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Davinder Singh Rana
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Davinder Singh Rana
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*श्रीहनुमान_चरित_४* *|| बाल्यकाल ||* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 माता अञ्जना अपने प्राणप्रिय पुत्र हनुमानजीका लालन-पालन बड़े ही मनोयोगपूर्वक करतीं। कपिराज केसरी भी उन्हें अतिशय प्यार करते। जब हनुमानजी प्रसन्नतापूर्वक किलकते तो अञ्जना और केसरी आनन्द-मग्न हो जाते। हनुमानकी बाल-क्रीड़ाएँ अत्यन्त आकर्षक और सुखद तो थीं ही, अद्भुत भी होती थीं। एक बारकी बात है। कपिराज केसरी कहीं बाहर गये थे। माता अञ्जना भी बालकको पालनेमें लिटाकर वनमें फल-फूल लेने चली गयीं। बालक हनुमानजीको भूख लगी। माताकी अनुपस्थितिमें वे हाथ-पैर उछाल-उछालकर क्रन्दन करने लगे। सहसा उनकी दृष्टि प्राचीके क्षितिजपर गयी। अरुणोदय हो रहा था। उन्होंने सूर्यके अरुण बिम्बको लाल फल समझा ।* तेज और पराक्रमके लिये अवस्था अपेक्षित नहीं। यहाँ तो हनुमानजीके रूपमें अञ्जनाके अङ्कमें प्रत्यक्ष प्रलयंकर शंकर ग्यारहवें रुद्र क्रीड़ा कर रहे थे। वायुदेवने पहले ही उन्हें उड़नेकी शक्ति प्रदान कर दी थी। हनुमानजी उछले और वायुवेगसे आकाशमें उड़ने लगे। पवनपुत्र तीव्र गतिसे उड़ते चले जा रहे थे। उन्हें इस प्रकार वेगपूर्वक उड़ते देखकर देव, दानव और यक्षादि विस्मित होकर कहने लगे— 'इस वायुपुत्रके वेगके तुल्य वेग तो स्वयं वायु, गरुड़ और मनमें भी नहीं है। इसी आयुमें शिशुका ऐसा वेग और पराक्रम है तो यौवनकालमें इसकी शक्ति कैसी होगी !' वायुदेवने अपने पुत्रको सूर्यकी ओर जाते देखा तो उनके मनमें चिन्ता हुई— 'मेरा यह बच्चा कहीं सूर्यकी प्रखर किरणोंसे झुलस न जाय ' — इस कारण वे बर्फके समान शीतल होकर उसके साथ चलने लगे। सूर्यदेवने भी अलौकिक बालकको अपनी ओर आते देखा तो उन्हें समझते देर न लगी कि ये पवन-पुत्र अपने पिताके वेगसे मेरी ओर आ रहे हैं और स्वयं पवनदेव भी उनकी रक्षा करनेके लिये साथ ही उड़ रहे हैं। सूर्यदेवने अपना सौभाग्य समझा— 'अहा ! स्वयं भगवान् चन्द्रमौलि ही हनुमानजीके रूपमें मुझे कृतार्थ करनेके लिये पधार रहे हैं !' अंशुमालीकी अग्निमयी किरणें शीतल हो गयीं। हनुमानजी सूर्यके रथपर पहुँचकर उनके साथ क्रीड़ा करने लगे। संयोगकी बात, उस दिन अमावस्या तिथि थी। सिंहिकापुत्र राहु सूर्यदेवको ग्रसनेके लिये आया तो भुवनभास्करके रथपर बैठे हुए उस बालकको देखा। राहु बालककी चिन्ता न कर दिनमणिको ग्रसनेके लिये आगे बढ़ा ही था कि हनुमानजीने उसे पकड़ लिया। उनकी वज्रमुष्टिमें दबकर राहु छटपटाने लगा। वह किसी प्रकार प्राण बचाकर भागा। वह सीधा सुरपति इन्द्रके समीप पहुँचा और उसने भौंहें टेढ़ी कर क्रोधके साथ कहा— 'सुरेश्वर ! मेरी क्षुधाका निवारण करनेके लिये आपने मुझे सूर्य और चन्द्रको साधनके रूपमें प्रदान किया था, किंतु अब आपने यह अधिकार दूसरेको किस कारण दे दिया ?' क्रुद्ध सिंहिकापुत्र राहुकी चकित करनेवाली वाणी सुनकर सुरेन्द्र उसका मुँह देखने लगे। उसने आगे कहा— 'आज पर्वके समय मैं सूर्यको ग्रसनेके लिये उनके समीप गया ही था कि वहाँ पहलेसे ही उपस्थित दूसरे राहुने मुझे कसकर पकड़ लिया। मैं किसी प्रकार अपनी जान बचाकर यहाँ आ पाया हूँ।' नेत्रोंमें आँसूभरे क्रुद्ध राहुकी वाणी सुनकर वासव चिन्तित हो उठे। वे अपने सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये और ऐरावतपर बैठकर घटना-स्थलकी ओर चले। राहु उनके आगे-आगे चला। शचीपति आश्चर्यचकित हो मन-ही-मन सोच रहे थे— 'तिमिरारिके समीप ऐसा कौन पराक्रमी पहुँच गया, जिसके भयसे सिंहिकापुत्रको प्राण बचाकर भागना पड़ा।' उधर राहु बड़े वेगसे सूर्यकी ओर दौड़ा। उसे देखते ही हनुमानजीको भूखकी स्मृति हुई। वे राहुको सुन्दर भक्ष्य समझकर उसपर टूट पड़े। सुरेश्वर ! बचाइये! बचाइये !!'