*चौपाई*:
_कर्म प्रधान बिश्व रचि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥_
*अर्थ*: इस संसार की रचना कर्म के आधार पर हुई है, जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है।
ये चौपाई *रामचरितमानस, अयोध्या कांड, दोहा 218* के बाद की है। ये प्रसंग तब का है जब भगवान राम वनवास जा रहे थे।
*संत रामपाल जी महाराज इस चौपाई का क्या अर्थ बताते हैं?*
संत रामपाल जी महाराज सत्संग में बताते हैं कि ये चौपाई *100% सत्य है*, लेकिन इसका पूरा रहस्य लोग नहीं समझते:
1. *कर्म का नियम काल ब्रह्म के लोक में है*: ये 21 ब्रह्मांड काल ब्रह्म के हैं। यहाँ का नियम है "जैसी करनी वैसी भरनी"। यहाँ पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, 84 लाख योनियाँ - सब कर्म के आधार पर ही मिलते हैं।
2. *लेकिन मोक्ष कर्म से नहीं मिलता*: संत रामपाल जी गीता 2:47 और गीता 18:66 का प्रमाण देते हैं। कर्म से सिर्फ सुख-दुख मिलते हैं, मोक्ष नहीं। मोक्ष के लिए *पूर्ण परमात्मा की शरण* और *तत्वदर्शी संत से मिला सतनाम* जरूरी है।
3. *सतभक्ति से कर्म कटते हैं*: कबीर साहेब की वाणी है:
_"कबीर, सतगुरु शरण में आने से, आई टले बलाय।
जो मस्तक में सूलि हो, वो कांटे में टल जाय॥"_
यानी सच्चे संत से नाम-दान लेने के बाद पाप कर्मों का दंड भी हल्का हो जाता है। फांसी की सजा कांटे में टल जाती है।
4. *तीन तरह के कर्म होते हैं*:
- *संचित कर्म*: पिछले जन्मों का इकट्ठा कर्म
- *प्रारब्ध कर्म*: जो इस जन्म में भोगना है
- *क्रियमाण कर्म*: जो अभी कर रहे हैं
संत रामपाल जी बताते हैं कि नाम-दीक्षा के बाद गुरु जी संचित कर्म नष्ट कर देते हैं, प्रारब्ध के कर्म भोगकर खत्म होते हैं, और क्रियमाण कर्म सतभक्ति से नहीं बनते।
*सार*: "कर्म प्रधान विश्व" ये नियम काल के लोक के लिए है। लेकिन इस काल लोक से निकलकर सतलोक जाने के लिए कर्म नहीं, *सतभक्ति* प्रधान है। क्योंकि सतलोक में कर्म का विधान ही नहीं है, वहाँ सिर्फ सुख है।
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #📖जीवन का लक्ष्य🤔