🌹कर्ज वाली लक्ष्मी🌹
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एक साधारण से घर में रहने वाला पंद्रह साल का बेटा जब अपने पिता दीनदयाल जी के पास आकर उत्साह और घबराहट भरे स्वर में बोला कि पापा, दीदी के होने वाले ससुर-सास कल आ रहे हैं और जीजाजी का फोन आया था कि दहेज को लेकर कुछ ज़रूरी बात करनी है, तो पहले से ही चिंतित दीनदयाल जी का चेहरा और बुझ गया; कुछ दिन पहले ही उनकी बड़ी बेटी की सगाई एक अच्छे, सुसंस्कृत परिवार में तय हुई थी, पर दहेज का डर उनके मन में लगातार घर करता जा रहा था।
उन्होंने भारी मन से कहा कि बेटा, उनका फोन आया था कि दहेज की बात करने आ रहे हैं और यह सोचकर ही मेरा कलेजा काँप रहा है कि कहीं उनकी मांग इतनी ज़्यादा न हो जाए जिसे मैं पूरा न कर पाऊँ, कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं और यह उदासी पूरे घर में फैल गई, माँ चुपचाप आँचल से आँखें पोंछने लगी और बेटी भी अपने कमरे में जाकर उदास हो गई।
अगले दिन समधी-समधिन आए, पूरे सम्मान और सादगी से उनका स्वागत किया गया, चाय-नाश्ते के बाद जब वातावरण थोड़ा शांत हुआ तो लड़के के पिता ने कहा कि दीनदयाल जी, अब ज़रा काम की बात हो जाए, यह सुनते ही दीनदयाल जी की धड़कन तेज़ हो गई, वे हाँ-हाँ करते हुए हाथ जोड़कर बैठ गए। लड़के के पिता ने अपनी कुर्सी पास खिसकाई और धीरे से उनके कान में कहा कि मुझे दहेज के बारे में बात करनी है, दीनदयाल जी की आँखों से आँसू छलक पड़े और उन्होंने काँपते स्वर में कहा कि समधी जी, जो आपको उचित लगे बताइए, मैं पूरी कोशिश करूँगा, तब लड़के के पिता ने उनका हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े स्नेह से कहा कि दीनदयाल जी, आप कन्यादान में कुछ भी दें या कुछ भी न दें, थोड़ा दें या ज़्यादा दें, मुझे सब स्वीकार है, लेकिन एक शर्त है कि कर्ज लेकर आप एक रुपया भी दहेज मत दीजिए, क्योंकि जो बेटी अपने पिता को कर्ज में डुबो दे, वैसी कर्ज वाली लक्ष्मी मुझे स्वीकार नहीं, मुझे ऐसी बहू चाहिए जो बिना कर्ज के मेरे घर आए और अपने संस्कार, समझदारी और परिश्रम से मेरी संपत्ति और सुख को दोगुना कर दे।
यह सुनकर दीनदयाल जी स्तब्ध रह गए, उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले, उन्होंने समधी जी को गले लगाकर कहा कि आपने आज मेरी आत्मा से बोझ उतार दिया और बिल्कुल ऐसा ही होगा, उस दिन घर में जो सुकून और सम्मान का भाव फैला, उसने सबको यह एहसास करा दिया कि असली धन दहेज नहीं बल्कि सोच की समृद्धि होती है।
शिक्षा...
बेटी बोझ नहीं, सम्मान है; दहेज कर्ज का कारण बनकर लक्ष्मी को अपवित्र करता है, इसलिए कर्ज वाली लक्ष्मी न कोई विदा करे और न कोई स्वीकार करे, क्योंकि सच्ची समृद्धि कर्ज में नहीं, संतोष, सद्बुद्धि और सही सोच में होती है।
मंगलमय प्रभात
प्रणाम
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