फॉलो करें
... Acharya Rajesh kumar
@astrorajesh
584
पोस्ट
1,121
फॉलोअर्स
... Acharya Rajesh kumar
528 ने देखा
#🌟देखिए खास ज्योतिष उपायएक तंदुरुस्त मर्द के किसी औरत के साथ सेक्स करने के बाद जो वीर्य निकलता है उसमें 40 मिलियन तक स्पर्म मौजूद होते हैं, आसान शब्दों में कहें तो अगर सबको सही जगह (गर्भाशय) मिल जाए तो 40 मिलियन बच्चे पैदा हो जायें जबकि ये सारे के सारे स्पर्म माँ की बच्चेदानी (गर्भाशय) की तरफ पागलों की तरह भागते हैं और इस दौड़ में सिर्फ 300 से 500 तक स्पर्म ही बच जाते हैं और बाकी रास्ते में ही थकन और हारकर मर जाते हैं ये 300 से 500 वही स्पर्म हैं जो गर्भाशय तक पहुंचने में कामयाब हो पाते हैं इनमें से भी सिर्फ एक बहुत मजबूत स्पर्म होता है जो गर्भाशय में पहुँचकर फर्टिलाइज होता है क्या आप जानते हैं वो खुशनसीब, मजबूत और जीतने वाला स्पर्म कौन है? वो खुशनसीब स्पर्म आप, मैं, या हम सब हैं! आप सोच भी नहीं सकते कि जब आप पहली बार भागे थे तब आंख, हाथ-पैर, चेहरा कुछ भी नहीं था फिर भी आप जीत गये जब आप भागे तब आपके पास सर्टिफिकेट्स नहीं थे, आपके पास दिमाग़ नहीं था, लेकिन आप फिर भी जीत गये बहुत से बच्चे माँ के पेट में ही खो गए लेकिन आप मौजूद रहे और आपने अपने 9 महीने पूरे किए और आज.................. आज आप घबराये हैं, जब कुछ होता है तो आप मायूस हो जाते हैं मगर क्यूँ? आपको क्यूँ लगता है कि आप हार गए हैं? आपने भरोसा क्यूँ खो दिया है? अब तो आपके पास दोस्त हैं, बहन भाई, सर्टिफिकेट्स सब कुछ है फिर आप मायूस क्यूँ हो गए? आप सबसे पहले जीते, आखिर में जीते, बीच में जीत जाते हैं.परमात्मा(प्रकृति )पर यकीन और सच्ची लगन से मकसद को हासिल करने के लिए पूरी जद्दोजहद करें, वो आपको हारने नहीं देगा जैसे मिलियन स्पर्म में से आपको जीतने का मौका दिया वैसे ही वो अब भी आपको कामयाब जरूर बनाएगा! #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓ #✡️ज्योतिष समाधान 🌟
... Acharya Rajesh kumar
1.6K ने देखा
#🔯कुंडली दोष 🔥 कृत्तिका नक्षत्र: 6 माताओं का त्याग और शरीर का अद्भुत विज्ञान 🔥 🔥 कृत्तिका नक्षत्र: 6 माताओं का त्याग और शरीर का अद्भुत विज्ञान 🔥 हम अक्सर सोचते हैं कि 'आग' (Fire) का काम केवल जलाना है। लेकिन कृत्तिका नक्षत्र बताता है कि आग का असली काम 'बनाना' (Creation) है। ​यही वह नक्षत्र है जो भोजन को 'खून' में और खून को 'जीवन' (वीर्य) में बदलता है। इसके देवता अग्नि हैं और स्वामी सूर्य। ​👇 गहराई से समझें: कार्तिकेय, 6 माताएं और आपका शरीर 👇 ​पौराणिक कथा कहती है कि भगवान शिव के तेज (वीर्य) से कार्तिकेय का जन्म हुआ। लेकिन उन्हें जन्म देने वाली माँ एक नहीं, 6 माताएं (कृत्तिकाएं) थीं, जिन्होंने अपना दूध पिलाकर उन्हें पाला। ​यह केवल कहानी नहीं, आयुर्वेद का सबसे बड़ा रहस्य है: ​🧬 6 माताएं आपके भीतर हैं (The 6 Dhatus): जब हम भोजन करते हैं, तो पेट की 'जठराग्नि' (कृत्तिका की आग) उसे पकाती है। इसके बाद शरीर में 7 धातुएं क्रम से