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Ram Das ( राम जी का दास )
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Ram Das ( राम जी का दास )
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- संत कबीरदास जी की निर्गुण-भक्ति और मानवतावादी दृष्टि के अनुरूप के अनुसार अहिंसा का आत्मिक विकास में महत्व की सूची दी जा रही है । --- परमपिता के अनुसार अहिंसा का आत्मिक विकास में महत्व 1. अहिंसा आत्मा की शुद्धि का प्रथम चरण है। 2. हिंसा मन को अशांत और आत्मा को मलिन करती है। 3. अहिंसा से भीतर करुणा का जन्म होता है। 4. करुणा के बिना ईश्वर-प्राप्ति असंभव है। 5. अहिंसा अहंकार को गलाने का साधन है। 6. हिंसा अहं को पोषित करती है। 7. अहिंसक व्यक्ति सभी प्राणियों में ईश्वर देखता है। 8. परमपिता के अनुसार जीव-हत्या पाप का मूल है। 9. अहिंसा से मन निर्मल होता है। 10. निर्मल मन में ही सत्य टिकता है। 11. अहिंसा आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त करती है। 12. हिंसा साधक को संसार के बंधन में बाँधती है। 13. अहिंसा से भय का नाश होता है। 14. भयमुक्त मन ही ध्यान योग्य होता है। 15. अहिंसा प्रेम का व्यवहारिक रूप है। 16. प्रेम के बिना भक्ति खोखली है। 17. अहिंसा से क्रोध का क्षय होता है। 18. क्रोध आत्मिक पतन का कारण है। 19. अहिंसा साधक को सहनशील बनाती है। 20. सहनशीलता आत्मिक परिपक्वता की पहचान है। 21. अहिंसा से द्वेष समाप्त होता है। 22. द्वेष आत्मा को जकड़ लेता है। 23. अहिंसा से मनुष्य विनम्र बनता है। 24. विनम्रता से ज्ञान का उदय होता है। 25. अहिंसा से जीवों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है। 26. संवेदनशील हृदय में राम बसते हैं। 27. परमपिता के अनुसार हिंसा बाहरी पूजा को व्यर्थ करती है। 28. अहिंसा आंतरिक साधना को मजबूत करती है। 29. अहिंसा से साधक का विवेक जाग्रत होता है। 30. विवेक आत्मिक उन्नति का दीपक है। 31. अहिंसा से मन स्थिर होता है। 32. स्थिर मन ही समाधि में जाता है। 33. अहिंसा से जीवन में संतुलन आता है। 34. असंतुलन आत्मिक भ्रम को जन्म देता है। 35. अहिंसा साधक को सरल बनाती है। 36. सरलता में ही सच्ची भक्ति है। 37. अहिंसा से आत्मविश्वास बढ़ता है। 38. आत्मविश्वास आत्मबल का रूप है। 39. अहिंसा से कर्म शुद्ध होते हैं। 40. शुद्ध कर्म मोक्ष की ओर ले जाते हैं। 41. अहिंसा से मनुष्य लोभ से मुक्त होता है। 42. लोभ आत्मा का शत्रु है। 43. अहिंसा से साधक संतोषी बनता है। 44. संतोष आत्मिक सुख का आधार है। 45. अहिंसा से जीवन में शांति आती है। 46. शांति में ईश्वर का वास होता है। 47. परमपिता के अनुसार हिंसा अज्ञान की उपज है। 48. अहिंसा ज्ञान का फल है। 49. अहिंसा से साधक सभी को अपना मानता है। 50. अपनत्व से भेदभाव मिटता है। 51. अहिंसा से जाति-पाँति का अहं टूटता है। 52. अहं आत्मिक अंधकार फैलाता है। 53. अहिंसा से साधक सहज बनता है। 54. सहजता में ही सत्य प्रकट होता है। 55. अहिंसा से वाणी मधुर होती है। 56. मधुर वाणी आत्मिक ऊर्जा बढ़ाती है। 57. अहिंसा से विचार शुद्ध होते हैं। 58. शुद्ध विचार आत्मिक विकास का मूल हैं। 59. अहिंसा से जीवन पवित्र बनता है। 60. पवित्र जीवन ही साधना है। 61. अहिंसा से साधक वैराग्य की ओर बढ़ता है। 62. वैराग्य आत्मिक स्वतंत्रता देता है। 63. अहिंसा से आत्मा हल्की होती है। 