दया ही धर्म की नींव है और अहंकार ही पाप का कारण है। दयावान व्यक्ति के हृदय में भगवान निवास करते हैं, जबकि अभिमानी व्यक्ति उनसे दूर होता है।दोहे का अर्थ:दया धर्म का मूल है: दया, करुणा, या जीवों के प्रति प्रेम ही सच्चे धर्म की जड़ है।पाप मूल अभिमान: घमंड या अहंकार ही समस्त पापों और दुखों की जड़ है।कह कबीर दयावान के पास रहे भगवान: जो व्यक्ति दयालु है, भगवान सदैव उसी के साथ रहते हैं।भावार्थ:संत कबीर दास जी कहते हैं कि जिस प्रकार पेड़ की जड़ से ही पेड़ जीवित रहता है, उसी प्रकार दया से ही धर्म जीवित रहता है। अहंकारी व्यक्ति न केवल ईश्वर से दूर होता है, बल्कि अपने पापों का भागी भी बनता है। इसलिए, व्यक्ति को अहंकार का त्याग कर दयावान बनना चाहिए।
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