बनती हैं। अंतिम धातु 'शुक्र/वीर्य' (कार्तिकेय) है। उसे बनाने के लिए उससे पहले की 6 धातुएं (माताएं) अपना पोषण देती हैं: १. रस (Plasma) २. रक्त (Blood) ३. मांस (Muscle) ४. मेद (Fat) ५. अस्थि (Bone) ६. मज्जा (Marrow) ​जब ये 6 माताएं पुष्ट होती हैं, तभी 7वें रूप में 'तेज' (जीवन शक्ति) का जन्म होता है। इसलिए कृत्तिका जातक 'सृजन' (Creation) और 'पालक' (Nurturer) की भूमिका में सर्वश्रेष्ठ होते हैं। ​🌟 कृत्तिका के 4 चेहरे: नवांश बदलते ही बदल जाता है इंसान 🌟 ​कृत्तिका नक्षत्र मेष (आग) और वृषभ (पृथ्वी) राशि को जोड़ता है। देखिए, नवांश के अनुसार आप कैसे दिखते हैं और सोचते हैं: ​👣 प्रथम चरण (धनु नवांश - गुरु): [मेष राशि] (अग्नि + ज्ञान) 🔹 रूप: इनका मस्तक चौड़ा और शरीर गठीला होता है। आँखों में एक चमक और चेहरे पर लालिमा होती है (मंगल का प्रभाव)। 🔹 स्वभाव: ये 'धर्म-योद्धा' होते हैं। अत्यंत सिद्धांतवादी। इन्हें भूख बहुत लगती है (जठराग्नि तीव्र होती है)। 🔹 विचार: "नियम मतलब नियम।" ये झुकना नहीं जानते। सेना, पुलिस या प्रशासन में उच्च पद पाते हैं। ​👣 द्वितीय चरण (मकर नवांश - शनि): [वृषभ राशि] (पृथ्वी + धैर्य) 🔹 रूप: इनका कद मध्यम और शरीर मजबूत होता है। चेहरे पर गंभीरता होती है। ये अपनी उम्र से बड़े दिख सकते हैं। 🔹 स्वभाव: ये बहुत मेहनती और व्यावहारिक (Practical) होते हैं। ये भावनाओं में नहीं बहते। ये अपनी ऊर्जा को धीरे-धीरे जलाते हैं, लम्बी रेस के घोड़े होते हैं। 🔹 विचार: "परिणाम क्या मिलेगा?" ये भौतिक सफलता और संसाधन जुटाने में विश्वास रखते हैं। ​👣 तृतीय चरण (कुंभ नवांश - शनि): [वृषभ राशि] (पृथ्वी + बुद्धि) 🔹 रूप: इनकी शारीरिक बनावट थोड़ी अलग या विशिष्ट (Unique) होती है। आँखें विचारशील होती हैं। 🔹 स्वभाव: ये 'विद्रोही' होते हैं। समाज की पुरानी रीतियों को काटना (कृत्तिका का उस्तरा) इनका काम है। ये भविष्यवक्ता या वैज्ञानिक सोच वाले होते हैं। 🔹 विचार: "सब कुछ बदला जा सकता है।" ये समाज कल्याण और मानवता के लिए अपनी आग का प्रयोग करते हैं। ​👣 चतुर्थ चरण (मीन नवांश - गुरु): [वृषभ राशि] (पुष्कर नवांश - सबसे पवित्र) 🔹 रूप: यह कृत्तिका का सबसे सुंदर और सौम्य रूप है। त्वचा कोमल और आँखें बड़ी/पानीदार होती हैं। 🔹 स्वभाव: यहाँ आग 'दीपक' बन जाती है। ये भोग-विलास (वृषभ) के बीच रहकर भी 'संन्यासी' (मीन) होते हैं। इनमें कला और संगीत की समझ होती है। 🔹 विचार: "शांति और मोक्ष।" ये दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। ​🗡️ कृत्तिका का प्रतीक: उस्तरा (Razor) कृत्तिका का काम है काटना। किसको? अज्ञान और मोह को। जैसे अग्नि भोजन से 'मल' को अलग करती है और 'रस' को अलग, वैसे ही कृत्तिका जातक झूठ और सच को अलग कर देता है। ​⚠️ जीवन सूत्र: अपनी जठराग्नि और काम-अग्नि (Passion) का सम्मान करें। सात्विक भोजन करें, क्योंकि जैसा अन्न होगा, वैसी ही 6 माताएं (धातुएं) बनेंगी और वैसा ही आपका जीवन (तेज) बनेगा। ​🙏 क्या आप अपनी भीतर की