*श्रीहनुमान_चरित_३२*
*|| मातृ-चरणोंमें ||*
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दशग्रीवके प्रायः सभी प्रमुख योद्धा समाप्त हो गये। विवशतः दशानन स्वयं युद्ध-भूमिमें आया। वह अद्भुत धीर, वीर एवं प्रबल पराक्रमी था, किंतु उसे भी कपिपुंगव आञ्जनेयकी वीरताकी प्रशंसा करनी पड़ी। रावणने भयानक युद्ध किया, किंतु श्रीरघुनाथजीके सम्मुख उसकी एक न चली। वह अमित सौन्दर्य-राशि त्रैलोक्य-त्राताका दर्शन करता हुआ उन्हींके पावनतम तीक्ष्ण शरकी भेंट चढ़ गया। दशाननका निर्जीव शरीर भू-लुण्ठित होते ही श्रीराम और रावणके युद्धकी पूर्णाहुति हो गयी !
'जय श्रीराम !' आनन्दातिरेकसे वानर-भालू उछलने-कूदने और परस्पर आलिङ्गन करने लगे। आकाशमें देवगण प्रभुका स्तवन करते हुए उनपर स्वर्गीय सुमनोंकी वृष्टि करने लगे। आञ्जनेयके भी हर्षकी सीमा नहीं थी। उस समय उनके हर्षाश्रुसे भरे नेत्रोंके सम्मुख निखिल भुवनेश्वरी माता सीताके अरुण अमल चरण-कमल थे।
उस समय भगवान् श्रीरामने विभीषण, हनुमान, अङ्गद, सुग्रीव और जाम्बवान् आदि वीरोंसे उनकी प्रशंसा करते हुए कहा— 'आपलोगोंके बाहु-बलसे आज मैंने रावणको मार दिया। आप सब लोगोंकी पवित्र कीर्ति जबतक सूर्य और चन्द्र रहेंगे, तबतक स्थिर रहेगी और जो लोग मेरेसहित आप सबकी कलि-कल्मष-नाशिनी त्रिलोकपावनी पवित्र कथाका कीर्तन करेंगे, वे परमपदको प्राप्त होंगे।'*
*भवतां बाहुवीर्येण निहतो रावणी मया ॥
कीर्तिः स्थास्यति वः पुण्या यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।
कीर्तयिष्यन्ति भवतां कां त्रैलोक्यपावनीम् ॥
मयोपेतां कलिहरां यास्यन्ति परमां गतिम् ।
—अ० रा० ६|१२|२-४
उसी समय मृत रावणको देखकर मन्दोदरी आदि रावणकी पत्नियाँ पछाड़ खाकर गिर पड़ीं और विलाप करने लगीं। स्वयं विभीषण अपने भाईका शव देखकर शोकसे व्याकुल हो गये। यह देखकर सुमित्रानन्दनने उन्हें संसारकी नश्वरताका वर्णन करते हुए प्रेमपूर्वक समझाया। उनके सदुपदेशसे विभीषणके शोक और मोहका निवारण हो गया। वे लक्ष्मणजीके साथ प्रभुके समीप पहुँचे। प्रभुने विभीषणको दुःखसे व्याकुल होकर विलाप करती हुई मन्दोदरी आदि रानियोंको समझाने और बन्धु-बान्धवोंसहित यथाशीघ्र दशाननका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेकी आज्ञा दी। विभीषणने पिता-तुल्य बड़े भाई रावणका विधिपूर्वक अन्तिम संस्कार कर उसे जलाञ्जलि दी और फिर पृथ्वीपर सिर रखकर प्रणाम किया। इसके अनन्तर उन्होंने मन्दोदरी आदि रानियोंको समझा-बुझाकर राज-सदनमें भेज दिया और स्वयं प्रभुके समीप जाकर विनीतभावसे हाथ जोड़े खड़े हो गये।
भगवान् श्रीरामने विभीषणकी प्रथम भेंटमें ही उन्हें 'लंकाधीश' बना दिया था, किंतु अब प्रभुके आदेशानुसार लक्ष्मणजीने सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान और जाम्बवान् आदिके सहित लंकामें प्रवेश किया और वहाँ उन्होंने ब्राह्मणोंके द्वारा मन्त्रपाठपूर्वक समुद्रके जलसे भरे हुए सुवर्ण-कलशोंसे विभीषणका मङ्गलमय अभिषेक किया। विभीषण लंकाके अधीश्वर हुए, यह देखकर पवनपुत्रके हर्षकी सीमा न रही। सच तो यह है कि विभीषणको इस सुख-सौभाग्यकी प्राप्तिका मुख्य हेतु श्रीहनुमान-मिलन ही था। यह अहैतुक दयामय पवन-पुत्रकी दयामयी दृष्टिका ही सुफल था।
