अजय यादव — मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला, पर आज पंजाब में मजदूरी करके परिवार चलाता है। रोज़ सुबह मेहनत करके लौटता, पैसे गिनकर घर पहुँचता, पर उसके दिल में जो वफ़ादारी थी वह किसी से कम नहीं — खासकर अपने नेता के प्रति। वह अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी का कट्टर समर्थक था; प्यार इतना गहरा कि किसी तर्क से नहीं, भाव से जुड़ा हुआ था।
मगर एक दिन ऐसा हुआ कि मजदूरी करके थका-हारा घर लौटकर पौवा लगाने के बाद उसके अंदर का वो जुनून—वो अंधा-सा लगने वाला जुनून—जाग उठा। नशे में या गुस्से में, उसने गोरखपुर के बीजेपी सांसद रवि किशन के निजी सहायक को फ़ोन कर के जान से मारने की धमकी दे दी। इस एक पल की भूल ने उसकी पूरी ज़िंदगी पर भारी असर डाल दिया — और परिणाम भी आया: गो-रखपुर पुलिस ने तकनीकी निगरानी के ज़रिये उसे पंजाब से ट्रेस करवा कर उठा लिया और गोरखपुर भेज दिया गया। 
यह पूरे परिवार के लिए एक आग की तरह है। सोचिए — एक क्षण का गुस्सा, एक लफ्ज़, एक गलती — और पूरी कमाई, सारे सपने, बच्चों की पढ़ाई, घर-बार का भविष्य सब बिखर सकता है। यूपी-पंजाब का यह मामूली-सा कथानक हमें एक कड़वी सीख देता है:
1. किसी नेता का समर्थक होना ठीक है — वोट देना, विचारों से जुड़ना लोकतंत्र का हक़ है।
2. लेकिन नेता के प्रति इमोशन जब अंधा हो जाए, जब तर्क और हदें ख़त्म हो जाएं, तो वही भाव ज़िंदगी बरबाद कर सकता है।
3. नशा, ग़ुस्सा, भड़काऊ बातें और उकसावे में किये गए काम का हिसाब अक्सर वही व्यक्ति और उसका परिवार चुकाता है — नेता नहीं, बहस नहीं—परिवार।
जिम्मेदारी का यही अर्थ है — अपने नेता का समर्थन करो, पर अपनी अक्ल और अपनी ज़िम्मेदारी मत खोओ। अपने बच्चों का भविष्य, अपनी इज्ज़त और अपनी आज़ादी किसी भी राजनीतिक जुनून के नाम पर दांव पर मत लगा दीजिए। समाज-राजनीति में जोश जरूरी है, पर उससे भी ज़रूरी है संयम और क़ानून का सम्मान।
अंत में एक सीधी-सी अपील: अगर आप किसी नेता के लिए खड़े हैं — गर्व से खड़े रहिये। पर इतना भी अंधा मत बन जाइए कि एक पल का जुनून आपकी और अपने परिवार की पूरी ज़िंदगी ख़तरे में डाल दे। लोकतंत्र में एक सूझ-बूझ, एक शांत मिज़ाज और सही फैसले ही सभी के भले की गारंटी
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