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अजय ओमप्रकाश आर्य
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अजय ओमप्रकाश आर्य
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25.2.2026 लोग चाहते हैं दूसरों के साथ हमारा संबंध सदा बना रहे, सुदृढ़ हो, जिससे हमें दूसरे लोगों से जीवन भर लाभ मिलता रहे। लोग यह तो सोचते हैं, कि *"हमें दूसरों से जीवन भर लाभ मिलता रहे। परंतु उनके साथ संबंध को टिकाए रखने के जो नियम हैं, उन नियमों का पालन करना नहीं चाहते।"* इसका कारण है, *"उनका स्वार्थ मूर्खता हठ दुराग्रह क्रोध लोभ ईर्ष्या छल कपट आदि दोष।"* *"जो व्यक्ति अपने इन दोषों को दूर नहीं करता और दूसरों के साथ न्यायपूर्वक प्रेमपूर्वक व्यवहार नहीं करेगा, उसका संबंध दूसरों के साथ लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा, टूट जाएगा।"* प्रेम से व्यवहार करने का अर्थ है, *"एक दूसरे के प्रति समर्पण, अर्थात बुद्धिमत्ता और न्याय से सब व्यवहार करना।"* यदि आप चाहते हों, कि *"आपके संबंध दूसरों के साथ लंबे समय तक टिके रहें, दूसरों से आपको जीवन भर लाभ मिलता रहे, तो संबंध बनाए रखने के नियमों का पालन करें।" "दूसरों के साथ समर्पित भाव से सभ्यतापूर्वक नम्रतापूर्वक प्रेमपूर्वक शुद्ध मन से छल कपट आदि दोष रहित होकर अच्छा व्यवहार करें। तभी आपका संबंध दूसरों के साथ जीवन भर टिका रह सकता है, और आपको दूसरों से जीवन भर लाभ मिल सकता है, अन्यथा नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
अजय ओमप्रकाश आर्य
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23.2.2026 संसार में ऐसा देखा जाता है, कि *"कोई व्यक्ति 25/30 वर्ष की आयु में ही बहुत बुद्धिमान हो जाता है। और कोई कोई 60/65 वर्ष की आयु में भी विशेष बुद्धिमान नहीं बन पाता। क्या कारण है?"* कारण यह है, कि *"जो व्यक्ति जीवन में आने वाली कठिनाइयों से संघर्ष करता है। पूर्व जन्म के अधिक विद्या बुद्धि के संस्कारों वाला भी होता है। उन संस्कारों के कारण वह कुछ स्वयं परिश्रम करता है। कुछ अन्य विद्वानों बुद्धिमानों से सलाह लेता है। इस प्रकार से पुरुषार्थ करते-करते वह कुछ ही समय में बुद्धिमान बन जाता है। और जीवन में आने वाली कठिनाइयां को पार कर जाता है, उन्हें जीत लेता है।"* *"और जो व्यक्ति पूर्व जन्म के अधिक विद्या बुद्धि के संस्कारों वाला नहीं होता। वर्तमान में भी विशेष पुरुषार्थ नहीं करता। तथा अन्य बुद्धिमानों की सलाह पर भी नहीं चलता। वह व्यक्ति 60/65 वर्ष की आयु में भी बुद्धिमान नहीं बन पाता।"* *"इसलिए व्यक्ति को केवल अपनी बुद्धि से ही सारे निर्णय नहीं करने चाहिएं। क्योंकि उसका ज्ञान अधूरा और अनुभव कम होता है।"* अतः जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए विशेष बुद्धिमान होना आवश्यक है। और *"उसके लिए अन्य विद्वानों बुद्धिमानों की सलाह लेनी चाहिए। उनके मार्गदर्शन से लाभ उठाना चाहिए, और स्वयं भी पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए। तब जाकर व्यक्ति विशेष बुद्धिमान बनता है, और सुखी होता है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
अजय ओमप्रकाश आर्य
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22.2.2026 लोग कहते हैं कि "बुरा देखना पाप है, बुरा सुनना पाप है, बुरा बोलना पाप है, और शरीर से बुरे काम करना भी पाप है।" जी हां, लोग ठीक कहते हैं। *"बुरा देखना बुरा सुनना और शरीर से बुरे काम करना, यह सब पाप है।"* परंतु वेद आदि शास्त्र कहते हैं कि *"पाप केवल इतना ही नहीं है। बल्कि इन सब का मूल कारण है बुरा सोचना। जैसे बुरा देखना पाप है, बुरा सुनना बुरा बोलना बुरे काम करना भी पाप है। ऐसे ही इन सब का मूल कारण "बुरा सोचना" भी पाप है।"* *"जो व्यक्ति जैसा सोचता है, वह वैसा ही देखता सुनता बोलता और वैसे ही काम करता है।"* इसका अर्थ हुआ कि *"सब पापों का मूल कारण "बुरा सोचना" ही है।"* यदि आप बुरे कामों या पापों से बचना चाहते हों, तो इसका उपाय यही है, कि *"अपने चिंतन को ठीक करें। अपने सोचने को ठीक करें।बुरा न सोचें, बल्कि अच्छा सोचें। अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी सबके लिए अच्छा सोचें।"* "यदि आप इस प्रकार से अपने चिंतन को ठीक करके अच्छा देखेंगे अच्छा सुनेंगे अच्छा बोलेंगे और शरीर से भी अच्छे काम करेंगे। तो इन सब अच्छे कर्मों को करके आप बहुत सा पुण्य कमाएंगे।"* *"और यदि आप पुण्य कर्मों का आचरण करेंगे, तो निश्चित रूप से ईश्वर आपको सुख देगा। आपका यह जन्म भी सुखदायक होगा और अगला भी।"* *"अतः अच्छा सोचें, अच्छा बोलें। अच्छा देखें अच्छा सुनें और शरीर से भी अच्छे काम ही करें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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