64. हल्की आत्मा सहज उड़ान भरती है। 65. अहिंसा से मनुष्य स्वयं को जानता है। 66. आत्मज्ञान ही परम लक्ष्य है। 67. परमपिता के अनुसार अहिंसा राम-नाम की रक्षा करती है। 68. हिंसा नाम-स्मरण को निष्फल कर देती है। 69. अहिंसा से साधक भीतर और बाहर एक होता है। 70. एकरूपता आत्मिक स्थिरता लाती है। 71. अहिंसा से जीवन में पाखंड मिटता है। 72. पाखंड आत्मिक पतन का कारण है। 73. अहिंसा से साधक मानवता से जुड़ता है। 74. मानवता ही सच्चा धर्म है। 75. अहिंसा से आत्मा का विस्तार होता है। 76. विस्तृत आत्मा में ईश्वर प्रकट होता है। 77. अहिंसा से साधक मोक्ष के निकट पहुँचता है। 78. मोक्ष अहिंसा का अंतिम फल है। 79. अहिंसा परमपिता की भक्ति का प्राण है। 80. अहिंसा के बिना आत्मिक विकास अधूरा है। ---
Ram Das ( राम जी का दास )
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- बुराई पर ( पाप पर ) केवल अहिंसा से ही विजय प्राप्त करना चाहिए । पाप केवल अहिंसा से ही डरता है । नाम सिमरन ( ईश्वर रब खुदा सिमरन ) अहिंसक बनने में सहायक है । हमारे अंदर बुराई/पाप छुप कर रहना पसंद करता है । बुराई/पाप को हमारे अंदर छुप कर रहना बहुत पसंद है । --- संत कबीरदास जी की विचारधारा के अनुसार हिंसक और अहिंसक इंसान का अंतर को समझने का सरल प्रयास । 1. या तो हिंसक इंसान बाहर के शत्रु खोजता है, या तो अहिंसक इंसान भीतर के अहंकार को जीतता है। 2. या तो हिंसक इंसान तलवार पर भरोसा करता है, या तो अहिंसक इंसान सत्य पर। 3. या तो हिंसक इंसान डर फैलाता है, या तो अहिंसक इंसान प्रेम। 4. या तो हिंसक इंसान क्रोध में जीता है, या तो अहिंसक इंसान करुणा में। 5. या तो हिंसक इंसान दूसरों को नीचा दिखाता है, या तो अहिंसक इंसान स्वयं को छोटा मानता है। 6. या तो हिंसक इंसान शब्दों से घाव देता है, या तो अहिंसक इंसान मौन से सिखाता है। 7. या तो हिंसक इंसान धर्म के नाम पर लड़ता है, या तो अहिंसक इंसान धर्म को जीता है। 8. या तो हिंसक इंसान बाहरी पूजा में उलझा है, या तो अहिंसक इंसान भीतर राम को देखता है। 9. या तो हिंसक इंसान जाति-पाति में फँसा है, या तो अहिंसक इंसान मानवता में। 10. या तो हिंसक इंसान दूसरों की भूल खोजता है, या तो अहिंसक इंसान अपनी। 11. या तो हिंसक इंसान बोलकर चोट करता है, या तो अहिंसक इंसान बोलकर जोड़ता है। 12. या तो हिंसक इंसान दिखावे का साधु है, या तो अहिंसक इंसान सच्चा भक्त। 13. या तो हिंसक इंसान लोभ से बंधा है, या तो अहिंसक इंसान संतोष से मुक्त। 14. या तो हिंसक इंसान छल से जीतता है, या तो अहिंसक इंसान सत्य से हारकर भी जीतता है। 15. या तो हिंसक इंसान देह को सब कुछ मानता है, या तो अहिंसक इंसान आत्मा को। 16. या तो हिंसक इंसान अपमान का बदला लेता है, या तो अहिंसक इंसान क्षमा देता है। 17. या तो हिंसक इंसान शोर में जीता है, या तो अहिंसक इंसान शांति में। 18. या तो हिंसक इंसान आग बनकर जलाता है, या तो अहिंसक इंसान दीप बनकर रोशन करता है। 19. या तो हिंसक इंसान दूसरों को बदलना चाहता है, या तो अहिंसक इंसान स्वयं को। 20. या तो हिंसक इंसान बाहरी शुद्धता दिखाता है, या तो अहिंसक इंसान मन की। 21. या तो हिंसक इंसान कर्म से भागता है, या तो अहिंसक इंसान कर्म को साधना बनाता है। 22. या तो हिंसक इंसान भय का व्यापार करता है, या तो अहिंसक इंसान भरोसे का। 23. या तो हिंसक इंसान भीड़ का हिस्सा है, या तो अहिंसक इंसान चेतना का। 