#जय श्री कृष्ण
' श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला '
कुब्जा का उद्धार और रंगभूमि में प्रवेश....
मथुरा नगरी में कदम रखते ही भगवान श्रीकृष्ण ने जो लीलाएं रचीं, वह हर भक्त के हृदय को आनंद से भर देती हैं। आइए जानते हैं कंस की दासी 'कुब्जा' के उद्धार और रंगभूमि के उस अद्भुत दृश्य का रहस्य:
कुब्जा पर कृपा:
कंस की एक दासी थी सैरन्ध्री। शरीर तीन जगह से टेढ़ा होने के कारण सब उसे 'कुब्जा' या 'त्रिवक्रा' कहते थे। वह प्रतिदिन कंस के लिए चंदन और हार लेकर जाती थी। रास्ते में जब करुणासागर श्रीकृष्ण ने उससे चंदन माँगा, तो प्रभु के प्रेम और तेज के आगे वह मना नहीं कर सकी। जैसे ही उसने अपने हाथों से भगवान के माथे पर चंदन लगाया, श्रीकृष्ण ने उसके पैरों को दबाकर और ठुड्डी को उठाकर उसे एक परम सुंदरी बना दिया! पहली बार किसी ने उसे सम्मान और प्रेम दिया था।
आध्यात्मिक रहस्य: कुब्जा कोई और नहीं, हमारी 'बुद्धि' है, जो काम, क्रोध और लोभ रूपी तीन विकारों से टेढ़ी हो चुकी है। जब तक यह कंस (अहंकार) की दासी रहती है, टेढ़ी ही रहती है। लेकिन ज्यों ही यह बुद्धि भगवान के चरणों में समर्पित होती है, इसके सारे विकार मिट जाते हैं और यह निर्मल हो जाती है।
धनुष भंग और कुवलयापीड़ का वध:
आगे बढ़कर प्रभु ने शिव-धनुष को बाएं हाथ से उठाकर गन्ने की तरह तोड़ दिया। जब कंस के महावत ने कुवलयापीड़ नामक हाथी को उन पर छोड़ना चाहा, तो प्रभु ने उसे भी सहज ही मार गिराया। इन समाचारों को सुनकर साक्षात् कंस भी कांप उठा!
रंगभूमि में प्रभु का प्रवेश:
जब श्रीकृष्ण और बलराम ने कंस की विशाल रंगभूमि में प्रवेश किया, तो वहां एक अद्भुत चमत्कार हुआ। शुकदेव जी वर्णन करते हैं कि एक ही कृष्ण वहां बैठे लाखों लोगों को अलग-अलग रूपों में दिखाई दिए:
पहलवानों को: वज्र के समान कठोर।
युवतियों को: साक्षात् कामदेव के समान मनमोहक।
गोप-ग्वालों को: अपने प्रिय सखा के रूप में।
कंस को: साक्षात् मृत्यु (काल) के रूप में।
योगियों और ज्ञानियों को: परमतत्त्व और साक्षात् परब्रह्म के रूप में।
"जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।।"
परमात्मा का स्वरूप कभी नहीं बदलता, लेकिन हमारी जैसी 'भावना' होगी, जिस रंग का हमारा नजरिया होगा, प्रभु हमें उसी रूप में दर्शन देंगे।
जय श्रीकृष्ण....
.