#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏
।।जय श्री राम।।
सातंव सम मोहि मय जग देखा।
मोतें संत अधिक करि लेखा।।
श्री राम जी शबरी माता को सातवीं नवधा भक्ति की महिमा बताते हुए कहते हैं कि यह सारा संसार मेरा ही स्वरुपहै इसलिए
सब में मुझे ही देखना चाहिए। श्री तुलसी दासजी महाराज जगत में जितने जड़और चेतन जीव हैं सभी को राम मय जानकर उन सबके चरणों की वंदना करते हैं।
जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राममय जानि
बदंउ सब के पद कमल
सदा जोरि जुग पानि।।
भगवान का भक्त सभी में अपने परमात्मा को ही देखता है। इसीलिए श्री तुलसीदास जी महाराज सारे संसार को परमात्मा मय जानकर लिखते हैं।(सियाराम मय सब जग जानी )(करहु प्रणाम जोरिजुग पानी)
भगवान ने नवधा भक्ति का जो वर्णन किया है उसमें भक्ति के अनेक रूप बताएं हैं। संत का संग यह भगवान की भक्ति है। भगवत कथा में प्रीति होना यह भगवान की भक्ति है। अभिमान रहित होकर गुरुदेव के चरणों की सेवा करना यह भी भगवान की भक्ति है ।
निष्कपट भाव से भगवान के गुणों को गाना यह भगवान की भक्ति है भगवान के मंत्र या उसके पावन नाम जप में दृढ़ विश्वास रखना यह भी भगवान की भक्ति है ।और इंद्रियों का संयम करके वैराग्य वान होकर सज्जनों के धर्म का पालन करना यह भी भगवान की भक्ति है।
छै भक्तियों का वर्णन अभी तक किया गया है पर सब भक्तियों के साथ शर्त रखी गई है। भगवान के गुण गाए तो शर्त यह है कि कपट का त्याग करें। मंत्र जाप करें तो शर्त यह है की दृढ़ विश्वास रखें।
इंद्रियों का संयमी हो वैराग्यवान हों तो इसमें भी शर्त है कि वैराग्य वान होकर निरंतर सज्जनों के आचरण का पालन करें ।
इसी तरह सातवीं भक्ति में भी शर्त रखी है कि सब में मुझको देखे पर शर्त यह है कि संत को मुझसे भी अधिक समझे। (मौतें अधिक संत करि लेखा )
अब कोई संत यह कहे कि मुझे भगवान से भी अधिक समझो। भगवान ने स्वयं ऐसा कहा कि मुझसे अधिक संत को समझो।तो विचार क्या करते हो समझो ।भगवान से अधिक मुझे समझो।
मानस के मर्मज्ञ संत कहते हैं कि जो अपने को भगवान से भी अधिक समझते हों वह संत नहीं हो सकतें हैं। यदि कोई तुम्हें भगवान से अधिक समझे तो तुम्हें खुश होने की आवश्यकता नहीं है यह तुम्हारा सौभाग्य नहीं यह तुम्हारा दुर्भाग्य है।
जब भगवान ने कहा कि संत को मुझसे भी अधिक समझो तो वह संत कैसा जो इस बात को स्वीकार करले। संत को तो यही कहना चाहिए नहीं भाई यह तो भगवान की करुणा है जो संतो को इतना महत्व दिया है, पर भगवान से अधिक महिमा तो किसी की नहीं हो सकती है।
सबसे अधिक महिमा तो भगवान कीही है
भरत जी संत हैं। श्री राम जी कहते हैं भरत तुम्हारे समान पुण्यआत्मा तीनों लोकों में नहीं है। भरत जी ने कहा प्रभु मैं पुण्यआत्मा कैसे?। मैं तो बहुत बड़ा पापी हूं। मेरे पाप के कारण ही आपको वनवास हुआ है। मैं पापी हूं मेरे कारण ही लक्ष्मण भैया को श्री सीता जी को और आपको वनवास हुआ है।
श्री राम जी ने कहा भरत तुम ऐसा मानते हो कि तुम्हारे पाप के कारण मुझे वनवास हुआ है,पर वन में मैंने जब संतों के दर्शन किए तो संतों ने मुझसे पूछा राम तुम्हारा वनवास क्यों हुआ? तुम किस पाप के कारण वन में आए हो?।
श्री राम जी ने कहा भरत मैंने संतो से यही कहा कि महाराज शास्त्रों में तो ऐसा वर्णन है कि बिना पुण्य के संतो के दर्शन दुर्लभ है। मैं वन में आया हूं तो मैं अपने पुण्यों के प्रभाव के कारण वन में आया हूं