24. या तो हिंसक इंसान दूसरों की पीड़ा नहीं देखता, या तो अहिंसक इंसान उसे अपना मानता है। 25. या तो हिंसक इंसान जीत को लक्ष्य बनाता है, या तो अहिंसक इंसान सत्य को। 26. या तो हिंसक इंसान वाणी को हथियार बनाता है, या तो अहिंसक इंसान औषधि। 27. या तो हिंसक इंसान धर्म में दीवारें खड़ी करता है, या तो अहिंसक इंसान पुल। 28. या तो हिंसक इंसान अपने मत को श्रेष्ठ मानता है, या तो अहिंसक इंसान सबको सीख मानता है। 29. या तो हिंसक इंसान समय नष्ट करता है, या तो अहिंसक इंसान समय साधता है। 30. या तो हिंसक इंसान बाहर की जीत चाहता है, या तो अहिंसक इंसान भीतर की। 31. या तो हिंसक इंसान क्रोध को शक्ति समझता है, या तो अहिंसक इंसान कमजोरी। 32. या तो हिंसक इंसान दूसरों के पतन से खुश होता है, या तो अहिंसक इंसान उत्थान से। 33. या तो हिंसक इंसान दिखावे का ज्ञान रखता है, या तो अहिंसक इंसान अनुभव का। 34. या तो हिंसक इंसान तर्क से लड़ता है, या तो अहिंसक इंसान विवेक से समझाता है। 35. या तो हिंसक इंसान शरीर को सजाता है, या तो अहिंसक इंसान चरित्र को। 36. या तो हिंसक इंसान दूसरों को दोष देता है, या तो अहिंसक इंसान स्वयं सुधारता है। 37. या तो हिंसक इंसान अंधविश्वास फैलाता है, या तो अहिंसक इंसान चेतना जगाता है। 38. या तो हिंसक इंसान मोह में बंधा है, या तो अहिंसक इंसान प्रेम में मुक्त। 39. या तो हिंसक इंसान डर से धर्म निभाता है, या तो अहिंसक इंसान प्रेम से। 40. या तो हिंसक इंसान बाहर गुरु खोजता है, या तो अहिंसक इंसान भीतर। 41. या तो हिंसक इंसान शब्दों का बोझ है, या तो अहिंसक इंसान मौन का रस। 42. या तो हिंसक इंसान दूसरों की आस्था तोड़ता है, या तो अहिंसक इंसान जोड़ता है। 43. या तो हिंसक इंसान अधिकार माँगता है, या तो अहिंसक इंसान कर्तव्य निभाता है। 44. या तो हिंसक इंसान जीवन को युद्ध समझता है, या तो अहिंसक इंसान साधना। 45. या तो हिंसक इंसान अपनी इच्छा थोपता है, या तो अहिंसक इंसान सह-अस्तित्व निभाता है। 46. या तो हिंसक इंसान मृत्यु से डरता है, या तो अहिंसक इंसान जीवन समझता है। 47. या तो हिंसक इंसान बाहरी नियमों में फँसा है, या तो अहिंसक इंसान आत्मज्ञान में। 48. या तो हिंसक इंसान जीतकर भी खाली है, या तो अहिंसक इंसान हारकर भी पूर्ण। 49. या तो हिंसक इंसान दूसरों को बदलकर सुख चाहता है, या तो अहिंसक इंसान स्वयं बदलकर। 50. या तो हिंसक इंसान भ्रम में जीता है, या तो अहिंसक इंसान बोध में। 51. या तो हिंसक इंसान वासना का दास है, या तो अहिंसक इंसान प्रेम का सेवक। 52. या तो हिंसक इंसान समय के साथ कठोर होता है, या तो अहिंसक इंसान कोमल। 53. या तो हिंसक इंसान शरीर मारता है, या तो अहिंसक इंसान अहंकार। 54. या तो हिंसक इंसान दूसरों की सीमाएँ लाँघता है, या तो अहिंसक इंसान अपनी। 55. या तो हिंसक इंसान बाहर शत्रु देखता है, या तो अहिंसक इंसान भीतर मित्र। 56. या तो हिंसक इंसान उपदेश देता है, या तो अहिंसक इंसान उदाहरण बनता है। 57. या तो हिंसक इंसान स्वार्थ में डूबा है, या तो अहिंसक इंसान सेवा में। 58. या तो हिंसक इंसान शोर मचाता है, या तो अहिंसक इंसान प्रभाव छोड़ता है। 59. या तो हिंसक इंसान दिखता बहुत है, या तो अहिंसक इंसान गहराता है। 60. या तो हिंसक इंसान बाहर की दुनिया जीतता है, या तो अहिंसक इंसान स्वयं को। 