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भरत लाल साहू
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भरत लाल साहू
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1 months ago
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भरत लाल साहू
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1 months ago
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भरत लाल साहू
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2 months ago
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भरत लाल साहू
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2 months ago
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भरत लाल साहू
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3 months ago
*🏵️🔲 अमृतकथा प्रसंग क्र 1917 🔲🏵️* +++++++++++++++++++++++++ *🔘🎋🕉️ अनोखा निर्णय 🕉️🎋🔘* प्राचीन भारत में उज्जैनी नामक एक समृद्ध राज्य था, जिसका शासन वीर न्यायप्रिय और लोक हितैषी राजा विक्रम के हाथों में था। राजा विक्रम अपनी वीरता और बुद्धिमानी के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान थी धरम के लिए कठिन से कठिन निर्णय लेने का साहस। एक वर्ष राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। वर्षा कम हुई, फसलें सूख गईं और प्रजा कठिनाई में आ गई। राजा विक्रम ने अपने कोष के द्वार जनता के लिए खोल दिए, लेकिन संकट इतना बड़ा था कि राजकोष जल्दी ही खाली हो गया। मंत्रियों ने सलाह दी महाराज! राजकोष खाली हो रहा है। हमें अपने सैनिकों का वेतन और राज्य का खर्च भी संभालना होगा। अब जनता की मदद कम कर दी जाए। परंतु राजा विक्रम बोले जब तक मेरे राज्य में एक भी प्रजा दुखी है, मैं चैन से नहीं बैठ सकता। राजकोष प्रजा का है, मैं केवल उसका रखवाला हूँ। मंत्री मौन हो गए लेकिन कठिनाई बढ़ती ही जा रही थी। इसी बीच एक दिन राजा विक्रम को सूचना मिली कि राज्य के पास वाले जंगल में एक साधु तपस्या कर रहा है, जो किसी भी प्रश्न का समाधान दे सकता है। राजा तुरंत साधु के पास पहुँचे। साधु ने राजा पर दृष्टि डाली और कहा राजन! संकट बड़ा है पर समाधान भी निकट है। परंतु पहले मुझे बताओ तुम्हारे लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है? अपना राज्य या प्रजा? राजा ने बिना सोचे कहा प्रजा। राज्य तो प्रजा से ही है। यदि वे सुरक्षित हैं तो मेरा अस्तित्व सार्थक है। साधु मुस्कुराया और बोला तुम परीक्षा में सफल हुए। यह लो ‘अक्षय पात्र’। इसमें से निकला भोजन कभी समाप्त नहीं होगा। इसका उपयोग केवल प्रजा की सेवा के लिए करोगे, ना कि अपने स्वार्थ के लिए। राजा ने विनम्रता से पात्र स्वीकार किया। उस दिन से पूरे राज्य में भोजन का प्रबंध होने लगा। भूखे लोग तृप्त होने लगे गाँवों में फिर से हँसी लौट आई। धीरे धीरे बारिश भी होने लगी और राज्य फिर से समृद्ध होने लगा। कुछ समय बाद दूसरे राज्य के राजा ने विक्रम से ईर्ष्या करके युद्ध की घोषणा कर दी। उनके सैनिकों ने उज्जैनी पर आक्रमण किया। उस समय भोजन वितरण के कारण राजा का सेना भंडार खाली था। मंत्री चिंतित हुए महाराज! अब तो संकट और बड़ा है। आपको युद्ध के लिए अक्षय पात्र का उपयोग करना चाहिए। राजा विक्रम ने दृढ़ आवाज़ में कहा “नहीं। यह पात्र प्रजा की सेवा के लिए है, युद्ध के लिए नहीं। हम युद्ध जीतेंगे लेकिन अपने सिद्धांतों को खोकर नहीं। युद्ध शुरू हुआ राजा विक्रम ने साहस और रण नीति से दुश्मन राजा को पराजित कर दिया। शत्रु राजा राजा विक्रम की नीति साहस और धर्म के प्रति समर्पण से इतना प्रभावित हुआ कि उसने शांति की याचना की और उज्जैनी का मित्र बन गया। अक्षय पात्र आज भी उज्जैनी के मंदिर में रखा है यह याद दिलाते हुए कि धर्म और साहस का मार्ग कठिन होता है लेकिन विजय उसी की होती है जो सही के साथ खड़ा रहे। सच्चा राजा वही होता है जो कठिन समय में भी धर्म और न्याय का साथ न छोड़े। जब इरादे पवित्र हों और उद्देश्य लोकहित का हो तो ईश्वर स्वयं मार्ग बनाते हैं। *🔅🌼🟠 ओम शांति 🟠🌼🔅*
