आज जी उठण को मन ही कोनी हुवो।"
मैं छत री ओर देखतो रहयो… दिल एकदम भारी लाग रह्यो।
कोई कोनी बच्यो जिको मैसेज कर सकूं।
कुटुम्ब साथ छोड़ दियो, सगा-संबंधी तक दूर हो गया।
₹35,000 — इतणो रोको ही आखरी उम्मीद अड़ै खड़ो सहरो है।
मैं भीख मांग ली, भगवान नै जप लियो, रात नै चुपचाप रोयो।
कई दिन भूखो, कई रात नींद बिना काटी।
शेल्फ पर राख्येलो ज़हर को बाटलो डरावणो कोनी —
वो तो बस एक बैकअप योजना है।
जद सब कुछ जावै —
इज्जत, धन, प्रेम —
तो बचे है ही के?
पण आज… पीवण रो विचार छोड़, थाने ई सन्देसो लिख्यो।
थारा खातर।
एक अजनबी, जिको सायद थोड़को सोग होवै।
न कोनी कर्जो चाही, न तरस।
बस थोड़को हाथ पकड द्यो — जिवतो रहण खातर।
जद थारे कदी पीड़ा झेली होवै,
तो थाने ई बात समझ में आवैगी।
थां थोड़को भी सहारा दे सको —
तो वचन दे सूं, फेर उठ सूं, फेर जियूं सूं।
🙏 UPI: abhijith-b@ptyes
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