🌹कर्म का फल🌹
🙏🙏🙏
अगला भाग ,2
......इतने में ज्योतिषी जी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषीजी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। कुछ देर बाद वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता! कैसे आना हुआ?"
ब्राह्मण ने कहा- आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका क्या कारण है? ज्योतिषी जी ने कहा- यह मेरी पत्नी नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी- जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है । यह पत्नी नहीं, मेरा किया हुआ पूर्व का कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।।
अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े। महाराज! आपने क्या कर्म किया था?।।
ज्योतिषी जी ने कहा- सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी पत्नी गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी और कमजोर भी हो गयी थी। फोड़े में कीड़े पड़ गये जिन्हें खाने के लिये मैं इसके फोड़े में चोंच मारता और कीड़ों को खाता था। इससे जब दर्द के कारण यह कूदती थी आखिर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ भी इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी।।
मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। फिर यह गंगाजी मे प्रवेश कर गयी ऐसा सोंचकर कि पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ देगा। परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी पत्नी बनी है।।
जो कुछ दिनों और अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी, लेकिन मैंने चोंच इसको दर्द पहुंचाने के लिये नहीं मारी थी। अतः इसकी समझ भी ठीक होगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा। इसका दोष नहीं मानता क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ और प्रतिक्षा में हूँ कि कभी तो इसका स्वभाव अच्छा होगा। अब अपना प्रश्न पूछो?।।
ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः- अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया? ज्योतिषी जी ने कहा- राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है। ब्राह्मण ने पूछ किस प्रकार का कौन सा कर्म? ज्योतिषी जी ने कहा- पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गई है?"
आपने जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ अपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। इतने में जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खा गया। कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को गड़ासे से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया।।
इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो। कितना सहज है ज्ञान संयुक्त जीवन! यदि हम इस कर्म सिद्धान्त को मान और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे। बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे...।
मंगलमय प्रभात
प्रणाम
#😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👍मोटिवेशनल कोट्स✌ #👫 हमारी ज़िन्दगी #🌸पॉजिटिव मंत्र #👍 सफलता के मंत्र ✔️