समय की पटरी और व्यक्तित्व की गति
एक ही ताल में चलते हैं दोनों,
चाहे पटरी हो या जीवन का पथ,
ट्रेन और महान व्यक्ति—
विराम नहीं, बस लक्ष्य का रथ।
ट्रेन की गति में एक संकल्प है,
जो काटती है मीलों का सन्नाटा,
वह नहीं देखती पीछे मुड़कर,
कि पीछे क्या छूटा, क्या सिमटा।
वह चलती है समय की पाबंदी संग,
हर पड़ाव को पीछे छोड़ते हुए,
मंज़िल की चाह में अडिग,
अंधेरी सुरंगों को चीरते हुए।
महान व्यक्ति भी कहाँ रुकते हैं?
उनके भीतर भी एक इंजन धधकता है,
वह इंजन—जो समाज को बदलने का,
अन्याय से लड़ने का साहस रखता है।
उनकी गति किसी घड़ी की मोहताज नहीं,
वे चलते हैं अपने सिद्धांतों के वेग से,
जहाँ भीड़ रुक जाती है डर कर,
वे निकलते हैं वहीं से संवेग से।
ट्रेन सबको साथ लेकर चलती है,
बिना पूछे किसी का नाम या जाति,
महानता की भी यही पहचान है—
जो हर दीन-दुखी की बने साथी।
पटरी पर दौड़ती लौह-शक्ति,
और ह्रदय में जलती क्रांति की मशाल,
दोनों ही बदलते हैं दुनिया का नक्शा,
दोनों ही रचते हैं नया इतिहास और काल।
— सोनी शुक्ला 'क्रांति
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