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Jagdish Sharma
@6079857
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Jagdish Sharma
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1 hours ago
।। ॐ ।। वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ वृष्णिवंश में मैं वासुदेव अर्थात् सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। पाण्डवों में मैं धनंजय हूँ। पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक सम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। मुनियों में मैं व्यास हूँ। परमतत्त्व को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ। कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं हूँ। #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
Jagdish Sharma
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1 days ago
।। ॐ ।। द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ तेजस्वी पुरुषों का तेज मैं हूँ। जुए में छल करनेवालों का छल मैं हूँ। तब तो अच्छा है कि जुआ खेलें, उसमें कलबल-छल करें, वहीं भगवान हैं। नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। यह प्रकृति ही एक जुआ है। यही ठगिनी है। इस प्रकृति के द्वन्द्व से निकलने के लिये दिखावा छोड़कर छिपाव के साथ गुप्त रूप से भजन करना ही छल है। छल है तो नहीं, किन्तु बचाव के लिये आवश्यक है। जड़भरत की तरह उन्मत्त, अन्धे-बहरे और गूंगे की तरह हृदय से जानकार होते हुए भी बाहर से ऐसे रहें कि अनजान हों, सुनते हुए भी न सुनें, देखते हुए भी न देखें। छिपकर ही भजन का विधान है, तभी साधक प्रकृति-पुरुष के जुए में पार पाता है। जीतनेवालों की विजय मैं हूँ और व्यवसायियों का निश्चय (जिसे अध्याय दो, श्लोक इकतालीस में कह आये हैं- इस योग में निश्चयात्मक क्रिया एक है, बुद्धि एक ही है, दिशा एक ही है ऐसी), क्रियात्मिका बुद्धि मैं हूँ। सात्त्विक पुरुषों का तेज और ओज मैं हूँ। #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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2 days ago
।। ॐ ।। बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम अर्थात् बृहत् से संयुक्त समत्व दिलानेवाला गायन हूँ अर्थात् ऐसी जागृति मैं हूँ। छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ। गायत्री कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जिसे पढ़ने से मुक्ति मिलती हो वरन् एक समर्पणात्मक छन्द है। तीन बार विचलित होने के पश्चात् ऋषि विश्वामित्र ने अपने को इष्ट के प्रति समर्पित करते हुए कहा- 'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।' अर्थात् भूः, भुवः और स्वः तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त देव! आप ही वरेण्य हैं। हमें ऐसी बुद्धि दें, ऐसी प्रेरणा करें कि हम लक्ष्य को प्राप्त कर लें। यह मात्र एक प्रार्थना है। साधक अपनी बुद्धि से यथार्थ निर्णय नहीं ले पाता कि वह कब सही है और कब गलत ? उसकी यह समर्पित प्रार्थना मैं हूँ, जिससे निश्चित कल्याण है; क्योंकि वह मेरे आश्रित हुआ है। मासों में शीर्षस्थ मार्ग मैं हूँ और जिसमें सदैव बहार हो ऐसी ऋतु, हृदय की ऐसी अवस्था भी मैं ही हूँ।
Jagdish Sharma
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3 days ago
।। ॐ ।। मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और आगे होनेवालों की उत्पत्ति का कारण हूँ। स्त्रियों में मैं यश, शक्ति, वाक्पटुता, स्मृति, मेधा अर्थात् बुद्धि, धैर्य और क्षमा हूँ। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, 'द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।' (अध्याय १५/१६) - पुरुष दो ही प्रकार के होते हैं, क्षर और अक्षर। सम्पूर्ण भूतादिकों की उत्पत्ति और विनाशवाले ये शरीर क्षर पुरुष हैं। ये नर, मादा, पुरुष अथवा स्त्री कुछ भी कहलाएँ, श्रीकृष्ण के शब्दों में पुरुष ही हैं। दूसरा है अक्षर पुरुष, जो कूटस्थ चित्त के स्थिर काल में देखने में आता है। यही कारण है कि इस योगपथ में स्त्री-पुरुष सभी समान स्थिति के महापुरुष होते आये हैं। किन्तु यहाँ स्मृति, शक्ति, बुद्धि इत्यादि स्त्रियों के ही गुण बताये गये। क्या इन सद्गुणों की आवश्यकता पुरुषों के लिये नहीं है? कौन ऐसा पुरुष है जो श्रीमान्, कीर्तिमान्, वक्ता, स्मरणशक्तिसम्पन्न, मेधावी, धैर्यवान् और क्षमावान् नहीं बनना चाहता? बौद्धिक स्तर पर कमजोर लड़कों में इन्हीं गुणों का विकास करने के लिये मात
Jagdish Sharma
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4 days ago
।। ॐ ।। अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ मैं अक्षरों में अकार-ओंकार तथा समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ। (साधना की उन्नत अवस्था में मन सिमटते-सिमटते केवल साधक और इष्ट आमने-सामने रह जाते हैं, शेष कोई संकल्प नहीं रह जाता, स्वामी सेवक में संघर्ष है; किन्तु द्वन्द्व की यह अवस्था भगवान की देन है।) अक्षयकाल मैं हूँ। काल सदैव परिवर्तनशील है; किन्तु वह समय जो अक्षय, अजर, अमर परमात्मा में प्रवेश दिलाता है, वह अवस्था मैं हूँ। विराट् स्वरूप अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, सबको धारण-पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ। #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏
Jagdish Sharma