मेरे पुण्यों से मुझे संतों के दर्शन हुए हैं।
(पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।
सतसंगति संसृति कर अंता।।
श्री राम जी ने कहा भरत तुम कह रहे हो कि तुम्हारे पाप के कारण मुझे वन मिला
और मैं कह रहा हूं कि मेरे पुण्य के कारण मुझे वनवास हुआ। तो जरा विचार करो जो काम तुम्हारे पाप ने किया वही काम मेरे पुण्य ने किया। तो इससे यह तो सिद्ध होता है कि तुम्हारे पाप और मेरे पुण्य दोनों ने एक ही काम किया।
श्री राम जी कहते हैं भरत अब विचार करके देखो जब तुम्हारे पाप मेरे पुण्यों की बराबरी कर सकते हैं, तो तुम्हारे पुण्यों की क्या महिमा होगी। इसीलिए मैं कहता हूं कि तुम्हारे समान पुणयत्मा तीनों लोकों में नहीं है।
तीन काल त्रिभुवन मत मोरे।
पुणयसि लोक तात तर तोरे।।
श्री राम जी ने कहा भरत तुम कुटिल हो नहीं फिर भी यदि कोई तुम्हें धोखा से कुटिल समझ ले तो उसका लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाएगा।
उर आनत तुम पर कुटलाई।
लोक जाई परलोक नसाई।।
जब श्री राम जी ने कहा कि यदि कोई तुम्हें धोखे से कुटिल समझेगा तो उसका लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाएगा
तो सभा में बैठे हुए सभी की आंखों में आंसू आ गए पर दो बहुत दुखी हुए।
दो कौन दुखी हुए?।
निषाद राज और श्री लक्ष्मण जी दोनों
बहुत दुखी हो गए। क्योंकि निषाद राज ने और श्री लक्ष्मण जी दोनों ने भरत जी को कुटिल कहा था। निषाद राज ने कहा था
यदि भरत के मन में कुटिलता नहीं होती
तो सेना लेकर क्यों आते।
जौं पै जिय न होत कुटिलाई।
तो कत संग लीन्ह कटकाई।।
लक्ष्मण जी ने भी यही कहा था कि भाई के मन में कुटिलता है इसीलिए तो यह समझ कर आया है कि रामजी वन मे अकेले हैं अवसर अच्छा है।
कुटिल कुबंधु कुअवसर ताकी।
जानि राम वनवास एकाकी।
राम जी ने जैसे ही कहा कि किसी ने धोखे से भी भरत को कुटिल कुबंधु कहा है तो उसके लोक पर लोक नष्ट हो जाएंगे
तो लक्ष्मण जी और निषाद राज दोनों की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें लगा कि यह ब्रह्म वाक्य है। राम जी की बात मिथ्या नहीं हो सकती है। हमारे लोक और परलोक दोनों नष्ट हो गए हैं।
वशिष्ठ जी ने राम जी से पूछा कि इसका उपाय क्या है? भरत जी को कुटिल कहने वाले के लोक परलोक नष्ट हो गए हैं तो इसका उपाय क्या है जिससे इनके लोक पर लोक सुधर जाएं।
श्री राम जी ने कहा इसका एक ही उपाय है,।भरत जो तुम्हारे नाम का सुमिरन करेगा उसके लोक और परलोक दोनों सुधर जाएंगे।
मिटिहहि पाप प्रमेय सब
अखिल अमंगल भार
लोक सुजसु परलोक सुख
सुमिरत नाम तुम्हार।।
श्री राम जी अयोध्या वासियों से कहते हैं कि जब मैं वन में आ रहा था तब मैं रथ
में बैठ कर आ रहा था और तुम पैदल पैदल आ रहे थे। और तुम भरत जी जैसे संत के साथ में आए तो भरत जी पैदल-पैदल आए और तुम्हें रथ में बैठा कर लाए इसलिए ऐसे महात्मा की महिमा अधिक है।
भगवान कहते हैं मैं सभी के हृदय में रहता हूं। और सभी के हृदय में सुमति और कुमति भी रहती है। कुमति के कारण मुझे वनवास हुआ और सुमति रुपी संत ने मुझे वापस सिंहासन पर बैठा कर अयोध्या वासियों से मिला दिया।
इसलिए जो भगवान से बिछड़ गए हैं, य
भगवान जिन से बिछुड़ गये है उन्हें आपस में मिला देना यह संत का ही काम है। इसलिए मुझसे अधिक महिमा संत की है।
( मोतें अधिक संत करि लेखा )
नवधा भक्ति में आठवीं भक्ति की महिमा का वर्णन अगले प्रशगंमें। जय श्री राम।।