सीएम योगी आदित्यनाथ आज भले ही सत्ता के शिखर पर हों,
भले ही उनके कंधों पर देश के सबसे बड़े राज्य की ज़िम्मेदारी हो, लेकिन कुछ लोग ऊँचाई पर पहुँचकर बदल जाते हैं…
और कुछ ऐसे होते हैं जो ऊँचाई पर पहुँचकर पहले से और ज़्यादा भरोसेमंद हो जाते हैं।
योगी आदित्यनाथ उन्हीं में से एक हैं।
ये उस वक्त की बात है जब वे मुख्यमंत्री नहीं थे,
जब न सुरक्षा का काफ़िला था,
न चारों तरफ़ सत्ता की चकाचौंध।
वे सिर्फ़ सांसद थे —
लेकिन दिल से तब भी उतने ही बड़े थे, जितने आज हैं।
एक छोटी सी बच्ची…
महज़ दस साल की उम्र…
और उसके सिर से उसके पिता का साया उठ चुका था।
जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं,
उस उम्र में उसने ज़िंदगी का सबसे बड़ा दर्द देख लिया था।
उस घर में मातम था,
खामोशी थी,
और भविष्य का डर था।
उसी वक्त योगी आदित्यनाथ उस परिवार से मिले।
उन्होंने उस बच्ची की आँखों में झाँका,
और शायद उसी पल तय कर लिया
कि यह बच्ची अब अकेली नहीं रहेगी।
उन्होंने उससे कोई भाषण नहीं दिया,
कोई दिखावटी आश्वासन नहीं दिया,
बस इतना कहा —
“आज से मैं तुम्हारा अभिभावक हूँ।
और जब तुम्हारी शादी होगी,
तो मैं ज़रूर आशीर्वाद देने आऊँगा।”
वक़्त बीतता गया…
साल बदलते गए…
योगी जी सांसद से मुख्यमंत्री बन गए।
देश-दुनिया में उनका नाम गूंजने लगा।
और उस बच्ची ने सोचा —
“अब वो इतने बड़े हो गए हैं,
शायद उन्हें वो वादा याद भी न हो…”
शादी तय हुई।
न्योता भेजने की हिम्मत भी नहीं हुई।
कौन मुख्यमंत्री को बुलाने की सोचे?
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
शादी के दिन,
जब मंडप सजा हुआ था,
ढोलक की थाप चल रही थी,
अचानक माहौल ठहर सा गया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वहाँ खड़े थे।
बिना किसी औपचारिकता के,
बिना किसी शोर-शराबे के,
बस वही पुराने योगी जी —
वही अभिभावक।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा —
“तुम लोग बुलाओगे नहीं,
तो मैं आऊँगा नहीं क्या?”
बस…
इतना सुनना था।
पूरे परिवार की आँखें भर आईं।
और वो बच्ची —
जो अब दुल्हन बनने जा रही थी —
फूट-फूट कर रो पड़ी।
काँपती आवाज़ में बस इतना कह पाई —
“हमें यकीन नहीं था
कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी
आपको अपना वादा याद होगा…”
ये आँसू दर्द के नहीं थे,
ये आँसू भरोसे के थे।
ये आँसू उस सुकून के थे
जो बरसों बाद मिला था।
योगी आदित्यनाथ ने उस दिन
कोई भाषण नहीं दिया,
कोई राजनीति नहीं की।
उन्होंने सिर्फ़
अपना वादा निभाया।
और यही फर्क होता है
नेता होने में
और नेतृत्व होने में।
ऐसे हैं हमारे योगी जी —
जो पद से नहीं,
प्रतिज्ञा से पहचाने जाते हैं। 🚩🚩
"शरद राय की कलम से ✍🏻"
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