Follow
Arvind Bhardwaj
@429570704
5,104
Posts
5,147
Followers
Arvind Bhardwaj
1.2K views
20 days ago
जब तुलसीदास को भगवान जगन्नाथ ने दिये राम रुप में दर्शन 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 तुलसीदास जी अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी गये। मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्न मन से अंदर प्रविष्ट हुए। जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही निराश हो गये। विचार किया कि यह हस्तपादविहीन देव हमारा इष्ट नहीं हो सकता। बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये। सोचा कि इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है? कदापि नहीं। रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट हुई। वे ध्यान से सुनने लगे। अरे बाबा ! तुलसीदास कौन है? एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था। तभी आप उठते हुए बोले –‘हाँ भाई ! मैं ही हूँ तुलसीदास।’ बालक ने कहा, ‘अरे ! आप यहाँ हैं। मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ। ‘बालक ने कहा -‘लीजिए, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।’ तुलसीदास बोले –‘कृपा करके इसे बापस ले जायँ। बालक ने कहा, आश्चर्य की बात है, ‘जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ’ और वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं। कारण? तुलसीदास बोले, ‘अरे भाई ! मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाये कुछ ग्रहण नहीं करता। फिर यह जगन्नाथ का जूठा प्रसाद जिसे मैं अपने इष्ट को समर्पित न कर सकूँ, यह मेरे किस काम का? ‘ बालक ने मुस्कराते हुए कहा, बाबा ! आपके इष्ट ने ही तो भेजा है । तुलसीदास बोले -यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता। बालक ने कहा कि अपने श्रीरामचरितमानस में तो आपने इसी रूप का वर्णन किया है — बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ।। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।। अब तुलसीदास की भाव-भंगिमा देखने लायक थी। नेत्रों में अश्रु-बिन्दु, मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। थाल रखकर बालक यह कहकर अदृश्य हो गया कि मैं ही राम हूँ। मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है।विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कल प्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना। तुलसीदास जी ने बड़े प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया। प्रातः मंदिर में उन्हें जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के स्थान पर श्री राम, लक्ष्मण एवं जानकी के भव्य दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की इच्छा पूरी की। जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने रात्रि व्यतीत की थी, वह स्थान ‘तुलसी चौरा’ नाम से विख्यात हुआ। वहाँ पर तुलसीदास जी की पीठ ‘बड़छता मठ’ के रूप में प्रतिष्ठित है। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 *🌹🙏जय श्री राम🙏🌹* #🖊 एक रचना रोज़ ✍
Arvind Bhardwaj
1.3K views
20 days ago
एक तरह की चींटी होती है जो दूसरी कॉलोनी के पास जाती है, वहाँ की एक काम करने वाली चींटी को मार देती है और उसकी गंध अपने ऊपर लगा लेती है। चींटियों के लिए गंध ही सब कुछ होती है। उसी गंध की वजह से वो आराम से दूसरी कॉलोनी में घुस जाती है, कोई उसे रोकता भी नहीं। बाकी चींटियाँ उसे अपनी ही समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। फिर वो धीरे-धीरे अंदर बढ़ती है, रानी तक पहुँचती है और उस पर एक अलग तरह की गंध डाल देती है। इससे बाकी चींटियाँ रानी के ही खिलाफ हो जाती हैं और उसे घेरकर मार देती हैं। मजेदार बात ये है कि घुसपैठ करने वाली चींटी को खुद लड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती—पूरी कॉलोनी उसका काम कर देती है। रानी के मरने के बाद वही घुसपैठिया आगे बढ़कर अपनी नस्ल बढ़ाता है। अब वो बाहरी नहीं रहता, वही भविष्य बन जाता है। ठीक ऐसा ही “विचारों का कब्ज़ा” (ideological takeover) में भी होता है। कोई बाहरी और खतरनाक विचारधारा आती है, लेकिन सीधे-सीधे नहीं। वो पहले अपने आपको हमारे जैसे दिखाती है। हमारे ही शब्द इस्तेमाल करती है—जैसे न्याय, बराबरी, करुणा, अधिकार, प्रगति। धीरे-धीरे वो इन शब्दों के मतलब बदल देती है, और हमें पता भी नहीं चलता। फिर वो अंदर तक घुस जाती है। लोगों की सोच बदलने लगती है—जिम्मेदारी को क्रूरता जैसा दिखाया जाता है, कानून को ज़ुल्म जैसा, सीमाओं को नफरत जैसा, परंपरा को खतरा और इतिहास को शर्म की चीज़ बना दिया जाता है। और फिर क्या होता है? समाज खुद ही अपने खिलाफ खड़ा हो जाता है। कोर्ट, यूनिवर्सिटी, धार्मिक संस्थाएँ, मीडिया, सरकारी सिस्टम—सब अपनी ही जड़ों को गलत मानने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वो सही कर रहे हैं, सिस्टम को बचा रहे हैं। असल में वो उसी चीज़ को बढ़ावा दे रहे होते हैं जो उन्हें “सही” लगने लगी है। उन्हें पता ही नहीं चलता कि असली घुसपैठिया कौन है, क्योंकि वो उनकी ही भाषा में बात करता है। और जब आखिर में असली मूल सिद्धांत ही हटा दिए जाते हैं—उन्हें बदनाम करके, तोड़-मरोड़ कर—तब उस बाहरी विचारधारा को कुछ जीतने की जरूरत नहीं रहती। वो बस बाकी बची चीज़ों पर कब्ज़ा कर लेती है। रानी खत्म हो चुकी होती है। कॉलोनी पहले जैसी नहीं रहती। सबसे खतरनाक जीत वही होती है, जिसमें समाज को ये यकीन दिला दिया जाए कि उसकी अपनी जड़ें ही उसकी दुश्मन हैं—और उन्हें खत्म करना ही सही काम है। गौर से देखें... समझें... कहीं आपके साथ भी तो यही न हो रहा....! *🙏श्री राधे राधे🌹🥰🙏* #🖊 एक रचना रोज़ ✍