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Davinder Singh Rana
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Davinder Singh Rana
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*अपरा एकादशी तिथि महत्व एवं कथा* 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 अपरा एकादशी को अचला एकादशी भी कहा जाता है. मान्यतानुसार इस दिन व्रत करने पर अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और अपार धन की प्राप्ति होती है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु का व्रत करने और उनकी पूजा करने से सभी पापों का नाश हो जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है, इसके अलावा इसे जलक्रीड़ा, अचला और भद्रकाली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ माह में आने वाली कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि आज 12 मई 2026 को दोपहर 02 बजकर 52 मिनट से आरंभ हो रही है, जिसका समापन कल 13 मई को दोपहर 01 बजकर 29 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के हिसाब से अपरा एकादशी का व्रत कल 13 मई 2026, बुधवार को रखा जाएगा। *अपरा (अचला) एकादशी की महिमा* अपरा एकादशी का अर्थ होता है अपार पुण्य। पदम पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा उनके वामन रूप में करने का विधान है। यूं तो सभी एकादशियां बहुत पुण्य देने वाली मानी गई हैं लेकिन ऐसी मान्यता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से भगवान श्रीहरि विष्णु मनुष्य के जीवन से सभी कष्टों को दूर कर अपार पुण्य प्रदान करते हैं। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि यह एकादशी बहुत पुण्य प्रदान करने वाली और बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाली है। इस व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भूत योनि, दूसरे की निंदा, परस्त्रीगमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी बनना तथा झूठा वैद्य बनना आदि सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। 'अपरा' को उपवास करके एवं इस महत्व को पड़ने और सुनने से सहस्त्र यज्ञों का फल मिलता है। *पूजाविधि* पदमपुराण के अनुसार अपरा एकादशी को भगवान वामन या विष्णुजी की पूजा करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्री विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके व्रत का संकल्प लें। श्रीमन नारायण को पंचामृत, रोली, मोली, गोपी चन्दन, अक्षत, पीले पुष्प, तुलसी पत्र, ऋतुफल, मिष्ठान आदि अर्पित कर धूप-दीप से आरती उतारकर दीप दान करना चाहिए। इस बार रविवार को एकादशी होने के कारण तुलसी पत्र एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें। *एकादशी व्रत के नियम* इस दिन शुभ रंगों के स्वच्छ वस्त्र पहनें। मन में भगवान विष्णु की छवि का ध्यान करते हुए 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' का जप और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना विशेष रूप से इस दिन बहुत फलदायी है। इस दिन भक्तों को परनिंदा, छल-कपट, लालच, द्धेष की भावनाओं से दूर रहकर, श्रीनारायण को ध्यान में रखते हुए भक्तिभाव से उनका भजन करना चाहिए और कुछ न कुछ गौसेवा के निमित्त दान करना चाहिये गौ को भोजन कराना चाहिए..