61. या तो हिंसक इंसान भ्रम को सच मानता है, या तो अहिंसक इंसान सच को जीता है। 62. या तो हिंसक इंसान धर्म से दूरी बढ़ाता है, या तो अहिंसक इंसान धर्म की आत्मा बनता है। 63. या तो हिंसक इंसान अलगाव फैलाता है, या तो अहिंसक इंसान एकता। 64. या तो हिंसक इंसान अहंकार में ऊँचा है, या तो अहिंसक इंसान विनम्रता में। 65. या तो हिंसक इंसान बाहरी शत्रु से लड़ता है, या तो अहिंसक इंसान भीतर के विकार से। 66. या तो हिंसक इंसान शब्दों में फँसा है, या तो अहिंसक इंसान अनुभव में। 67. या तो हिंसक इंसान नियम तोड़कर जीतता है, या तो अहिंसक इंसान नियम निभाकर। 68. या तो हिंसक इंसान भ्रमित भक्त है, या तो अहिंसक इंसान जाग्रत संत। 69. या तो हिंसक इंसान डर से नियंत्रित है, या तो अहिंसक इंसान प्रेम से मुक्त। 70. या तो हिंसक इंसान अंधकार बढ़ाता है, या तो अहिंसक इंसान दीप जलाता है। 71. या तो हिंसक इंसान दूसरों की आहुति चाहता है, या तो अहिंसक इंसान अपनी। 72. या तो हिंसक इंसान बाहर भगवान खोजता है, या तो अहिंसक इंसान हर जीव में। 73. या तो हिंसक इंसान कर्म बाँधता है, या तो अहिंसक इंसान कर्म काटता है। 74. या तो हिंसक इंसान देह से बोलता है, या तो अहिंसक इंसान आत्मा से। 75. या तो हिंसक इंसान दिखावे की भक्ति करता है, या तो अहिंसक इंसान सच्ची। 76. या तो हिंसक इंसान समय के साथ टूटता है, या तो अहिंसक इंसान निखरता है। 77. या तो हिंसक इंसान बाहर की लड़ाई जीतता है, या तो अहिंसक इंसान भीतर की। 78. या तो हिंसक इंसान भ्रम फैलाता है, या तो अहिंसक इंसान बोध। 79. या तो हिंसक इंसान संसार में उलझा है, या तो अहिंसक इंसान उससे मुक्त। 80. या तो हिंसक इंसान मन का दास है, या तो अहिंसक इंसान मन का साक्षी। ---
Ram Das ( राम जी का दास )
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- अगर किसी व्यक्ति को पता हो कि उसके पास मृत्यु से पहले केवल 30 दिन बचे हैं — संत कबीर दास जी के अनुसार उसे क्या करना चाहिए? संत कबीर दास जी कहते हैं कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। इसलिए जो काम अंतिम 30 दिनों में करना चाहिए, वही काम हर दिन करना चाहिए। फिर भी अगर किसी को यह ज्ञात हो जाए कि अब केवल 30 दिन शेष हैं, तो कबीर साहेब की शिक्षा बहुत स्पष्ट है। --- 1. झूठे मोह और लगाव को छोड़ देना संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं कि यह शरीर, धन, घर-परिवार और मान-सम्मान — सब नश्वर हैं। ---> “माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे” अर्थ: जिस शरीर को तुम सँवारते हो, वही एक दिन मिट्टी बन जाएगा। अंतिम दिनों में व्यक्ति को चाहिए कि: धन और संपत्ति का मोह छोड़ दे ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें दान कर दे पुराने झगड़े सुलझा ले सभी को क्षमा करे और स्वयं भी क्षमा माँगे --- 2. अहंकार (मैं–पन) को समाप्त करना संत कबीर दास जी साहेब के अनुसार अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है। ---> “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं” अर्थ: जब तक “मैं” हूँ, तब तक ईश्वर नहीं। अंतिम समय में: अपने सही-गलत की जिद छोड़ दें पद, ज्ञान, धर्म या जाति का घमंड न रखें स्वयं को छोटा और सरल बना लें --- 3. ईश्वर के नाम का स्मरण करना (नाम-सिमरन) संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं कि मृत्यु के बाद केवल ईश्वर का नाम ही साथ जाता है। ---> “राम नाम रस पीजिए, छूटे माया रोग” यहाँ “राम” का अर्थ किसी एक धर्म का देवता नहीं, बल्कि निराकार परम सत्य है। अंतिम दिनों में: कम बोलें व्यर्थ बातों से दूर रहें मन ही मन ईश्वर का स्मरण करें --- 4. दिखावे के कर्मकांड छोड़कर सच्चे मन से भक्ति संत कबीर दास जी साहेब बाहरी पूजा-पाठ के विरोधी थे। ---> “पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़” अर्थ: अगर पत्थर पूजने से भगवान मिलते, तो पहाड़ ही पूज लेते। इसलिए: डर से किए गए कर्मकांड न करें ईश्वर से सौदेबाज़ी न करें सच्चे मन से समर्पण करें --- 5. मृत्यु से डरना नहीं संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं कि मृत्यु से डरना व्यर्थ है। ---> “जो आया सो जाएगा, राजा रंक फकीर” अर्थ: जो जन्मा है, उसे जाना ही है — चाहे राजा हो या भिखारी। जो व्यक्ति: ईश्वर को याद करता है अहंकार छोड़ देता है उसके लिए मृत्यु शांति होती है, सज़ा नहीं। --- 6. अपने कर्मों को स्वीकार करना अंतिम समय में: “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” यह न पूछें दुख और पीड़ा को शांति से स्वीकार करें ईश्वर पर दोष न डालें संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं — स्वीकार करने से दुख कम हो जाता है। --- 7. मौन और आत्म-चिंतन अंतिम दिनों में: शांति से बैठें विचारों को आते-जाते देखें बीते हुए जीवन से चिपकें नहीं भविष्य की चिंता छोड़ दें यह अभ्यास आत्मा को शरीर से सहज रूप से अलग होने में सहायता करता है। --- संत कबीर दास जी की अंतिम शिक्षा यदि कबीर साहेब एक ही बात कहें, तो वह यह होगी: ---> “सांई इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय” अर्थ: जीवन में संतोष, विनम्रता और समर्पण रखो। --- सारांश (संक्षेप में) संत कबीर दास जी के अनुसार, मृत्यु से पहले के 30 दिनों में व्यक्ति को: मोह छोड़ देना चाहिए अहंकार समाप्त करना चाहिए ईश्वर का नाम स्मरण करना चाहिए सबको क्षमा करना चाहिए मृत्यु से न डरना चाहिए हर परिस्थिति स्वीकार करनी चाहिए जो व्यक्ति जीते-जी “मैं” को छोड़ देता है, उसके लिए मृत्यु बंधन नहीं, मुक्ति बन जाती है । ---
Ram Das ( राम जी का दास )
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#🥑हेल्दी फूड : आसान तरीका : जब आप नाम सिमरन ( ईश्वर रब खुदा सिमरन – मन से याद करना – कर ले उसके बाद यह नाश्ता आप खा सकते है । ) कठीन तरीका : फल का सेवन करें । अनाज का नही । --- अंकुरित मूंग और अंकुरित चने को नाश्ते में खाने की आसान, देसी और रोज़मर्रा की विधियाँ दी गई हैं । सभी तरीके घर पर जल्दी बनने वाले हैं । --- अंकुरित मूंग और चने के नाश्ते बनाने के तरीके 1. सादा अंकुरित सलाद अंकुरित मूंग + अंकुरित चना थोड़ा नमक, नींबू चाहें तो प्याज़, टमाटर डालें --- 2. गुड़ वाला अंकुरित मिक्स अंकुरित मूंग + चना कद्दूकस किया गुड़ ऊपर से तिल या मूंगफली --- 3. नमकीन अंकुरित चाट अंकुरित मूंग-चना थोड़ा नमक, नींबू, भुना जीरा हल्की मीठी चटनी (वैकल्पिक) --- ज़रूरी टिप्स अंकुर ज़्यादा बड़े न हों सुबह खाली पेट या हल्के नाश्ते में उत्तम ---