— चिल्लाता हुआ राहु इन्द्रकी ओर भागा। सुरेन्द्र राहुकी रक्षाके लिये दौड़े। राहुके बच निकलनेपर हनुमानजीने ऐरावतको देखा तो उसे सुन्दर सुस्वादु खाद्य समझा। वे ऐरावतपर झपटे। उस समय हनुमानजीका स्वरूप प्रज्वलित अग्निकी भाँति प्रकाशित और भयानक प्रतीत हो रहा था। इन्द्र डर गये। अपनी रक्षाके लिये उन्होंने बालकपर वज्रसे प्रहार किया। वह हनुमानजीकी बायीं हनु ( ठुड्डी ) में लगा, जिससे उनकी हनु टूट गयी और वे छटपटाते हुए पर्वत-शिखरपर गिरकर मूच्छित हो गये। अपने प्राणप्रिय पुत्रको वज्रके आघातसे छटपटाते देख वायुदेव इन्द्रपर अत्यन्त कुपित हुए। शक्तिशाली वायुदेवने अपनी गति रोक दी और वे अपने पुत्रको अङ्कमें लेकर पर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हो गये। फिर तो त्रिभुवनके समस्त प्राणियोंमें श्वास आदिका संचार रुक गया। उनके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंके जोड़ टूटने लगे और वे सब-के-सब सूखे काठकी तरह अवसन्न हो गये। उनके सारे धर्म-कर्म रुक गये। प्राण-संकटसे भयभीत इन्द्र, देव, गन्धर्व, असुर, नाग, गुह्यक आदि जीवन-रक्षाके लिये ब्रह्माजीके पास दौड़े। ब्रह्माजी सबको साथ लेकर उस गिरि-गुहामें पहुँचे, जहाँ पवनदेव अपने पुत्रको अङ्कमें लेकर वक्षसे सटाये दुःखातिरेकसे आँसू बहा रहे थे। मूर्च्छित हनुमानजीकी सूर्य, अग्नि एवं सुवर्णके समान अङ्ग-कान्ति देखकर चतुर्मुख चकित हो गये। अपने सम्मुख स्रष्टाको देखते ही पवनदेव पुत्रको गोदमें लेकर खड़े हो गये। उस समय हनुमानजीके कानोंमें अलौकिक कुण्डल हिल रहे थे। उनके मस्तकपर मुकुट, गलेमें हार और दिव्य अङ्गोंपर सुवर्णके आभूषण सुशोभित थे। पवनदेवता विधाताके चरणोंपर गिर पड़े। चतुराननने अपने हाथोंसे अत्यन्त स्नेहपूर्वक पवनदेवको उठाया और उनके पुत्रके अङ्गोंपर अपना कर-कमल फेरने लगे। कमलयोनिके कर-स्पर्शसे पवन-पुत्र हनुमानजीकी मूर्च्छा दूर हो गयी। वे उठकर बैठ गये। अपने पुत्रको जीवित देखते ही जगत्‌के प्राणस्वरूप पवनदेव पूर्ववत् बहने लगे और त्रैलोक्यको जीवन-दान मिला। ब्रह्माने संतुष्ट होकर हनुमानजीको वर प्रदान करते हुए कहा— 'इस बालकको ब्रह्मशाप नहीं लगेगा और इसका कोई अङ्ग कभी भी शस्त्रास्त्रसे नहीं छिद सकेगा।' फिर उन्होंने सुर-समुदायसे कहा— 'देवताओ ! यह असाधारण बालक भविष्यमें आपलोगोंका बड़ा हित-साधन करेगा, अतएव आपलोग इसे वर प्रदान करें।' देवराज इन्द्रने तुरंत प्रसन्नतापूर्वक हनुमानजीके कण्ठमें अम्लान कमलोंकी माला पहनाकर कहा— "मेरे हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा इस बालककी हनु ( ठुड्डी ) टूट गयी थी, इसलिये इस कपिश्रेष्ठका नाम 'हनुमान' होगा† इसके अतिरिक्त इस बालकपर मेरे वज्रका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और इसका शरीर मेरे वज्रसे भी अधिक कठोर होगा।" वहाँ उपस्थित सूर्यदेवने कहा— 'मैं इसे अपने तेजका शतांश प्रदान करता हूँ, साथ ही समयपर इसे शिक्षा देकर शास्त्र मर्मज्ञ भी बना दूँगा। यह अद्वितीय विद्वान् और वक्ता होगा।' वरुणने कहा— 'मेरे पाश और जलसे यह बालक सदा सुरक्षित रहेगा।' यमदेव बोले— 'यह नीरोग और मेरे दण्डसे सदा अवध्य रहेगा।' पिङ्गलवर्णके यक्षराज कुबेरने कहा— 'युद्धमें इसे कभी विषाद नहीं होगा। मेरी गदासे यह सुरक्षित तो रहेगा ही, मेरे यक्ष-राक्षसोंसे भी कभी पराजित नहीं हो सकेगा।' भगवान् शंकरने वर प्रदान किया— 'यह मुझसे और मेरे आयुधोंसे सदा अवध्य रहेगा।' विश्वकर्मा बोले— 'यह बालक मेरे द्वारा निर्मित समस्त दिव्य अस्त्रों और शस्त्रोंसे सदा सुरक्षित रहकर चिरायु होगा।' इस प्रकार देवताओंके अमोघ वरदान दे लेनेपर कमलयोनि ब्रह्माने अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः कहा— 'यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकारके ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य होगा।' फिर प्रसन्न चतुराननने पवनदेवसे कहा— 'मारुत ! तुम्हारा यह पुत्र शत्रुओंके लिये भयंकर और मित्रोंके लिये अभय देनेवाला होगा। इसे युद्धमें कोई पराजित नहीं कर सकेगा। यह इच्छानुसार रूप धारणकर जहाँ चाहेगा, जा सकेगा। इसकी अव्याहत गति होगी। यह अत्यन्त यशस्वी होगा और अत्यन्त अद्भुत एवं रोमाञ्चकारी कार्य करेगा।' इस प्रकार वर प्रदान कर ब्रह्मादि देवगण तथा असुरादि अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थित हुए। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि यह घटना भी श्रीहनुमानजीके जन्मके समयकी है— अध्यात्मरामायण || जय_श्री_राम || ||राणा जी खेड़ांवाली|| #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🎶जय श्री राम🚩
Davinder Singh Rana
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*सत्संगके_प्रभावसे_पाँच_प्रेतोंके_उद्धारकी_कथा* ❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤ 'हारीतस्मृति' ने मानवमात्रके लिये कुछ सामान्य धर्मोका परिगणन किया है, जिनमें सत्संग भी है— संतोंकी संगतिसे लाभ-ही-लाभ होता है। संत तुलसीदासजीने कहा है कि एक क्षण भी सत्संग करनेसे जो सुख प्राप्त होता है, उसकी तुलनामें स्वर्ग और अपवर्गका सुख बिलकुल नगण्य है। यह तो हुआ सत्संगका आध्यात्मिक लाभ। आधिदैविक और आधिभौतिक लाभ भी इससे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। रत्नाकर डाकूका देवर्षि नारदसे जो थोड़ी देरका संग हुआ, उसका परिणाम बहुत ही चौंकानेवाला है। वह व्यक्ति वाल्मीकि रूप महर्षि और आदिकवि बन गया। इसी तरह पद्मपुराण ( सृष्टिखण्ड ) से पता चलता है कि एक संतके साथ केवल बातचीत करनेसे कुछ ही देरमें पाँच प्रेतोंको प्रेतत्वसे छुटकारा मिल गया और वे दिव्य विमानोंपर चढ़कर ऊँचे लोकोंमें चले गये। प्राचीन कालमें पृथु नामके एक आचारनिष्ठ ब्राह्मण थे। वे दिन-रात धर्मके ही कार्य किया करते थे। एक बार तीर्थयात्राके प्रसंगसे वे एक वनमें पहुँचे। वह वन वृक्ष और लतासे शून्य था। कहीं जल भी नहीं दिखायी देता। केवल काँटे-ही-काँटे वहाँ दिखायी पड़ते। सहसा ब्राह्मण देवताकी दृष्टि पाँच प्रेतोंपर पड़ गयी। वे देखनेमें बहुत ही भयंकर थे। देखते ही ब्राह्मण देवतामें भयका संचार हो गया, किंतु तुरंत ही उन्होंने धैर्य धारण कर लिया। उन्होंने पूछा— 'तुम लोग कौन हो? तुमसे ऐसे कौन-से कर्म हो गये हैं कि तुम्हारी आकृति इतनी विकृत हो गयी है ? इतने दुःखी एवं बेचैन क्यों हो?' प्रेतोंमेंसे एकने कहा— 'आपने ठीक ही समझा है, सचमुच हमलोग निरन्तर दुःख-ही-दुःखमें डूबे रहते हैं। एक क्षण भी चैन नहीं पाते। हमारा ज्ञान भी लुप्त हो गया है। हम इतना भी नहीं जानते कि कौन दिशा किस ओर है। केवल दुःख-ही-दुःखका ज्ञान होता रहता है।' ब्राह्मणने याद दिलाया कि 'क्या आपको पता है कि आपलोगोंको किस-किस कर्मसे इस दुर्गतिकी प्राप्ति हुई है?' उनमेंसे एकने कहा कि 'मैं ताजा और स्वादिष्ट भोजन स्वयं खा जाता था और ब्राह्मणोंको बासी खिलाता था, इस कारण मेरा नाम पर्युषित पड़ गया है। इस पापसे मैं प्रेत बन गया हूँ और मेरा भयानक रूप हो गया है। मेरे दूसरे साथीने कुछ भूखे और अन्न माँगनेवाले ब्राह्मणोंकी हत्या कर दी। इस पापसे यह सूचीमुख नामका प्रेत हो गया है। इसका मुँह सुईकी तरह छोटा है। एक तो भोजन-पानी मिलता ही नहीं, मिलनेपर भी सुई-जितने छोटे छेदसे कितना पानी पिया जा सकता है और कितना भोजन किया जा सकता है। यह हमेशा भूख और प्याससे तड़पता ही रहता है। यह तीसरा प्रेत 'भूखे ब्राह्मणको कुछ देना न पड़े' इस भयसे शीघ्रतापूर्वक वहाँसे हट जाता था, इसलिये इसका नाम शीघ्रग हो गया। इस प्रेतयोनिमें इसको लँगड़ा बनना पड़ा। यह जो चौथा प्रेत है, वह देनेके डरसे केवल घरमें बैठकर स्वादिष्ट भोजन किया करता था, यह रोधक कहलाता है। इस प्रेतयोनिमें इसे सिर नीचा करके चलना पड़ रहा है। यह जो पाँचवाँ प्रेत है, वह किसीके माँगनेपर कुछ बोलता नहीं था, केवल सिर नीचा करके धरती कुरेदने लगता