#📲मेरा पहला पोस्ट😍 लफ़ड़ा ज़ोन
ग़ाज़ियाबाद की उस इमारत को देखो।
नौवीं मंज़िल से तीन बहनें—12, 14 और 16 साल—2 बजे रात कूद गईं।
ये किसी हॉरर फ़िल्म का ओपनिंग सीन लगता है, लेकिन ये हकीकत है।
क़ब्ज़ा किसी भूत का नहीं था।
क़ब्ज़ा था एक ऑनलाइन कोरियन टास्क-बेस्ड गेम का—जिसमें कथित तौर पर सेल्फ-हार्म तक के टास्क थे।
पुलिस को 8 पन्नों का सुसाइड नोट मिला।
लिखा था:
> “पापा, सॉरी। कोरिया हमारी ज़िंदगी है। कोरिया हमारा सबसे बड़ा प्यार है। हम इसे छोड़ नहीं सकते।”
कोविड के दौरान शुरुआत हुई।
पहले स्कूल छूटा, फिर स्कूल छूट गया।
तीनों साथ नहातीं, साथ खातीं—गेम के नियमों के नाम पर।
कोरियन नाम रख लिए। असली नाम से बुलाने पर गुस्सा।
ये ट्रेंड नहीं है।
ये रेड फ्लैग है।
ये “कंटेंट” नहीं है—ये खतरा है।
पेरेंट्स, सीख लो।
माइनर्स के हाथ में स्मार्टफोन कोई खिलौना नहीं।
देना पड़े तो निगरानी अनिवार्य है।
स्क्रीन टाइम, ऐप्स, चैट्स—सब पर नज़र।
वरना मोबाइल बच्चों को दुनिया से नहीं, ज़िंदगी से काट देता है।
आज चुप रहे, तो कल पछतावा भी देर से आएगा।