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Mukesh Sharma
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Mukesh Sharma
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मै नही जानता ये काव्य है या गद्य रचना??? किंतु... ये पढने के बाद एक "आह" और एक "वाह" जरुर निकलेगी... स्वर्ग में विचरण करते हुए अचानक एक दुसरे के सामने आ गए विचलित से कृष्ण- प्रसन्नचित सी राधा... कृष्ण सकपकाए, राधा मुस्काई इससे पहले कृष्ण कुछ कहते राधा बोल उठी- "कैसे हो द्वारकाधीश ??" जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया और बोले राधा से ... "मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ तुम तो द्वारकाधीश मत कहो! आओ बैठते है .... कुछ मै अपनी कहता हूँ कुछ तुम अपनी कहो सच कहूँ राधा जब जब भी तुम्हारी याद आती थी इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..." बोली राधा - "मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते इन आँखों में सदा तुम रहते थे कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ इसलिए रोते भी नहीं थे प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया इसका इक आइना दिखाऊं आपको ? कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ? कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ? एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया और दसों उँगलियों पर चलने वाळी बांसुरी को भूल गए ? कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो .... जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली क्या क्या रंग दिखाने लगी ? सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताऊँ ? कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी दुखी तो रह सकता है पर किसी को दुःख नहीं देता आप तो कई कलाओं के स्वामी हो स्वप्न दूर द्रष्टा हो गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो पर आपने क्या निर्णय किया अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी? और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ? सेना तो आपकी प्रजा थी राजा तो पालाक होता है उसका रक्षक होता है आप जैसा महा ज्ञानी उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन आपकी प्रजा को ही मार रहा था आपनी प्रजा को मरते देख आपमें करूणा नहीं जगी ? क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे आज भी धरती पर जाकर देखो अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को ढूंढते रह जाओगे हर घर हर मंदिर में मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे आज भी मै मानती हूँ लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं उनके महत्व की बात करते है मगर धरती के लोग युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i. प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है, पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है" #📒 मेरी डायरी #☝ मेरे विचार
Mukesh Sharma
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आर्यसमाज के संस्थापक और आधुनिक पुनर्जागरण के प्रणेता कहे जाने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जन्म 12 फरवरी 1824 ई. को गुजरात में फाल्गुन कृष्ण दशमी तिथि को हुआ था। हर साल इस तिथि को इनका जन्मदिन मनाया जाता है। मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण इनके माता पिता ने इनका नाम मूलशंकर रखा था। बचपन से ही शिवभक्त शंकर की धार्मिक भावना को उस समय चोट लगी जब शिवरात्रि की रात उन्होंने एक चूहे को भगवन शिव पर चढ़ा प्रसाद खाते हुए देखा। इसके बाद से इन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध शुरू कर दिया। वजह यह थी कि इनके मन ने कहा कि, ‘जो अपने लिए रखे प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकते वह हमारी रक्षा क्या करेंगे। ईश्वर इतने असहाय नहीं हो सकते।’ इन्होंने पुराणों पर आधारित धार्मिक कर्मकांडों का भी खंडन किया और वेदों की प्रमाणिकता को सिद्ध करने का प्रयास किया। इन्होंने स्वामी विरजानंद जी से वेदों और व्याकरण का ज्ञान प्राप्त किया और संन्यासी बन गए। संन्यास ग्रहण करने करने के बाद से यह स्वामी दयानंद सरस्वती कहलाने लगे। सन् 1875 ई. में इन्होंने चैत्र नवरात्र के दिन आर्य समाज की स्थापना की। इस संस्था के द्वार इन्होंने बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियों को दूर करने और विधवा विवाह एवं शिक्षा के प्रसार का कार्य किया। मूर्तिपूजा और कर्मकांड के विरोध के कारण इनके शत्रुओं ने कई बार इन्हें जान से मारने का भी प्रयास किया। ऐसी मान्यता है कि जोधपुर के महाराज जसवन्त सिंह के आमंत्रण पर जब यह राजस्थान आए तो इन्होंने देखा कि महाराज पर एक वेश्या का काफी प्रभाव है। स्वामी जी के समझाने पर महारज जसवन्त सिंह ने वेश्या से नाता तोड़ लिया। क्रोधित होकर वेश्या ने रसोई बनाने वाले से मिलकर स्वामी जी को दूध में जहर मिलाकर पिला दिया। इससे स्वामी दयानंद सरस्वती जी बीमार हो गए और 30 अक्टूबर 1883 को दिपावली के दिन परलोक सिधार गए। कहते हैं मृत्यु से पहले इनका अंतिम वाक्य था- “प्रभु! तूने अच्छी लीला की। आपकी इच्छा पूर्ण हो।” स्वामी दयानंद सरस्वती धर्म सुधारक ही नहीं समाज सुधारक और सच्चे राष्ट्रवादी भी थे। बालगंगाधर तिलक ने कहा है कि – स्वराज का मंत्र सबसे पहले स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही दिया था। सरदार पटेल का कहना था ‘भारत की स्वतंत्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने रखी थी।’ देश की आजादी के यह इतने बड़े समर्थक थे कि इन्होंने गर्वनर जनरल लॉर्ड नार्थब्रुक से साफ-साफ कह दिया था कि ‘मेरे देशवासियों को पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो।’ इनकी मन में हमेशा एक इच्छा रही कि, ‘कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे देश की एक भाषा हो।’ हिंदी को यह आमजनों की भाषा के रूप में देखते थे इसलिए धर्म सुधार और समाज सुधार के लिए इन्होंने हिंदी में ही प्रचार किया और अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश का प्रकाशन भी हिंदी में करवाया #💐स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती💐
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