विभीषण लंकाके सम्भ्रान्त नागरिकोंके साथ विविध प्रकारके बहुमूल्य उपहार लेकर लक्ष्मणसहित प्रभुके चरणोंमें पहुँचे। उपहार प्रभुके सम्मुख रखकर उसने उन्हें सादर दण्डवत्-प्रणाम किया। उसको राज्य-पदपर अभिषिक्त देखकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त प्रसन्न थे।
प्रभुने देखा, उनके सम्मुख पर्वताकार हनुमानजी हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हैं। श्रीराघवेन्द्रने उनसे कहा— 'पवनकुमार ! तुम मिथिलेशकुमारीके स्नेह-भाजन हो। तुम महाराज विभीषणकी आज्ञा प्राप्त करके लंकामें प्रवेश करो और वहाँ सीताको रावण वधका समाचार सुना दो। साथ ही वानरराज सुग्रीव, युवराज अङ्गद, मैन्द, द्विविद, नल, नील, जाम्बवान्, विभीषण तथा अन्यान्य वीर वानर-भालुओंके साथ मेरा और लक्ष्मणका कुशल-समाचार बतला दो।'
'जय श्रीराम !' हनुमानजीने गर्जना की। हर्ष उनके हृदयमें समा नहीं रहा था। जगज्जननी जानकीजीको उन्होंने वचन दिया था और वह वचन रावण-वधके साथ पूरा हो गया, किंतु यह कुशल-समाचार ! यह विजय-संदेश !! प्रभुके विरह-वह्निमें जलनेवाली अनुपम सती पत्नी सीताको प्रभुका विजय-संदेश !!! इससे अधिक सुखकी वस्तु और क्या होगी ?
विभीषणके आदेशानुसार महावीर हनुमानजीके साथ प्रख्यात वीर असुर चल रहे थे। हनुमानजीका सर्वत्र उल्लासपूर्ण स्वागत एवं सादर अभिनन्दन हो रहा था, किंतु उन प्रभु-भक्तको तो मातृ-चरणोंके दर्शनकी, उन चरणोंमें दण्डकी भाँति लेट जानेकी उत्कट लालसा थी। हनुमानजी अशोकवाटिकामें पहुँचे।
माता सीता उसी अशोक तरुके नीचे राक्षसियोंसे घिरी बैठी थीं, जहाँ पहले पवनतनयने उनका दर्शन किया था। उग्रवेग हनुमानजी दौड़े और 'माता !' कहते हुए उनके चरणोंमें लेट गये। हनुमानको देखते ही माता सीताका मुख हर्षसे खिल उठा।
कुछ देर बाद हनुमानजी उठे और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। उन्होंने गद्गद कण्ठसे कहा— 'माता ! असुरराज रावण मारा गया। विभीषणने लंकाका राज्य-पद प्राप्त कर लिया और श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सुग्रीव तथा वानरसेनासहित सकुशल हैं।'
जीवन-सर्वस्व प्रभुका संदेश कितना सुखद था, इसे वियोगिनी माता जानकी ही जानती हैं। उनके आनन्दकी सीमा नहीं थी। हर्षातिरेकके कारण कुछ क्षण तो वे बोल भी नहीं सकीं। फिर उन्होंने कहा— 'वत्स हनुमान ! इस संदेशके सदृश त्रैलोक्यकी अन्य कोई वस्तु मुझे सुख नहीं दे सकती ! इस अवसरपर मैं तुम्हें क्या दूँ, मुझे नहीं सूझ रहा है। तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है, मैं तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकती।'
विनीतात्मा हनुमानजी माताके चरणोंमें गिर पड़े। उन्होंने कहा— 'माता ! मैं शत्रुके नष्ट होनेपर स्वस्थ-चित्तसे विराजमान विजयशाली श्रीरामका दर्शन करता हूँ— यह मेरे लिये नाना प्रकारकी रत्नराशि और देवराज्यसे भी बढ़कर है।* और पुत्र तो मातासे कभी उऋण हो ही नहीं पाता। मैं आपके साथ परमप्रभुके चरणोंकी छाँहमें पड़ा रहूँ, मुझे आपकी सेवाका सुअवसर प्राप्त होता रहे, बस, मेरी यही लालसा है। मेरी इतनी ही कामना है।'
* रत्नौघाद् विविधाद् वापि देवराज्याद् विशिष्यते ।
हतशत्रु विजयिनं रामं पश्यामि सुस्थिरम् ॥
—अ० रा०६|१२|६२