कलयुग में गौमाता की सेवा ही भगवत प्राप्ति का सबसे सुगम मार्ग है। इस दिन आप फलाहार करें। भूलकर भी तामसिक भोजन और चावल नहीं खाएं। इस दिन किसी का दिया हुआ अन्न आदि न खाएं। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें। *अपरा (अचला) एकादशी व्रत कथा* युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है सो कृपा कर कहिए? भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! यह एकादशी ‘अचला’ तथा’ अपरा दो नामों से जानी जाती है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं। इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भू‍त योनि, दूसरे की निंदा आदि के सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी बनना तथा झूठा वैद्य बनना आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं। जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए वे नरकगामी होते हैं, परंतु अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं। मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं। जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्णदान करने से फल प्राप्त होता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है। यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए ‍अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है। इसकी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा। एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया। दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया। हे राजन! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है। इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। एकादशी पर गौसेवा गौमाताओं को भोजन कराने से देवता प्रश्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं.. क्योंकि गौमाता में 33 कोटि देवताओं का निवास है वंही पितृलोक में पितृ प्रश्नन होते हैं और आशीर्वाद देते हैं जिसके फल स्वरूप घर मे धन-धान्य, सुख सम्पत्ति, शांति संपन्नता और वंश में वृद्धि पुत्रादि प्राप्ति होती है इसलिए एकादशी पर गौसेवा के निमित्त कुछ न कुछ दान अवश्य करें। राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🌸जय सिया राम #श्री हरि
Davinder Singh Rana
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*श्रीमद्भागवत महापुराण* *प्रथम स्कंध - अद्याय उन्नीस - परीक्षित्‌का अनशनव्रत और शुकदेवजीका आगमन* 🫒🫒🫒🫒🫒🫒🫒🫒🫒🫒🫒🫒 सभी उपस्थित महर्षियोंने परीक्षित्‌के निश्चय की प्रशंसा की और ‘साधु-साधु’ कहकर उनका अनुमोदन किया⁠। ऋषिलोग तो स्वभाव से ही लोगों पर अनुग्रह की वर्षा करते रहते हैं; यही नहीं, उनकी सारी शक्ति लोक पर कृपा करने के लिये ही होती है⁠। उन लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण के गुणों से प्रभावित परीक्षित्‌ के प्रति उनके अनुरूप वचन कहे ⁠।⁠।⁠ 19 ।⁠। ‘राजर्षिशिरोमणे! भगवान् श्रीकृष्ण के सेवक और अनुयायी आप पाण्डु वंशियों के लिये यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि आप लोगों ने भगवान्‌ की सन्निधि प्राप्त करने की आकांक्षा से उस राजसिंहासन का एक क्षण में ही परित्याग कर दिया, जिसकी सेवा बड़े-बड़े राजा अपने मुकुटों से करते थे ⁠।