"संस्करण"
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कुछ छुपा हुआ मुझमे,
उलझा हुआ ओझल सा,
कचोटता हुआ मेरे प्रतिबिंब जैसा,
अधछाँव प्रकाश लिये हुए,
थोड़ा लंबा फिर सिमटा हुआ।
जैसे बता रहा है,
अनछुए कुछ पहलुओं को,
ढहते हुए ढांचे को बनते हुए ढांचे को,
प्रकृति के वश हो प्रवृत्ति के विरुद्ध हो,
अंतर अनुभूति मे जलता हुआ,
साँय-साँय अँधेरे मे चलता हुआ।
एक आवेग एक उद्वेग बढ़ता सा,
कणकण को झंकझोरता
और कुछ कहता,
जो था अब नही है
जो नही था वो अब है,
आखिर कैसे हुआ ये कब हुआ ये,
विवश हुआ विचलित हुआ
समयवश हुआ,
या किंचित उचित प्रेमवश हुआ।
चमकते हुए तलवारों के संग,
रुनझुन नूपुरों के झंकार उपज गए।
गूंजते हुए ठहाकों के संग,
आँसूओ के भी मोती चार उपज गए।
अनुराजि प्रत्यक्षदर्शी मे,
वैरागी में अनुराग उपज गए।
लटकते हुए झूलते हुए,
ठोस फिर ठेठ प्रभावी मे
अनुभव के संस्कार उपज गए।
कुछ है छुपा हुआ मुझमे,
उलझा हुआ ओझल सा,
अँधेरे में चलता हुआ,
अंतर अनुभूति में जलता हुआ,
उजालों की ओर बढ़ता हुआ,
स्वतःकण में बहता हुआ,
कई कई मन को पढ़ता हुआ,
अन्तरंगो में रंगता हुआ,
पुनः-पुनः अंतःकण में बहता हुआ।💕💞
......✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳
#🌹प्यार के नगमे💖 #❤️ आई लव यू #💔पुराना प्यार 💔 #💝 शायराना इश्क़ #❤️Love You ज़िंदगी ❤️