sn vyas
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2 days ago
#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 ।।जय श्री राम।। आठंव जथा लाभ संतोषा। सपनेहुं नहि देखइ परदोषा।। भगवान ने सबरी माता को सातवीं भक्ति की महिमा बताई यहां तक हमने पिछले प्रसंगो में पड़ा। अब इस प्रसंग में आठवीं भक्ति की महिमा है। आठवीं भक्ति में कहा गया है कि प्राप्त को ही पर्याप्त समझो।और दूसरों में स्वप्न में भी दोष मत देखो यह हमारा स्वभाव होना चाहिए यह आठवीं भक्ति की महिमा है। प्रत्येक परिस्थिति में संतुष्ट बने रहना यह भगवत भक्ति के लक्षण हैं। असंतुष्ट एंव असंतोष यह बीमारी है पर इसका एक ही इलाज है।छै विकारों में सर्वाधिक प्रबल विकार तीन हैं।काम,क्रौधऔर लोभ यह तीनों विकार क्षण भर में मुनि जनों के मन में भी छोभ उत्पन्न कर देते हैं। तात तीन अरु प्रबल खल काम क्रौध अरु लोभ मुनि विग्यान धाम मन करहि निमिष महुं छोभ तीनों विकारों को मिटानेका एक ही उपाय है और वह है संतोष।श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कामनाओं से निवृत्ति बिना संतोष के मिट नहीं सकती है। बिना कामनाएं मिटे स्वप्न में भी सुख नहीं मिल सकता है। बिनु संतोष कि काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहु नाहीं।। क्रोध को मिटाने का भी यही उपाय है। जब परशुराम जी को बड़ा क्रोध आ रहा था तब श्री लक्ष्मण जी ने कहा महाराज यदि आप कुछ कहना चाहते हो तो कह डालिए क्रौध को रोककर यह दुसह दुख क्यों सह रहे हो?कहकर संतुष्ट हो जाओ। क्योंकि बिना कहे आपको संतोष होगा नहीं। नहिं संतोष तो पुनि कछु कहहीं। जनि रिषि रोक दुसह दुःख सहहूं।। श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं जिस तरह अगस्त्य तारे के उदित होने पर नदियों का तालाबों का मार्ग जल सूख जाता है,उसी तरह संतोष लोभ को सोख लेता है।बिना संतोष के लोभ मिटता नहीं उदित अगस्त्य पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।। इस विषय में कबीर दास जी भी यही कहते हैं कि व्यक्ति के पास चाहे जितना धन आ जाए चाहे हाथी घोड़ा हीरे मोती जवाहरात, संसार की सारी भौतिक वस्तुओं का सुख उसे मिल जाए संतोष नहीं होगा। पर संतोष रुपी धन आने पर यह सब धूल के समान लगने लगेंगे। गो धन गज धन बाजि धन और रत्न धन खानि जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान भगवान का भक्त कौन?। भगवान का भक्त वही जो संतोषी हों। जितना उसे मिल जाए उतने में ही संतुष्ट रहें प्राप्त को ही पर्याप्त समझें।ऐसा नहीं की इसने इतना नहीं दिया उसने उतना नहीं दिया। श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि तुम्हारे लोटे में जल उतना ही आएगा जितनी उस लोटे की क्षमता है। इसके लिए तुम चाहे कुएं के पास जाओ चाहे नदी के पास जाओ चाहे समुद्र के पास जाओ, लोटे की क्षमता से अधिक एक बूंद भी नहीं आएगा। करम कमंडल कर लियो तुलसी जहं जहं जाय सरिता कूप समुद्र जल बूंद न अधिक समाय।। एक महात्मा जी कहा करते थे कि भाग्य में होगा तो भाग कर आ जाएगा और भाग में नहीं होगा तो आया हुआ भी भाग कर चला जाएगा। प्रारब्ध का परिणाम ही जीवन में मिलता है इसलिए दूसरों को क्या दोष देना। अपने ही भाग्य का फल अपने सामने हैं। पहले तो प्रारब्ध रच्यो