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M P SINGH
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M P SINGH
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महाप्रस्थान : पांडवों की अंतिम यात्रा और धर्म की अंतिम परीक्षा : महाभारत का युद्ध समाप्त हुए कई वर्ष बीत चुके थे। हस्तिनापुर फिर से बस चुका था, राजमहल में वैभव लौट आया था, लेकिन पांडवों के मन में अब किसी विजय का उत्साह नहीं बचा था। युद्ध ने उन्हें राज्य तो दिया था, पर भीतर से सब कुछ छीन लिया था। फिर एक दिन वह समाचार आया जिसने पूरी धरती को शोक में डुबो दिया। श्री कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त कर दी थी। यह सुनते ही युधिष्ठिर समझ गए, अब द्वापर युग समाप्त हो चुका है। कलियुग ने पृथ्वी पर कदम रख दिया है। उनका कार्य पूरा हो चुका था। राजसभा में एक अंतिम निर्णय लिया गया। हस्तिनापुर का सिंहासन परीक्षित को सौंप दिया गया। सोने के महल, राजसी वस्त्र, हथियार, वैभव, सब पीछे छोड़ दिए गए। अब केवल एक यात्रा शेष थी, अंतिम यात्रा। इसे महाप्रस्थान कहा गया। सुबह का समय था। हिमालय की ओर जाने वाला मार्ग सफेद बर्फ से ढका था। ठंडी हवाएं मानो शरीर को चीर रही थीं। लेकिन पांचों पांडव और द्रौपदी बिना पीछे देखे आगे बढ़ रहे थे। न कोई सेना, न कोई रथ, न कोई शंखनाद, केवल मौन, तप और ईश्वर का स्मरण। सबसे आगे धर्मराज युधिष्ठिर थे। उनके चेहरे पर वैराग्य था। पीछे भीम अपने भारी कदमों से चल रहे थे। अर्जुन का तेज अब शांत हो चुका था। नकुल और सहदेव मौन थे। सबसे पीछे द्रौपदी थीं, जिन्होंने जीवनभर अपमान, युद्ध और पीड़ा सहकर भी धर्म का साथ नहीं छोड़ा था। यात्रा कठिन होती जा रही थी। ऊंचे बर्फीले पहाड़, गहरी खाइयां, सांसें तोड़ देने वाली हवाएं, हर कदम मानो आत्मा की परीक्षा बन चुका था। तभी अचानक द्रौपदी का पैर फिसला। वे लड़खड़ाईं और बर्फ पर गिर पड़ीं। उनकी सांसें धीरे-धीरे थमने लगीं। भीम घबरा गए। उन्होंने पुकारा, भैया! द्रौपदी गिर गईं! क्या हम इन्हें ऐसे ही छोड़ देंगे? लेकिन युधिष्ठिर बिना रुके आगे बढ़ते रहे। भीम ने फिर पूछा, उन्होंने जीवन भर हमारे साथ कष्ट सहे। फिर सबसे पहले वही क्यों गिरीं? कुछ क्षण मौन रहा फिर युधिष्ठिर ने धीमे लेकिन कठोर स्वर में कहा, द्रौपदी महान थीं, धर्मपरायण थीं लेकिन उनके हृदय में एक सूक्ष्म पक्षपात था। वे हम पांचों की पत्नी थीं, परंतु उनके मन में अर्जुन के लिए विशेष प्रेम था। उन्होंने सभी को समान दृष्टि से नहीं देखा। यही उनका सूक्ष्म दोष था। बर्फीली हवाओं के बीच यह उत्तर सुनकर भीम मौन हो गए। यात्रा आगे बढ़ती रही। कुछ दूर चलने के बाद सहदेव गिर पड़े। युधिष्ठिर बोले, उन्हें अपने ज्ञान पर गर्व था। वे स्वयं को सबसे बुद्धिमान मानते थे। फिर नकुल गिरे। उन्हें अपने रूप-सौंदर्य पर अभिमान था। उसके बाद अर्जुन का शरीर भी थककर गिर पड़ा। युधिष्ठिर की आंखों में क्षण भर पीड़ा चमकी, लेकिन वे रुके नहीं। उन्होंने कहा, अर्जुन को अपनी वीरता और धनुष विद्या पर अत्यधिक अहंकार था। अब केवल भीम और युधिष्ठिर बचे थे। भीम भारी सांसों के साथ चल रहे थे। अचानक उनका विशाल शरीर भी डगमगाया और वे धरती पर गिर पड़े। गिरते हुए उन्होंने पूछा, भैया मैं क्यों गिरा? युधिष्ठिर ने पीछे देखे बिना उत्तर दिया, भीम तुम्हें अपनी शक्ति और भोजन पर गर्व था। अब उस अनंत हिमपथ पर केवल एक व्यक्ति चल रहा था, धर्मराज युधिष्ठिर। और उनके पीछे चल रहा था एक कुत्ता। जब वे स्वर्ग के द्वार तक पहुंचे, तब देवराज इंद्र अपने दिव्य रथ के साथ प्रकट हुए। उन्होंने कहा, राजन आप सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करने