श्री जगन्नाथ पुरी के पास रहने वाला रघु केवट अत्यंत दयालु और भगवद भक्त था। मछली पकड़ना उसका पैतृक व्यवसाय था, किंतु जीव-हिंसा से उसका मन ग्लानि से भर जाता था। एक दिन जब उसने एक तड़पती हुई मछली में साक्षात नारायण के दर्शन किए, तो उसने मछली की रक्षा की और सदैव के लिए हिंसा का त्याग कर दिया।
रघु की इस निस्वार्थ दया और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए। रघु अब पूर्णतः भक्ति में लीन रहने लगा और उसकी ख्याति एक सिद्ध महात्मा के रूप में फैल गई।
कथा का सबसे मर्मस्पर्शी क्षण तब आता है जब स्वयं भगवान जगन्नाथ, मंदिर के राजसी भोग को छोड़कर रघु की साधारण कुटिया में उसके हाथ से भोजन ग्रहण करने पहुँच जाते हैं। उधर मंदिर के 'भोग मंडप' के दर्पण में प्रभु का प्रतिबिंब दिखना बंद हो जाता है, जिससे राजा और पुजारी व्याकुल हो उठते हैं।
अंततः, भगवान स्वप्न में राजा को बताते हैं कि वे अपने भक्त रघु के प्रेम के वशीभूत होकर उसकी कुटिया में हैं। राजा स्वयं रघु को ससम्मान पुरी लेकर आते हैं, और भक्त की उपस्थिति मात्र से मंदिर में प्रभु का सान्निध्य पुनः लौट आता है। यह कथा सिद्ध करती है कि ईश्वर मंदिर की भव्यता में नहीं, बल्कि भक्त के कोमल भाव और जीव-दया में बसते हैं।
राधे राधे
मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १००८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा
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