मारुतात्मजकी श्रद्धा-भक्तिपूर्ण विनीत वाणी सुनकर जनकनन्दिनीने प्रसन्न होकर कहा— 'वीरवर ! तुम्हारी वाणी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, माधुर्य-गुणसे भूषित तथा बुद्धिके आठ† अङ्गों ( गुणों ) से अलंकृत है। ऐसी वाणी केवल तुम्हीं बोल सकते हो। तुम वायुदेवताके प्रशंसनीय पुत्र तथा परम धर्मात्मा हो। शारीरिक बल, शूरता, शास्त्रज्ञान, मानसिक बल, पराक्रम, उत्तम दक्षता, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय तथा अन्य बहुत-से सुन्दर गुण केवल तुम्हींमें एक साथ विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है।‡
† शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा ।
ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ॥
❝सुननेकी इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, स्मरण रखना, ऊहा ( तर्क-वितर्क ), अपोह ( सिद्धान्तका निश्चय ), अर्थका ज्ञान होना तथा तत्त्वको समझना — ये आठ बुद्धिके गुण हैं।❞
‡ अतिलक्षणसम्पन्नं माधुर्यगुणभूषणम् ।
बुद्ध्या ह्यष्टाङ्गया युक्तं त्वमेवार्हसि भाषितुम् ॥
श्लाघनीयोऽनिलस्य त्वं सुतः परमधार्मिकः ।
बलं शौर्यं श्रुतं सत्त्वं विक्रमो दाक्ष्यमुत्तमम् ॥
तेजः क्षमा धृतिः स्थैर्यं विनीतत्वं न संशयः ।
एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभनाः ॥
—वा० रा० ६|११३|२६-२८
अनिलात्मजकी प्रशंसा करती हुई माता जानकीने उन्हें दुर्लभतम आशिष दे दी— 'हे पुत्र ! सुनो, समस्त सगुण तुम्हारे हृदयमें बसें और हे हनुमान ! लक्ष्मणजीके साथ कोसलपति प्रभु सदा तुमपर प्रसन्न रहें।'§
§ सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदय बसहु हनुमंत ।
सानुकूल कोसलपति रहहु समेत अनंत ॥
—मानस ६|१०७
निखिल भुवनेश्वरी जगदम्बासे शुभाशीर्वाद प्राप्तकर हनुमानजी पुनः मातृ-चरणोंमें गिर पड़े। कुछ क्षणोंके उपरान्त उन्होंने क्रूर दृष्टिवाली विकरालमुखी राक्षसियोंको देखकर निवेदन किया— 'माता ! इन विकराल, विकट आकारवाली, क्रूर और अत्यन्त दारुण राक्षसियोंने आपको बड़ी पीड़ा पहुँचायी है। इन्हें देखकर मेरा खून खौल रहा है। आप कृपापूर्वक आज्ञा प्रदान करें तो मैं इनके दाँत तोड़ दूँ, इनके नाक-कान काट लूँ और इनके बाल नोचकर मुक्कों और लातोंसे मार-मारकर इनका कचूमर निकाल दूँ।'
हनुमानजीकी कठोर वाणी सुनकर सीताजीको निरन्तर डराने-धमकानेवाली रावणकी दुष्ट दासियाँ अत्यन्त भयभीत होकर वैदेहीके मुखारविन्दकी ओर देखने लगीं। जनकदुलारीने कहा— 'ना, बेटा ! ये तो स्वयं रावणके अधीन थीं और उसके आदेशका पालन कर रही थीं। रावणकी मृत्युके बाद तो ये अत्यन्त विनयपूर्वक मुझे प्रत्येक रीतिसे संतुष्ट करनेका प्रयत्न कर रही हैं। मुझे तो अपने पूर्व-कर्मोंके कारण यह सारा दुःख निश्चितरूपसे भोगना ही था, इसलिये यदि इन राक्षसियोंका कुछ अपराध भी हो तो उसे मैं क्षमा करती हूँ। ये तो दयाकी पात्र हैं।'
'दयामयी जननी !' हनुमानजीने गद्गद कण्ठसे कहा— 'ऐसे वचन मेरे परमप्रभु श्रीरामकी सहधर्मिणी ही बोल सकती हैं!' फिर हनुमानजीने निवेदन किया— 'माँ ! अपनी ओरसे आप मुझे कोई संदेश दें। अब मैं अपने स्वामीके पास जाऊँगा।'
|| जय_श्री_राम ||
|| राणा जी खेड़ांवाली|| #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏रामायण🕉 #🌸जय सिया राम #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