⁠।⁠ 20 ⁠।⁠। हम सब तब तक यहीं रहेंगे, जब तक ये भगवान्‌ के परम भक्त परीक्षित् अपने नश्वर शरीर को छोड़कर माया दोष एवं शोकसे रहित भगवद्धाम में नहीं चले जाते’ ⁠।⁠।⁠ 21 ⁠।⁠। ऋषियोंके ये वचन बड़े ही मधुर, गम्भीर, सत्य और समतासे युक्त थे⁠। उन्हें सुन कर राजा परीक्षित्‌ ने उन योग युक्त मुनियों का अभिनन्दन किया और भगवान्‌ के मनोहर चरित्र सुनने की इच्छा से ऋषियों से प्रार्थना की ⁠।⁠।⁠ 22 ⁠।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली 🚩 026 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
Davinder Singh Rana
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*श्रीमद्भागवत महापुराण* *प्रथम स्कंध - अद्याय उन्नीस - परीक्षित्‌का अनशनव्रत और शुकदेवजीका आगमन* 🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦 ब्राह्मणो! अब मैंने अपने चित्तको भगवान्‌ के चरणों में समर्पित कर दिया है⁠। आप लोग और माँ गंगाजी शरणागत जानकर मुझपर अनुग्रह करें, ब्राह्मण कुमार के शाप से प्रेरित कोई दूसरा कपट से तक्षक का रूप धरकर मुझे डस ले अथवा स्वयं तक्षक आकर डस ले; इसकी मुझे तनिक भी परवा नहीं है⁠। आप लोग कृपा करके भगवान्‌ की रसमयी लीलाओं का गायन करें ⁠।⁠।⁠ 15 ⁠।⁠। मैं आप ब्राह्मणों के चरणों में प्रणाम करके पुनः यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे कर्मवश चाहे जिस योनि में जन्म लेना पड़े, भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में मेरा अनुराग हो, उनके चरणाश्रित महात्माओं से विशेष प्रीति हो और जगत्‌ के समस्त प्राणियों के प्रति मेरी एक-सी मैत्री रहे⁠। ऐसा आप आशीर्वाद दीजिये ⁠।⁠।⁠ 16 ⁠।⁠। महाराज परीक्षित् परम धीर थे⁠। वे ऐसा दृढ़ निश्चय करके गंगाजी के दक्षिण तटपर पूर्वाग्र कुशोंके आसन पर उत्तर मुख होकर बैठ गये⁠। राज-काज का भार तो उन्होंने पहले ही अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया था ⁠।⁠।⁠ 17 ⁠।⁠। पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट् परीक्षित् जब इस प्रकार आमरण अनशन का निश्चय करके बैठ गये, तब आकाश में स्थित देवता लोग बड़े आनन्द से उनकी प्रशंसा करते हुए वहाँ पृथ्वी पर पुष्पों की वर्षा करने लगे तथा उनके नगारे बार-बार बजने लगे ⁠।⁠।⁠ 18 ⁠।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली 🚩 025 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
Davinder Singh Rana
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18 hours ago
*आनन्दरामायणम्* *श्रीसीतापतये नमः* *श्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटीकितम्)* *(विलासकाण्डम्)अष्टम सर्गः* 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 *(राम के द्वारा देवांगनाओं को वरदान)...(दिन 232)* 🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹 तव सीता और भी तमककर कहने लगी कि तुम्हारी यह प्रतिज्ञा वाली बात कहाँ गयि ? वह व्रत कहाँ गया? आज ही मैं सरयू के जल में डूब कर अपना जीवन समाप्त कर दूंगी ॥ ६४ ॥ मैं ऐसी 'शय्या पर अब नहीं सोना चाहती, जिसपर कि एक वेश्या की पीठ लग चुकी है। तुम्हारे जैसे वेश्या सक्त राजा की जो दशा होनी होगी, सो होगी। लेकिन यह समझ रखियेगा कि वेश्या सक्त राजा का राज्य ज्यादा दिन नहीं ठहरता ।।