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Jagdish Sharma
@6079857
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Jagdish Sharma
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7 hours ago
।। ॐ ।। अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥ अहिंसा अर्थात् अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचाने का आचरण, समता- जिसमें विषमता न हो, सन्तोष, तप- मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना, दान अर्थात् सर्वस्व का समर्पण, भगवत्पथ में मान-अपमान का सहन- इस प्रकार प्राणियों के उपर्युक्त भाव मुझसे ही होते हैं। ये सभी भाव दैवी चिन्तन-पद्धति के लक्षण हैं। इनका अभाव ही आसुरी सम्पद् है। #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
Jagdish Sharma
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3 days ago
।। ॐ।। न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ अर्जुन ! मेरी उत्पत्ति को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा था, 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्' - मेरा वह जन्म और कर्म अलौकिक है, इन चर्मचक्षुओं से देखा नहीं जा सकता। इसलिये मेरे उस प्रकट होने को देव और महर्षि स्तर तक पहुँचे हुए लोग भी नहीं जानते। मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ। #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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4 days ago
।। ॐ ।। श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः। यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥ महाबाहु अर्जुन! मेरे परम प्रभावयुक्त वचन को पुनः सुन, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखनेवाले के हित की इच्छा से कहूँगा। #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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5 days ago
।।ॐ।। मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। ममेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥ #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 अर्जुन ! मेरे में ही मनवाला हो। सिवाय मेरे दूसरे भाव मन में न आने पायें। मेरा अनन्य भक्त हो, अनवरत चिन्तन में लग। श्रद्धासहित मेरा ही निरन्तर पूजन कर और मेरे को ही नमस्कार कर। इस प्रकार मेरी शरण हुआ, आत्मा को मुझमें एकीभाव से स्थित कर तू मुझे ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरे साथ एकता प्राप्त करेगा।
Jagdish Sharma
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6 days ago
।। ॐ ।। किं पुनर्ब्रह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥ फिर तो ब्राह्मण तथा राजर्षि क्षत्रिय श्रेणीप्राप्त भक्तों के लिये कहना ही क्या है? ब्राह्मण एक अवस्था-विशेष है, जिसमें ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएँ विद्यमान हैं। शान्ति, आर्जव, अनुभवी उपलब्धि, ध्यान और इष्ट के निर्देशन पर जिसमें चलने की क्षमता है, वही ब्राह्मण की अवस्था है। राजर्षि क्षत्रिय में ऋद्धियों-सिद्धियों का संचार, शौर्य, स्वामीभाव, पीछे न हटने का स्वभाव रहता है। इस योगस्तर पर पहुँचे हुए योगी तो पार होते ही हैं, उनके लिये क्या कहना है? अतः अर्जुन ! तू सुखरहित, क्षणभंगुर इस मनुष्य-शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर। इस नश्वर शरीर के ममत्व, पोषण में समय नष्ट न कर। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यहाँ चौथी बार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की चर्चा की। अध्याय दो में उन्होंने कहा कि क्षत्रिय के लिये युद्ध से बढ़कर कल्याण का कोई रास्ता नहीं है। अध्याय तीन में उन्होंने कहा कि स्वधर्म में निधन भी श्रेयतर है। अध्याय चार में उन्होंने संक्षेप में बताया कि चार वर्णों की रचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार जातियों में बाँटा? बोले, नहीं 'गुणकर्म विभागशः' - गुण के पैमाने से कर्म को चार श्रेणियों में रखा। श्रीकृष्ण के अनुसार, कर्म एकमात्र यज्ञ की प्रक्रिया है। अतः इस यज्ञ को करनेवाले चार प्रकार के हैं। प्रवेशकाल में वह यज्ञकर्त्ता शूद्र है, अल्पज्ञ है। कुछ करने की क्षमता आयी, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह हुआ तो वही यज्ञकर्त्ता वैश्य बन गया। इससे उन्नत होने पर प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता आ जाने पर वही साधक क्षत्रिय श्रेणी का है और जब इसी साधक के स्वभाव में ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली योग्यताएँ ढल जाती हैं तो वही ब्राह्मण है। वैश्य एवं शूद्र की अपेक्षा क्षत्रिय और ब्राह्मण श्रेणी के साधक प्राप्ति के अधिक समीप हैं। शूद्र और वैश्य भी उसी ब्रह्म में प्रवेश पाकर शान्त होंगे, फिर इसके आगे की अवस्थावालों के लिये तो कहना ही क्या है। उनके लिये तो निश्चित ही है। गीता, जिसका विस्तार वेद और अन्य उपनिषद् जिनमें ब्रह्मविदुषी महिलाओं के आख्यान भरे पड़े हैं, तथाकथित धर्मभीरु, रूढ़िवादी वेदाध्ययन के अधिकार-अनधिकार की व्यवस्था देने में माथापच्ची करते रहें लेकिन योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्पष्ट उद्घोष है कि यज्ञार्थ कर्म की निर्धारित क्रिया में स्त्री-पुरुष सभी प्रवेश ले सकते हैं। अब वे भजन की धारणा पर प्रोत्साहन देते हैं- #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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7 days ago
।। ॐ ।। मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #यथार्थ गीता पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्रादि तथा जो कोई पापयोनिवाले भी हों, वे सभी मेरे आश्रित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं। अतः यह गीता मनुष्यमात्र के लिये है, चाहे वह कुछ भी करता हो, कहीं भी पैदा हुआ हो। सबके लिये यह एक समान कल्याण का उपदेश करती है। गीता सार्वभौम है। पापयोनि- अध्याय १६/७-२१ में आसुरी वृत्ति के लक्षणों के अन्तर्गत भगवान ने बताया कि जो शास्त्रविधि को त्यागकर नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भ से यजन करते हैं, वे नरों में अधम हैं। यज्ञ है नहीं किन्तु नाम दे रखा है और दम्भ से यजन करता है वह क्रूरकर्मी और पापाचारी (पापयोनि) है। जो मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं वही पापी हैं। वैश्य और शूद्र भगवत्पथ की सीढ़ियाँ हैं। स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान, कभी हीनता की भावना समाज में रही है, इसीलिये श्रीकृष्ण ने इनका नाम लिया। योग-प्रक्रिया में स्त्री और पुरुष दोनों का समान ही प्रवेश है।
Jagdish Sharma
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8 days ago
।। ॐ ।। क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ इस भजन के प्रभाव से वह दुराचारी भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, परमधर्म परमात्मा से संयुक्त हो जाता है तथा सदैव रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। कौन्तेय! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। यदि एक जन्म में पार नहीं लगा तो अगले जन्मों में भी वही साधन करके शीघ्र ही परमशान्ति को प्राप्त होता है। अतः सदाचारी, दुराचारी सभी को भजन करने का अधिकार है। #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
Jagdish Sharma
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9 days ago
।। ॐ।। अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से अर्थात् (अन्य न) मेरे सिवाय किसी अन्य वस्तु या देवता को न भजकर केवल मुझे ही निरन्तर भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है। अभी वह साधु हुआ नहीं है किन्तु उसके हो जाने में सन्देह भी नहीं है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है। अतः भजन आप भी कर सकते हैं बशर्ते कि आप मनुष्य हों; क्योंकि मनुष्य ही यथार्थ निश्चयवाला है। गीता पापियों का उद्धार करती है और वह पथिक-
Jagdish Sharma
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10 days ago
।।ॐ।। समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता मैं सब भूतों में सम हूँ। सृष्टि में न मेरा कोई प्रिय है और न अप्रिय है; किन्तु जो अनन्य भक्त है, वह मुझमें है और मैं उसमें हूँ। यही मेरा एकमात्र रिश्ता है। मैं उसमें परिपूर्ण हो जाता हूँ। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं रह जाता। तब तो बहुत भाग्यशाली लोग ही भजन करते होंगे? भजन करने का अधिकार किसे है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-"यथार्थ गीता"
Jagdish Sharma
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12 days ago
।। ॐ ।। यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ अर्जुन! तू जो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता है, दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, वह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यह सब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता