एक करोड़ ॐ नमः शिवाय। यह संख्या सुनते ही लोग कैलकुलेटर निकालते हैं, पर काशी के अस्सी घाट पर रहने वाले पंडित रामशरण मिश्र ने कागज नहीं, एक पुरानी रुद्राक्ष माला निकाली थी।
उनकी उम्र सत्तर पार थी। पत्नी के जाने के बाद घर में केवल एक तांबे का लोटा, शिवलिंग की छोटी पिंडी और दीवार पर टंगी एक डायरी बची थी। डायरी के पहले पन्ने पर उनके गुरु ने लिखा था, "जब मन बहुत शोर करे, तो एक ही नाम को इतनी बार दोहराओ कि शोर उसी में घुल जाए।"
2022 की महाशिवरात्रि को उन्होंने संकल्प लिया। एक करोड़ जप। न किसी मनोकामना के लिए, न किसी चमत्कार के लिए। केवल इस कारण कि जीवन में अब करने को कुछ बचा नहीं था, सिवाय सुनने के।
गिनती का गणित
एक माला में 108 मनके। एक बार माला पूरी होने पर वे एक छोटा चावल का दाना एक मिट्टी की हांडी में डालते। 108 बार वं, 108 बार नमः शिवाय। दिन में वे औसतन 21 मालाएँ करते, यानी लगभग 2,268 जप।
इस हिसाब से एक करोड़ तक पहुँचने में लगभग बारह साल लगते। रामशरण हँसे थे, "शिव को जल्दी नहीं है, मुझे क्यों हो।"
पहले महीने में ही कठिनाई आई। घुटनों में दर्द, आवाज बैठना, मोहल्ले के बच्चे पूछते, "बाबा, आप हर समय बुदबुदाते क्यों हो।" वे उत्तर नहीं देते, केवल माला घुमाते रहते।
पहली लाख
पहली एक लाख पूरी हुई सावन में। हांडी में चावल आधे से भी कम थे। उस रात पहली बार उन्हें लगा कि मंत्र उनके भीतर नहीं, वे मंत्र के भीतर हैं।
वे रोज सुबह चार बजे उठते, गंगा में डुबकी लगाते, पिंडी पर दो बेलपत्र चढ़ाते। फिर बैठ जाते। ॐ नमः शिवाय। साँस भीतर, ॐ। साँस बाहर, नमः शिवाय।
धीरे धीरे जप बोलना बंद हुआ, वह देखना बन गया। जब ग्राहक आते, पुरोहिती के लिए बुलाते, वे जप रोकते नहीं, बस गति धीमी कर देते। लोग कहते, "मिश्र जी अब कम बोलते हैं।" वे मन में कहते, "अब एक ही बात बार कहता हूँ।"
बीच के साल
तीसरे साल उनकी हांडी भर गई। उन्होंने दूसरी हांडी रखी। उसी साल उनके बेटे ने उन्हें लखनऊ बुलाया। "बाबा, यहाँ फ्लैट में रहो, आराम मिलेगा।" रामशरण तीन महीने रहे। लिफ्ट की आवाज, टीवी का शोर, पोते की ऑनलाइन क्लास। माला चलती रही, पर मन बिखरता।
एक दिन पोते ने पूछा, "दादाजी, वन करोड़ मतलब कितना।" उन्होंने कहा, "मतलब उतना जितना तुम रोज स्कूल जाते हो और एक दिन अचानक तुम्हें रास्ता याद नहीं रहता, पैर खुद चलने लगते हैं।"
वे वापस काशी लौट आए। घाट, वही लोटा, वही पिंडी।
पाँचवें साल में गिनती पचास लाख पार हुई। अब चावल नहीं, वे एक कॉपी में केवल तारीख लिखते। डॉक्टर ने कहा मोतियाबिंद है। ऑपरेशन के बाद पट्टी खुली तो पहली चीज उन्होंने देखी, सामने रखी माला। उन्होंने आँख बंद की और फिर जप शुरू किया। देखना जरूरी नहीं रहा था।
थकान और रस
नौवें साल सर्दियों में निमोनिया हुआ। तीन दिन बुखार। चौथे दिन जब होश आया तो होंठ सूखे थे, पर जीभ पर अपने आप चल रहा था, नमः शिवाय, नमः शिवाय। नर्स ने पूछा, "बाबा कुछ चाहिए।" उन्होंने कहा, "बस माला।"
उस बीमारी के बाद जप की गति बदल गई। अब वे गिनते नहीं थे। माला अपने आप घूमती। कभी वे सोते सोते भी जप में होते, और सुबह उठते तो उंगलियों में रुद्राक्ष की गर्मी होती।
लोग अब उन्हें देखने आते। कोई कहता, "एक करोड़ पूरा होगा तो क्या मिलेगा।" वे हँसते, "जो गिन रहा है वही घट जाएगा।"
अंतिम दाना
2025 की महाशिवरात्रि से तीन दिन पहले, रात के दो बजे, उनकी कॉपी में आखिरी पन्ना भरा। हिसाब के अनुसार 1,00,00,108 जप पूरे हुए थे। उन्होंने हांडी में आखिरी चावल नहीं डाला। उन्होंने माला पिंडी पर रख दी।
सुबह घाट पर आरती हो रही थी। रामशरण चुपचाप बैठे थे। किसी ने पूछा, "बाबा, आज जप नहीं।" उन्होंने कहा, "आज सुन रहा हूँ।"
उसी क्षण डमरू बजा, शंख उठा, और उन्हें पहली बार स्पष्ट सुनाई दिया कि हर ध्वनि के पीछे वही पाँच अक्षर हैं। नाविक की पतवार पानी काटती, ॐ। बच्चा रोता, नमः। चाय उबलती, शिवाय।
उन्होंने डायरी का आखिरी पन्ना खोला और लिखा, "एक करोड़ बार मैंने शिव को पुकारा, एक करोड़ एकवीं बार उन्होंने उत्तर दिया। उत्तर शब्द नहीं था, मौन था। अब मुझे जप नहीं करना पड़ता, जप मुझे करता है।"
उस दिन के बाद उन्होंने माला फिर उठाई, पर गिनती के लिए नहीं। अब वे हर आने वाले को एक ही बात कहते, "शुरू करो। संख्या शिव की है, थकान तुम्हारी। जब थकान गिर जाएगी, संख्या भी गिर जाएगी, केवल नमः शिवाय बचेगा।"
और अस्सी घाट पर आज भी सुबह चार बजे एक तांबे के लोटे की आवाज आती है, फिर धीमी, अटूट ध्वनि, ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय, जैसे गंगा खुद जप कर रही हो।
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