६५१।६६।। इतना कहकर सीता ने राम को प्रणाम किया और अपना देह त्याग करने के लिए पटगृह से बाहर होकर सरयू के तीर की ओर चलीं ।। ६७ ।। सीता को जाती देखकर राम भी पीछे से दौड़ पड़े और जल के पास पहुंचने से पहले ही उन्हें रेती में पकड़ लिया ।। ६८ ।। तब वे मीठी-मोठी बातों में कहने लगे हे विदेहजे ! मेरे ऊपर इतना नाराज मत होओ। मेरी बात सुनी-यदि मेरी बातपर विश्वास न हो तो मै शपथ खाने को भी तैयार हूँ ॥ ६६ ॥ ७० ॥ हे सीते ! बोलो, क्या कहती हो? हे भामिनि । इस तरह क्यों कोप करती हो ? इस प्रकार राम की बात सुनकर सीता ने कहा- मैं तुम्हें कुछ कहती तो हूँ नहीं। फिर तुम कसम किसलिए खाने को तैयार हो ? क्यों दिव्य परीक्षा कराना चाहते हो ? फिर यदि मैं दिव्य परीक्षा लेना भी चाहूँ, तो कैसे लें। अग्नि तुम्हारे मुख से निकलि है, सूर्य-चन्द्रमा तुम्हारे दोनों नेत्र हैं, समुद्र तुम्हारा निवास स्थान है, पृथ्वी को तुमने अपने ऊपर रख छोड़ा है, शेष तुम्हारी शय्या है, सो वे भी लक्ष्मण के रूप में बाहर बैठे हुए है ।। ७१-७३ ।। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि समस्त शास्त्र तुम्हारे नख से जायमान हुए हैं, मैं जिधर देखती हूँ, जो कुछ भी देखती हूँ, सब तुम्हारा ही रूप है ॥ ७४ ॥ मै कोई भी दुर्घट दिव्य (कसम) नहीं देखती, जिससे मेरे मन में विश्वास हो ।। ७५ ।। बहुत कुछ सोच-विचारकर मैने तो यही निश्चय किया है और आप भी यही करें। अभी अपने गुरु (वसिष्ठ) को बुलाकर यदि आप उनके पैरों की शपथ खा लें तो मुझे विश्वास हो जायगा। है रघूत्तम । ऐसा करने से मेरे हृदय में किसी प्रकार का संशय नहीं रह सकेगा। अतएव आप यही करें ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ इस प्रकार सीता का कथन सुनकर राम ने तुरन्त दासी द्वारा लक्ष्मण को बुलवाया और वसिष्ठजी के पास भेजा ॥ ७८ ॥ पालकी पर चढ़कर लक्ष्मण राजद्वार पर पहुंचे। वहाँ पहरेदारों से फाटक खुलवाकर तुरन्त गुरु वसिष्ठ के दरवाजे पर जा पहुंचे। द्वारपाल ने दासी द्वारा लक्ष्मण के आने का सन्देश वसिष्ठ-के पास भेजवाया ॥ ७९ ॥ ८० ॥ आधी रात के समय लक्ष्मण को द्वार पर आना सुनकर वसिष्ठ तथा अरुन्धती दोनों घबराहट से विह्वल हो गये ॥ ८१ ॥ क्रमशः... जय सिया राम जी राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🌸जय सिया राम #🙏रामायण🕉
Davinder Singh Rana
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*मिट्टी के बर्तनों में खाना खाने और बनाने के लाभ* 🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵 भोजन धीरे-धीरे पकना लाभकारी माना जाता है आयुर्वेद के अनुसार, भोजन को धीमी आंच पर पकाने से उसका स्वाद और पोषण बेहतर बना रह सकता है। मिट्टी के बर्तनों में खाना धीरे पकता है, जिससे भोजन अधिक संतुलित और सुपाच्य बन सकता है। *सस्ते और आसानी से उपलब्ध* मिट्टी के बर्तन अन्य धातुओं की तुलना में किफायती होते हैं और विभिन्न आकारों में आसानी से मिल जाते हैं। इन्हें स्थानीय बाजार या ऑनलाइन माध्यम से खरीदा जा सकता है। स्वाद में प्राकृतिक सुधार मिट्टी के बर्तनों में पकाया गया भोजन हल्की प्राकृतिक सुगंध के साथ आता है, जिससे खाने का स्वाद अलग और पारंपरिक अनुभव देता है। विविध आकार और उपयोग मिट्टी के बर्तन विभिन्न आकार और डिजाइन में उपलब्ध होते हैं। कुल्हड़ में