संवाद : रिश्तों की साँस
प्रेम कभी आँखों से बहता है,
कभी मौन में ठहर जाता है।
पर जब संवाद नहीं होता,
तो वही प्रेम भीतर ही भीतर बोझ बन जाता है।
अनकही बातें गलतफ़हमियाँ बनती हैं,
और जो समझा जाना चाहिए था
वही रिश्ते की जड़ों में ज़हर घोल देता है।
तब प्रेम तपस्या नहीं,
एक ऐसा दंड बन जाता है
जिसमें सहना तो पड़ता है
पर शांति नहीं मिलती।
संवाद केवल शब्द नहीं,
वह साधना है—
जहाँ अहंकार शांत होता है
और संवेदना जागती है।
बाहर रिश्ते मुस्कुराते हैं,
पर भीतर रिक्तता दम घोंटती रहती है।
प्रेम भावना है,
पर संवाद निरंतर कर्म।
जहाँ संवाद है
वहाँ पीड़ा भी पवित्र हो जाती है,
और जहाँ संवाद नहीं
वहाँ प्रेम भी बंधन बन जाता है।
इसलिए जब आपका पार्टनर कहे—
“टाइम दो, बात करो”
तो साथ दीजिए।
क्योंकि समय न देने से
रिश्ते टूटते नहीं,
वेंटीलेटर पर पहुँच जाते हैं।
संवाद ही
एक स्वस्थ रिश्ते की पहचान है।
#😊Feeling happy