#यह प्रसिद्ध दोहा संत कबीरदास जी द्वारा रचित है, जो ईश्वर की सर्वव्यापकता और मनुष्य के अज्ञान को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि कस्तूरी मृग (हिरण) अपनी ही नाभि में स्थित कस्तूरी की सुगंध को पूरे जंगल में खोजता है, ठीक वैसे ही ईश्वर हर मनुष्य के हृदय (घट-घट) में मौजूद हैं, लेकिन दुनिया उन्हें बाहर खोजती है।
दोहे का विस्तृत अर्थ:
कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूढ़े वन माहि: कस्तूरी (एक सुगंधित पदार्थ) हिरण की नाभि में होती है, लेकिन अनजान हिरण उस सुगंध के कारण उसे जंगल (वन) में यहाँ-वहाँ ढूंढता फिरता है।
ऐसे घट घट हरि हैं, दुनिया देखे नाहि: इसी प्रकार, ईश्वर (राम/हरि) हर इंसान के हृदय में, संसार के कण-कण में रमे हुए हैं, लेकिन अज्ञानता और मोह के कारण दुनिया उन्हें तीर्थों, मंदिरों और बाहर की दुनिया में ढूंढती है।
शिक्षा (संदेश):
कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं है; वे आपके भीतर ही निवास करते हैं। अपनी अंतरात्मा में झांकने पर ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।#
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