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सुशील मेहता
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सुशील मेहता
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23 hours ago
भारत में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस प्रतिवर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य देश के हथकरघा बुनकर समुदाय को सम्मानित करना और राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास में हथकरघा उद्योग के योगदान को उजागर करना है। इस दिन का उद्देश्य हथकरघा उत्पादों के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इस स्वदेशी विरासत की रक्षा करना है7 अगस्त की तारीख को 1905 में स्वदेशी आंदोलन के शुभारंभ की स्मृति में चुना गया था । इस दिन कलकत्ता टाउन हॉल में एक औपचारिक घोषणा के साथ आंदोलन शुरू किया गया था और इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन को पुनर्जीवित करना और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना था। जुलाई 2015 में, भारत सरकार ने 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस घोषित किया। उद्घाटन समारोह 7 अगस्त 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चेन्नई में मद्रास विश्वविद्यालय के शताब्दी हॉल में आयोजित किया गया था । 7 अगस्त की तारीख को 1905 में स्वदेशी आंदोलन के शुभारंभ की स्मृति में चुना गया था । इस दिन कलकत्ता टाउन हॉल में एक औपचारिक घोषणा के साथ आंदोलन शुरू किया गया था और इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन को पुनर्जीवित करना और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना था। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का आयोजन जनता के बीच हथकरघा उद्योग के प्रति जागरूकता पैदा करने और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में इसके महत्व पर बल देने के उद्देश्य से किया जाता है। इसका उद्देश्य हथकरघा क्षेत्र के बुनकरों और कारीगरों को सशक्त बनाना है, जो अक्सर ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं, जिससे स्थायी आजीविका को बढ़ावा मिलता है। यह दिन भारत के स्वदेशी हथकरघा उत्पादों की सांस्कृतिक समृद्धि और कलात्मकता को उजागर करता है, उपभोक्ताओं को हस्तनिर्मित वस्तुओं को चुनने और ' वोकल फॉर लोकल ' और ' मेक इन इंडिया ' पहलों का समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित करता है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस देश भर में वस्त्र मंत्रालय और राज्य सरकारों द्वारा आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जाता है। इन समारोहों में हथकरघा बुनकरों को पुरस्कार देकर सम्मानित करना, नई योजनाओं और पहलों का शुभारंभ करना, प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं और सेमिनारों का आयोजन करना शामिल है। राज्य स्तर पर उत्सव व्यापक रूप से मनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, तेलंगाना में सरकार बुनकरों को सम्मानित करने और राज्य की वस्त्र विरासत को प्रदर्शित करने के लिए कार्यक्रम आयोजित करती है। कर्नाटक में , शिल्प में उनके योगदान के लिए बुनकरों को अक्सर सम्मानित किया जाता है। तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में भी स्थानीय बुनकरों को समर्थन देने के लिए प्रदर्शनियों और कार्यक्रमों के साथ इस दिन को मनाया जाता है। प्रदर्शनियाँ समारोहों की एक प्रमुख विशेषता हैं, जैसे कि दिल्ली के राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय में आयोजित की जाने वाली प्रदर्शनियाँ , जो विविध भारतीय हथकरघा परंपराओं को प्रदर्शित करती हैं। #शुभ कामनाएँ 🙏