इस ऊर्जा को महसूस करते हैं? कमेंट में "जय कार्तिकेय" या 🔥 लिखें और शेयर करें। ​#KrittikaNakshatra #Ayurveda #SevenDhatus #Kartikeya #Navamsha #VedicAstrology #AcharyaRajesh #JyotishScience - जनवरी 12, 2026 इसे ईमेल करें इसे ब्लॉग करें! X पर शेयर करें Facebook पर शेयर करें Pinterest पर शेयर करें #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏गुरु महिमा😇 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी
... Acharya Rajesh kumar
12.5K ने देखा
#🌸 जय श्री कृष्ण😇 जिंदगी में उन्हीं को महत्व दो जो तुम्हारे साथ बने रहना चाहते है बाकी सब तो बस वक्त के मुसाफिर हैं #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓ #✡️ज्योतिष समाधान 🌟
... Acharya Rajesh kumar
562 ने देखा
#🌸 जय श्री कृष्ण😇 🌙 हृदय की झील में खिली 'कुमुदिनी' और रिश्तों की 'पिस्ता-खीर' 🪷 ज्योतिष को अक्सर हम केवल गणित और गणनाओं तक सीमित मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह परमात्मा की बनाई हुई सबसे सुंदर और रहस्यमयी पेंटिंग है जहाँ कभी-कभी कुंडली में ग्रह ऐसी युति बनाते हैं कि एक लुभावना दृश्य पैदा हो जाता है जिसे देखकर बड़े-बड़े ज्ञानी भी अपना दिल हार बैठते हैं और ईश्वरीय लीला के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। एक ऐसे ही काव्यात्मक योग की जब हम कल्पना करते हैं जहाँ किसी जातक की कुंडली में चौथे भाव यानी सुख स्थान में बुध और शनि एक साथ बैठे हों और दूर आकाश में यानी बारहवें भाव में चंद्रमा अकेले चमक रहा हो, तो यह साधारण योग नहीं बल्कि प्रकृति का एक दृश्य काव्य बन जाता है क्योंकि चौथा भाव एक शांत तालाब रूपी जल तत्व है जिसके भीतर बुध की हरियाली और शनि की गहराई मिलकर एक गहरे हरे रंग की वनस्पति का निर्माण करते हैं, और उधर बारहवें भाव का चंद्रमा जो आकाश है जब उसकी अदृश्य चांदनी उस गहरे पानी पर पड़ती है तो वहां कमल नहीं बल्कि 'कुमुदिनी' खिल उठती है जो अंधेरे में उम्मीद और सौंदर्य का प्रतीक है। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व बड़ा ही जादुई होता है क्योंकि बुध की बुद्धि और हास्य में जब शनि की गंभीरता मिलती है तो वह इंसान छिछली बातें नहीं करता और उसकी हंसी-मजाक में भी एक गहरा फलसफा छुपा होता है, मानो उसकी जुबान से निकली बात हवा में नहीं उड़ती बल्कि पत्थर पर तराशे अक्षरों की तरह अमर हो जाती है। जब हम आतिथ्य की बात करते हैं तो चौथा भाव दूध और ममता का है, और सोचिये कि दूध में जब शनि की आंच यानी गाढ़ापन और बुध का हरा रंग यानी पिस्ता मिलता है तो वह पिस्ता वाली गाढ़ी रबड़ीदार खीर बन जाती है, जिससे ऐसे व्यक्ति के हाथ का भोजन केवल पेट नहीं भरता बल्कि आत्मा को तृप्त कर देता है क्योंकि उनके प्रेम में शनि का धैर्य और बुध का स्वाद घुला होता है। चौथे भाव का शनि अक्सर दिल में एक एकांत देता है लेकिन बारहवें घर का चंद्रमा उस अंधेरे को डरावना नहीं बल्कि शायराना बना देता है, इसलिए