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जब भगवान श्री कृष्ण ने दुर्योधन के छप्पन भोग त्याग कर महात्मा विदुर के भोजन किया !
कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को रोकने के लिए भगवान कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए थे। दुर्योधन ने कृष्ण को प्रभावित करने के लिए बहुत बड़ी तैयारी की थी। उसने सोने की थालियों में छप्पन प्रकार के व्यंजन बनवाए और सोचा कि कृष्ण इन सुख-सुविधाओं से प्रसन्न हो जाएंगे।।
जब कृष्ण सभा में पहुँचे, तो दुर्योधन ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। लेकिन कृष्ण ने बड़ी विनम्रता और स्पष्टता से कहा
"दुर्योधन, भोजन के केवल दो कारण होते हैं—या तो खिलाने वाले के मन में प्रेम हो, या खाने वाले को बहुत भूख हो। यहाँ न तो तुम्हें मुझसे प्रेम है और न ही मुझे भूख है। इसलिए तुम्हारा यह अहंकारी भोजन मुझे स्वीकार नहीं।"
दुर्योधन के राजमहल को छोड़कर कृष्ण सीधे महात्मा विदुर के घर पहुँचे। विदुर जी उस समय घर पर नहीं थे, केवल उनकी पत्नी सुलभा (विदुरानी) घर पर थीं। जब उन्होंने देखा कि साक्षात द्वारिकाधीश उनके द्वार पर खड़े हैं, तो वे सुध-बुध खो बैठीं।
वे इतनी भावुक हो गईं कि उन्हें समझ नहीं आया कि भगवान का स्वागत कैसे करें। उनके पास न तो बैठने के लिए कोई कीमती आसन था और न ही खिलाने के लिए कोई पकवान।
विदुरानी जी ने भगवान को बिठाया और घर में रखे हुए कुछ केले लेकर आईं। भगवान कृष्ण ने कहा, "काकी, मुझे बड़ी भूख लगी है, जल्दी से कुछ खाने को दो।"
भगवान की भूख का सुनकर विदुरानी और भी व्याकुल हो गईं। वे कृष्ण के चेहरे को एकटक निहारते हुए केले छीलने लगीं। प्रेम की अतिशयता और तल्लीनता में उन्होंने केला तो फेंक दिया और छिलका कृष्ण के हाथ में दे दिया।
भगवान कृष्ण भक्त के उस प्रेममयी पागलपन को देख रहे थे। उन्होंने बिना कुछ कहे बड़े चाव से वह छिलका खाना शुरू कर दिया। वे ऐसे खा रहे थे जैसे उन्होंने इससे अधिक स्वादिष्ट वस्तु कभी चखी ही न हो।
इतने में विदुर जी घर आए और यह दृश्य देखकर चौंक गए। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "अरी ओ पगली! यह तू क्या कर रही है? साक्षात भगवान को केले के छिलके खिला रही है!"
विदुरानी होश में आईं और अपनी भूल पर लज्जित होकर रोने लगीं। विदुर जी ने तुरंत केले का गूदा (फल) कृष्ण की ओर बढ़ाया। कृष्ण ने एक ग्रास खाया और मुस्कुराकर कहा:
"विदुर जी, इस केले में वह स्वाद कहाँ, जो काकी के उन छिलकों में था! वह छिलके केवल छिलके नहीं थे, वे शुद्ध प्रेम में डूबे हुए थे।"
यह कहानी हमें 'प्रेम-लक्षणा भक्ति' का परिचय देती है।
निष्कपटता: भगवान को दिखावा पसंद नहीं है।
शरणागति: विदुरानी के पास कुछ नहीं था, लेकिन जो था (प्रेम), वह पूर्ण था।
ईश्वर का स्वभाव: भगवान भक्तों के दोष नहीं देखते, वे केवल उनके हृदय के भाव को ग्रहण करते हैं।
इसीलिए भक्त गाते हैं:
"सबसे ऊँची प्रेम सगाई, दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाई।"
अनिल सुधांशु
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