#GodNightThursday
#Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6
. आशा मार! तू अलख सूं खेल!
मनुष्य की सबसे बड़ी भूल क्या है? वह इस दुनिया की चमक चौध मनुष्य अपने आप और परमात्मा को भूल कर वह बाहर की दुनिया को पकड़ने में लगा है। हमारी आत्मा परमात्मा का प्रतिबिम्ब है। और मनुष्य भीतर बैठे परमात्मा को भूल गया है।
दिन-रात बस यही चिंता है कि कल क्या होगा? भव्य मकान का निमार्ण कैसे होगा। विवाह शादियां में भारी खर्च होगा। बच्चों की शिक्षा और कारोबार में इतना पैसा कैसे आएगा? लोग क्या कहेंगे? और इसी चिंता में जीवन हाथ से रेत की तरह फिसल जाता है। सब कहते है कि आशा को मारो। लेकिन जीवन को मत मारो। आशा मरने का अर्थ उदास होना नहीं है।
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर॥
कबीर साहिब जी कहते है कि धन दौलत और भौतिकतावाद की लालसा कभी नहीं मरती, न ही मन चंचल इच्छाओं वाला मन मरता है। भले ही शरीर बार- बार मृत्यु को प्राप्त हो जाए, लेकिन आशा अथार्त उम्मीदें और तृष्णा, लोभ, लालसा नहीं मरती हैं।
जीवत मुक्ता सो कहो, आशा तृष्णा खण्ड।
मन के जीते जीत है, क्यों भरमें ब्रह्मांड।।
जीवित मुक्त तो वही है जिसको किसी वस्तु की इच्छा न रही हो। मन को भक्ति मे लगा लिया तो मन आपके आधीन हो गया। जब तक मन काबू में नहीं है तो चाहे ब्रह्माण्ड की सैर कर ले, कोई लाभ नही।
तन धर सुखिया कोई न देख्या
आज कोई भी मनुष्य यह नहीं कह सकता कि मैं सुखी हूं या मुझे किसी भी प्रकार का दु:ख नहीं है चाहे वह शारीरिक हो या फिर मानसिक। सच्चाई तो यह है कि परमात्मा कहते हैं कि मनुष्य शरीर धारी प्राणी ऐसा कोई भी मैंने नहीं देखा जो दुखी नहीं हो। परमात्मा कहते हैं कि
तन धर सुखिया कोई न देख्या, जो देखा सो दुखिया हो।
उदयअस्त की बात करत है मैंने सबका किया विवेका हो।
तन धर सुखिया कोई न देख्या, जो देखा सो दुखिया हो।
भई धाटे बादे सब जग दुखिया, के गृहस्थी बैरागी हो,
सुखदेव ने दुख के डर से, गर्भ में माया त्यागी हो----2
तन धर सुखिया कोई न देख्या, जो देखा सो दुखिया हो।
भई जंगम दुखिया योगी दुखिया, तपस्वी को दुख दुना हो,
आशा तृष्णा सब धट व्यापै, कोई महल ना सूना हो----2
तन धर सुखिया कोई न देख्या, जो देखा सो दुखिया हो।
भई साँच कहूँ तो ये जग ना माने, झूठ कहीं ना जाई हो,
ये ब्रह्मा विष्णु शिवजी दुखिया, जिन ये राह चलाई हो-2
तन धर सुखिया कोई न देख्या, जो देखा सो दुखिया हो।
सुरपति दुखिया भूपति दुखिया,ये रंक दुखी बपरीति हो,
कहै कबीर और सब दुखिया,एक संत सुखी मनजीती हो-2
तन धर सुखिया कोई न देख्या, जो देखा सो दुखिया हो।
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