खबर बिना सच जाने छापी गई
शराफत की ज़मी झूठ से नापी गई।
अखबारों का कब ये उसूल हुआ
पैमाना-ए-खबर का फ़िज़ूल हुआ।
वक़्त-ए-ग़म दुश्मन भी रोता होगा
दाग़ी है काला सहाफ़त का चोग़ा।
नौजवान आज सड़क पे पड़े थे
तुम झूठ को सच कहने पे अड़े थे।
अपनों के खोने का दर्द जानोगे
जब बीतेगी खुद पर तो मानोगे।
कौन मुजरिम, किसकी साजिश है
ये बेगुनाहों पे इल्ज़ाम नवाज़िश है।
मुजरिम कौन, कैसा पता नहीं लगता
ग़लत को सही करें अच्छा नहीं लगता।
सुन लो, हम सह गए ज़ुल्म इतने
अब काम न आएंगे तेरे फ़ितने।
शहीद को तुम शहीद क्यों नहीं बताते
मंशा-ए-खुद को क्यों नहीं दिखाते।
हम हक़ पे रहे, बार-बार इंसाफ़ किया
पर न समझना दिल से माफ़ किया।
पुलिस ओ सहाफ़त का सत्य धर्म है
हक़ से पूरा करे जो उसका कर्म है।
अब नहीं चलेगी ये जालसाज़ी
ज़िंदाबाद गाज़ी, ज़िंदाबाद गाज़ी!
#❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #😇 चाणक्य नीति