*महा कवि अरविंद भरद्वाज की कविता....*
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*करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना कि होली है*
*हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना कि होली है_*.
*_ किसी को याद करते ही अगर बजते सुनाई दें कहीं घुँघरू कहीं कंगन, समझ लेना कि होली है_*
*_कभी खोलो अचानक , आप अपने घर का दरवाजा खड़े देहरी पे हों साजन, समझ लेना कि होली है _*
*_तरसती जिसके हों दीदार तक को आपकी आंखें उसे छूने का आये क्षण, समझ लेना कि होली है _*
*_हमारी ज़िन्दगी यूँ तो है इक काँटों भरा जंगल अगर लगने लगे मधुबन, समझ लेना कि होली है _*
*_बुलाये जब तुझे वो गीत गा कर ताल पर ढफ की जिसे माना किये दुश्मन, समझ लेना कि होली है _*
*_अगर महसूस हो तुमको, कभी जब सांस लो 'अरविंद' हवाओं में घुला चन्दन, समझ लेना कि होली है_*
*होली की हार्दिक शुभकामनाएं*! #🖊 एक रचना रोज़ ✍