चाय पीना या मटकी का पानी उपयोग करना पारंपरिक और आकर्षक अनुभव देता है। प्राकृतिक तत्वों का संतुलन मिट्टी के बर्तनों में भोजन पकाने से उसमें कुछ प्राकृतिक खनिज तत्व मिल सकते हैं, जो संतुलित आहार का हिस्सा हो सकते हैं। विभिन्न धातुओं के बर्तनों के उपयोग के अपने-अपने लाभ और सीमाएं होती हैं। *धीमी आंच पर पकाने के लिए उपयुक्त* मिट्टी के बर्तन धीमी आंच पर उपयोग के लिए बेहतर होते हैं। अधिक तापमान पर इन्हें नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए सावधानी के साथ उपयोग करना चाहिए। *दूध और दुग्ध उत्पादों के लिए उपयोगी* मिट्टी के बर्तनों में दही जमाना या दूध रखना पारंपरिक रूप से प्रचलित है, जिससे स्वाद और बनावट में बदलाव महसूस हो सकता है। राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🌿आयुर्वेद #💁🏻‍♀️घरेलू नुस्खे #🕉️सनातन धर्म🚩
Davinder Singh Rana
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18 hours ago
*श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उत्पत्ति दुर्गा देवी जी से हुई, और दुर्गा माता सिंदूर भी लगाती हैं, तो इन का पति कौन है?* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 ♥️आसानी से इस बात को समझने के लिए मैं भगवान विष्णु के अवतारों की ओर ले चलता हु | भगवान विष्णु त्रिगुणातीत है | अर्थात वो महाप्रलय के बाद भी रहेंगे और हर कल्प में रहेंगे | फिर भी यशोदा,सुमित्रा कैकयी कौशल्या और यहाँ तक पूतना भी उनकी माता है | क्युकी जब वो जिसके गर्भ से जन्म लेते है तब वही उनकी माता हो जाती है |♥️ ❣️माता के जो भी अवतार है वो कभी किसी के गर्भ से नहीं है | चाहे सीता हो, या राधा, रुक्मणि या वैष्णवी हो | क्युकी वो स्वयं अजन्मा है |❣️ ♓अब रही बात उनके पति होने की - तो जब भी वो अपने तीनों रूपों में से किसी से भी अवतरित होती है तो उनका वर भी उनके मूल रूप के पतियों में से ही होता है | उदाहरण से मई ये बात समझाता हु:♓ 🚩१. जब वो कालिका हैं तो शिव उनके पति है | 🚩२.जब लक्ष्मी है तो विष्णु उनके पति है | 🚩३. जब ब्राह्मणी है तो ब्रह्मा उनके पति है | 🚩४. इसी प्रकार जब उन्होंने कौशिकी रूप लिया तो पारवती जी के रूप से जन्मी इस लिए शिव को ही पति माना | 🚩५. जब छिन्नमस्तका और भुवनेश्वरी सहित १० महाविद्याओं के रूप लिए है तो इन रूपों का आधार देवी पारवती है । इस कारन इनके पति भगवन शिव है| 🛐माता की अधिकतर कथाएं जो की पौराणिक है हम तक पहुंची है वो महर्षि मार्कण्डेय जी के द्वारा रचित है | मार्कण्डेय जी शिव जी के भक्त थे इस लिए माता पारवती से जन्मे माता के रूपों का अधिक वर्णन उन्होंने किया है | जिस माँ दुर्गा के रूपों का वर्णन मार्कण्डेय जी करते है जिसमे वो सिंह पे सवार है और हाथों में कई शस्त्र लिए है शायद ये रुप महिषासुर मर्दनी का है जिसका आदि स्रोत भगवन शिव का क्रोध है (श्री दुर्गा सप्तशती के अनुसार) या वो देवी कात्यायनी है जिन्हे स्वयं माता पार्वति का अवतार बताया गया है |🛐 ☘️अतः इस रूप में जब वो सिंदूर लगाती है तो यहाँ वो शिव की ही शिवा हैं | परन्तु वही जब वो पद्मावती के रूप मे हैं तो वो विष्णु भगवन की वैष्णवी है |☘️ 🏵️परन्तु यदि आप आदि शक्ति के रूप के बारे में पूछ रहे हो जिस रूप में उन्होंने स्वयं भगवन को उत्पन्न किया । मैंने श्री दुर्गा सप्तशती में उस रूप का कोई विस्तार वर्णन नहीं सुना है जिसमे उनके सिंदूर की बात हो | मेरे हिसाब से माता का मूल रूप निराकार ही है और पूरी दुर्गा सप्तशती में माता के हर अवतार की कथा के अंत में किसी न किसी रूप में मेधा ऋषि ने उनके अंतरध्यान होने की बात कर के यही बताया है की वो निराकार प्रकृति की है |🏵️ 🙏!! जय माता दी !!