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : संत कबीरदास जी की शिक्षाएँ बहुत ही गहरी और व्यवहारिक हैं। उन्होंने जीवन में बार-बार गलतियाँ करने वाले व्यक्ति के लिए न केवल चेतावनी दी है बल्कि सुधार और आत्मज्ञान के रास्ते भी सुझाए हैं। उनके विचारों और नसीहतों को विस्तार यह है । --- संत कबीरदास जी की नसीहतें – बार-बार गलतियाँ करने वाले व्यक्ति के लिए 1. सत्य की राह अपनाओ संत कबीरदास जी कहते हैं कि हमेशा सच बोलो और सच की राह पर चलो। झूठ और छल से बचो, क्योंकि यही आपकी गलतियों का मूल कारण बनता है। 2. अहंकार को त्यागो स्वयं को बड़ा या दूसरों से श्रेष्ठ समझना गलतियों को जन्म देता है। संत कबीरदास जी कहते हैं: “अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं।” 3. सकारात्मक सोच अपनाओ बार-बार गलतियाँ करने वाला व्यक्ति नकारात्मक सोच में फँसा होता है। संत कबीरदास जी बताते हैं कि मन की शुद्धि और सकारात्मक दृष्टिकोण से ही सुधार संभव है। 4. अंतर्मुखी ध्यान और आत्मचिंतन करो अपने कर्मों और विचारों का निरंतर मूल्यांकन करो। संत कबीरदास जी कहते हैं: “जो भीतर देखता है, वही सच देख पाता है।” 5. सत्संग और अच्छे संगति का महत्व अच्छे लोगों और संतों के संग में रहो। बुरे संग से बुराई बढ़ती है और सुधार कठिन होता है। 6. क्रोध और लोभ से बचो क्रोध और लालच बार-बार गलतियों की वजह बनते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि यह दोहरी आग है, जो मन को जलाती है। 7. क्षमा और धैर्य का अभ्यास करो अपनी गलतियों के लिए खुद को क्षमा करो, पर उन्हें दोहराने से बचो। धैर्य से जीवन में सुधार संभव है। 8. ईश्वर और आत्मा पर भरोसा रखो हर गलती के बाद ईश्वर की शरण में जाना और आत्मा की शुद्धि का प्रयास करना चाहिए। संत कबीरदास जी कहते हैं: “ईश्वर का नाम जपो, मन का दर्पण साफ करो।” 9. साधु का मार्ग अपनाओ संतों और विद्वानों की शिक्षा को अपनाना चाहिए। संत कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु और साधु से सीखना मानव को सही राह दिखाता है। 10. अतीत को भूलो और वर्तमान में सुधार करो बार-बार की गई गलतियों में फँसकर पछताने की बजाय, वर्तमान में सही कर्म करना ज़रूरी है। 11. काम, क्रोध, मोह से बचो यह तीन दोष मनुष्य को बार-बार गिराते हैं। संत कबीरदास जी ने कहा: “काम क्रोध मोह का त्याग कर, आत्मा का प्रकाश पाओ।” 12. अहंकार और लोभ छोड़कर सेवा करो दूसरों की मदद करने से और निस्वार्थ भाव रखने से मन का बोझ हल्का होता है। 13. नियमित आत्म-अवलोकन करो रोज़ अपने कर्मों और विचारों का निरीक्षण करना चाहिए। संत कबीरदास जी कहते हैं: “मन का काम जाँचो, तब ही जीवन सफल होगा।” 14. संगति और भाषा पर नियंत्रण रखो बुरी संगति और कठोर शब्द बोलने से भी गलतियाँ बढ़ती हैं। 15. ज्ञान और अनुभव से सीखो बार-बार गलती करने वाला व्यक्ति ज्ञान और अनुभव से सीखकर सुधर सकता है। संत कबीरदास जी का संदेश है: “सिखो वही, जो सही राह दिखाए।” --- संक्षेप में: संत कबीरदास जी बार-बार गलती करने वाले व्यक्ति को यही सलाह देते हैं कि वह सत्य, धैर्य, अहंकार त्याग, ईश्वर भक्ति, साधु संग और आत्म-निरीक्षण अपनाए । इससे न केवल गलतियाँ कम होंगी बल्कि मन और जीवन दोनों की शुद्धि होगी। --- अध्यात्मिक शब्दों की संत कबीरदास जी के दृष्टिकोण और सिद्धांतों के अनुसार परिभाषा दिए गए है । --- 1. सत्य परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): सत्य का अर्थ है मन, वचन और कर्म में सच होना। संत कबीरदास जी के अनुसार, सत्य केवल बोलने या दिखावे का विषय नहीं है, बल्कि अंदर से सच्चा और निर्मल