सुना है छूटी हुई चीजों की जड़ें उग आती हैं,
कुछ ऐसा ही अधूरा सा छूट गया हूँ मै कहीं,
अपनी सोचो में अपने सवालो में अपने ही बुने हुए जवाबो में.. अधूरा एकदम अधूरा ...!!.
पहले कोई सवाल आता था तो तुम तक पहुँच जाया करता था, पहले तुम तक पहुँचना ही जैसे मेरे सारे सवालों का जवाब था,
लेकिन अब .. अब में तुम तक नही आता, न सवाल पूछता हूँ, जानता हूँ तुम्हारे जवाबो में कहीं न कहीं तुम खुद को सही साबित करने की जंग में अंत मे मुझे हरा ही दोगी , जबकि मैं तो पहले ही हार चुका हूँ ।
जब कभी पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो हँसी आती है, जो जिया हमने वो सच भी था या एक भरम,
अगर सच था तो आज जो सच है वो क्या है.. उसे कैसे झुठलाओगे तुम..!!
मुझे ये भी पता है वक्त के साथ एक दिन सब बदल जायेगा , तुम्हारी सब सही करने की कोशिश भी, तुम्हारा पछतावा भी, तुम बदले हुए से थोड़ा और बदल जाओगे ..
तुमने एक भरम की दीवार अपने इर्द गिर्द इस तरह बना ली होगी कि तुम्हे तब तुम सही लगने लगोगे और मै हमेशा की तरह गलत...!!
लेकिन क्या सच में.. सब कुछ बदल जायेगा इतनी आसानी से ??
बहुत कुछ छूट जाता है बीतते वक्त में , कुछ मुझ में भी छूट गया है..
आकर देखो..
"उन छूटी हुई चीजो की जड़े निकल आयी है..!!
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