🙏 🌹माता के मंदिर चले छोड़े जग के काज। उन चरनन में मिले जीवन के परवाज।। !! जय माता दी!! !! राणा जी खेड़ांवाली !! #🕉️सनातन धर्म🚩 #जय माता की
Davinder Singh Rana
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*पुरुषोत्तम मास की उत्पत्ति कथा* *जय हो बॉके बिहारी लाल की जय हो* 🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦 पुरुषोत्तम मास की उत्पत्ति कथा – हर वैष्णव को यह पढना ही चाहिये*** प्रत्येक राशि, नक्षत्र, करण व चैत्रादि बारह मासों के सभी के स्वामी है, परन्तु मलमास का कोई स्वामी नही है. इसलिए देव कार्य, शुभ कार्य एवं पितृ कार्य इस मास में वर्जित माने गये है. इससे दुखी होकर स्वयं मलमास(अधिक मास) बहुत नाराज व उदास रहता था, इसी कारण सभी ओर उसकी निंदा होने लगी. मलमास को सभी ने असहाय, निन्दक, अपूज्य तथा संक्रांति से वर्जितकहकर लज्जित किया. अत: लोक-भत्र्सना से चिन्तातुर होकर अपार दु:ख समुद्र में मग्न हो गया. वह कान्तिहीन, दु:खों से युक्त, निंदा से दु:खी होकर मल मास भगवान विष्णु के पास वैकुण्ठ लोक में पहुंचा. और मलमास बोला – हे नाथ, हे कृपानिधे! मेरा नाम मलमास है. मैं सभी से तिरस्कृत होकर यहां आया हूं. सभी ने मुझे शुभ-कर्म वर्जित, अनाथ और सदैव घृणा-दृष्टि से देखा है. संसार में सभी क्षण, लव, मुहूर्त, पक्ष, मास, अहोरात्र आदि अपने-अपने अधिपतियों के अधिकारों से सदैव निर्भय रहकर आनन्द मनाया करते हैं. मैं ऐसा अभागा हूं जिसका न कोई नाम है,न स्वामी, न धर्म तथा न ही कोई आश्रम है. इसलिए हे स्वामी, मैं अब मरना चाहता हूं.’ ऐसा कहकर वह शान्त हो गया. तब भगवान विष्णु मलमास को लेकर गोलोक धाम गए. वहां भगवान श्रीकृष्ण मोरपंख का मुकुट व वैजयंती माला धारण कर स्वर्णजडि़त आसन पर बैठेथे. गोपियों से घिरे हुए थे.भगवान विष्णु ने मलमास को श्रीकृष्ण के चरणों में नतमस्तक करवाया व कहा – कि यह मलमास वेद-शास्त्र के अनुसार पुण्य कर्मों के लिए अयोग्य माना गया है इसीलिए सभी इसकी निंदा करते हैं. तब श्रीकृष्ण ने कहा – हे हरि! आप इसका हाथ पकड़कर यहां लाए हो. जिसे आपने स्वीकार किया उसे मैंने भी स्वीकार कर लिया है. इसे मैं अपने हीसमान करूंगा तथा गुण, कीर्ति, ऐश्वर्य, पराक्रम, भक्तों को वरदान आदि मेरे समान सभी गुण इसमें होंगे. मेरे अन्दर जितने भी सदॄगुण है, उन सभी को मैंमलमास में तुम्हे सौंप रहा हूँ मैं इसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ देता हूं और यह इसी नाम से विख्यात होगा.यह मेरे समान ही सभी मासों का स्वामी होगा. कि अब से कोई भी मलमास की निंदा नहीं करेगा. मैं इस मास का स्वामी बन गया हूं. जिस परमधाम गोलोक को पाने के लिए ऋषि तपस्या करते हैं वहीदुर्लभ पद पुरुषोत्तम मास में स्नान, पूजन, अनुष्ठान व दान करने वाले को सरलता से प्राप्त हो जाएंगे.इस प्रकार मल मास पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध हुआ.