#🙏🏻🌸आध्यात्मिक बाते😇 #🙏🏻 मेरे भगवान 🙏🏻 #🙏 नमो बुद्धाय 🙏 बहुत समय पहले की बात है, एक स्त्री थी जिसका नाम किसा गौतमी था। उसका एक ही पुत्र था जिससे वह प्राणों से भी बढ़कर प्रेम करती थी। दुर्भाग्यवश, एक दिन उसके पुत्र की मृत्यु हो गई।
पुत्र के वियोग में किसा गौतमी इतनी व्याकुल हो गई कि उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि उसका बच्चा मर चुका है। वह अपने मृत बालक को गोद में लेकर घर-घर भटकने लगी और लोगों से दवा मांगने लगी ताकि उसका बेटा फिर से जीवित हो जाए। लोग उसे देख कर दुखी होते और कहते, "पगली! तेरा बेटा मर चुका है, अब वह वापस नहीं आएगा।" लेकिन गौतमी हार मानने को तैयार नहीं थी।
अंत में, एक दयालु व्यक्ति ने उसे सुझाव दिया, "बेटी, तुम शाक्यमुनि गौतम बुद्ध के पास जाओ। उनके पास हर दुःख का निवारण है।"
किसा गौतमी आशा के साथ बुद्ध के पास पहुँची और उनके चरणों में गिरकर रोने लगी, "हे महात्मा! कृपया मेरे पुत्र को जीवित कर दें।"
बुद्ध ने उसकी करुणा भरी पुकार सुनी और बड़ी शांति से कहा, "मैं तुम्हारे पुत्र को जीवित कर सकता हूँ, लेकिन इसके लिए तुम्हें एक छोटी सी वस्तु लानी होगी।"
गौतमी ने उत्साह से पूछा, "क्या लाना होगा महाराज?"
बुद्ध ने कहा, "एक मुट्ठी सरसों के दाने।"
गौतमी तुरंत जाने को तैयार हुई, तभी बुद्ध ने एक शर्त जोड़ दी— "वह सरसों के दाने केवल उसी घर से लाना, जहाँ आज तक किसी की मृत्यु न हुई हो।"
किसा गौतमी हाथ में झोली लेकर गाँव के हर घर में गई। वह जिस भी दरवाजे पर जाती और सरसों मांगती, लोग उसे सहर्ष देने को तैयार हो जाते। लेकिन जैसे ही वह बुद्ध की शर्त पूछती, "क्या आपके घर में कभी किसी की मृत्यु हुई है?" उसे हर जगह निराशा ही हाथ लगती।
* किसी ने कहा, "मेरे पिता की मृत्यु पिछले साल हुई थी।"
* किसी ने कहा, "मैंने अपनी बेटी को खोया है।"
* किसी ने कहा, "इस घर में जीवित लोगों से ज्यादा तो मरने वालों की संख्या है।"
पूरा दिन भटकने के बाद, उसे एक भी ऐसा घर नहीं मिला जहाँ काल ने दस्तक न दी हो। शाम होते-होते किसा गौतमी थक कर सड़क के किनारे बैठ गई। उसने देखा कि रात के अंधेरे में नगर के दीप जल रहे हैं और फिर बुझ रहे हैं।
तभी उसे बोध हुआ कि मनुष्य का जीवन भी इन दीपकों की तरह ही है जो जलते हैं और एक दिन बुझ जाते हैं। उसे समझ आ गया कि मृत्यु एक अटल सत्य है और वह अपने व्यक्तिगत दुख में इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल गई कि यह पीड़ा पूरी दुनिया की है।
वह वापस बुद्ध के पास गई। इस बार उसके हाथ खाली थे, लेकिन उसका मन शांत था। उसने बुद्ध के चरणों में शीश झुकाया। बुद्ध ने पूछा, "क्या तुम्हें सरसों के दाने मिले?"
गौतमी ने कहा, "नहीं भगवन! मुझे समझ आ गया है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है। मोह ही दुःख का कारण है।"
जब हम इस सच को स्वीकार कर लेते हैं कि जो आया है उसे जाना ही होगा, तो हमारा मन अनावश्यक विलाप से मुक्त हो जाता है।
दुनिया में हर व्यक्ति किसी न किसी को खोने के दुःख से गुजरता है। यह बोध हमारे व्यक्तिगत दुःख को कम करता है।
अपनों से प्रेम करना स्वाभाविक है, लेकिन मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य से लड़ना केवल मानसिक अशांति देता है।
"जैसे पका हुआ फल गिरने के डर से मुक्त नहीं हो सकता, वैसे ही जन्म लेने वाला प्राणी मृत्यु के भय से मुक्त नहीं हो सकता।" — गौतम बुद्ध