ऐसा जातक जब कविता लिखता है तो लगता है जैसे वह अंधेरे कमरे में टॉर्च लेकर किसी बहुत ही मुलायम और कोमल चीज़ को ढूंढ रहा हो। यह योग माता के साथ भी एक गहरे और मूक संबंध को दर्शाता है जहाँ माँ का प्रेम उस कुमुदिनी की तरह होता है जो रात के सन्नाटे में खिलती है, और साथ ही बारहवें भाव का मोक्ष और चौथे भाव के मन का यह संबंध जातक को जन्मजात योगी बनाता है जो भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस कर सकता है लेकिन अपने कमरे के एकांत में ही खुद को पूर्ण पाता है। बुध यादें हैं और शनि स्थायित्व, इसलिए ऐसे लोग पुरानी यादों और पुराने रिश्तों के संरक्षक होते हैं जिनके मन की तलहटी में बचपन की छोटी बातें हमेशा सुरक्षित रहती हैं, और अंततः यह "कुमुदिनी योग" हमें यही सिखाता है कि जीवन में शनि की कालिमा भी ज़रूरी है ताकि उस पर चंद्रमा की चांदनी चमक सके और एक गंभीर व्यक्तित्व के भीतर भावनाओं का सागर हिलोरें ले सके। — आचार्य राजेश कुमार (हनुमानगढ़, राजस्थान) (सत्य सनातन ज्योतिष एवं महाकाली सेवक) #Astrology #Jyotish #PlanetaryYoga #Moon #Saturn #Mercury #Spirituality #PoetryInStars #AcharyaRajeshKumar #🙏जय माता दी📿 #🔯वास्तु दोष उपाय #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी
... Acharya Rajesh kumar
503 ने देखा
#🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय ।बहुरूपी संसार: ग्रहों की वक्र दृष्टि, समय का चक्र और कर्म का विधान ।। सोचने वाली बात है कि इस दुनिया की आबादी 800 करोड़ से भी ज्यादा है, लेकिन उन्हें चलाने वाले अंक (ग्रह) केवल 9 हैं। यही 9 ग्रह अपनी चाल और गोचर से पूरी दुनिया को नचा रहे हैं। लोग सोचते हैं कि नाम की स्पेलिंग (वर्तनी) बदल लेने से किस्मत बदल जाएगी, लेकिन सच तो यह है कि स्पेलिंग बदलने से कुछ नहीं होता, जब तक कि ग्रहों की चाल और आपके कर्म नहीं बदलते। यह संसार बड़ा ही विचित्र और बहुरूपी है। बचपन में पुत्र पिता के सहारे चलता है, उसकी उंगली पकड़कर जीवन की राहें ढूंढता है। कुदरत का नियम तो यही है कि जवान होते ही पुत्र पिता का सहारा बने। लेकिन ग्रहों की माया देखिये—यदि पिता की कुंडली में पुत्र का कारक ग्रह 'वक्री' हो, तो वह पुत्र जवानी आते ही अपनी स्वार्थ पूर्ति के बाद पिता से दूर हो जाता है। पिता का जीवन भर का किया-धरा सब परे रह जाता है और अंत समय में वह दूसरों पर आश्रित होकर अपना बुढ़ापा निकालता है। ठीक यही स्थिति पुत्री की है। शादी तक वह पिता पर और शादी के बाद पति पर निर्भर होती है। लेकिन यदि उसकी कुंडली में गुरु (बृहस्पति) वक्री हो, तो वह पहले पिता का बदला हुआ रूप देखती है और फिर पति का। अंततः अपने स्वार्थ के कारण वह संबंधों को केवल मतलब तक ही सीमित रखती है। असल में, वक्री ग्रहों के इसी प्रभाव ने संसार में हर काम और संबंध के लिए 'दो प्रकार के अर्थ' बना दिए हैं और दुनिया का रूप 'दो-रंगा' कर दिया है। रिश्तों की यह अदला-बदली गोचर के खेल पर टिकी है। जन्म समय