पाछे रच्यो शरीर तुलसी चिंता मत करें भजले श्री रघुवीर।। इसलिए प्राप्त को ही पर्याप्त समझे। यही है (आंठव जथा लाभ संतोषा )। जैसे कि प्रत्येक भक्ति के साथ कोई ना कोई शर्त लगी है इसी प्रकार आठवीं भक्ति के साथ भी एक शर्त है । इसमें शर्त यह है कि जितना मिला हो उसमें संतुष्ट तो रहें पर संतुष्ट रहते हुए दूसरों मे दोष दिखाई नहीं देना चाहिए। श्रृंगवेरपुर में जब श्री सीताराम जी घास फूस के बिछोने पर विश्राम कर रहे थे तब राम जी के सखा निषाद राज को बड़ा दुख हुआ। निषाद राज ने राम जी के दुख का कारण कैकई माता को माना पर श्री लक्ष्मण जी ने कहा नहीं भाई। किसी के सुख-दुख का कारण कोई दूसरा नहीं है। सब अपने ही प्रारब्ध का फल पाते हैं। कोउ न कछु सुख दुख कर दाता निज कृत करम भोग सुनु भ्राता।। अब कई लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि राम जी का ऐसा कौनसा प्रारब्ध था जिसके कारण उन्हें दुःख झेलना पड़ा।? उत्तर सीधा सा है ।वन गमन की इच्छा ही रामजी की थी। सरस्वती जी को प्रेरित ही राम जी ने किया इसके पश्चात जो भी घटना क्रम हुआ सब रामजी की इच्छा से ही हुआ। इसलिए इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है । भगवान का भक्त किसी को दोषी नहीं मानता है। कागभुसुंडि जी ने गरुड़ जी को अपनी कथा सुनाई थी कि लोमश ऋषि के वचनों को जब मैंने स्वीकार नहीं किया तब क्रोध में आकर लोमश ऋषि ने मुझे कौवा होने का श्राप दे दिया। गरुड़ जी ने कहा फिर तो तुम्हें लोमश ऋषि पर क्रौध आया होगा? कागभुशुण्डि जी बोले मुझे क्रौध नहीं आया। गरुड़ जी ने कहा तुम्हें क्रोध क्यों नहीं आया?।श्राप दिया ही था तो मनुष्य ही बने रहने देते कौवा क्यों बनाया?। कागभुशुण्डि जी बोले कौवा होने पर मैं तो प्रशन्न हो गया। मनुष्य होता तो राम जी के दर्शन के लिए अयोध्या जाता फिर जरूरी नहीं कि मुझे अयोध्या के राज महल में प्रवेश मिल ही जाता।और यदि एक बार प्रवेश मिल भी जाता तो केवल एक ही बार राम जी के दर्शन कर पाता। अब मुझे कौवे का रूप मिल गया तो मैं स्वतंत्र हो गया। आराम से उड़कर सीधे राजमहल में जाऊंगा किसी से पूछना ही नहीं है। वहीं रहकर अपने प्रभु के दर्शन करूंगा।और यह श्राप कोई लोमश ऋषि ने थोड़े ही दिया।यह तो भगवान की ही इच्छाथी।लोमसऋषि तो केवल माध्यम थे भगवान मेरी परीक्षा लेना चाह रहे थे। कृपा सिंधु मुनि मति करि भोरी लीन्ही प्रेम परीक्षा मोरी।। कागभुशुण्डि जी कहते हैं जब मैं कौवा होकर उड़के जाने लगा तो मेरे गुरु देव ने मुझे बुलाया। मेरे गुरुदेव का तो केवल बहाना था यह परीक्षा तो मेरी भगवान के द्वारा ही ली जा रही थी कि भक्त कच्चा है या पक्का। जब मैंने अपने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम किया तो गुरुदेव की आंखों से आंसू बर सने लगे मानो संकेत यह था कि तुम परीक्षा में पास हो गए हो।तो भगवान का भक्त हर परिस्थिति को भगवान की ही इच्छा मानता है।वह किसी को दोषी नहीं मानताहै यही आंठवी भक्ति की महिमा है आठंव जथा लाभ संतोषा। सपनेहु नहिं देखइ परदोषा।। नवधा भक्ति प्रसंग की नवीं भक्ति की महिमा हम अगले प्रशंग में पड़ेंगे। इसके पश्चात श्री राम जी के वन गमन की लीला में आगे श्री राम जी ने और क्या-क्या चरित्र किए उन प्रसंगों को पढ़ेंगे जय श्री राम।।