#🪔विघ्नेश्वर चतुर्थी🌺
शीतकाल की ठिठुरन और सुबह-सुबह छाया घना कोहरा—काशी की गलियों में जब धुंध धीरे-धीरे उतरती है, तब भी आस्था की लौ मंद नहीं पड़ती। कोहरे की चादर ओढ़े काशी विश्वनाथ धाम में इन दिनों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। ठंड के बावजूद देश-विदेश से आए भक्तों की लंबी कतारें इस बात की साक्षी हैं कि शिवनगरी काशी में भक्ति हर मौसम में अपनी पूरी गरिमा के साथ जीवित रहती है।
सुबह की आरती से पहले ही धाम परिसर में ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजने लगते हैं। कोहरे में लिपटी गंगा की लहरें, धाम की रोशनियों से झिलमिलाता आकाश और शिवलिंग पर अर्पित जल-धारा—यह दृश्य मन को अलौकिक शांति से भर देता है। श्रद्धालु ऊनी कपड़ों में लिपटे, हाथों में फूल-बेलपत्र लिए, धैर्य और श्रद्धा के साथ दर्शन की प्रतीक्षा करते दिखाई देते हैं। ठंड मानो भक्ति की तपिश के आगे हार मान लेती है।
काशी विश्वनाथ धाम का भव्य और सुव्यवस्थित परिसर शीतकालीन भीड़ को संभालने में सक्षम दिखता है। प्रशासन द्वारा दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा, स्वच्छता और गर्म पानी जैसी सुविधाओं की समुचित व्यवस्था की गई है, जिससे श्रद्धालुओं को कठिन मौसम में भी असुविधा न हो। स्वयंसेवक और सुरक्षाकर्मी लगातार मार्गदर्शन करते हुए भीड़ को सहज रूप से आगे बढ़ाते हैं।
शीतकाल में काशी का आध्यात्मिक सौंदर्य और गहरा हो जाता है। धुंध में लिपटी प्राचीन गलियां, मंदिरों की घंटियों की ध्वनि और मंत्रोच्चार—सब मिलकर समय को थाम सा लेते हैं। भक्तों का विश्वास है कि इस मौसम में किए गए दर्शन और पूजन विशेष फलदायी होते हैं। यही कारण है कि ठंड और कोहरे के बावजूद आस्था का प्रवाह थमता नहीं।
काशी विश्वनाथ धाम में उमड़ी यह भीड़ केवल संख्या नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास का प्रतीक है जो पीढ़ियों से शिवभक्तों के हृदय में बसता आया है। शीतकाल का कोहरा चाहे जितना घना हो, काशी में श्रद्धा की रोशनी सदैव उजास बिखेरती रहती है—और महादेव की नगरी में आस्था की यह यात्रा अनवरत चलती रहती है।