*🌹कर्म और उद्देश्य🌹*
🙏🙏🙏
*देखिये!
डाक्टर भी चाकू चलाता है और डाकू भी चाकू चलाता है। कर्म दोनों का एक है, पर उद्देश्य में भिन्नता है।*
*डाक्टर के चाकू से मैं मर भी गया, तो भी डाक्टर को कोई दोष नहीं लगेगा। डाकू का चाकू खाकर मैं बच भी गया, तो भी डाकू को दोष लगेगा। विचार करें, क्यों?*
*डाक्टर मुझे बचाने के लिए, मुझ पर कृपा रूप, मेरी चिकित्सा के लिए चाकू चला रहा है। डाकू मुझे लूटने के उद्देश्य से, मुझे मारने के लिए चाकू चला रहा है।*
*अब ध्यान दें, वहाँ संसार में, कर्म की बड़ी कीमत मानी जाती है। जबकि परमात्मा के दरबार में कर्म की कीमत नहीं है, यहाँ तो उद्देश्य की कीमत है। आपने क्या किया? यह बात गौण है। क्यों किया? पड़ताल इस बात की की जाती है।*
*हमें यह भी समझना होगा कि किसी ने बुरा किया तो बहुत गलत किया, पर किसी ने भला किया, तो क्या तीर मार लिया? भला तो करना ही चाहिए, भला तो स्वाभाविक ही होना चाहिए, इसमें बड़ी बात क्या है?*
*किसी को दुख में देख कर किसी का हृदय द्रवित हो गया, उसने सहायता का हाथ बढ़ा दिया, तो यह तो मनुष्योचित स्वभाव ही है। इसमें "मैंने किसी की सहायता की" ऐसी गर्व की कौन सी बात है? यह तो भगवान की कृपा है कि आपको भले कर्म का निमित्त बना लिया।*
*मुझसे नए नए मिलने वाले, बड़ी सूची गिनाते हैं। महाराज! मैं यह करता हूँ, वह करता हूँ। मैंने अमुक शास्त्र अमुक बार पढ़ा, अमुक क्रिया अमुक बार की, अमुक तीर्थ किए, इतना नाम जपा आदि आदि। और मैं देखता हूँ कि वे दुखी भी हैं। कारण क्या है? उनका दुख इस बात का है कि मैंने इतना किया, फिर भी उनके जीवन का कष्ट दूर नहीं हुआ। कि कचहरी में हार गए, कि व्यापार में हानि हो गई, कि परिवार प्रतिकूल है, कि रोग नहीं मिटा।*
*तो अपने सत्कर्मों के बदले में, जो संसार का सुख चाहता है, सम्पत्ति, स्वास्थ्य चाहता है, उसका कर्म तो ठीक ही था, पर उद्देश्य गड़बड़ हो गया। उसने जो किया, सुख की कामना से किया। "संसार से निवृत्त हो जाऊँ" ऐसा उसका उद्देश्य नहीं है। "थोड़ा संसार और बना लूं, संसार को अनुकूल बना लूं" ऐसा उद्देश्य है।*
*किसलिए आप क्या करते हो, इस का मूल्य दो कौड़ी है, किस उद्देश्य से करते हो, उस का ही मूल्य है....।*
*मंगलमय प्रभात*
*स्नेह वंदन*
*प्रणाम*
#🏠घर-परिवार #☝ मेरे विचार #👍 सफलता के मंत्र ✔️ #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👫 हमारी ज़िन्दगी