वसुधैव-कुटुंबकम
संपूर्ण धरा एक घर-संपूर्ण जीव एक परिवार! यही तो है भारत-दर्शन! यदि इस स्लोगन की तह तक जाया जाए तो इसमे अनंत ब्रह्मांड की तरह ही अनंत अध्यात्मिक जगत के भीतर नीहित विस्तृत विज्ञान की जटिलताओं का सहज-सरल-स्वच्छ लेकिन पारदर्शी गुफाओं का वृहद जाल दृश्यमान होता है ! जो बाहर से अलग-अलग किंतु अंदर से एकाण्वित है ! अर्थात मूल रूप से एक अणु पर केंद्रित है ! जो कि एक परमाणु मात्र के परिवर्तन से अपना स्वरूप बदलने मे निरंतर तत्पर है ! जल चक्र, खाद्य चक्र एवं जीवन चक्र जैसे अनंत अज्ञात पारिस्थितिकीय तंत्र एक-दूसरे को संतुलन प्रदान करते हैं तब जाकर कहीं हमारी पृथ्वी पर सृष्टि आकार लेती है !
हमारे पूर्वजों ने जब अपने संपूर्ण अनुसंधानों और अध्ययनों को मिलाकर एक निष्कर्ष निकाला तो जो सूत्र निकला वह 'वसुधैव-कुटुंबकम' है !
आज समूचे विश्व मे अनगिनत विद्यालय एवं विश्व विद्यालय संचालन मे हैं लेकिन उनकी शिक्षा हर बार सिर्फ अशांति और युद्ध का प्रारूप तैयार करती है ! क्योंकि इसमे सिर्फ अज्ञान है विज्ञान नहीं ! लेकिन हमारा भारतवर्ष लाखों वर्षों से सिर्फ इसीलिए सिमटता रहा है कि हमारे पास सनातन का विज्ञान है ! हम सृष्टि और जीवन का महत्व भलिभांति जानते हैं इसलिए हम हिंसा के अतिरिक्त विचार करते हैं ! और इसीलिए हमारे पास त्यौहारों का गुलदस्ता है ! जिसके अलग-अलग फूलों की महक जीवन की सुंदरता से मानवता का मिलाप कराती है ! निश्चय ही विश्व जगत को भारतीयों से जीवन जीना सीखना चाहिए! आज भारत-दर्शन ही समस्त संसारवासियों की प्रथम आवश्यक्ता है !
#सनातन संस्कार (वसुधैव-कुटुंबकम)