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Arvind Bhardwaj
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Arvind Bhardwaj
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3 days ago
श्री गणेश की मूर्ति के विषय में सारगर्भित वर्णन 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 1-श्री गणेश की मूर्ति 1फुट से अधिक बड़ी (ऊंची) नहीं होना चाहिए। 2-एक व्यक्ति के द्वारा सहजता से उठाकर लाई जा सके ऐसी मूर्ति हो। 3-सिंहासन पर बैठी हुई, लोड पर टिकी हुई प्रतिमा सर्वोत्तम है। 4-सांप,गरुड,मछली आदि पर आरूढ अथवा युद्ध करती हुई या चित्रविचित्र आकार प्रकार की प्रतिमा बिलकुल ना रखें। 5-शिवपार्वती की गोद में बैठे हुए गणेश जी कदापि ना लें. क्येंकि शिवपार्वती की पूजा लिंगस्वरूप में ही किये जाने का विधान है. शास्त्रों में शिवपार्वती की मूर्ति बनाना और उसे विसर्जित करना निषिद्ध है। 6-श्रीगणेश की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बांधकर घरपर ना लाएं। 7-श्रीगणेश की जबतक विधिवत प्राणप्रतिष्ठा नहीं होती तब तक देवत्व नहीं आता. अत: विधिवत् प्राणप्रतिष्ठा करें। 8-परिवार मेंअथवा रिश्तेदारी में मृत्युशोक होने पर, सूतक में पडोसी या मित्रों द्वारा पूजा, नैवेद्य आदि कार्य करायें. विसर्जित करने की शीघ्रता ना करें। 9-श्रीगणेश की प्राणप्रतिष्ठा होने के बाद घर में वादविवाद, झगड़ा, मद्यपान, मांसाहार आदि ना करें। 10-श्रीगणेशजी को ताजी सब्जीरोटी का भी प्रसाद नैवेद्य के रूप में चलता है केवल उसमें खट्टा, तीखा, मिर्चमसाले आदि ना हों। 11-दही+शक्कर+भात यह सर्वोत्तम नैवेद्य है। 12-विसर्जन के जलूस में झांज- मंजीरा,भजन आदि गाकर प्रभु को शांति पूर्वक विदा करें. डी. जे. पर जोर जोर से अश्लील नाच, गाने, होहल्ला करके विकृत हावभाव के साथ श्रीगणेश की बिदाई ना करें. ध्यान रहे कि इस प्रकार के अश्लील गाने अन्यधर्मावलंबियों केउत्सवों पर नहीं बजाते. 13-यदि ऊपर वर्णित बातों पर अमल करना संभव ना हो तो श्रीगणेश की स्थापना कर उस मूर्ति का अपमान ना करें। अंत में-जो लोग 10दिनों तक गणेशाय की झांकी के सामने रहते हैं, अगर वो नहीं सुधर सकते, तो हम आप भीड़ में धक्के खाकर 2,4 सेकिंड का दर्शन कर सुघर जायेंगे??? कितने अंधेरे में हैं हम लोग.!! इस अंधेरे में क्षणिक प्रकाश ढूंढने की अपेक्षा, घर में रखी हुई गणेशमूर्ति के सामने 1घंटे तक शांत बैठे. अपना आत्मनिरीक्षण करें, अच्छा व्यवहार करें.. घरपर ही गणेश आपपर कृपा बरसायेंगे. श्रीगणेशजी एक ही हैं.... उनकी अलग अलग कंपनियां नहीं होती... अपनी सोच अलग हो सकती है. एकाग्रचित्त हों, शांति प्राप्त करें। शुभम अस्तु✋.... 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 *🙏🌹श्री राधे राधे🌹🙏* #🖊 एक रचना रोज़ ✍
Arvind Bhardwaj
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5 days ago
