सच्ची मोहब्बत
मोहब्बत करके किसी को छोड़ना यह एक घटिया तरीन अमल है। मोहब्बत करना गुनाह नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो अल्लाह कभी न कहता— "जिससे मोहब्बत करते हो उससे निकाह भी करो।" मोहब्बत या तो होती है, या नहीं होती, दरमियान (बीच) का कोई रास्ता नहीं होता इसमें। अगर मोहब्बत करते हो तो उसे निकाह तक पहुँचाओ। कुछ लोग अपनी मोहब्बतों का मान रख के उसे हलाल तक ले जाते हैं। और कुछ कम-ज़र्फ (छोटे दिल वाले) लोग ज़रा सी आज़माइश पर अपनी मोहब्बत को बीच रास्ते में लावारिस छोड़ देते हैं।
ऐसे लोगों के लिए मोहब्बत हराम है। जब मोहब्बत होती है ना तो यह नहीं कहा जाता— "अल्लाह अगर वो मेरे हक़ में बेहतर है तो मुझे उससे नवाज़ दे।" नहीं!!! बल्कि कहा जाता है— "अल्लाह अगर वो मेरे हक़ में बेहतर नहीं भी है तो उसे मेरे हक़ में बेहतर लिख दे, मुझे वही चाहिए।" फिर ऐसी मोहब्बत करने वालों को मैंने नमाज़ों में रोते हुए भी देखा है। और ऐसी मोहब्बतें ही सच्ची मोहब्बतें होती हैं। यह वक्त गुज़ारी को मोहब्बत नहीं कहते। खुश रहें और मोहब्बत फैलाएं।
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