सुशील मेहता
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गुरु हरकिशन दास जयंती गुरू हर किशन साहिब जी का जन्म सावन वदी १० (८वां सावन) बिक्रम सम्वत १७१३ (१७ जुलाई १६५६) को कीरतपुर साहिब में हुआ। वे गुरू हर राय साहिब जी एवं माता किशन कौर के दूसरे पुत्र थे। राम राय जी गुरू हरकिशन साहिब जी के बड़े भाई थे। रामराय जी को उनके गुरू घर विरोधी क्रियाकलापों एवं मुगल सलतनत के पक्ष में खड़े होने की वजह से सिख पंथ से निष्कासित कर दिया गया था।५ वर्ष की अल्प आयु में गुरू हर किशन साहिब जी को गुरुपद प्रदान किया गया। गुरु हर राय जी ने १६६१ में गुरु हरकिशन जी को अष्ठम्‌ गुरू के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार से नाराज होकर राम राय जी ने औरंगजेब से इस बात की शिकायत की। इस बावत शाहजांह ने राम राय का पक्ष लेते हुए राजा जय सिंह को गुरू हर किशन जी को उनके समक्ष उपस्थित करने का आदेश दिया। राजा जय सिंह ने अपना संदेशवाहक कीरतपुर भेजकर गुरू को दिल्ली लाने का आदेश दिया। पहले तो गुरू साहिब ने अनिच्छा जाहिर की। परन्तु उनके गुरसिखों एवं राजा जय सिंह के बार-बार आग्रह करने पर वो दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गये।इसके बाद पंजाब के सभी सामाजिक समूहों ने आकर गुरू साहिब को विदायी दी। उन्होंने गुरू साहिब को अम्बाला के निकट पंजोखरा गांव तक छोड़ा। इस स्थान पर गुरू साहिब ने लोगों को अपने अपने घर वापिस जाने का आदेश दिया। गुरू साहिब अपने परिवारजनों व कुछ सिखों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुये। परन्तु इस स्थान को छोड़ने से पहले गुरू साहिब ने उस महान ईश्वर प्रदत्त शक्ति का परिचय दिया। लाल चन्द एक हिन्दू साहित्य का प्रखर विद्वान एव आध्यात्मिक पुरुष था जो इस बात से विचलित था कि एक बालक को गुरुपद कैसे दिया जा सकता है। उनके सामर्थ्य पर शंका करते हुए लालचंद ने गुरू साहिब को गीता के श्लोकों का अर्थ करने की चुनौती दी। गुरू साहिब जी ने चुनौती सवीकार की। लालचंद अपने साथ एक गूँगे बहरे निशक्त व अनपढ़ व्यक्ति छज्जु झीवर (पानी लाने का काम करने वाला) को लाया। गुरु जी ने छज्जु को सरोवर में सनान करवाकर बैठाया और उसके सिर पर अपनी छड़ी इंगित कर के उसके मुख से संपूर्ण गीता सार सुनाकर लाल चन्द कोहतप्रभ कर दिया। इस स्थान पर आज के समय में एक भव्य गुरुद्वारा सुशोभित है जिसके बारे में लोकमान्यता है कि यहाँ स्नान करके शारीरिक व मानसिक व्याधियों से छुटकारा मिलता है। इसके पश्चात लाल चन्द ने सिख धर्म को अपनाया एवं गुरू साहिब को कुरूक्षेत्र तक छोड़ा। जब गुरू साहिब दिल्ली पहुंचे तो राजा जय सिंह एवं दिल्ली में रहने वाले सिखों ने उनका बड़े ही गर्मजोशी से स्वागत किया। गुरू साहिब को राजा जय सिंह के महल में ठहराया गया। सभी धर्म के लोगों का महल में गुरू साहिब के दर्शन के लिए तांताअपने अन्त समय में गुरू साहिब सभी लोगों को निर्देश दिया कि कोई भी उनकी मृत्यू पर रोयेगा नहीं। बल्कि गुरूबाणी में लिखे शबदों को गायेंगे। इस प्रकार बाला पीर चैत सूदी १४ (तीसरा वैसाख) बिक्रम सम्वत १७२१ (९ अप्रैल १६६४) को धीरे से वाहेगुरू शबद् का उच्चारण करते हुए ज्योतिजोत समा गये। गुरू गोविन्द साहिब जी ने अपनी श्रद्धाजंलि देते हुए अरदास में दर्ज किया कि श्री हरकिशन धियाइये, जिस डिट्ठे सब दुख जाए।' दिल्ली में जिस आवास में वो रहे, वहां एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब है। #शत शत नमन