एक करोड़ ॐ नमः शिवाय। यह संख्या सुनते ही लोग कैलकुलेटर निकालते हैं, पर काशी के अस्सी घाट पर रहने वाले पंडित रामशरण मिश्र ने कागज नहीं, एक पुरानी रुद्राक्ष माला निकाली थी। उनकी उम्र सत्तर पार थी। पत्नी के जाने के बाद घर में केवल एक तांबे का लोटा, शिवलिंग की छोटी पिंडी और दीवार पर टंगी एक डायरी बची थी। डायरी के पहले पन्ने पर उनके गुरु ने लिखा था, "जब मन बहुत शोर करे, तो एक ही नाम को इतनी बार दोहराओ कि शोर उसी में घुल जाए।" 2022 की महाशिवरात्रि को उन्होंने संकल्प लिया। एक करोड़ जप। न किसी मनोकामना के लिए, न किसी चमत्कार के लिए। केवल इस कारण कि जीवन में अब करने को कुछ बचा नहीं था, सिवाय सुनने के। गिनती का गणित एक माला में 108 मनके। एक बार माला पूरी होने पर वे एक छोटा चावल का दाना एक मिट्टी की हांडी में डालते। 108 बार वं, 108 बार नमः शिवाय। दिन में वे औसतन 21 मालाएँ करते, यानी लगभग 2,268 जप। इस हिसाब से एक करोड़ तक पहुँचने में लगभग बारह साल लगते। रामशरण हँसे थे, "शिव को जल्दी नहीं है, मुझे क्यों हो।" पहले महीने में ही कठिनाई आई। घुटनों में दर्द, आवाज बैठना, मोहल्ले के बच्चे पूछते, "बाबा, आप हर समय बुदबुदाते क्यों हो।" वे उत्तर नहीं देते, केवल माला घुमाते रहते। पहली लाख पहली एक लाख पूरी हुई सावन में। हांडी में चावल आधे से भी कम थे। उस रात पहली बार उन्हें लगा कि मंत्र उनके भीतर नहीं, वे मंत्र के भीतर हैं। वे रोज सुबह चार बजे उठते, गंगा में डुबकी लगाते, पिंडी पर दो बेलपत्र चढ़ाते। फिर बैठ जाते। ॐ नमः शिवाय। साँस भीतर, ॐ। साँस बाहर, नमः शिवाय। धीरे धीरे जप बोलना बंद हुआ, वह देखना बन गया। जब ग्राहक आते, पुरोहिती के लिए बुलाते, वे जप रोकते नहीं, बस गति धीमी कर देते। लोग कहते, "मिश्र जी अब कम बोलते हैं।" वे मन में कहते, "अब एक ही बात बार कहता हूँ।" बीच के साल तीसरे साल उनकी हांडी भर गई। उन्होंने दूसरी हांडी रखी। उसी साल उनके बेटे ने उन्हें लखनऊ बुलाया। "बाबा, यहाँ फ्लैट में रहो, आराम मिलेगा।" रामशरण तीन महीने रहे। लिफ्ट की आवाज, टीवी का शोर, पोते की ऑनलाइन क्लास। माला चलती रही, पर मन बिखरता। एक दिन पोते ने पूछा, "दादाजी, वन करोड़ मतलब कितना।" उन्होंने कहा, "मतलब उतना जितना तुम रोज स्कूल जाते हो और एक दिन अचानक तुम्हें रास्ता याद नहीं रहता, पैर खुद चलने लगते हैं।" वे वापस काशी लौट आए। घाट, वही लोटा, वही पिंडी। पाँचवें साल में गिनती पचास लाख पार हुई। अब चावल नहीं, वे एक कॉपी में केवल तारीख लिखते। डॉक्टर ने कहा मोतियाबिंद है। ऑपरेशन के बाद पट्टी खुली तो पहली चीज उन्होंने देखी, सामने रखी माला। उन्होंने आँख बंद की और फिर जप शुरू किया। देखना जरूरी नहीं रहा था। थकान और रस नौवें साल सर्दियों में निमोनिया हुआ। तीन दिन बुखार। चौथे दिन जब होश आया तो होंठ सूखे थे, पर जीभ पर अपने आप चल रहा था, नमः शिवाय, नमः शिवाय। नर्स ने पूछा, "बाबा कुछ चाहिए।" उन्होंने कहा, "बस माला।" उस बीमारी के बाद जप की गति बदल गई। अब वे गिनते नहीं थे। माला अपने आप घूमती। कभी वे सोते सोते भी जप में होते, और सुबह उठते तो उंगलियों में रुद्राक्ष की गर्मी होती। लोग अब उन्हें देखने आते। कोई कहता, "एक करोड़ पूरा होगा तो क्या मिलेगा।" वे हँसते, "जो गिन रहा है वही घट जाएगा।" अंतिम दाना 2025 की महाशिवरात्रि से तीन दिन पहले, रात के दो बजे, उनकी कॉपी में आखिरी पन्ना भरा। हिसाब के अनुसार 1,00,00,108 जप पूरे हुए थे। उन्होंने हांडी में आखिरी चावल नहीं डाला। उन्होंने माला पिंडी पर रख दी। सुबह घाट पर आरती हो रही थी। रामशरण चुपचाप बैठे थे। किसी ने पूछा, "बाबा, आज जप नहीं।" उन्होंने कहा, "आज सुन रहा