सतगुरू ज्ञाननाथ जी सम्पूर्ण समर्पित थे ईश्वर वाल्मीकि दयावान जी के चरणों में। पावन वाल्मीकि आश्रम, अमृतसर की आज़ादी के लिए वहां पर काबिज महंतों और प्रशासन से सीधे टक्कर ली। शासकों ने उन्हें बाकी साधुओं के साथ जेल में कैद किया लेकिन उस असीम वाल्मीकि की असीम कृपा से कोई भी जेल उन्हें ज्यादा समय कैद नहीं रख पाई, प्रशासन पर वाल्मीकि कौम का दवाब बढ़ता गया। सतगुरु ज्ञाननाथ जी ने जिस-जिस स्थान, गांव, शहर प्रचार किया, उनकी बात जहां तक पहुंची , वहां वहां से संगत के रूप में लोग पावन वाल्मीकि आश्रम, अमृतसर आने लगे और प्रशासन को सतगुरू ज्ञाननाथ जी और उनके साथ बाकी साधुओं को रिहा करना पड़ा।
इसीलिए 9 - 10 उष्णा (फरवरी) को पुरी वाल्मीकि कौम पावन वाल्मीकि आश्रम में उत्सव के रूप में मनाते हैं।
आप सभी को इस इतिहासिक पर्व (मेले) की हार्दिक मुबारकबाद
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