का सूर्य यदि मित्र भाव में हो तो सहयोग देता है, लेकिन जब वही सूर्य गोचर में शत्रु भाव में आता है, तो उस सूर्य के अंदर शत्रुता जैसे गुण आ जाते हैं; जो कार्य और दोस्त अब तक सहायक थे, वही 'विश्वासघात' करने लगते हैं। यही बात रोजाना की जिंदगी में चन्द्रमा के लिए मानी जाती है। कर्क राशि का चन्द्रमा हृदय को द्रवित (कोमल) कर देता है, लेकिन मकर का चन्द्रमा हृदय को कठोर कर देता है। पर गोचर का विरोधाभास देखिये—जन्म के समय का कठोर चन्द्रमा जब गोचर से कर्क राशि में आता है, तो वह अपने स्वभाव को 'द्रव' बना लेता है और कभी-कभी एक 'कसाई भी दया कर जाता है'। इसके विपरीत, जिसका चन्द्रमा जन्म से ही कर्क राशि का हो या चौथे भाव का प्रभाव देने वाला हो, और वही चन्द्रमा जब दसवें भाव में आता है या मकर राशि का होता है, तो दया का प्रभाव समाप्त होकर केवल स्वार्थ की नीति पैदा हो जाती है; तब दया करने वाला भी 'कसाई' का रूप धारण कर लेता है। समय का चक्र बड़ा बलवान है। केतु अपने उच्च समय में जातक की खूब 'जय-जयकार' करवाता है, लेकिन ठीक नौ साल बाद जब वही केतु नीच राशि में गोचर करता है, तो बदनामी भी देता है। जितनी अधिक जय-जयकार हुई होती है, उतनी ही गहरी नफरत भी वह अपनी शक्ति से प्रदान कर देता है। उधर राहु, जब बारहवें भाव में होता है तो ऊपरी बाधाएं और आकस्मिक कष्ट प्रदान करता है, लेकिन वही राहु जब छठे भाव में गोचर करता है, तो जातक को दूसरों के लिए 'आफत' बनाकर सामने खड़ा कर देता है। इसलिए कहा है—"पुरुष बली नहि होत है, समय होत बलवान।" जो लोग समय को समझकर चलते हैं, वे न किसी को दिक्कत देते हैं और न खुद दिक्कत का सामना करते हैं। समय की धारा में भूतकाल पिता है, वर्तमान काल खुद का जीवन है और भविष्य खुद की संतान का रूप है। अगर पिता ने अच्छे कर्म किए हैं, तो आप खुद भी अच्छे जीवन को जियोगे और पिता के कर्मों का भोग प्राप्त करोगे। लेकिन यदि आपने खुद (वर्तमान में) कोई अच्छा काम नहीं किया, तो भले ही कितनी ही अच्छी जिन्दगी जीने का हक मिले, लेकिन आपकी संतान तो दुखी रहेगी, उसे कोई रोक नहीं सकता। यह संसार एक चक्की की तरह है और सामाजिकता उस विशाल बड़ (वटवृक्ष) के पेड़ की तरह है जिसके नीचे यह संसार की चक्की चल रही है। कहा भी है—"चक्की चल रही बड़ के नीचे, रस पीजा लांगुरिया।" अब उस रस को पीकर कैसा चलना है, वह आपकी सामाजिकता पर निर्भर करता है। जन्म हुआ है तो मरना भी होगा, इसे कोई रोक नहीं सकता। जब सूर्य ने जन्म लिया है, तो शनि भी जन्म लेगा। और यहाँ एक गहरा राज है—जब शनि खुद कुछ नहीं कर पाता, तो वह अपने 'चेलों' राहु और केतु से अपने कार्य को करवाता है। जब शनि के साथ राहु मिलता है तो उल्टे काम करवाता है; जो भी होगा वह केवल 'झूठ की दीवार' पर खड़ा होगा और जिस दिन गुरु और केतु की छाया उस दीवार पर आयी, झूठ की दीवार पर खड़ा यह संसार धराशायी हो जाएगा। इसलिए घमंड करना बेकार की बात है। जो प्राप्त कर रहे हो वह अपने पूर्वजों के कर्मों से प्राप्त कर रहे हो। अपनी-अपनी