हूँ।" उसी क्षण डमरू बजा, शंख उठा, और उन्हें पहली बार स्पष्ट सुनाई दिया कि हर ध्वनि के पीछे वही पाँच अक्षर हैं। नाविक की पतवार पानी काटती, ॐ। बच्चा रोता, नमः। चाय उबलती, शिवाय। उन्होंने डायरी का आखिरी पन्ना खोला और लिखा, "एक करोड़ बार मैंने शिव को पुकारा, एक करोड़ एकवीं बार उन्होंने उत्तर दिया। उत्तर शब्द नहीं था, मौन था। अब मुझे जप नहीं करना पड़ता, जप मुझे करता है।" उस दिन के बाद उन्होंने माला फिर उठाई, पर गिनती के लिए नहीं। अब वे हर आने वाले को एक ही बात कहते, "शुरू करो। संख्या शिव की है, थकान तुम्हारी। जब थकान गिर जाएगी, संख्या भी गिर जाएगी, केवल नमः शिवाय बचेगा।" और अस्सी घाट पर आज भी सुबह चार बजे एक तांबे के लोटे की आवाज आती है, फिर धीमी, अटूट ध्वनि, ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय, जैसे गंगा खुद जप कर रही हो। *🌹🙏श्री राधे राधे🌹🙏* #🖊 एक रचना रोज़ ✍
Arvind Bhardwaj
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7 days ago
0️⃣2️⃣💧0️⃣5️⃣💧2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣ *🔥 आज की प्रेरणा प्रसंग 🔥* *🌹 भक्तों की संगति में रहने के फल 🌹* एक बार महान ऋषि नारद मुनि वैकुंठ गए और भगवान विष्णु से पूछा, “हे भगवान, भक्तों की संगति में रहने के क्या फल होते हैं?” भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे मेरे प्रिय नारद, पृथ्वी पर एक वन में जाओ। वहाँ तुम्हें एक बरगद का वृक्ष मिलेगा, जिसकी बाईं शाखा पर एक तोते का घोंसला होगा। घोंसले में एक नवजात तोते का बच्चा होगा। उस तोते के बच्चे से यही प्रश्न पूछो, वह तुम्हें उत्तर देगा।” नारद मुनि ने भगवान विष्णु के निर्देशों का पालन करते हुए वृक्ष के पास गए। उनके पहुँचते ही एक अंडा फूटा और उसमें से एक नन्हा तोता निकला। नारद पक्षी के पास गए और पूछा, “नन्हे पक्षी, कृपया मुझे बताओ कि साधु संघ (भक्तों के साथ संगति) का क्या प्रभाव होता है?” जैसे ही ये शब्द कहे गए, नन्हा पक्षी वहीं गिर पड़ा और मर गया। स्तब्ध और दुखी होकर नारद मुनि भगवान विष्णु के पास लौटे और उन्हें सारी घटना बताई। भगवान विष्णु ने एक बार फिर मुस्कुराते हुए नारद को एक ऐसे गाँव का निर्देश दिया जहाँ एक ब्राह्मण के घर अभी-अभी एक बछड़े का जन्म हुआ था। भगवान ने निर्देश दिया, “बछड़े से प्रश्न पूछो और अपना उत्तर पाओ।” नारद गांव गए और उन्हें नवजात बछड़ा मिला। बछड़ा जैसे ही अपने पैरों पर खड़ा होने लगा, नारद ने पूछा, “प्यारे बछड़े, मुझे बताओ भक्तों के साथ रहने का क्या फल होता है?” जैसे ही उन्होंने अपना प्रश्न समाप्त किया, बछड़ा भी वहीं गिरकर मर गया। अब अत्यंत दुखी होकर नारद मुनि सोचने लगे, “मैं कितना पापी हूँ! लगता है मैं दो मौतों का कारण हूँ।” शोक में डूबे हुए वे वैकुंठ लौट आए और भगवान विष्णु को सब कुछ बताया। भगवान ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, “चिंता मत करो, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। काशी के राजा के अस्तबल में अभी-अभी एक घोड़े का बच्चा पैदा हुआ है। जाओ और उस घोड़े के बच्चे से इसका उत्तर पूछो।” संकोच करते हुए, लेकिन आज्ञाकारी होकर, नारद अस्तबल में गए और सावधानीपूर्वक घोड़े के बच्चे से वही प्रश्न पूछा। पहले की तरह ही, प्रश्न