1.5.2026
रूप रस गंध आदि विषयों को ग्रहण करने का साधन आंख रसना नासिका आदि इंद्रियां हैं। इन पांच विषयों का ग्रहण पांच इंद्रियों से होता है। इन्हें ज्ञानेंद्रियां कहते हैं। और *"जो सुख-दुख का ग्रहण है, वह आंतरिक इंद्रिय मन से होता है।"*
अब जीवन में सुख और दुख दोनों आते रहते हैं। जब कोई समस्या आपत्ति परेशानी आती है, तो लोग दुखी हो जाते हैं। और वे सोचते हैं, कि *"जब ये सारी समस्याएं आपत्तियां परेशानियां दूर हो जाएंगी, तब मन प्रसन्न होगा।"*
*"परंतु इस बात में आधा सत्य है और आधी भ्रांति है।"* इतना तो ठीक है, कि *"जब बाहर की आपत्तियां परेशानियां दूर हो जाती हैं, तो मन प्रसन्न हो जाता है।" "परंतु बहुत सी परेशानियां तो व्यक्ति अपनी अविद्या के कारण अपने मन में स्वयं उत्पन्न करता रहता है। उसकी सोचने की पद्धति ठीक न होने से, अर्थात उसका चिंतन नकारात्मक होने से वह अपने मन में बहुत से दुखों को उत्पन्न करता रहता है, और प्रसन्न नहीं रहता।"*
*"यदि व्यक्ति अपने सोचने का ढंग ठीक कर ले, सकारात्मक चिंतन करे, तो बहुत से मानसिक दुख दूर हो सकते हैं। और व्यक्ति बहुत मात्रा में प्रसन्न रह सकता है।"*
*"फिर जो बाहर की आपत्तियां और परेशानियां हैं, उन्हें भी दूर करने का प्रयत्न करे। यदि व्यक्ति ये दोनों काम कर ले, तो उस का मन पूरा प्रसन्न हो जाएगा।"*
(नोट -- यह जो हम भाषा में बोलते हैं,कि *"मन प्रसन्न हो जाएगा।"* यह केवल बोलने की भाषा है, वास्तविकता नहीं है। *"वास्तव में मन जड़ पदार्थ है। न वह दुखी होता है, और न ही वह प्रसन्न होता है। आत्मा चेतन पदार्थ है। वही प्रसन्न होता है, और वही दुखी होता है।"* केवल मोटी भाषा में हम ऐसा कह देते हैं, कि *"आज मेरा मन प्रसन्न है, अथवा मेरा मन दुखी है।"* जैसे हम मोटी भाषा में ऐसा कह देते हैं, कि *"चलो भाई उतरो, अहमदाबाद स्टेशन आ गया।"* जबकि अहमदाबाद स्टेशन नहीं आता, आती तो रेलगाड़ी है। जैसे यह मोटी भाषा है। ऐसे ही मोटी भाषा में कह देते हैं, कि *"आज मेरा मन बहुत दुखी है, और आज मेरा मन बहुत प्रसन्न है। वास्तव में आत्मा ही सुखी और दुखी होता है।")*
*"अतः अपना चिंतन सकारात्मक रखें। अपनी समस्याओं को बुद्धिमत्ता से सुलझाएं। स्वयं न सुलझा पाएं, तो दूसरे बुद्धिमान लोगों की सहायता लेवें।" "नकारात्मक चिंतन कर करके व्यर्थ ही मन में दुखों को उत्पन्न न करें। चिंताएं न करें, बल्कि सकारात्मक चिंतन करें। इससे आपका मन प्रसन्न रहेगा।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*
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