जहाँ मौन बोलता है, वहाँ हनुमान जी ध्यान करते हैं
जब समस्त जगत की गति थम जाती है,
तब श्री हनुमान जी अपने भीतर उतरते हैं।
यह ध्यान पलायन नहीं है, यह शक्ति का स्रोत है।
हनुमान जी की ध्यान मुद्रा हमें यह सिखाती है कि
बल तभी दिव्य बनता है, जब वह अनुशासन में बंधा हो।
मन तभी अडिग रहता है, जब वह राम नाम में स्थिर हो।
ध्यान में स्थित हनुमान जी न तो अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं,
न ही अपने पराक्रम का स्मरण—
वे स्वयं को शून्य कर, प्रभु श्रीराम में पूर्ण हो जाते हैं।
यह मुद्रा हमें सिखाती है कि
जीवन की हर लड़ाई तलवार से नहीं जीती जाती,
कुछ युद्ध मौन, संयम और श्रद्धा से भी जीते जाते हैं।
जो साधक अपने भीतर इस मौन को धारण कर लेता है,
उसके लिए भय, भ्रम और अस्थिरता स्वतः नष्ट हो जाते हैं।
यही हनुमान तत्व है—
शक्ति जो शांत है,
भक्ति जो अडिग है,
और ध्यान जो जीवन को दिशा देता है।
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