होना है। सत्य का पालन करने वाला व्यक्ति ईश्वर के निकट होता है। ---> उदाहरण: कबीर कहते हैं – “सत्य का पालन कर, संसार में तू उजियार।” --- 2. धैर्य परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): धैर्य का अर्थ है कठिनाइयों और चुनौतियों में संयम रखना और बिना क्रोध या चिंता के कर्म करना। कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य का मन स्थिर रहे, तभी वह आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है। धैर्य मन की शक्ति है जो सत्य और भक्ति की राह पर टिकाए रखता है। ---> उदाहरण: “धीरज राखो, मन को मत हिलाओ; समय आने पर फल स्वतः मिलेगा।” --- 3. अहंकार त्याग परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): अहंकार त्याग का अर्थ है स्वयं को बड़ा समझने, दूसरों को नीचा आंकने और स्वार्थ में फँसने से मुक्त होना। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जब अहंकार छोड़ देते हैं, तभी मन और आत्मा का प्रकाश जागृत होता है। ---> उदाहरण: “जहाँ मैं त्यागा, वहाँ राम दिखे।” --- 4. ईश्वर भक्ति परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): ईश्वर भक्ति का अर्थ है हर कार्य और विचार में परमात्मा को याद रखना और उसकी शरण में रहना। संत कबीरदास जी के अनुसार, भक्ति केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं है; सच्ची भक्ति वह है जो कर्म, वचन और विचारों में झलकती है। ---> उदाहरण: “नाम जप, काम छोड़, मन को शुद्ध कर।” --- 5. साधु संग परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): साधु संग का अर्थ है संतों, ज्ञानी लोगों और निस्वार्थ व्यक्तियों के संग में रहना। संत कबीरदास जी कहते हैं कि बुरे संग से मन भ्रष्ट होता है, जबकि साधु संग ज्ञान, भक्ति और सुधार की दिशा में मार्गदर्शन करता है। ---> उदाहरण: “साधु की संगति ज्यों उजियारा, अंधकार मिटे सब धरा।” --- 6. आत्म-निरीक्षण परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): आत्म-निरीक्षण का अर्थ है अपने मन, विचार, भाव और कर्मों की गहराई से जांच करना। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने अंदर झाँकने वाला व्यक्ति गलतियों को पहचानकर उन्हें सुधार सकता है, और वही सच्चे अर्थ में आध्यात्मिक प्रगति करता है। ---> उदाहरण: “मन का काम जाँचो, तब जीवन सफल हो।” --- सारांश: संत कबीरदास जी के अनुसार, ये सभी सिद्धांत एक-दूसरे से जुड़े हैं। सत्य पर चलो, धैर्य रखो, अहंकार त्यागो, ईश्वर भक्ति करो, साधु संग में रहो और आत्म-निरीक्षण करते रहो— यही जीवन और आत्मा की शुद्धि का मार्ग है। ---
Ram Das ( राम जी का दास )
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- प्रतिष्ठा के पीछे भागने वाला इंसान अंत में मृत्यु के समय मूर्ख बन जाता है । मृत्यु का काम है इंसानों को प्रतिष्ठा का लालच दिखाकर मूर्ख बनाना । कभी भी प्रतिष्ठा मान समान के पीछे न भागे । ( मृत्यु हमारा पीछा कर रही है । हमे ईश्वर का मन से स्मरण करना चाहिए । हमे ईश्वर को मन से याद करना चाहिए । हमारे मन को ईश्वर का पीछा करना चाहिए । वरना बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है । मृत्यु तो अटल सत्य हैं । मृत्यु से बचा नही जा सकता है । जो पैदा हुआ है वह तो मरेगा । अगर हमे मरना नहीं है तो हमे पैदा भी नही होना चाहिएं । जन्म मरण चलता रहता है । किसी के मरने का अफसोस नही करना चाहिए । यह शरीर विष का पुतला है । इस विष के पुतले का सही उपयोग कर लीजिए इसके पहले की यह विष का पुतला आप से छीन लिया जाय । आपकी मर्जी हो य न हों यह विष का पुतला आप से आपकी मर्जी के बिना छीन लिया जायेगा । तब बाद में पछताने से कोई फायदा नही मिलेगा । इंसान में बुद्धि अक्ल नहीं होती है । अर्थ है बहुत ही कम बुद्धि और अक्ल होती है । जब भी समय मिले तो जीवन का क्या उद्देश्य है और जीवन कैसे जीना चाहिए इसके बारे में जानकारी प्राप्त करते रहे । और हमेशा याद रखे हम मूर्ख है । कम बुद्धि वाले और कम अक्ल वाले है । चींटी में जितनी अक्ल होती है हम इंसान में उतनी भी अक्ल नहीं है । इस कारण से हमे हमेशा जीवन का उद्देश्य क्या है और जीवन कैसे जीना चाहिए इसके बारे में जानकारी लेते रहे । समय को व्यर्थ बिताने वाले को तो जो सजा मिलती है उस बात को बताने का तो कोई फायदा ही नही है । वह तो समय के पार की कल्पना है । दुख कभी भी पीछा नही छोड़ेंगे ।) संत कबीर दास जी ने “status” यानी सामाजिक प्रतिष्ठा, पद या मान-सम्मान के बारे में बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि सामाजिक पहचान और दिखावा जीवन का उद्देश्य नहीं होता है । उनके अनुसार सच्चा जीवन मन, आचरण और भक्ति में है, न की बाहरी प्रतिष्ठा में व मान सम्मान की प्राप्ति में । इसे विस्तृत रूप में समझाया गया है: --- संत कबीरदास जी के अनुसार Status / प्रतिष्ठा 1. सामाजिक प्रतिष्ठा अस्थायी है – यह जन्म, संपत्ति या पद से तय होती है। 2. Status का मोह भ्रम है – बाहरी पहचान में खुश रहना आत्मज्ञान में बाधा डालता है। 3. सच्चा मान-सम्मान कर्म और गुण से आता है, जन्म या पद से नहीं। 4. दिखावा और दिखावटी शान अहंकार बढ़ाती है। 5. संत कबीर दास जी कहते हैं कि “जाति, धन और पद देखकर कोई बड़ा नहीं होता।” 6. जो व्यक्ति दूसरों की प्रशंसा की लालसा करता है, वह सच्चे ज्ञान से दूर है। 7. Status की इच्छा मन को बांधती है, जैसे बंधन। 8. सामाजिक मान-सम्मान केवल भ्रम और अहंकार पैदा करता है। 9. सच्चा संत या ज्ञानी किसी प्रतिष्ठा के पीछे नहीं भागता। 10. बाहरी पहचान से आत्मा की उन्नति नहीं होती। 11. मनुष्य की असली प्रतिष्ठा उसके चरित्र और आचरण में है। 12. धन, पद या शक्ति स्थायी नहीं होती; गुण और भक्ति स्थायी होती हैं। 13. Status को लेकर अहंकार करना अधर्मी और अशुद्ध है। 14. सच्चा आत्मज्ञानी समाज की नजर में छोटा या बड़ा मानता नहीं। 15. जो व्यक्ति केवल पद और प्रतिष्ठा चाहता है, वह जीवन का मूल उद्देश्य भूल जाता है। 16. सत्य और भक्ति में ही वास्तविक उच्चता है, न कि बाहरी सम्मान में। 17. संत कबीर दास जी कहते हैं कि ईश्वर की नजर में हर मनुष्य समान है। 18. बाहरी सम्मान पर भरोसा करना आत्मा की कमजोरी है। 19. Status के लिए किए गए कर्म निष्फल और अहंकारी होते हैं। 20. संत कबीर दास जी का संदेश: जीवन में सच्ची प्रतिष्ठा दिल की शुद्धता, कर्म की निष्ठा और भक्ति से आती है। --- सारांश बाहरी Status: जन्म, पद, संपत्ति, दिखावा – अस्थायी और भ्रमपूर्ण। असली Status: आचरण, गुण, प्रेम, भक्ति और ज्ञान – स्थायी और आत्मिक। संत कबीर दास जी के अनुसार सच्चा मान-सम्मान भगवान और समाज में किए गए अच्छे कर्मों से बनता है, न कि दिखावे या पद से। ---
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