था। इसलिये इसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग विकृत हो गये हैं और इसका नाम लेखक पड़ गया।' ब्राह्मणने पूछा— आखिर तुम लोग खाते-पीते क्या हो ? प्रेतोंने कहा कि 'हमको बहुत ही निन्दित भोजन करना पड़ता है। जिन घरोंमें पवित्रता नहीं होती, वहीं हमें विकृत पदार्थोंका भोजन प्राप्त होता है।' अन्तमें प्रेतोंने ब्राह्मणसे प्रार्थना की कि 'आप तपस्वी हैं, आप बतायें कि वह कौन-सा कर्म है, जिस कर्मसे जीव प्रेतयोनिमें नहीं पड़ता।' ब्राह्मणने कहा— 'जो मनुष्य एक या तीन कृच्छ्र-चान्द्रायण-व्रत करता है, वह कभी प्रेतयोनिमें नहीं जाता। जो मान-अपमानमें और शत्रु-मित्रमें समानभाव रखता है, वह भी प्रेतयोनिमें नहीं जाता। जिसने क्रोध, ईर्ष्या, तृष्णा तथा लोभ आदिको जीत लिया है, वह प्रेत नहीं होता। जिसके हृदयमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति दया भरी हुई है तथा जो गौ, ब्राह्मण, तीर्थ, पर्वत, नदी और देवताओंको प्रणाम करता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता।' पृथु जब इस प्रकार उपदेश दे रहे थे, उसी समय आकाशमें सहसा नगारे बजने लगे, आकाशसे पुष्प-वृष्टि होने लगी और चारों ओरसे उन पाँच प्रेतोंके लिये विमान आ गये। आकाशवाणी हुई— 'एक संतके साथ वार्तालाप करनेके कारण तुम सब प्रेतोंकी दिव्य गति हुई है।' इस प्रकार सत्संगके प्रभावसे उन प्रेतोंका उद्धार हो गया। ॐ_नमो_नारायणाय राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #श्री हरि
Davinder Singh Rana
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*श्रीकृष्ण_३२* *शिशुपाल_वध* 🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍 जब भगवान् श्रीकृष्ण भीमसेनद्वारा जरासन्धका वध करवाकर तथा उसके द्वारा बन्दी बनाये गये राजाओंको मुक्त करके इन्द्रप्रस्थ लौट आये तब महाराज युधिष्ठिरने राजसूय यज्ञका आयोजन किया। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णाकी अनुमतिसे वेदवादी ब्राह्मणोंका आचार्य आदिके रूपमें वरण किया। धर्मराज युधिष्ठिरने सभी प्रधान ऋषियोंके साथ द्रोणाचार्य, भीष्मपितामह, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधन तथा विदुर आदिको भी यज्ञमें आमन्त्रित किया। राजसूय यज्ञका दर्शन करनेके लिये देश-विदेशके सब राजा, उनके मन्त्री तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-सब-के-सब वहाँ आये। ब्राह्मणोंने सोनेके हलोंसे यज्ञभूमिको जुतवाकर राजा युधिष्ठिरको शास्त्रानुसार यज्ञकी दीक्षा दी। यज्ञके सब पात्र सोनेके बने हुए थे। विधिपूर्वक यज्ञकार्य प्रारम्भ हुआ। अब सभासद लोग इस विषयपर विचार करने लगे कि सदस्योंमें अग्रपूजा किसकी होनी चाहिये। जितनी मति थी उतने मत। इसलिये सर्वसम्मतिसे कोई निर्णय न हो सका। सहदेवने कहा— 'यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण ही अग्रपूजाके अधिकारी हैं। यह सारा विश्व ही श्रीकृष्णका रूप है। समस्त यज्ञ भी श्रीकृष्णस्वरूप ही हैं। ये अपने संकल्पसे ही जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। इसलिये सबसे महान् भगवान् श्रीकृष्णकी ही अग्रपूजा होनी चाहिये।' इतना कहकर सहदेव चुप हो गये। उस समय युधिष्ठिरकी यज्ञसभामें जितने सत्पुरुष थे, सबने एक स्वरसे 'बहुत ठीक' कहकर सहदेवकी बातका समर्थन किया। धर्मराज युधिष्ठिरने सभासदोंका अभिप्राय जानकर बड़े ही आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णके पाँव पखारे। उस समय देवताओंने आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा की। अपने आसनपर बैठा शिशुपाल यह सब देख रहा था। भगवान् श्रीकृष्णकी अग्रपूजा देखकर वह मन-ही-मन जल-भुन गया। उसने कहा— 'सभासदो! आपलोग अग्रपूजाके अधिकारी पात्रका चयन करनेमें सर्वथा असमर्थ रहे। बालक सहदेवके कहनेपर आपलोग कृष्णकी अग्रपूजा कर रहे हैं, जो कदापि उचित नहीं है। यहाँपर बड़े-बड़े तपस्वी, ज्ञानी, ब्रह्मनिष्ठ महात्मा बैठे हुए हैं, जिनकी पूजा लोकपाल भी करते हैं। उनको छोड़कर यह कुलकलङ्क ग्वाला भला अग्रपूजाका अधिकारी कैसे हो सकता है। यह लोकमर्यादाका उल्लङ्घन करके मनमाना आचरण करता है। इसमें कोई भी गुण नहीं है। फिर यह अग्रपूजाका पात्र कैसे हो सकता है।' इस प्रकार शिशुपालने भगवान् श्रीकृष्णको और भी बहुत-सी खरी-खोटी सुनायी। सभासदोंके लिये शिशुपालकी बात सुनना असह्य हो गया। उसे मार डालनेके लिये पाण्डव, मत्स्य, केकय और सूर्यवंशी राजा हाथमें हथियार लेकर खड़े हो गये। परन्तु भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें शान्त करते हुए कहा कि मैंने अपनी बुआको इसकी सौ गालियाँ क्षमा करनेका वचन दे रखा है। जैसे ही वे पूरी हो जायँगी, इसका अन्त निश्चित है। जब शिशुपाल सौसे अधिक गालियाँ बकने लगा, तब भगवान्‌ने सबके देखते-देखते अपने सुदर्शन चक्रसे उसका सिर काट डाला। उसके शरीरसे एक दिव्य ज्योति निकलकर श्रीकृष्णमें समा गयी। वह वैरभावसे ही सही, भगवान्‌का चिन्तन करनेके कारण मुक्त हो गया। जय श्री कृष्ण राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩
Davinder Singh Rana
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*भगवत गीता* *अध्याय 5* *कर्म संन्यास योग* *त्याग का योग* 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 इस अध्याय में श्री कृष्ण कर्म संन्यास योग (कर्मों के त्याग का मार्ग) और कर्म योग (भक्तिपूर्ण कर्म का मार्ग) की तुलना करते हैं। वे कहते हैं: हम दोनों में से कोई भी मार्ग चुन सकते हैं, क्योंकि दोनों एक ही मंजिल तक ले जाते हैं। हालांकि, वे स्पष्ट करते हैं कि कर्मों का त्याग करना अधिक चुनौतीपूर्ण है और इसे केवल वही लोग पूर्णतः कर सकते हैं जिनका मन शुद्ध हो। मन की शुद्धि केवल भक्तिपूर्ण कर्म से ही प्राप्त की जा सकती है। इसलिए, कर्म योग अधिकांश मनुष्यों के लिए अधिक उपयुक्त मार्ग है। शुद्ध बुद्धि वाले कर्म योगी अपने सांसारिक कर्तव्यों का निर्लज्जतापूर्वक निर्वाह करते हैं। वे अपने सभी कर्मों और उनके परिणामों को ईश्वर को समर्पित करते हैं। जिस प्रकार जल पर तैरता कमल का पत्ता नम नहीं होता, उसी प्रकार कर्म योगी भी पाप से अप्रभावित रहते हैं। वे जानते हैं कि आत्मा शरीर में निवास करती है, जो नौ द्वारों वाले नगर के समान है। इसलिए वे स्वयं को अपने कर्मों का कर्ता या भोक्ता नहीं मानते। समता की दृष्टि से परिपूर्ण, वे ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते का मांस खाने वाले को एक समान दृष्टि से देखते हैं। परम सत्य में विलीन होकर, ऐसे सच्चे ज्ञानी लोग ईश्वर के समान दोषरहित गुण विकसित करते हैं। अज्ञानी सांसारिक लोग यह नहीं समझते कि जिन सुखों को वे अपनी इंद्रियों से भोगने का प्रयास करते हैं, वे ही उनके दुखों का मूल कारण हैं। वहीं, कर्म योगी ऐसे सांसारिक सुखों से कोई आनंद नहीं पाते। इसके विपरीत, वे अपने भीतर निवास करने वाले ईश्वर के आनंद का अनुभव करते हैं। भगवान श्री कृष्ण कर्म संन्यास योग या त्याग के मार्ग का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि कर्म संन्यासी अनेक तपस्याओं द्वारा अपने मन, बुद्धि और इंद्रियों को वश में रखते हैं। बाह्य सुखों के सभी विचारों को त्यागकर वे भय, इच्छा और क्रोध से मुक्त हो जाते हैं। और अपनी सभी तपस्याओं में ईश्वर भक्ति को शामिल करके वे चिरस्थायी शांति प्राप्त करते हैं। हरि ॐ नमो नारायण राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
Davinder Singh Rana