तानी (ऐंठन) तो 'म' के ऊपर लगी बिंदी जैसी है, जो सीधी 'ड' के नीचे आ जाएगी और वही 'घमंड' शब्द 'घमड़' (मिट्टी में मिलना) बन जाएगा और जैसे ही जीवन 'घमड़' हुआ, समझ लो घमंड का फल मिलने लगा। अंततः, कभी भी एक ही ग्रह का आसरा नहीं पकड़ना चाहिए। दिमाग में जब बुरे भाव आने लगें, तो सोचना चाहिए कि चन्द्रमा बुरे ग्रह के साथ है। कुंडली देखकर समझ सकते हो तो समझ लो कि चन्द्रमा किस ग्रह के साथ या किसकी शक्ति में अपना गोचर कर रहा है। नजरिया समय के साथ बदलता है—किसी भी सड़ी-गली चीज से नफरत होना स्वाभाविक है, लेकिन वही सड़ी-गली चीज कभी-कभी मन को बहुत सुंदर लगने लगती है, जैसे भूख लगने पर 'फलों का सड़ा-गला अचार' भी कितना अच्छा लगता है। यदि लड़का उद्दंड हो गया है, बात को नहीं मानता है, तो उसे 'प्रकृति के सहारे पर छोड कर चुप लगाना उचित होगा'। जैसे ही समय की मार लड़के पर पड़ेगी, वह अपने आप ही ठीक भी हो जाएगा और अपनी दुनियादारी भी बदल कर इस बहुरूपी संसार का प्रभाव आपके सामने सिद्ध कर देगा। आखिरकार, कर्म का विधान तो यही कहता है—"बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहाँ से खाय?" डिस्क्लेमर: यह लेख केवल ज्योतिषीय जानकारी और ग्रह-गोचर के प्रभाव को समझाने के उद्देश्य से लिखा गया है। पाठक इसे अपने विवेक से लें। #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓
... Acharya Rajesh kumar
489 ने देखा
#🌸 जय श्री कृष्ण😇 ग्रहों का विचित्र खेल और मोहल्ले की 'सुप्रीम कोर्ट': सुषमा भाभीग्रहों का विचित्र खेल और मोहल्ले की 'सुप्रीम कोर्ट': सुषमा भाभी लेखक: आचार्य राजेश कुमार हमारे मोहल्ले की फिजाओं में अगर किसी शख्सियत का सिक्का चलता है, तो वे हैं—सुषमा भाभी। अगर एक ज्योतिषी की नज़र से देखा जाए, तो सुषमा भाभी महज एक महिला नहीं, बल्कि ग्रहों की एक चलती-फिरती और बड़ी ही दिलचस्प 'युति' हैं। उनकी फितरत में एक अजीब सा हुनर है—वे राई का पहाड़ बनाने में माहिर हैं। ज्योतिष में यह 'राहू' (Rahu) का साक्षात् प्रभाव है, जो धुएं को भी बादल बनाकर पेश करता है। इसी राहू के दम पर वे मोहल्ले की किसी छोटी सी बात को इतना उछाल देती हैं कि सामने वाला शरीफ आदमी अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर भागने को मजबूर हो जाता है, या फिर अपनी बातों में इतना वजन डाल देती हैं कि कल का आया हुआ अजनबी भी मोहल्ले का 'चौधरी' बन बैठता है। जुबान का जादू और ग्रहों की गवाही उनकी बातों में शुक्र (Venus) का ऐसा जबरदस्त आकर्षण है कि अमीर हो या गरीब, बूढ़ा हो या जवान, सब उनकी बातों को ऐसे गौर से सुनते हैं जैसे कोई ब्रह्मवाक्य हो। और मजे की बात यह है कि बात करते वक्त वे गवाही अपने साथ रखती हैं, अगर कोई गवाह न मिले तो "भगवान की सौगंध" उनकी जुबान पर धरी रहती है। यहाँ साफ़ दिखता है कि उनका गुरु (Jupiter), जो धर्म का कारक है, वो उनके स्वार्थ (राहू) के आगे कमजोर पड़ गया है, तभी तो वे ईश्वर की कसम को केवल एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं। व्यवहार कुशलता में तो उनका जवाब नहीं! जब वे बुजुर्गों के पास बैठती हैं, तो शनि (Saturn) जैसी गंभीरता ओढ़ लेती हैं—सिर पर पल्ला और लहज़े में खानदानी तहजीब। वहीँ, जब हमउम्र औरतों या पुरुषों के बीच होती हैं, तो शुक्र अपना रंग दिखाता है—कटाक्ष भरे नैन-मटक्के और हंसी-ठिठोली। और बच्चों के साथ? वहां उनका चंद्रमा (Moon) जाग उठता है, इतना लाड़-प्यार लुटाती हैं कि बच्चे अपनी सगी माँ की गोद छोड़कर भाभी की गोद में जा बैठते हैं। यह ग्रहों का ऐसा बहुरूपिया खेल है जो सबको अपना बना लेता है। घर का 'न्यूज़ रूम' और तीन 'बुध' रूपी कन्याएं अब ज़रा उनके घर के ग्रहों का हाल देखिए। पतिदेव किसी कचहरी में 'बाबू' हैं। जितने भाभी के चर्चे हैं, पतिदेव उतने ही खामोश और अपनी दुनिया में मस्त रहने वाले जीव हैं। ज्योतिषीय भाषा में कहें तो यह 'कमजोर सूर्य' (Weak Sun) और 'पीड़ित गुरु' का लक्षण है। घर की असली 'सरकार' यानी सूर्य का तेज, भाभी के बलिष्ठ राहू के आगे फीका पड़ गया है। उनके पास तीन लड़कियां हैं, जो ज्योतिष में 'बुध' (Mercury) का प्रतीक हैं—यानी संदेशवाहक। जब तक पिता घर पर हैं, ये बुध रूपी कन्याएं शांत रहती हैं, लेकिन जैसे ही भाभी घर लौटती हैं, ये तीनों 'एक्टिव' हो जाती हैं। भाभी मोहल्ले भर की खबरें—किसके घर क्या पका, कौन कहाँ गया—अपनी इन 'रिपोर्टरों' को सुनाती हैं। और कमाल देखिए, जब भाभी बातें करते हुए कुछ भूल जाती हैं, तो यही बेटियां उन्हें याद दिलाती हैं। यह साबित करता है कि भाभी का अपना बुध कमजोर है, इसलिए उन्हें अपनी बेटियों के 'स्मृति-कोष' का सहारा लेना पड़ता है। विलासिता, गुप्त धन और अष्टम भाव का रहस्य सुषमा भाभी को ईश्वर ने गाने-बजाने और नाचने का भी खूब हुनर बख्शा है, जो कि उच्च के शुक्र की निशानी है। किसी भी उत्सव में अगर भाभी नहीं, तो वो फीका लगता है। किसी की रसोई (जो कि दूसरे भाव का विषय है) में अगर भाभी का दखल न हो, तो खाना बेस्वाद माना जाता है। आर्थिक स्थिति का गणित बड़ा ही विचित्र है। पतिदेव जो सैलरी लाते हैं, वो तो भाभी के कपड़ों की धुलाई और शान-शौकत में ही स्वाहा हो जाती है—यह खर्चीले शुक्र का प्रभाव है। लेकिन घर का असली रसूख और खर्चा जिस 'गुप्त स्रोत' से चलता है, उसका पता आज तक किसी को नहीं चला। यह कुंडली का 'अष्टम भाव' (8th House) और 'राहू' है, जो गुप्त धन और अनजान जुगाड़ से काम चलाता है। भाभी की यही 'राहू-नीति' है कि उनकी जान-पहचान से बड़े-बड़े काम चुटकियों में हो जाते हैं। राजनीति: सूर्य पर राहू का ग्रहण मोहल्ले की राजनीति में भाभी का कोई पद नहीं है, लेकिन वे 'किंगमेकर' हैं। ज्योतिष में राजा सूर्य होता है, लेकिन यहाँ राहू (भाभी) तय करता है कि राजा कौन बनेगा। आपको शुक्ला जी याद होंगे? उन्हें नेतागिरी का शौक था (सूर्य का प्रभाव), लेकिन भाभी ने उन्हें उखाड़ फेंका। और फिर श्रीवास्तव जी, जिन्होंने भाभी को कोई विशेष 'गुड़' खिलाया (जो कि राहू को शांत करने का उपाय था), वे