BK ANITA Patel
*🏵️🔲 अमृतकथा प्रसंग क्र 1917 🔲🏵️* +++++++++++++++++++++++++ *🔘🎋🕉️ अनोखा निर्णय 🕉️🎋🔘* प्राचीन भारत में उज्जैनी नामक एक समृद्ध राज्य था, जिसका शासन वीर न्यायप्रिय और लोक हितैषी राजा विक्रम के हाथों में था। राजा विक्रम अपनी वीरता और बुद्धिमानी के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान थी धरम के लिए कठिन से कठिन निर्णय लेने का साहस। एक वर्ष राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। वर्षा कम हुई, फसलें सूख गईं और प्रजा कठिनाई में आ गई। राजा विक्रम ने अपने कोष के द्वार जनता के लिए खोल दिए, लेकिन संकट इतना बड़ा था कि राजकोष जल्दी ही खाली हो गया। मंत्रियों ने सलाह दी महाराज! राजकोष खाली हो रहा है। हमें अपने सैनिकों का वेतन और राज्य का खर्च भी संभालना होगा। अब जनता की मदद कम कर दी जाए। परंतु राजा विक्रम बोले जब तक मेरे राज्य में एक भी प्रजा दुखी है, मैं चैन से नहीं बैठ सकता। राजकोष प्रजा का है, मैं केवल उसका रखवाला हूँ। मंत्री मौन हो गए लेकिन कठिनाई बढ़ती ही जा रही थी। इसी बीच एक दिन राजा विक्रम को सूचना मिली कि राज्य के पास वाले जंगल में एक साधु तपस्या कर रहा है, जो किसी भी प्रश्न का समाधान दे सकता है। राजा तुरंत साधु के पास पहुँचे। साधु ने राजा पर दृष्टि डाली और कहा राजन! संकट बड़ा है पर समाधान भी निकट है। परंतु पहले मुझे बताओ तुम्हारे लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है? अपना राज्य या प्रजा? राजा ने बिना सोचे कहा प्रजा। राज्य तो प्रजा से ही है। यदि वे सुरक्षित हैं तो मेरा अस्तित्व सार्थक है। साधु मुस्कुराया और बोला तुम परीक्षा में सफल हुए। यह लो ‘अक्षय पात्र’। इसमें से निकला भोजन कभी समाप्त नहीं होगा। इसका उपयोग केवल प्रजा की सेवा के लिए करोगे, ना कि अपने स्वार्थ के लिए। राजा ने विनम्रता से पात्र स्वीकार किया। उस दिन से पूरे राज्य में भोजन का प्रबंध होने लगा। भूखे लोग तृप्त होने लगे गाँवों में फिर से हँसी लौट आई। धीरे धीरे बारिश भी होने लगी और राज्य फिर से समृद्ध होने लगा। कुछ समय बाद दूसरे राज्य के राजा ने विक्रम से ईर्ष्या करके युद्ध की घोषणा कर दी। उनके सैनिकों ने उज्जैनी पर आक्रमण किया। उस समय भोजन वितरण के कारण राजा का सेना भंडार खाली था। मंत्री चिंतित हुए महाराज! अब तो संकट और बड़ा है। आपको युद्ध के लिए अक्षय पात्र का उपयोग करना चाहिए। राजा विक्रम ने दृढ़ आवाज़ में कहा “नहीं। यह पात्र प्रजा की सेवा के लिए है, युद्ध के लिए नहीं। हम युद्ध जीतेंगे लेकिन अपने सिद्धांतों को खोकर नहीं। युद्ध शुरू हुआ राजा विक्रम ने साहस और रण नीति से दुश्मन राजा को पराजित कर दिया। शत्रु राजा राजा विक्रम की नीति साहस और धर्म के प्रति समर्पण से इतना प्रभावित हुआ कि उसने शांति की याचना की और उज्जैनी का मित्र बन गया। अक्षय पात्र आज भी उज्जैनी के मंदिर में रखा है यह याद दिलाते हुए कि धर्म और साहस का मार्ग कठिन होता है लेकिन विजय उसी की होती है जो सही के साथ खड़ा रहे। सच्चा राजा वही होता है जो कठिन समय में भी धर्म और न्याय का साथ न छोड़े। जब इरादे पवित्र हों और उद्देश्य लोकहित का हो तो ईश्वर स्वयं मार्ग बनाते हैं। *🔅🌼🟠 ओम शांति 🟠🌼🔅* #🙏 प्रेरणादायक विचार #👉 लोगों के लिए सीख👈