#हरिद्वार_की_खबरें का नीलेश्वर महादेव मंदिर एक प्राचीन और महत्वपूर्ण स्थल है, जिसका इतिहास समुद्र मंथन और भगवान शिव से जुड़ा है, जहाँ शिव ने हलाहल विष पिया था, जिससे पर्वत और गंगा (नील गंगा) का रंग नीला पड़ गया; यह मंदिर स्कंद पुराण और शिव पुराण में वर्णित है और यहाँ एक स्वयंभू शिवलिंग है, जहाँ बारात रुकने और दक्ष के यज्ञ विध्वंस से संबंधित कथाएँ भी प्रचलित हैं, औरंगज़ेब के हमलों के निशान भी शिवलिंग पर देखे जा सकते हैं, और इसे मनोकामना पूर्ति के लिए पवित्र माना जाता है। 
ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व:
विषपान और नील पर्वत: मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष के प्रभाव से पूरा पर्वत और गंगा नदी नीली पड़ गई, इसलिए इसे 'नील पर्वत' और 'नील गंगा' कहा जाता है।
स्वयंभू शिवलिंग: मंदिर में एक स्वयंभू (स्वयं प्रकट) शिवलिंग है, जिसे औरंगज़ेब के सैनिकों ने तोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन असफल रहे; शिवलिंग पर आज भी भालों के निशान देखे जा सकते हैं।
शिव-पार्वती का निवास: विवाह के बाद भगवान शिव और माता पार्वती का बारात इसी स्थान पर रुका था और वे यहाँ कुछ वर्षों तक रहे थे, इसलिए इसे 'गौरी शंकर जनवासा' भी कहते हैं।
दक्ष यज्ञ विध्वंस: माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव ने इसी नील पर्वत से खड़े होकर दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस किया था, जिससे यह स्थान और भी महत्वपूर्ण हो गया।
प्राचीन उल्लेख: इस मंदिर का वर्णन स्कंद पुराण और शिव पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। 
स्थान और संरचना:
यह मंदिर हरिद्वार में नील पर्वत पर स्थित है, जहाँ से चंडी देवी मंदिर भी दिखता है।
यह मुख्य सड़क से लगभग 200-250 मीटर की चढ़ाई पर है और आसपास का वातावरण शांत और शुद्ध है। 
पूजा और मान्यताएँ:
सावन के महीने में यहाँ जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
एक लोटा गंगाजल चढ़ाने से हज़ार गुना फल मिलता है।
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और सोमवार को यहाँ पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। 
आधुनिक समय में:
यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, जहाँ भक्त शांति और आध्यात्मिक अनुभव के लिए आते हैं।