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shyamsundarpatel
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सिंधु की अनेक गहरा और गहन –हृदय जिनकी कल्पना अनेक; जिनके जीवन में हो नेक अनेक स्वप्न उनके कोई न अनेक भटकाव। होते जिनके नन्हें बच्चे उनके नवीन स्वप्न भी होंगे न जीवन के उचित मार्ग न ही कुछ प्रपंच होंगे; उनके वास्ते केवल कुछ स्मृतियों  कुछ ख़्वाब ही अनुपम होंगे जो न होगा वह सुकून की रातें और न ही आकाश के तारें जिनके छांव में वह नवीन स्वप्न के स्तंभों को कर सके स्तंभित। संभारी एवं विचलित छड़ों वाला एक बिलखित सुमन की उपवन में जिनके नेक इरादों के स्वप्न सजेंगे; होंगे केवल अनोखे ख़्वाब; विख्यात नामों की कुछ उठते भाव जिनके हृदय ; कुछ मचलकर कहते हो वह स्तंभित भवन की रोटी बिलखती स्त्री वह मलिन व्यथा उसके ; आहत हृदय ऐसा मालूम हो कि दीर्घकालीन व्यथा है। जीवन के अनुचित उठते स्वप्न ; जिनके कदम बिल्कुल कल्पनाओं के पर उनके दुर्गम इरादे कुछ मचलते भाव उठते हृदय के तरंगें; बढ़ती जंजीरों की बेड़ियां विचलित करते जीवन के व्यथित क्षण जिनके आहत मात्र से जीवन खंडित हो जाते; होते हृदय भी आहत; मगर हो कुछ स्वप्न भी कुछ कर गुजरने की प्रबल अभिलाषा। भाव, अनु भाव,विभाव और संसारी भाव से करते अतुलित प्रेम हम जिनको; उनके प्रीति में होती हमारी असीम श्रद्धा ; जिनके हृदय में उठते हमारे प्रति प्रेम; नैन भी रोते आखों के पलके  मधुर स्वप्न न सजोए और न ही पुतलियां आंखों के सुंदर छवि देखती; अब वह ढूंढती है तो केवल प्रियतम की छवि; उसके प्रेम के मनोरम स्पर्श और सजल आंखे; जिनमें अपने प्रिय के प्रति कभी रौद्र भाव दर्श न हुए; तुम तो थे चित मन के सुंदर पंछी अब चले कौन को देश; अब जिया डोले मन को पराई छवि न भावे; भईल दो चार बारिश बीतल तनिक उमरिया कह गए छलिया मिलन तोहे आईबो ; काबहुं मगर बीतल हीरा जड़ित रे उमीरिया मगर अबगांव हु न आइल पिया के  पता  रे –खबरिया; ##साहित्यलेखन #साहित्यकविता#साहित्यलेखन #📚कविता-कहानी संग्रह
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