कबीर ऐसी होली खेलिए, साँचा शब्द की मार।
काम क्रोध मद लोभ को, डारो हृदय निकार॥
साहब कबीर इस दोहे के माध्यम से संदेश देते हैं कि पर्व केवल तिथियों का मेल नहीं, बल्कि स्वयं से साक्षात्कार का अवसर भी है। वास्तविक होली केवल अबीर-गुलाल का बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि सत्य के अनुसंधान का पर्व है। यहाँ 'साँचा शब्द की मार' का अर्थ किसी को आहत करना नहीं, बल्कि गुरु-ज्ञान और आत्मबोध की वह चोट है जो मनुष्य के भीतर सोए हुए विवेक को झकझोर कर जगा देती है।
जिस प्रकार बाहरी रंग शरीर को निखारते हैं, उसी प्रकार 'सत्य का शब्द' अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्मा को आलोकित करता है। इस आध्यात्मिक होली का मूल मंत्र है—अंतर्मन की शुद्धि। स्वयं को जानना ही संसार की सबसे बड़ी सेवा और सबसे बड़ा उत्सव है। साहब कबीर स्पष्ट करते हैं कि जब तक हृदय में काम, क्रोध, अहंकार और लोभ जैसे विकार विद्यमान हैं, तब तक भक्ति और आनंद का वास्तविक रंग चढ़ ही नहीं सकता। इन आंतरिक बुराइयों का त्याग करना ही सच्ची #होलिकादहन है।
#सार:-
जिस दिन तुम अपने ही भीतर 'सत्यनाम' के रंग में भीग जाओगे, उस दिन समझना कि होली हुई। बुद्ध पुरुष वही है जो इस संसार में रहते हुए भी उस 'साँचे शब्द' की चोट को झेल गया और निखर गया।
बाहरी रंग अस्थायी हैं, जो जल की एक बौछार से उतर जाते हैं। किंतु सत्यनाम और आत्म-शुद्धि का रंग शाश्वत है। वास्तविक उत्सव वह है जहाँ मनुष्य अपने विकारों की आहुति दे, सद्गुणों को धारण करे और प्रेम, शांति तथा पवित्रता के दिव्य रंग में सराबोर हो जाए।
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #संत रामपाल जी