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*श्रीमद्भागवत महापुराण* *प्रथम स्कंध - अध्याय तीन* *भगवान्‌के अवतारोंका वर्णन* 🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄 उन्हीं प्रभुने पहले कौमारसर्गमें सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार — इन चार ब्राह्मणोंके रूपमें अवतार ग्रहण करके अत्यन्त कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन किया ⁠।⁠।⁠ 6 ।⁠। दूसरी बार इस संसारके कल्याणके लिये समस्त यज्ञोंके स्वामी उन भगवान्‌ने ही रसातलमें गयी हुई पृथ्वीको निकाल लानेके विचारसे सूकररूप ग्रहण किया ⁠।⁠।⁠ 7 ।⁠। ऋषियोंकी सृष्टिमें उन्होंने देवर्षि नारदके रूपमें तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तन्त्रका (जिसे ‘नारद-पांचरात्र’ कहते हैं) उपदेश किया; उसमें कर्मोंके द्वारा किस प्रकार कर्मबन्धनसे मुक्ति मिलती है, इसका वर्णन है ⁠।⁠।⁠8⁠।⁠। धर्मपत्नी मूर्तिके गर्भसे उन्होंने नर-नारायणके रूपमें चौथा अवतार ग्रहण किया⁠। इस अवतारमें उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियोंका सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की ⁠।⁠।⁠ 9 ⁠।⁠। पाँचवें अवतारमें वे सिद्धोंके स्वामी कपिलके रूपमें प्रकट हुए और तत्त्वोंका निर्णय करनेवाले सांख्य-शास्त्रका, जो समयके फेरसे लुप्त हो गया था, आसुरि नामक ब्राह्मणको उपदेश किया ⁠।⁠।⁠ 10 ।⁠। अनसूयाके वर माँगनेपर छठे अवतारमें वे अत्रिकी सन्तान — दत्तात्रेय हुए⁠। इस अवतारमें उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लाद आदिको ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया ⁠।⁠। 11 ⁠।⁠। सातवीं बार रुचि प्रजापतिकी आकूति नामक पत्नीसे यज्ञके रूपमें उन्होंने अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र याम आदि देवताओंके साथ स्वायम्भुव मन्वन्तरकी रक्षा की ⁠।⁠।⁠ 12 ⁠।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩
Davinder Singh Rana
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*श्रीमद्भागवत महापुराण* *प्रथम स्कंध - अध्याय तीन* *भगवान्‌के अवतारोंका वर्णन* 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 राजा नाभिकी पत्नी मेरु देवीके गर्भसे ऋषभदेवके रूपमें भगवान्‌ने आठवाँ अवतार ग्रहण किया⁠। इस रूपमें उन्होंने परमहंसोंका वह मार्ग, जो सभी आश्रमियोंके लिये वन्दनीय है, दिखाया ⁠।⁠।⁠ 13 ⁠।⁠। ऋषियोंकी प्रार्थनासे नवीं बार वे राजा पृथुके रूपमें अवतीर्ण हुए⁠। शौनकादि ऋषियो! इस अवतारमें उन्होंने पृथ्वीसे समस्त ओषधियोंका दोहन किया था, इससे यह अवतार सबके लिये बड़ा ही कल्याणकारी हुआ ⁠।⁠।⁠ 14 ⁠।⁠। चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें जब सारी त्रिलोकी समुद्रमें डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्यके रूपमें दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौकापर बैठाकर अगले मन्वन्तरके अधिपति वैवस्वत मनुकी रक्षा की ⁠।⁠।⁠ 15 ⁠।⁠। जिस समय देवता और दैत्य समुद्र-मन्थन कर रहे थे, उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण करके कच्छपरूपसे भगवान्‌ने मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया ⁠।⁠।⁠ 16 ।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली🚩78 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
Davinder Singh Rana
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*‼️🚩 श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः 🚩‼️* *श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण सुंदरकाण्ड* *📖 ( अट्ठाईसवां- सर्ग) 📖* *✍️विलाप करती हुई सीताका प्राण-त्यागके लिये उद्यत होना* ======================= पतिके विरहके दुःखसे व्याकुल हुई सीता राक्षसराज रावणके उन अप्रिय वचनोंको याद करके उसी तरह भयभीत हो गयीं, जैसे वनमें सिंहके पंजेमें पड़ी हुई कोई गजराजकी बच्ची॥१॥ राक्षसियोंके बीचमें बैठकर उनके कठोर वचनोंसे बारम्बार धमकायी और रावणद्वारा फटकारी गयी भीरु स्वभाववाली सीता निर्जन एवं बीहड़ वनमें अकेली छूटी हुई अल्पवयस्का बालिकाके समान विलाप करने लगीं॥२॥ वे बोलीं—'संतजन लोकमें यह बात ठीक ही कहते हैं कि बिना समय आये किसीकी मृत्यु नहीं होती, तभी तो इस प्रकार धमकायी जानेपर भी मैं पुण्यहीना नारी क्षणभर भी जीवित रह पाती हूँ॥३॥ 'मेरा यह हृदय सुखसे रहित और अनेक प्रकारके दुःखोंसे भरा होनेपर भी निश्चय ही अत्यन्त दृढ़ है। इसीलिये वज्रके मारे हुए पर्वतशिखरकी भाँति आज इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते॥४॥ 'मैं इस दुष्ट रावणके हाथसे मारी जानेवाली हूँ। इसलिये यहाँ आत्मघात करनेसे भी मुझे कोई दोष नहीं लग सकता। कुछ भी हो, जैसे द्विज किसी शूद्रको वेदमन्त्रका उपदेश नहीं देता, उसी प्रकार मैं भी इस निशाचरको अपने हृदयका अनुराग नहीं दे सकती॥५॥ 'हाय! लोकनाथ भगवान् श्रीरामके आनेसे पहले ही यह दुष्ट राक्षसराज निश्चय ही अपने तीखे शस्त्रोंसे मेरे अंगोंके शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े कर डालेगा। ठीक वैसे ही, जैसे शल्यचिकित्सक किसी विशेष अवस्थामें गर्भस्थ शिशुके टूक-टूक कर देता है (अथवा जैसे इन्द्रने दितिके गर्भमें स्थित शिशुके उनचास टुकड़े कर डाले थे)॥६॥ 'मैं बड़ी दुःखिया हूँ। दुःखकी बात है कि मेरी अवधिके ये दो महीने भी जल्दी ही समाप्त हो जायँगे। राजाके कारागारमें कैद हुए और रात्रिके अन्तमें फाँसीकी सजा पानेवाले अपराधी चोरकी जो दशा होती है, वही मेरी भी है॥७॥ 'हा राम! हा लक्ष्मण! हा सुमित्रे! हा श्रीरामजननी कौसल्ये! और हा मेरी माताओ! जिस प्रकार बवंडरमें पड़ी हुई नौका महासागरमें डूब जाती है, उसी प्रकार आज मैं मन्दभागिनी सीता प्राणसङ्कटकी दशामें पड़ी हुई हूँ॥८॥ 'निश्चय ही उस मृगरूपधारी जीवने मेरे कारण उन दोनों वेगशाली राजकुमारोंको मार डाला होगा। जैसे दो श्रेष्ठ सिंह बिजलीसे मार दिये जायँ, वही दशा उन दोनों भाइयोंकी हुई होगी॥९॥ 'अवश्य ही उस समय कालने ही मृगका रूप धारण करके मुझ मन्दभागिनीको लुभाया था, जिससे प्रभावित हो मुझ मूढ़ नारीने उन दोनों आर्यपुत्रों—श्रीराम और लक्ष्मणको उसके पीछे भेज दिया था॥१०॥ 'हा सत्यव्रतधारी महाबाहु श्रीराम! हा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले रघुनन्दन! हा जीवजगत्‌के हितैषी और प्रियतम! आपको पता नहीं है कि मैं राक्षसोंके हाथसे मारी जानेवाली हूँ॥११॥ 'मेरी यह अनन्योपासना, क्षमा, भूमिशयन, धर्मसम्बन्धी नियमोंका पालन और पतिव्रतपरायणता—ये सब-के-सब कृतघ्नोंके प्रति किये गये मनुष्योंके उपकारकी भाँति निष्फल हो गये॥१२॥ 'प्रभो! यदि मैं अत्यन्त कृश और कान्तिहीन होकर आपसे बिछुड़ी ही रह गयी तथा आपसे मिलनेकी आशा खो बैठी, तब तो मैंने जिसका जीवनभर आचरण किया है, वह धर्म मेरे लिये व्यर्थ हो गया और यह एकपत्नीव्रत भी किसी काम नहीं आया॥१३ 'मैं तो समझती हूँ आप नियमानुसार पिताकी आज्ञाका पालन करके अपने व्रतको पूर्ण करनेके पश्चात् जब वनसे लौटेंगे, तब निर्भय एवं सफलमनोरथ हो विशाल नेत्रोंवाली बहुत-सी सुन्दरियोंके साथ विवाह करके उनके साथ रमण करेंगे॥१४॥ 'किंतु श्रीराम! मैं तो केवल आपमें ही अनुराग रखती हूँ। मेरा हृदय चिरकालतक आपसे ही बँधा रहेगा। मैं अपने विनाशके लिये ही आपसे प्रेम करती हूँ। अबतक मैंने तप और व्रत आदि जो कुछ भी किया है, वह मेरे लिये व्यर्थ सिद्ध हुआ है। उस अभीष्ट फलको न देनेवाले धर्मका आचरण करके अब मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा। अतः मुझ मन्दभागिनीको धिक्कार है॥१५॥ 'मैं शीघ्र ही किसी तीखे शस्त्र अथवा विष से अपने प्राण त्याग दूँगी; परंतु इस राक्षस के यहाँ मुझे कोई विष या शस्त्र देने वाला भी नहीं है'॥१६॥ शोकसे संतप्त हुई सीताने इसी प्रकार बहुत कुछ विचार करके अपनी चोटीको पकड़कर निश्चय किया कि मैं शीघ्र ही इस चोटीसे फाँसी लगाकर यमलोकमें पहुँच जाऊँगी॥१७॥ सीताजीके सभी अंग बड़े कोमल थे। वे उस अशोक-वृक्षके निकट उसकी शाखा पकड़कर खड़ी हो गयीं। इस प्रकार प्राण-त्यागके लिये उद्यत हो जब वे श्रीराम, लक्ष्मण और अपने कुलके विषयमें विचार करने लगीं, उस समय शुभांगी सीताके समक्ष ऐसे बहुत-से लोकप्रसिद्ध श्रेष्ठ शकुन प्रकट हुए, जो शोककी निवृत्ति करनेवाले और उन्हें ढाढ़स बँधानेवाले थे। उन शकुनोंका दर्शन और उनके शुभ फलोंका अनुभव उन्हें पहले भी हो चुका था॥१८-१९॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२८॥* *🚩राणा जी खेड़ांवाली🚩* *🚩 जय जय श्री सीताराम 🚩* 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🎶जय श्री राम🚩 #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🙏रामायण🕉