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5 days ago
।। ॐ ।। सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥ हे अर्जुन ! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ। विद्याओं में अध्यात्मविद्या मैं हूँ। जो आत्मा का आधिपत्य दिला दे, वह विद्या मैं हूँ। संसार में अधिकांश प्राणी माया के आधिपत्य में हैं। राग, द्वेष, काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से प्रेरित हैं। इनके आधिपत्य से निकालकर आत्मा के आधिपत्य में ले जानेवाली विद्या मैं हूँ, जिसे अध्यात्मविद्या कहते हैं। परस्पर होनेवाले विवादों में, ब्रह्मचर्चा में जो निर्णायक है, ऐसी वार्त्ता मैं हूँ। शेष निर्णय तो अनिर्णीत होते हैं। #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
Jagdish Sharma
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6 days ago
।। ॐ ।। पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ पवित्र करनेवालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ। 'रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।' योगी किसमें रमण करते हैं? अनुभव में। ईश्वर इष्टरूप में जो निर्देशन देता है, योगी उसमें रमण करते हैं। उस जागृति का नाम राम है और वह जागृति मैं हूँ। मछलियों में मगर तथा नदियों में गंगा मैं हूँ। #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
Jagdish Sharma
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7 days ago
।। ॐ ।। प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥ मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ। (पर + आह्लाद-पर के लिये आह्लाद) प्रेम ही प्रह्लाद है। आसुरी सम्पद् में रहते हुए ईश्वर के लिए आकर्षण-विकलता आरम्भ होती है, जिससे परमप्रभु का दिग्दर्शन होता है, ऐसा प्रेमोल्लास मैं हूँ। गिनती करनेवालों में मैं समय हूँ। एक, दो, तीन, चार ऐसी गिनती या क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास इत्यादि नहीं, बल्कि ईश्वर के चिन्तन में लगा हुआ समय मैं हूँ। यहाँ तक कि 'जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।' अनवरत चिन्तन में समय मैं हूँ। पशुओं में मृगराज (योगी भी मृ (जंगल) + ग (गमन करना) अर्थात् योगरूपी जंगल में गमन करनेवाला है) तथा पक्षियों में गरुड़ मैं हूँ। ज्ञान ही गरुड़ है। जब ईश्वरीय अनुभूति आने लगती है, तब यही मन अपने आराध्य की सवारी बन जाता है और जब यही मन संशय से युक्त है तब सर्प होता है, डसता रहता है, योनियों में फेंकता है। गरुड़ विष्णु की सवारी है। जो सत्ता विश्व में अणुरूप से संचारित है, ज्ञानसंयुक्त मन उसे अपने में धारण करता है, उसका वाहक बनता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, इष्ट को धारण करनेवाला मन मैं हूँ। #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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8 days ago
।। ॐ ।। अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ #यथार्थ गीता #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ। वैसे यह कोई सर्प नहीं है। गीता की समकालीन पुस्तक श्रीमद्भागवत में इसके रूप की चर्चा है कि इस पृथ्वी से तीस हजार योजन की दूरी पर परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है, जिसके सिर पर यह पृथ्वी सरसों के दाने की तरह भाररहित टिकी है। उस युग में योजन का पैमाना चाहे जो रहा हो, फिर भी यह पर्याप्त दूर है। वस्तुतः यह आकर्षण शक्ति का चित्रण है। वैज्ञानिकों ने जिसे ईथर माना है। ग्रह-उपग्रह सभी उसी शक्ति के आधार पर टिके हैं। उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहीं है। वह शक्ति सर्प की कुण्डली की तरह सभी ग्रहों को लपेटे है। यही है वह अनन्त, जिससे पृथ्वी धारण की जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं-ऐसी ईश्वरीय शक्ति मैं हूँ। जलचरों में उनका अधिपति 'वरुण' हूँ तथा पितरों में 'अर्यमा' हूँ। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं। इनके पालन में आनेवाले विकारों को काटना 'अर:' है। विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत-संस्कार तृप्त होते हैं, निवृत्ति प्रदान कर देते हैं। शासन करनेवालों में मैं यमराज हूँ।
Jagdish Sharma
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9 days ago
।। ॐ ।। आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ शस्त्रों में मैं वज्र हूँ। गायों में कामधेनु हूँ। कामधेनु कोई ऐसी गाय नहीं है, जो दूध के स्थान पर मनचाहा व्यंजन परसती हो। ऋषियों में वशिष्ठ के पास कामधेनु थी। वस्तुतः 'गो' इन्द्रियों को कहते हैं। इन्द्रियों का संयत होना इष्ट को वश में रखनेवाले में पाया जाता है। जिसकी इन्द्रियाँ ईश्वर के अनुरूप स्थिर हो जाती हैं, उसके लिये उसी की इन्द्रियाँ 'कामधेनु' बन जाती हैं। फिर तो 'जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।' (रामचरितमानस, ७/११३/४) उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। प्रजनन करनेवालों में नवीन स्थितियों को प्रकट करनेवाला मैं हूँ। 'प्रजनन'- एक तो लड़का बाहर पैदा किया जाता है, चराचर में रात-दिन पैदा ही होते हैं, चूहे-चींटी रात-दिन करते हैं- ऐसा नहीं, बल्कि एक स्थिति से दूसरी स्थिति, इस प्रकार वृत्तियों का परिवर्तन होता है। वह परिवर्तित स्वरूप मैं हूँ। सर्पों में मैं वासुकि हूँ। #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