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*मैं कौन हूँ?*
*(Who Am I)*
*[मन का अंतरद्वंद]*
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*सेवा निवृत्ति के बाद,*
*न कोई नौकरी,*
*न कोई दिनचर्या,*
*और एक शांत घर।*
*जो अब सिर्फ,*
*सन्नाटे की गूंज है!
बच्चे सभी अपने परिवार में
मस्त व्यस्त हैं।
अब उनकी भी
उत्तरदायित्व
भारी भरकम है।
*मैंने अंततः*
*अपने असली अस्तित्व को,*
*खोजना शुरू किया।।*
*मैं कौन हूँ?*
*मैंने बंगले बनवाए,*
*छोटे-बड़े कई निवेश किए।*
*पर आज चार दीवारों में,*
*सिमट गया हूँ।।*
*साइकिल से मोपेड,*
*मोपेड से बाइक।*
*बाइक से कार तक की रफ्तार,*
*और स्टाइल का पीछा किया।*
*पर अब धीरे-धीरे चलता हूँ,*
*वो भी अकेले,*
*अपने कमरे के भीतर।।*
*प्रकृति मुस्कराई और पूछा,*
*तुम कौन हो, प्रिय मित्र?*
*मैंने कहा -*
*मैं...! बस मैं हूँ...!।*
*राज्य देखे, देश विदेश देखे,*
*महाद्वीपों की सैर की।*
*पर आज मेरी यात्रा,*
*ड्राइंग रूम से*
*रसोई तक सीमित है।।*
*संस्कृतियाँ,*
*और परंपराएँ सीखीं।*
*पर अब केवल,*
*अपने ही परिवार को,*
*समझने की इच्छा है।।*
*प्रकृति फिर मुस्कराई,*
*तुम कौन हो, प्रिय मित्र?*
*मैंने उत्तर दिया,*
*मैं...! बस मैं हूँ...!!*
*कभी जन्म दिन,*
*सगाई, शादियाँ,*
*धूमधाम से मनाईं।*
*पर आज,*
*सब्ज़ियाँ खरीदने के लिए,*
*सिक्के गिनता हूँ।।*
*प्रकृति ने फिर पूछा,*
*तुम कौन हो, प्रिय मित्र?*
*मैंने कहा,*
*मैं...! बस मैं हूँ...!!*
*सोना, चाँदी, हीरे,*
*लॉकर्स में,*
*चुपचाप पड़े हैं।*
*सूट-ब्लेज़र,*
*अलमारी में टंगे हैं,*
*बिना छुए।*
*पर अब मैं,*
*नरम सूती कपड़ों में,*
*जीता हूँ,*
*सादा और आज़ाद।।*
*कभी अंग्रेज़ी, संस्कृत, गुजराती, मराठी
*व हिंदी में दक्ष था।*
*अब तो केवल माँ की बोली में,*
*सुकून मिलता है।।*
*काम के सिलसिलों में,*
*नगर नगर देश-देश घूमता रहा।*
*अब उन मुनाफ़ों,*
*और नुकसानों को,*
*यादों में तौलता हूँ।।*
*व्यवसाय चलाया,*
*परिवार बसाया,*
*अनेक रिश्ते बनाए।*
*पर अब,*
*मेरे सबसे प्रिय साथी,*
*पड़ोस के,*
*वो स्नेही बुज़ुर्ग हैं।।*
*कभी नियमों का,*
*पालन किया।*
*शिक्षा में आगे बढ़ा।*
*पर अब समझ आया,*
*कि वास्तव में,*
*मायने क्या रखता है?*
*ज़िंदगी की,*
*हर ऊँच-नीच के बाद।*
*एक शांत पल में,*
*मेरी आत्मा ने मुझसे,*
*फुसफुसा कर कहा --*
*हे यात्री,*
*बस अब तैयार हो जा,*
*अंतिम यात्रा की तैयारी कर।
*प्रकृति ने कोमलता से,*
*मुस्कराते हुए पूछा --
अब बताओ
*तुम कौन हो, प्रिय मित्र?*
*और मैंने उत्तर दिया --*
*हे प्रकृति,*
*तुम मैं हो और मैं तुम।*
*कभी मैं,*
*आकाश में उड़ता था।*
*अब ज़मीन को,*
*सम्मान से छूता हूँ।*
*मुझे क्षमा करो,*
*एक और मौका दो जीने का।*पैसा कमाने की मशीन नहीं,*
*एक सच्चा इंसान बनकर,*
*मूल्यों के साथ,*
*परिवार के साथ,*
*प्यार से जीने का।।*