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दीपक कुमार
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दीपक कुमार
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1 months ago
.बूढ़ा केदार शिवलिंग /टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड #हरिद्वार_की_खबरें
दीपक कुमार
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1 months ago
दीपक कुमार
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1 months ago
#हरिद्वार_की_खबरें बगलामुखी देवी हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं में से 8वीं महाविद्या हैं, जिन्हें 'स्तंभन' (रोकने) की देवी माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में सृष्टि को नष्ट करने वाले भयंकर तूफान को रोकने के लिए भगवान विष्णु की तपस्या से माता पार्वती सौराष्ट्र (गुजरात) की हरिद्रा झील से बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई थीं।  मां बगलामुखी का इतिहास और पौराणिक मान्यताएं: उत्पत्ति की कथा: पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भयंकर प्रलय आया जिससे सृष्टि नष्ट होने लगी। भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव की सलाह पर हरिद्रा सरोवर (हल्दी की झील) के किनारे कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने बगलामुखी रूप में प्रकट होकर तूफान को शांत किया। मदन राक्षस का संहार: एक अन्य कथा के अनुसार, मदन नामक राक्षस ने वरदान पाकर मनुष्यों और देवताओं को आतंकित कर दिया था। मां बगलामुखी ने मदन का सामना किया और अपनी दिव्य शक्ति से उसकी जीभ खींचकर उसे पंगु बना दिया, जिससे उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। पीताम्बरा रूप: माता बगलामुखी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। वह पीले वस्त्र, पीताम्बर और पीले फूलों से पूजी जाती हैं। इसी कारण उन्हें 'पीताम्बरा' भी कहा जाता है। विशेष साधना: मां बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की देवी कहा जाता है, जो शत्रुओं की वाणी, विचार और कर्म को पंगु बना सकती हैं। वे अपने भक्तों को कानूनी विवादों, शत्रु बाधा और हर तरह के भय से सुरक्षा प्रदान करती हैं। प्रमुख मंदिर: इनका मुख्य और प्राचीन मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा (बनखंडी) में स्थित है, जहां माता स्वयं प्रकट हुई थीं। इसके अलावा, मध्य प्रदेश के नलखेड़ा (शाजापुर) में भी पावन सिद्धपीठ है, जिसे पांडव कालीन माना जाता है।
दीपक कुमार
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1 months ago
#हरिद्वार_की_खबरें का माया देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है, जो 11वीं शताब्दी (या उससे पूर्व) का माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती की नाभि और हृदय गिरा था। यह हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं और इन्हीं के नाम पर हरिद्वार को 'मायापुरी' कहा जाता है।   AajTak +4 माया देवी मंदिर का इतिहास और मुख्य तथ्य: ऐतिहासिक महत्व: इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था और यह हरिद्वार के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। पौराणिक कथा: कथा के अनुसार, भगवान शिव की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह किया था। शिव जी सती के शरीर को लेकर जा रहे थे, तब विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से शरीर के टुकड़े किए, जिसमें सती की नाभि यहां गिरी थी। मंदिर संरचना: मुख्य गर्भगृह में तीन देवियां विराजमान हैं - मध्य में मां माया देवी (तीन सिर, चार भुजाएं), बाईं ओर मां काली और दाईं ओर मां कामाख्या। स्थापना: मंदिर में आदि काल से माता की पिंडी विराजमान है, लेकिन मुख्य मूर्तियां 18वीं शताब्दी में स्थापित की गई थीं। महत्व (सिद्धपीठ): इसे एक प्रमुख सिद्धपीठ माना जाता है, जहाँ मनसा देवी और चंडी देवी के साथ मिलकर माया देवी का त्रिकोण हरिद्वार की सुरक्षा करता है। स्थान: यह मंदिर हरिद्वार रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किलोमीटर दूर हर की पौड़ी के पास स्थित है।