ब्रज के खेतों में सुनहरी धूप खिली थी। कुंभनदास जी, जिनका रोम-रोम श्रीनाथजी के प्रेम में रचा-बसा था, अपने खेत में खड़े थे। उनका मन फसल काटने में नहीं, बल्कि उस "लाला" (बालकृष्ण) में अटका था, जो उनके हर श्वास में बसते थे।
अचानक, एक मधुर स्वर गूंजा, "कुंभन... मुझे भूख लगी है! पर आज मुझे मंदिर के राजसी छप्पन भोग नहीं चाहिए। मुझे तुम्हारे घर का वो सोंधा स्वाद चाहिए।"
कुंभनदास जी मुस्कुराए, उनकी आँखें भर आईं। "मेरे प्रभु को क्या चाहिए?"
श्रीनाथजी ने नटखटपन से उत्तर दिया, "एक सीधा-सादा भोज! ज्वार की महेरी (दलिया), ताजा दही, दूध, बेजर की सोंधी रोटियाँ, टेटी (कैर) की सब्जी और केरड़े का तीखा अचार... बस इतना ही, इससे ज्यादा कुछ नहीं!"
सरल तैयारी
कुंभनदास जी की भतीजी कलेवा (भाथा) लेकर खेत पर पहुँची। अपने चाचा की आँखों में दिव्य चमक देखकर वह समझ गई कि आज कोई अलौकिक लीला होने वाली है।
"काका," उसने कहा, "मैं बेजर का आटा, टेटी की सब्जी और अचार तो लाई हूँ, पर दूध घर पर गर्म हो रहा है।"
"बेटी, आज दही मत जमाना," कुंभनदास जी ने उत्सुकता से कहा। "जल्दी से घर जा, पिसा हुआ ज्वार और दूध की गरम हांडी ले आ। आज सखाओं ने मेरे ही खेत में 'उजाणी' (भोज) रखी है!"
चाचा के स्वभाव से परिचित भतीजी बिना कुछ पूछे घर की ओर दौड़ पड़ी। इधर कुंभनदास जी ने झोपड़ी के पीछे चूल्हा तैयार किया। हाथ-पंखे से कोयले सुलगाए, आटे में नमक और जल मिलाकर उसे गूँथा और अपने हाथों से थपथपाकर रोटियाँ बनाने लगे।
रोटी की हर थपक उनके हृदय की धड़कन थी, और तवे पर फूलती हर रोटी एक प्रार्थना।
वन-भोज (छाक लीला)
जल्द ही ग्वाल-बाल (सखा) आ पहुँचे, हर कोई अपने घर से भोजन की एक-एक हांडी लाया था। लेकिन त्रिलोकी के नाथ, श्रीनाथजी ने सीधे कुंभनदास जी के घर से आई हांडी को अपने पास रख लिया।
एक घने, छायादार पेड़ के नीचे 'छाक लीला' शुरू हुई।
* वहाँ खिलखिलाहट थी।
* वहाँ दिव्य खेल थे।
* और वहाँ एक-दूसरे का जूठा खाने का निस्वार्थ प्रेम था।
जब सब भोजन के लिए बैठे, तो सबने अपनी-अपनी हांडी से पकवान परोसे। लेकिन जब सबने श्रीनाथजी की हांडी से चखा—वही जिसे कुंभनदास जी ने तैयार किया था—तो सब ठिठक गए। वह केवल भोजन नहीं था, वह अमृत था। साधारण बेजर की रोटी और टेटी की सब्जी का स्वाद स्वर्ग के व्यंजनों से भी अधिक दिव्य था।
आनंद का गायन
तृप्त होकर श्रीनाथजी ने कुंभनदास जी की ओर देखा और धीरे से बोले, "कुंभन, मेरे लिए कुछ गाओ।"
परमानंद की अवस्था में कुंभनदास जी ने 'सारंग राग' में कीर्तन छेड़ दिया
"ब्रज में बड़ो मेवा यह टेटी... बेजर की रोटी के संग इसका स्वाद अनूठा है।"
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उन्होंने गाया कि कैसे घर-घर से अलग-अलग स्वाद की 'छाक' आई है—खट्टी, मीठी, नमकीन—और कैसे वे सब प्रभु के प्रेम में एक हो गई हैं।
कीर्तन समाप्त हुआ, तो उपवन में एक गहरा सन्नाटा छा गया। श्रीनाथजी और सखा चुपचाप अपनी दिव्य लीलाओं में लौट गए। पर कुंभनदास जी वहीं पेड़ के नीचे समाधि में खोए रहे।
वे संसार को भूल गए। वे अपने शरीर को भूल गए। अब वे न किसान थे, न कवि; वे बस एक ऐसी आत्मा थे जो प्रभु की उपस्थिति की खुशबू में डूबी थी। सूरज ढल गया, तारे निकल आए, पर कुंभनदास जी निश्चल बैठे रहे, अपने हृदय के मंदिर में उस 'छाक लीला' का आनंद लेते हुए।
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