बिनोद कुमार शर्मा
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19 hours ago
*भगवान की दृष्टि में जाति का मूल्य* *दण्डकारण्य वन में शबरी नाम की एक भीलनी अपनी कुटी बनाकर रहती और प्रेमपूर्वक साधना करती थी। वह भजन के साथ-साथ ऋषियों की कुछ सेवा भी करना चाहती थी पर ऋषि उसे अछूत कह कर उसकी सेवा भी स्वीकार न करते थे। निदान शबरी ने ऋषियों के रास्तों को झाड़ बुहार कर साफ करने और ईंधन इकट्ठा करके आश्रमों के आगे जमा कर देने की सेवा करना यह सोचकर आरम्भ कर दिया कि इसमें तो उन्हें आपत्ति होगी ही नहीं। किन्तु यह भी अभिमानी ब्राह्मणों को बुरा लगा। वे उसे पकड़कर मातंग ऋषि के आश्रम ले गये।* *मातंग दयालु थे। उन्होंने उसे छुड़ा दिया। इतना ही नहीं उसकी वृद्धावस्था को देखते हुए अपने विशाल आश्रम के एक कोने में उसे भी रहने की आज्ञा दे दी। यह बात अन्य ब्राह्मणों को बहुत लगी, उन्होंने मातंग का भी बहिष्कार कर दिया।* *भगवान राम जब दंड कारण अपने वनवास काल में आये तब सबसे पहले वे शबरी के ही आश्रम में गये। शबरी आचार व्यवहार में प्रवीण न थी। उसने इकट्ठे किये हुए बेरों को चख-चख कर मीठे-मीठे रामचन्द्रजी को खिलाये। उन्होंने लक्ष्मण समेत उन बेरों को बड़े प्रेम पूर्वक खाया।* *ऋषियों ने सरोवर में कीड़े पड़ने और उसका जल रुधिर होने की बात कही तो लक्ष्मण ने कहा-मतंग ऋषि के बहिष्कार और शबरी के अपमान का यही फल है । अब शबरी यदि उस जल को स्पर्श करे तो वह जल शुद्ध हो। शबरी ने उस तालाब में प्रवेश किया और वह फिर पूर्ववत् शुद्ध हो गया।* *भगवान की दृष्टि में जाति का नहीं भावना का मूल्य है।* *-रामकृपा-* #किस्से-कहानी