एक बार की बात है, जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में राज कर रहे थे, तभी ब्रह्माजी उनसे मिलने आए। द्वारपाल ने जाकर भगवान को सूचित किया—
“प्रभु, ब्रह्मा आपसे मिलने आए हैं।”
यह सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले—
“कौन से ब्रह्मा?”
द्वारपाल यह प्रश्न सुनकर चकित रह गया। उसने तुरंत जाकर वही सवाल ब्रह्मा जी से पूछा।
ब्रह्माजी ने उत्तर दिया—
“मैं ही चार मुखों वाला ब्रह्मा हूँ, सृष्टि का कर्ता।”
द्वारपाल ने यह संदेश भगवान को दिया, और श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा को भीतर बुलवा लिया।
जब ब्रह्माजी अंदर पहुँचे और श्रीकृष्ण के दर्शन किए, तो वे उनके चरणों में नतमस्तक हो गए। भगवान ने उन्हें आसन प्रदान किया। कुछ क्षण बाद श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए पूछा—
“आप अकेले ही आए हैं? दूसरे ब्रह्मा कहाँ हैं?”
यह सुनकर ब्रह्मा जी विस्मित हो गए।
उसी समय भगवान ने आदेश दिया, और अचानक चारों दिशाओं से असंख्य ब्रह्मा प्रकट हो गए—
कहीं दस मुख वाले ब्रह्मा, कहीं सौ मुख वाले, कहीं हजार मुख वाले…
कुछ के लाखों मुख, कुछ के करोड़ों!
सभी ब्रह्मा सृष्टियों के अधिपति थे, पर सभी श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम कर रहे थे।
चारमुखी ब्रह्मा जी ने पहली बार जाना—
कि अनंत ब्रह्माण्ड हैं, और हर ब्रह्माण्ड का अपना एक ब्रह्मा है…
और उन सभी के स्वामी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं।
ब्रह्मा जी का अहंकार क्षणभर में मिट गया। उनका हृदय भक्ति और विनम्रता से भर उठा।
अंत में भगवान ने सभी ब्रह्माओं को आशीर्वाद देकर उनके-उनके लोकों में भेज दिया।
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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