पूरा होते ही घोड़ा का बच्चा मर गया। घोर निराशा में डूबे नारद मुनि भगवान विष्णु के पास लौट आए। उनकी पीड़ा देखकर भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, “तुम्हारे तमाम कष्टों के बावजूद तुम्हें अभी तक अपना उत्तर नहीं मिला है। अब एक काम करो: काशी के राजा के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ है। जाओ और उस शिशु से अपना प्रश्न पूछो।” एक और मृत्यु का कारण बनने के भय से नारद ने विरोध करते हुए कहा, “हे प्रभु, बस! मैं अपने कारण और मृत्यु नहीं चाहता। मेरे प्रश्न का उत्तर न दिया जाए। मैं पहले से ही अपराधबोध से ग्रस्त हूँ; मैं किसी राजकुमार की मृत्यु का बोझ अपने अंतरात्मा पर नहीं लेना चाहता।” लेकिन भगवान ने नारद को आश्वासन दिया, “इस बार तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा।” अत्यंत अनिच्छा से नारद काशी के राजा के महल में गए।राजकुमार के जन्म से महल में खूब हर्षोल्लास था। राजा ने जब नारद मुनि को देखा, तो उन्होंने स्वयं को दुगुना भाग्यशाली समझा और तुरंत अपने पुत्र को आशीर्वाद के लिए ऋषि के पास ले गए। नारद ने बच्चे को प्यार से अपनी बाहों में लिया और धीरे से पूछा, "बच्चे, कृपया मुझे बताओ कि भक्तों के साथ रहने का क्या फल होता है?" नारद आश्चर्यचकित रह गए जब शिशु ने गुटरगू करते हुए कहा, “हे ऋषियों में श्रेष्ठ, क्या आप अभी तक नहीं समझ पाए? मैं वही छोटा पक्षी था जिससे आपने बरगद के वृक्ष पर प्रश्न किया था। आप जैसे संत के थोड़े से संपर्क के कारण, मैं उस नन्हे शरीर से मुक्त होकर बछड़े के रूप में जन्मा। जब आपने बछड़े के रूप में मुझसे प्रश्न किया, तो मैं उस शरीर को छोड़कर घोड़े के रूप में जन्मा। फिर, आपके थोड़े से संपर्क के कारण, मुझे काशी राज्य के राजकुमार के रूप में सबसे अनमोल मानव रूप प्राप्त हुआ। यह 'साधु संग' का फल है—भक्तों के साथ थोड़े समय का मेल-मिलाप। हे ऋषि, मुझे इस अवस्था तक पहुँचाने के लिए मैं आपका आभारी हूँ।” अंततः नारद मुनि के संदेह दूर हो गए। वे अब पशु शिशुओं की मृत्यु से दुखी नहीं थे। इसके बजाय, उन्होंने एक भक्त के साथ थोड़े समय के भी मेल-मिलाप की अपार शक्ति को महसूस किया। उन्होंने राजकुमार को आशीर्वाद दिया और भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने मार्ग पर चल दिए। *👉शिक्षा* भक्तों के साथ थोड़े समय के लिए भी संगति करने की परिवर्तनकारी शक्ति को खूबसूरती से दर्शाती है। एक शुद्ध भक्त की संगति आत्मा को विभिन्न जीवन रूपों से ऊपर उठा सकती है, अंततः मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि - आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर के साथ घनिष्ठ संबंध की ओर ले जा सकती है। संतों का साथ केवल समय नहीं, जीवन की दिशा बदल देता है। यही वह अदृश्य शक्ति है, जो धीरे-धीरे हमें भीतर से शुद्ध और ऊँचा बनाती है। संगति आपका भविष्य तय करती है, हम जिन लोगों के साथ बैठते हैं, वैसी ही सोच हमारे भीतर बसने लगती है।नकारात्मक संगति धीरे-धीरे ऊर्जा को कमजोर करती है, जबकि संतों का साथ मन को ऊँचा उठाता है। *सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।* *जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।* *🙏🌹श्री राधे राधे🌹🙏* #🖊 एक रचना रोज़ ✍