योग्य हैं आइए। युधिष्ठिर रथ की ओर बढ़े, लेकिन तभी इंद्र बोले, इस कुत्ते को यहीं छोड़ना होगा। युधिष्ठिर ठहर गए। उन्होंने शांत स्वर में कहा, जिसने अंत तक मेरा साथ नहीं छोड़ा, मैं उसे कैसे त्याग दूं? यदि स्वर्ग पाने के लिए मुझे अपने साथी से विश्वासघात करना पड़े, तो ऐसा स्वर्ग मुझे स्वीकार नहीं। इतना सुनते ही वह कुत्ता तेज प्रकाश में बदल गया। वह स्वयं धर्मदेव थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, युधिष्ठिर आज तुमने सिद्ध कर दिया कि धर्म केवल पूजा या सत्य बोलने का नाम नहीं, धर्म वह है जहां मनुष्य कठिन समय में भी न्याय और निष्ठा का साथ न छोड़े। तभी स्वर्ग के द्वार खुल गए। यह कथा केवल पांडवों की अंतिम यात्रा नहीं थी बल्कि यह मनुष्य के भीतर छिपे उन छोटे दोषों की कहानी थी, जिन्हें हम अक्सर महत्वहीन समझते हैं यानी अहंकार, पक्षपात, मोह और गर्व। महाभारत हमें बताता है कि महानता केवल शक्ति से नहीं मिलती। सच्ची विजय तब होती है, जब मनुष्य अपने भीतर के दोषों को जीत ले। 🙏 जय श्री कृष्ण 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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सुबह की पहली किरणें आसमान को हल्के सुनहरे रंग में रंग रही थीं। मंद हवा बह रही थी और पूरा वातावरण शांत, पवित्र और प्रेममय लग रहा था। वृंदावन की गलियों में पक्षियों की मधुर आवाज़ गूंज रही थी। राधा रानी मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे छत पर आईं। उनके हाथ में पानी से भरी एक छोटी बाल्टी थी और आँखों में वही प्यारी नटखट शरारत चमक रही थी, जिसे देखकर स्वयं कान्हा भी हार जाएँ। नीचे श्रीकृष्ण गहरी नींद में विश्राम कर रहे थे। उनके चेहरे पर मासूम मुस्कान थी, मानो वे किसी मधुर स्वप्न में खोए हों। राधा जी धीरे से आगे बढ़ीं… और अगले ही पल हँसते हुए ठंडा पानी कान्हा जी पर डाल दिया। जैसे ही पानी की बूँदें श्रीकृष्ण को छूती हैं, वे अचानक चौंककर उठ बैठते हैं। पहले तो उन्हें कुछ समझ नहीं आता, लेकिन जब उनकी नज़र ऊपर जाती है, तो वे राधा रानी को खिलखिलाते हुए देखते हैं। बस फिर क्या था… कान्हा जी के चेहरे पर भी प्यारी मुस्कान आ जाती है। उनकी आँखों में भी शरारत चमक उठती है, जैसे अब वे इस मस्ती का जवाब जरूर देंगे। राधा जी हल्की हँसी के साथ पीछे हट जाती हैं और पूरा वातावरण प्रेम, आनंद और नटखटपन से भर जाता है। वृंदावन का प्रेम ऐसा ही है — जहाँ छोटी-सी शरारत भी भक्ति बन जाती है, और हर मुस्कान में राधा-कृष्ण का दिव्य प्रेम झलकता है। 💛✨ 🌹🌺राधे राधे🌼🌹 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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एक बार देवताओं और ऋषियों के बीच यह विवाद छिड़ गया कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश — इन तीनों में सबसे महान कौन है। 🤔 तब सभी ने निर्णय लिया कि महर्षि भृगु इस रहस्य का पता लगाएंगे, क्योंकि वे महान तपस्वी और तेजस्वी ऋषि थे। 🕉️ सबसे पहले भृगु ऋषि ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ ब्रह्मा जी ने उनका उचित सम्मान नहीं किया, जिससे ऋषि क्रोधित हो गए। फिर वे कैलाश पहुँचे, जहाँ शिवजी उन्हें गले लगाने आए, लेकिन भृगु ने इसे अपमान समझ लिया और वहाँ से चले गए। 😨 अंत में वे वैकुण्ठ पहुँचे, जहाँ भगवान विष्णु माता लक्ष्मी की गोद में विश्राम कर रहे थे। भृगु ऋषि को लगा कि विष्णु भी उनका आदर नहीं कर रहे हैं। क्रोध में आकर उन्होंने भगवान विष्णु की छाती पर लात मार दी! 