Davinder Singh Rana
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🚩~ *श्री गणेशाय नम:*~🚩 🚩~ *हर हर महादेव*~🚩 🚩 *~ सनातन पंचांग ~* 🚩 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🌺 *दिनांक - 04 फरवरी 2026* 🌺 *दिन - बुधवार* 🌺 *विक्रम संवत 2082* 🌺 *शक संवत -1947* 🌺 *अयन - उत्तरायण* 🌺 *ऋतु - शिशिर ॠतु* 🌺 *मास - फाल्गुन ( गुजरात-महाराष्ट्र -माघ )* 🌺 *पक्ष - कृष्ण* 🌺 *तिथि - तृतीया रात्रि 12:09 तक तत्पश्चात चतुर्थी* 🌺 *नक्षत्र - पूर्वाफाल्गुनी रात्रि 10:12 तक तत्पश्चात उत्तराफाल्गुनी* 🌺 *योग - अतिगण्ड 05 फरवरी रात्रि 01:05 तक तत्पश्चात सुकर्मा* 🌺 *राहुकाल - दोपहर 12:53 से दोपहर 02:17 तक* 🌺 *सूर्योदय - 07:16* 🌺 *सूर्यास्त - 06:29* 👉 *दिशाशूल - उत्तर दिशा मे* 🚩 *व्रत पर्व विवरण-* 💥 *विशेष - तृतीया को पर्वल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)* 🚩~*सनातन पंचांग* ~🚩 🚩~ *राणा जी खेड़ांवाली*~🚩 🌷 *विघ्नों और मुसीबते दूर करने के लिए* 🌷 👉 *05 फरवरी 2026 गुरुवार को संकष्ट चतुर्थी (चन्द्रोदय रात्रि 09:39)* 🙏🏻 *शिव पुराण में आता हैं कि हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी ( पूनम के बाद की ) के दिन सुबह में गणपतिजी का पूजन करें और रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें और ये मंत्र बोलें :* 🌷 *ॐ गं गणपते नमः ।* 🌷 *ॐ सोमाय नमः ।* 🚩 *~ सनातन पंचांग ~* 🚩 ‪🌷 *चतुर्थी‬ तिथि विशेष* 🌷 🙏🏻 *चतुर्थी तिथि के स्वामी ‪भगवान गणेश‬जी हैं।* 📆 *हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक मास में दो चतुर्थी होती हैं।* 🙏🏻 *पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी कहते हैं।अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।* 🙏🏻 *शिवपुराण के अनुसार “महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥* ➡ *“ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली और एक पक्षतक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।* 🚩 *~ सनातन पंचांग ~* 🚩 🌷 *कोई कष्ट हो तो* 🌷 🙏🏻 *हमारे जीवन में बहुत समस्याएँ आती रहती हैं, मिटती नहीं हैं ।, कभी कोई कष्ट, कभी कोई समस्या | ऐसे लोग शिवपुराण में बताया हुआ एक प्रयोग कर सकते हैं कि, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (मतलब पुर्णिमा के बाद की चतुर्थी ) आती है | उस दिन सुबह छः मंत्र बोलते हुये गणपतिजी को प्रणाम करें कि हमारे घर में ये बार-बार कष्ट और समस्याएं आ रही हैं वो नष्ट हों |* 👉🏻 *छः मंत्र इस प्रकार हैं –* 🌷 *ॐ सुमुखाय नम: : सुंदर मुख वाले; हमारे मुख पर भी सच्ची भक्ति प्रदान सुंदरता रहे ।* 🌷 *ॐ दुर्मुखाय नम: : मतलब भक्त को जब कोई आसुरी प्रवृत्ति वाला सताता है तो… भैरव देख दुष्ट घबराये ।* 🌷 *ॐ मोदाय नम: : मुदित रहने वाले, प्रसन्न रहने वाले । उनका सुमिरन करने वाले भी प्रसन्न हो जायें ।* 🌷 *ॐ प्रमोदाय नम: : प्रमोदाय; दूसरों को भी आनंदित करते हैं । भक्त भी प्रमोदी होता है और अभक्त प्रमादी होता है, आलसी । आलसी आदमी को लक्ष्मी छोड़ कर चली जाती है । और जो प्रमादी न हो, लक्ष्मी स्थायी होती है ।* 🌷 *ॐ अविघ्नाय नम:* 🌷 *ॐ विघ्नकरत्र्येय नम:* 📖 *राणा जी खेड़ांवाली🚩* 🚩 *~ सनातन पंचांग ~* 🚩 🙏🏻🌷🌸🌼💐☘🌹🌻🌺🙏🏻 #🕉️सनातन धर्म🚩 #श्री हरि #आज का राशिफल / पंचाग ☀
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