1.2.2026
अधिकतर लोग ऐसा मानते हैं, कि *"उपदेश दूसरों के लिए होता है, अपने लिए नहीं।" "लोग जितना उपदेश या सुझाव दूसरों को देते हैं, यदि उस पर वे स्वयं आचरण कर लेते, तो उनका कल्याण हो जाता।*
परंतु मनुष्य की अधिकतर मनोवृत्ति ऐसी देखी जाती है, कि वह जो भी उपदेश या सुझाव दूसरे व्यक्ति को देता है, तो वह सोचता है, कि *"यह तो दूसरे के लिए है, मेरे लिए नहीं।" "इसलिए वह स्वयं उस उपदेश पर आचरण नहीं करता। जिसका परिणाम यह होता है, कि उसकी उन्नति नहीं हो पाती।"*
और जो सुनने वाला व्यक्ति है, वह भी ऐसा सोचता है, कि *"मुझे जो उपदेश या सुझाव दिया जा रहा है, यह भी दूसरे लोगों के लिए है, मेरे लिए नहीं है।" "इसका परिणाम यह होता है, कि वह सुनने वाला भी उस उपदेश या सुझाव पर आचरण नहीं करता। इसलिए न तो वक्ता का कल्याण हो पाता है, और न ही श्रोता का।"*
दूसरी बात -- *"कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो दूसरे के उपदेश या सुझाव को सुन तो लेते हैं, परंतु उसमें से जितना उनको अपने अनुकूल लगता है, उतना वे स्वीकार कर लेते हैं, और जितना उनको अपने प्रतिकूल लगता है, उसे वे छोड़ देते हैं।"* उनकी उन्नति भी अधिक नहीं हो पाती।
अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि *"दूसरे योग्य व्यक्ति का उपदेश उनके लिए हितकारी भी होता है, परंतु वे ऐसा मानते हैं कि "मैं इसके सुझाव या उपदेश पर आचरण क्यों करूं? इससे तो मैं समाज में छोटा गिना जाऊंगा, और यह मुझसे बड़ा गिना जाएगा।" "यह मिथ्या अभिमान उन्हें उन्नति नहीं करने देता। उनके अंदर बहुत सारा हठ और मूर्खता भी होती है, जो उन्हें सत्य को स्वीकार नहीं करने देती। इस कारण से उनकी उन्नति नहीं हो पाती।"*
*"तो ऐसे हठ अभिमान और मूर्खता आदि दोषों से बचने का प्रयत्न करें, अन्यथा आपकी भी वही स्थिति होगी, जो संसार के अन्य लोगों की है।" "आप भी दूसरों की बातें सुन लेंगे। उनमें से जो आपको अपने अनुकूल लगेगी, जिसमें आपको कष्ट कम प्रतीत होता होगा, या नहीं होता होगा, उतनी बात तो आप मान लेंगे। उससे आगे की बातें, जो आपके लिए अधिक हितकारी होंगी, परन्तु उन पर आचरण करने में आपको अधिक कष्ट प्रतीत होता होगा, उन्हें आप छोड़ देंगे। इस कारण से आपकी भी कोई विशेष उन्नति नहीं हो पाएगी।"*
*"अतः यदि आप वास्तव में अपनी उन्नति करना चाहते हों, तो संसार के अन्य लोगों की नकल न करें। बुद्धिमत्ता से काम लें। अपना लक्ष्य बनाएं, और उसकी प्राप्ति के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करें।"*
यदि आज आपने मेरी इस बात पर ध्यान नहीं दिया, तो हो सकता है, कि आपकी वृद्धावस्था में आपको मेरी यह बात समझ में आवे, कि *"हमने उस समय अपने हठ अभिमान और मूर्खता के कारण बहुत सारी गलतियां की, और अपनी उन्नति करने से वंचित रहे।" "परंतु तब पश्चाताप करने से क्या लाभ होगा? बुद्धिमत्ता तो इसी बात में है कि आज ही इन बातों से लाभ उठाया जाए।"*
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."
#🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