१. त्रेता में जो राम थे, द्वापर कृष्ण वही:
इस पंक्ति का अर्थ है कि समय (युग) बदल गया, लेकिन शक्ति वही रही। 'त्रेता युग' में जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के रूप में अवतरित हुए थे, वही परम तत्व 'द्वापर युग' में श्री कृष्ण के रूप में प्रकट हुए। यह हमें सिखाता है कि सत्य एक ही है, बस वह अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
२. रूप बदले पर तत्व नहीं:
ईश्वर जब अवतार लेते हैं, तो उनके शरीर, उनकी लीलाएं और उनके सामाजिक नियम (मर्यादा बनाम प्रेम) अलग हो सकते हैं। राम 'मर्यादा' के प्रतीक थे, तो कृष्ण 'लीला' और 'ज्ञान' के। लेकिन उनके भीतर का 'तत्व' (दिव्यता, चेतना और परमात्मा का अंश) बिल्कुल एक समान और अपरिवर्तित रहा।
३. बात का सार यही:
अंत में हमें बाहरी रूपों या नामों के भेद में नहीं फंसना चाहिए। चाहे हम राम की पूजा करें या कृष्ण की, हम उसी एक अखंड सत्ता का ध्यान कर रहे हैं।
🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩
🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩
. 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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#🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #👏भगवान विष्णु😇