रातों-रात अध्यक्ष बन गए। यह साफ़ तौर पर सूर्य-राहू के ग्रहण दोष और कूटनीति का प्रमाण है कि सत्ता उसी को मिलेगी जिस पर 'सुषमा भाभी' रूपी राहू की कृपा होगी। धर्म और दिखावे की संस्कृति धर्म के मामले में भाभी का नज़रिया बड़ा ही 'मॉडर्न' है। सत्संग में जाती जरूर हैं, लेकिन वहां गुरु (भक्ति) नदारद रहता है और शुक्र (दिखावा) हावी रहता है। वे केवल झांकी की सजावट, कीर्तन के सुर और यह देखती हैं कि कौन सा भजन किस फिल्मी गीत की तर्ज़ पर था। ईश्वर के प्रति श्रद्धा की बात पर उनका जवाब होता है—"अजी, कर्म ही पूजा है, भगवान घर देने थोड़े ही आएंगे।" शादियों में उनका आशीर्वाद लिफाफे के वजन पर निर्भर करता है—यह 'वणिक बुद्धि' (Business Minded Mercury) है। रिश्तों को लेकर उनकी सोच—कि पटरी न खाए तो तलाक ले लो—यह बताता है कि उनके लिए 'संस्कार' (Jupiter) से ज्यादा 'निजी सुख' (Venus) महत्वपूर्ण है। भाषा का अहंकार और मंगल का 'खोपड़ा' सुषमा भाभी को अपनी मातृभाषा हिंदी बोलने में कभी-कभी 'तकलीफ' होती है। अपना रुतबा जमाने के लिए वे बीच-बीच में विदेशी (अंग्रेजी) शब्द बोलती हैं—यह विदेशी कारक राहू का प्रभाव है। जो लोग रसूखदार हैं, भाभी उनके कसीदे पढ़ती हैं, लेकिन अगर कोई विद्वान गरीब है, तो उसे नीचा दिखाने का मौका नहीं छोड़तीं। यहाँ लक्ष्मी (शुक्र) ने सरस्वती (गुरु) को दबा रखा है। जो अज्ञानी उनकी चापलूसी करे, उसे वे आसमान पर चढ़ा देती हैं। चुनाव के समय तो नेताओं की भीड़ उनके दरवाजे पर होती है। उस समय भाभी का 'वाक-चातुर्य' (Mercury-Rahu) देखने लायक होता है—बुरे को अच्छा और अच्छे को गोल-मोल बताना। लेकिन सबसे खतरनाक है उनका "खोपड़ा घूमना"। यह कुंडली का 'अंगारक योग' (मंगल+राहू) है। जब यह योग जागता है, तो भाभी किसी को भी अर्श से फर्श पर पटक सकती हैं, इसी डर से कोई उनके सामने मुंह नहीं खोलता। निष्कर्ष: कलयुग का मीडिया अंत में, अगर हम व्यापक दृष्टिकोण से देखें, तो हमारे हर शहर, हर गांव में ऐसी हज़ारों 'सुषमा भाभियां' मौजूद हैं। ये सिर्फ़ महिलाएं नहीं हैं, बल्कि यह आज के दौर का मीडिया तंत्र है। कोई अखबार बनकर, कोई चैनल बनकर तो कोई वेबसाइट बनकर 'सुषमा भाभी' का किरदार निभा रहा है। इनका ज्योतिषीय समीकरण स्पष्ट है: * कल्पना और ग्लैमराइज करना: यह शुक्र और राहू का काम है। * सूचनाओं को तोड़-मरोड़ कर पेश करना: यह पीड़ित बुध और केतु का खेल है। * तीन बेटियां: वे उन 'दत्तक संतानों' या 'रिपोर्टरों' की तरह हैं जो आज इस चैनल में हैं, कल उस अखबार में। उनका सरोकार सच से नहीं, बल्कि इस बात से है कि 'टीआरपी' कैसे आए और क्या 'बिक' सकता है। सुषमा भाभी उस व्यवस्था का नाम है जहाँ गुरु (ज्ञान और नैतिकता) चुपचाप कोने में बैठा है और महफिल लूट रहे हैं—राहू (छलावा) और शुक्र (दिखावा)। #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #🔯वास्तु दोष उपाय #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें
See other profiles for amazing content