😳 लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे ब्रह्मांड को चौंका दिया। भगवान विष्णु क्रोधित होने के बजाय तुरंत उठे और बोले — “हे ऋषिवर, आपके कोमल चरणों को मेरी कठोर छाती से चोट तो नहीं लगी?” 🙏 यह सुनकर भृगु ऋषि की आँखें खुल गईं। उन्हें समझ आ गया कि भगवान विष्णु सबसे अधिक विनम्र, क्षमाशील और करुणामयी हैं। तभी उन्होंने विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ घोषित किया। 🔱 कहा जाता है कि भृगु ऋषि के चरणों का निशान आज भी भगवान विष्णु की छाती पर श्रीवत्स चिन्ह के रूप में माना जाता है। 🌺 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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🙏🏻🚩 ॐ श शनैश्र्चराय नमः🙏🏻🚩 🏵️नमस्ते कोणसंस्थाय पिंगलाय नमोस्तुते। नमस्ते वभ्रुरूपाय कृष्णाय च नमोस्तुते।। नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चांतकाय च। नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो।। नमस्ते मंदसंज्ञाय शनैश्चर नमोस्तुते। प्रसादं कुरु में देवेश दीनस्य प्रणतस्य च।🏵️ 🌹 सूर्य पुत्रो दीर्घ देहो विशालाक्षः शिवप्रियः।🌹 🌹मन्दचारः प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनिः॥🌹 🏵️कोणस्थ पिंगलो ब्रभू कृष्णो रौद्रो दंतको यमः। सौरिः शनैश्वरो मन्दः पिप्पालोद्तः संस्तुतः॥🏵️ 🌹एतानि दशनामानी प्रातः रुत्थाय य पठेतः। शनैश्वर कृता पिडा न कदाचित भविष्यती॥🌹 🙏🏻🚩 ॐ निलान्जनम समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥🙏🏻🚩 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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ऋष्यमूक पर्वत, जहाँ हुई श्री राम-सुग्रीव मित्रता और श्रीलंका विजय की शुरुआत : ऋष्यमूक पर्वत का वर्णन रामायण में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान के रूप में मिलता है। मान्यता है कि यह पर्वत आज के कर्नाटक के हम्पी में स्थित है और यही क्षेत्र प्राचीन किष्किंधा नगरी था। लोककथाओं के अनुसार रावण के अत्याचारों से पीड़ित अनेक ऋषियों ने भगवान विष्णु से रावण के विनाश हेतु मौन रहकर तपस्या की। जब रावण को यह ज्ञात हुआ कि ऋषि उसके अंत के लिए तप कर रहे हैं, तो उसने क्रोधित होकर उन सभी ऋषियों का वध करा दिया। कहा जाता है कि उन्हीं मूक ऋषियों के शवों से बने पर्वत का नाम ऋष्यमूक पड़ा। बाद में महर्षि मातंग ने इस स्थान को अपने आश्रम से पुनः पवित्र किया। इसी क्षेत्र में वानरराज बाली और सुग्रीव का प्रसंग भी जुड़ा है। दुदुम्भी नामक दैत्य का वध कर बाली ने उसका शव दूर फेंका, जिससे मातंग ऋषि का आश्रम अपवित्र हो गया। क्रोधित होकर मातंग ऋषि ने बाली को श्राप दिया कि यदि वह ऋष्यमूक पर्वत के निकट आएगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के कारण सुग्रीव अपने मंत्रियों और हनुमान जी के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर सुरक्षित रहे। बाद में यहीं श्री राम और सुग्रीव की मित्रता हुई तथा श्री राम ने बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य दिलाया। आज भी हम्पी का यह क्षेत्र रामायण से जुड़ी पवित्र स्मृतियों के कारण श्रद्धा का केंद्र माना जाता है। 