🙏राम राम जी : CJC🙏
*डूबी हुई लागत प्रभाव*
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आसमान में ऊँचाई पर उड़ता एक बाज अपनी तेज़ नज़र से नीचे पानी में हलचल देख रहा था। उसकी दृष्टि अचानक एक बड़ी मछली पर टिक गई। *पंखों की ताक़त और पंजों की धार के साथ वह बिजली की तरह नीचे झपटा और मछली को अपने नुकीले नाखूनों में जकड़ लिया।*
शिकार सफल हुआ था। परंतु जैसे ही उसने उड़ने की कोशिश की, *उसे महसूस हुआ कि यह मछली साधारण नहीं है। उसका वजन बहुत अधिक है और वह लगातार छटपटा रही है। पानी की लहरें और मछली की ताक़त मिलकर बाज को नीचे खींच रही थीं।*
बाज के पास विकल्प था— *वह मछली को छोड़कर हल्का होकर फिर से आसमान में लौट सकता था। लेकिन उसने सोचा, _"इतना बड़ा शिकार आसानी से कहाँ मिलेगा? इसे छोड़ना मूर्खता होगी।"_ और उसने अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली।*
मगर मछली हार मानने वाली नहीं थी। उसने पूरी ताक़त से झटके दिए और बाज को कई फीट पानी के भीतर खींच लिया। *बाज ने संघर्ष किया, पंख फड़फड़ाए, पर पानी की गहराई और मछली की ताक़त ने उसे जकड़ लिया।*
अब बाज को समझ आया कि यह लड़ाई उसके जीवन पर भारी पड़ रही है। *उसने छोड़ने का प्रयास किया, परंतु बहुत देर हो चुकी थी। उसके पंजे इतने गहरे धँस चुके थे कि वह चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाया। अंततः पानी ने उसे पूरी तरह निगल लिया।*
बाज की मृत्यु मछली के कारण नहीं हुई। उसकी मृत्यु का असली कारण उसका लालच और छोड़ने की अयोग्यता थी। *यदि उसने सही समय पर पकड़ ढीली कर दी होती, तो वह बच सकता था।* यह दृश्य प्रकृति का एक गहरा सबक है।
दोस्तों, *जीवन में हम अक्सर ऐसी परिस्थितियों में फँस जाते हैं जहाँ हमें लगता है कि हमने बहुत निवेश किया है—समय, ऊर्जा, भावनाएँ या धन। हम जानते हैं कि रास्ता गलत है, फिर भी छोड़ नहीं पाते और हार जाते हैं। मनोविज्ञान में इसे "संक कॉस्ट इफेक्ट" या "डूबी हुई लागत प्रभाव" कहा जाता है। लालच और जिद हमें डुबो देती है, जबकि त्याग हमें बचा लेता है। इसलिए याद रखें, जीवन में पाना जितना ज़रूरी है, उतना ही छोड़ना भी ज़रूरी है।*
👉इ मीडिया से साभार उद्धरित👈
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