🙏 जय श्री राम 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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वाल्मीकि रामायण का अनसुना प्रसंग, जब मारीच ने रावण को सीता हरण से रोक दिया था : वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता हरण की कथा में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि खर-दूषण और १४००० राक्षसों के वध का समाचार सबसे पहले शूर्पणखा ने नहीं, बल्कि अकम्पन्न नामक राक्षस ने रावण को दिया था। उसी ने रावण को बताया कि श्री राम ने अकेले ही जनस्थान का विनाश कर दिया है और उनके पराक्रम का वर्णन करते हुए कहा कि उन्हें युद्ध में परास्त करना असंभव है। अकम्पन्न ने ही पहली बार रावण को यह सलाह दी कि यदि किसी प्रकार माता सीता का हरण कर लिया जाए, तो उनके वियोग में श्री राम जीवित नहीं रहेंगे। यह सुनकर रावण मारीच के पास पहुँचा और उससे सहायता माँगी किन्तु मारीच ने रावण को कठोर शब्दों में समझाया कि श्री राम से वैर लेना विनाश को बुलाना है। उसने कहा कि जो व्यक्ति सीता हरण की सलाह दे रहा है, वह वास्तव में रावण का शत्रु है। मारीच के समझाने पर रावण उस समय अपना विचार छोड़कर लंका लौट गया। इसके बाद जब शूर्पणखा लंका पहुँची और उसने भी सीता हरण के लिए रावण को उकसाया, तब दूसरी बार रावण मारीच की सहायता से पंचवटी गया और माता सीता का हरण किया। इस प्रसंग से हमें ज्ञात होता है कि खर-दूषण के वध का समाचार सबसे पहले अकम्पन्न ने दिया था। सीता हरण की पहली सलाह भी अकम्पन्न ने ही दी थी। मारीच ने प्रारम्भ में रावण को इस कार्य से रोक दिया था। रावण पहली बार सीता हरण का विचार त्यागकर वापस लौट गया था। 🙏 जय श्री राम 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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हनुमान जी की अंतिम परीक्षा : श्री राम को राज्य करते हुए ११००० वर्ष बीत गए थे। उनकी कृपा से महाबली हनुमान भी चिरंजीवी बन चुके थे और कल्प के अंत तक जीवित रहने वाले थे। वही श्री राम के मुख्य द्वार के रक्षक भी थे। श्री राम द्वारा त्यागे जाने के बाद उन चारो भाइयों में सबसे पहले लक्ष्मण ने अपने शरीर का त्याग किया। लक्ष्मण और देवी सीता के न रहने के कारण श्री राम का मन भी संसार से उचट गया। इसी कारण उन्होंने अपनी लीला समाप्त करने का निर्णय लिया। मनुष्य रूप में थे तो मृत्यु को अंगीकार करना उनकी लीला का अंतिम चरण था। यही सोच कर उन्होंने यमराज को आमंत्रित किया। यमराज आये तो सही किन्तु जब उन्होंने द्वार पर पवनपुत्र को देखा तो सोच में पड़ गए कि अब श्री राम तक कैसे पहुंचा जाये। हनुमान किसी भी स्थिति में मृत्यु को अपने प्रभु तक पहुँचने नहीं दे सकते थे और उनसे युद्ध कर अंदर जाना किसी के वश की बात नहीं थी। ये बात यमराज ने श्री राम को बताई। जब श्री राम ने ये सुना तो उन्होंने हनुमान जी को बुला कर बहुत समझाया कि जिसने भी जन्म लिया है उसकी मृत्यु आवश्यक है। अतः अब वे हठ छोड़ें और उन्हें इस संसार का त्याग करने दें। किन्तु बजरंगबली ने जब ये सुना कि उनके प्रभु अब इस मृत्यु लोक का त्याग करने वाले हैं, वे अत्यंत व्याकुल हो उठे। अब तक उन्हें पता चल ही चुका था कि यमराज द्वार से प्रवेश करना चाहते हैं इसीलिए वे और तत्परता से पहरा देने लगे। इससे श्री राम के निर्वाण में विलम्ब होने लगा। श्री राम ये जानते थे कि जब तक हनुमान द्वार पर हैं, उनका निर्वाण लेना असंभव है। इसलिए एक दिन जब हनुमान श्री राम के समक्ष थे, श्री राम ने जान-बूझ कर अपनी अंगूठी भूमि के एक छिद्र में गिरा दिया। फिर उन्होंने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र! ये अंगूठी मुझे सीता ने दी थी इसलिए मुझे अत्यंत प्रिय है। अतः आप यथाशीघ्र उसे ढूंढ कर ले आएं। अपने प्रभु की आज्ञा पर हनुमान सूक्ष्म रूप धर कर उस छिद्र में घुस गए और अंगूठी खोजते हुए पाताल में नागलोक पहुँच गए। वहाँ जब नागों ने उन्हें कुछ खोजते हुए देखा तो वे उन्हें नागराज वासुकी के पास ले गए। हनुमान ने वासुकी को प्रणाम किया और वहां आने का अपना प्रयोजन बताया। उनकी बात सुन कर वासुकी हंसने लगे और कहा, तो इस कल्प में श्री राम का अवतरण समाप्त हो गया। हनुमान को कुछ समझ में नहीं आया। तब वासुकी उन्हें लेकर पाताल के गर्भ में ले कर चले गए जहाँ एक जैसी अंगूठियों का ढेर लगा हुआ था। उन्होंने हनुमान से कहा कि श्री राम की अंगूठी ढूंढ लें। हनुमान बड़े परेशान हुए कि अंगूठियों के इस ढेर में वे असली अंगूठी कैसे ढूंढे? फिर उन्होंने पहली अंगूठी उठाई तो उसमें उन्हें श्री राम का चित्र दिखा। वे प्रसन्न हो गए और वापस जाने को मुड़े ही थे कि उनका ध्यान वहां पड़ी अन्य अंगूठियों पर पड़ा। वे ये देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि सभी अंगूठियां एक सी ही थी और सब में श्री राम का चित्र अंकित था। उन्होंने नागराज वासुकी से इसका रहस्य पूछा। तब उन्होंने कहा कि आज से पहले असंख्य श्री राम अवतरित हो चुके हैं और आज के बाद भी असंख्य श्री राम अवतरित होते रहेंगे। यही परमपिता ब्रह्मा द्वारा रचित सृष्टि का विधान है। इसी को सृजन और विनाश का चक्र कहते हैं। ब्रह्मा जी के आधे दिन को एक कल्प कहा जाता है जिसमें १००० चतुर्युग होते हैं। प्रत्येक कल्प में उन्ही सहस्त्र चतुर्युग के किसी त्रेता में श्री राम अवतरित होते हैं। यही नहीं, स्वयं आप भी हर कल्प में जन्म लेते हैं और इस अंगूठी को ढूंढते हुए यहाँ आते हैं। तब आपकी अनुपस्थिति में श्री राम अपनी लीला समाप्त कर यमराज के साथ अपने लोक वापस चले जाते हैं। इसी प्रकार इन अंगूठियों का ढेर बढ़ता रहता है। तब हनुमान श्री राम की लीला को समझ गए। उन्हें ये भी समझ आ गया कि भले ही वे नारायण का अवतार हों, यदि वे पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तो उस रूप में उनका निर्वाण लेना भी अवश्यम्भावी है। यदि ईश्वर स्वयं अपने बनाये विधान का उलंघन करेंगे तो सृष्टि में अराजकता व्याप्त हो जाएगी। हनुमान के मन की व्यथा समाप्त हो गयी और वे पुनः वापस धरती लोक पर आ गए। वहां आकर उन्हें पता चला कि श्री राम अपने दोनों भाइयों के साथ निर्वाण ले चुके हैं। साथ ही साथ जिन देवताओं के अंशों ने पृथ्वी पर अवतार लिया था वे भी पुनः अपने लोक लौट चुके थे। श्री राम के बिना हनुमान को वो पृथ्वी अच्छी नहीं लग रही थी किन्तु उन्हें ये समझ आ गया कि कदाचित इसी कारण श्री राम ने उन्हें कल्प के अंत तक जीवित रहने का वरदान दिया था ताकि वे उनकी कथाओं का प्रचार-प्रसार करते रहें। चिरंजीवी हनुमान आज भी इस लोक में उपस्थित हैं। 🙏 जय श्री राम 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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श्री कृष्ण कहते हैं.... जिस दिन तुमको पता चलेगा कि जिन लोगों को खुश करने में तुमने सालों लगा दिए... उन्हें सच में कोई फर्क ही नहीं पड़ा, उसी दिन तुम सच में आजाद हो जाओगे! क्योंकि सच्ची शांति लोगों को खुश करने में नहीं,खुद से खुश रहने में है !! जय जय श्री कृष्णा 🙌❣️🚩 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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प्रेम भी एक तीर्थयात्रा जैसा होता है… जहाँ पहले मन को पुराने दुखों, शोर और बोझ से मुक्त करना पड़ता है। मैंने भी अब सब कुछ प्रभु को सौंप दिया है... मन का सारा कलुष, सारी बेचैनियाँ। अब जो शेष है, वो केवल शांत, निर्मल और शाश्वत प्रेम है। तूफ़ान आते हैं, लेकिन सच्चा प्रेम अंत में अरदास बनकर ही ठहरता है। 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
M P SINGH
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शिव ही सत्य हैं शिव ही सुंदर शिव आदि है और अनंत भी शिव ही हैं...! ओम नमः शिवाय 🚩 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️