यह मेरे समान ही सभी मासों का स्वामी होगा. अब यह जगत को पूज्य व नमस्कार करने योग्य होगा.यह इसे पूजने वालों के दु:ख-दरिद्रता का नाश करेगा. यह मेरे समान ही मनुष्यों को मोक्ष प्रदान करेगा. जो कोई इच्छा रहित या इच्छा वाला इसे पूजेगा वह अपने किए कर्मों को भस्म करके नि:संशय मुझ कोप्राप्त होगा.सब साधनों में श्रेष्ठ तथा सब काम व अर्थ का देने वाला यह पुरुषोत्तम मास स्वाध्याय योग्य होगा. इस मास में किया गया पुण्य कोटि गुणा होगा.जो भी मनुष्य मेरे प्रिय मलमास का तिरस्कार करेंगेऔर जो धर्म का आचरण नहीं करेंगे, वे सदैव नरक के गामी होंगे. अत: इस मास में स्नान, दान, पूजा आदि का विशेष महत्व होगा.इसलिए हे रमापते! आप पुरुषोत्तम मास को लेकर बैकुण्ठ को जाओ.’इस प्रकार बैकुण्ठ में स्थित होकर वह अत्यन्त आनन्द करने लगा तथा भगवान के साथ विभिन्न क्रीड़ाओं में मग्न हो गया. इस प्रकार श्रीकृष्ण ने मन से प्रसन्न होकर मलमास को बारह मासों में श्रेष्ठ बना दिया तथा वह सभी का पूजनीय बन गया. राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🌸जय सिया राम #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #श्री हरि
Davinder Singh Rana
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19 hours ago
*श्रीहरिः* *जय श्रीकृष्ण मीरा चरित, विस्तार से (भाग 51)* 🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏🥏 (सामन्तों - सरदारोंकी खीज) वैद्यराज जीवित हो गये हुकम !' – विजयवर्गीय दीवानने महाराणा विक्रमादित्यसे निवेदन किया । ‘हैं! क्या?'–महाराणा चौंक पड़े । फिर सँभलकर बोले – 'वह तो मरा ही न था। यों ही मरनेका बहाना किये पड़ा था डरके मारे । मुझे क्रोध आ गया था, इसीसे कह दिया कि हटाओ मेरी आँखोंके सामनेसे। भूल अपनी ही थी कि अच्छी तरह देखकर भेजना चाहिये था । यह वैद्य बड़ा हरामखोर है । उसने विष बनाया ही नहीं था । विष होता तो भाभी म्हाँरा देवलोक पधारतीं, विष होता तो वह स्वयं न मरता ?' 'बदनामी तो हो रही है अन्नदाता !' ‘होने दो। मेरा कोई क्या कर सकता है ? ऐसे जीवित कर देनेवाली होती तो उस मिथुला गोली (दासीका तिरस्कारपूर्ण संबोधन) को क्यों न जीवित कर दिया ?" 'यह चारों ओर क्या बातें सुनायी दे रही हैं हुकम !' – सलुम्बर रावतजीके साथ चार-पाँच उमरावोंने आकर पूछा । ‘कैसी बातें ?’—महाराणाने पूछा । 'सुना है कि सरकारने मेड़तणीजीसाको जहर दिलवाया ।' 'झूठी बातका क्या उत्तर हो सकता है ? किसने कहा आपसे? यदि मैंने जहर दिलवाया तो मरी क्यों नहीं? किसने उनकी दवा - दारू की ? जहर किसने पिलाया और भाभी म्हाँरा उसे क्यों और कैसे पी गयीं ?' 'किसने पिलाया, किसने दवा - दारू की, इन बातोंसे क्या लेना-देना है ? बात तो यह है कि आपने सचमुच उन्हें विष दिलाया या नहीं? यदि दिलवाया तो क्यों ? ऐसा कौन-सा अनर्थ उन्होंने कर दिया था ? वे लाज - पर्दा नहीं करतीं, सो मान लिया, पर उनको कहीं व्यर्थ आते-जाते नहीं सुना और न देखा। वे केवल मन्दिर पधारती हैं, सो भी रथमें पर्देके भीतर बैठकर । पर्दा न करनेवाली बात आज की तो है नहीं । बड़े हजूर भी यह सब जानते थे । जानकर ही उन्होंने यह विवाह कराया। मंदिरको छोड़कर कभी बड़े-बूढ़े सरदार या गुरुजनोंके सामने वे पधार गयी हों, ऐसा कभी भी नहीं सुना। मंदिरमें कोई ज्ञान सुनने चला गया हो और वहाँ उन्होंने घूँघट नहीं किया हो तो भले । इसमें भी उनकी नहीं, जानेवालेकी भूल है। अपने महलोंमें ही जब हमें ज्ञात होता है कि कोई बहू आयी हुई है तो हम स्वयं उस ओर नहीं जाते। उन्हें कहीं आना-जाना होता है तो हम पीठ फेर लेते हैं। मर्यादा दोनों ओरसे रखी जाती है हुकम ! उसकी रक्षा एक तरफा नहीं हो सकती 'नयी बात तो यह है कि सारंगपुरका नवाब आया। उसने मंदिरमें बैठकर भाभी म्हाँरासे बातें की और हीरोंका एक हार बख्श गया है।' महाराणाने जहरीले स्वरमें कहा – 'तुम्हारी पगड़ियोंमें धूल भर दी है उन्होंने। मैं कभी-कभी बरज देता हूँ कि आप महलमें रहकर भजन करें तो उन्हें बुरा लगता है। अब नया समाचार उड़ा दिया है कि मैंने उन्हें विष दिया । कोई बालक भी समझ सकता कि राजी-खुशी कोई जहर नहीं पीता और उनसे जोरावरी करने मैं कब गया था । किसीको भेजा हो तब भी सोचकर देखिये कि भाभी म्हाँराको हाथ लगा सके, ऐसा तो केवल भाई उदयसिंह ही है । वह भी इस समय केवल बारह - तेरह वर्षका बालक है। समाचार सुनते ही आप सब दौड़े हुए आये हैं मुझसे उत्तर उगाहने । " 'पगड़ियोंमें यदि भक्ति करनेसे धूल घुसती हो तो उसी दिन घुस गयी। जिस दिन महाराजकुमारका विवाह हुआ और मेड़तणीजीसाका यहाँ पधारना हुआ यह तो आपके शासनकी ढिलाई है कि शत्रु हमारे घरमें आकर निकल गया और आपको-हमको ज्ञात ही न हो सका ! क्या करता है आपका गुप्तचर विभाग ? पड़े पड़े टुकड़े खाते हैं और मौज करते हैं। वह आया, उसी समय उसे क्यों नहीं बंदी कर लिया गया? सांँप चला गया और हम लकीरें पीटे जा रहे हैं। सार क्या है इसमें ? 'किंतु वह आया तो भाभी म्हाँरासे सलाह करने! ये क्यों नहीं महलमें विराजनेकी कृपा करके कुलकान रखतीं ?'- महाराणाने कहा। 'अन्नदाता ! बात यह नहीं है कि वह क्यों आया? बात यह है कि वह अपने घरमें घुसकर निकल गया और हम देखते रह गये, कुछ न कर पाये। कौन जानता है कि वह क्यों आया? राह–बाट और युद्धके लिये सुपास देखने आया होगा। खाली भजन सुननेके लिये कोई इतनी बड़ी जोखिम नहीं उठाता सरकार ! शत्रु हमारी मूँछका केश उखाड़ ले गया और हम दाँतोंपर चिढ़ रहे हैं।' — सादड़ी राजराणा बोले । 'सीमाकी चौकियाँ ढीली हो गयी हैं। उधरसे मालवाका सुलतान और इधर गुजरात दोनों ओरसे प्रजा दो पाटोंके बीचमें पिस रही है। उसकी हाय-पुकार सुननेवाला कोई नहीं है।' 'तो फिर आप सब किस मांदगीकी औखद हैं ?' राणाजी अपने स्वभावपर उतर आये – 'केवल जागीरीका उपभोग करते हुए महलोंमें सुख- नींद लिरावौ ।' 'जागीरकी क्या बात फरमायी हुकम !' सलुम्बर रावतजी भभक पड़े — 'हम ब्राह्मण अथवा चारण—भाट हैं कि दानमें बख्श दी सरकारने ? जागीर हमें माथेके मोल मिली है। जिस दिन रणभेरी बजे, कड़खोंकी तान उठे और मातृभूमिकी लाज ललकारे, उस समय यदि हरावलमें दिखायी न दें, रणाङ्गणमें पड़े हमारे शवकी छातीपर घाव दिखायी न दें, तब उस दिन यह बात फरमाइयेगा। हमें जागीर नहीं, सम्मान प्यारा है। बार-बार अपमान पीकर यहाँ बैठे हैं सो पूर्वजोंके नामपर गाली न लगे और राजपूती आनपर दाग न लग जाय इसलिये । जागीरके लोभसे नहीं पड़े हैं हुकम ! यदि आप ऐसा ही समझते हैं तो यह लीजिये राजकी जागीर । राजपूतके बेटेकी जागीर उसकी तलवार है। उसके बलसे वह जहाँ खड़ा होगा, जागीर बसा लेगा।' वे कमरसे तलवार खोलने लगे कि राजपुरोहितने बढ़कर उनका हाथ थाम लिया —'यह क्या कर रहे हैं आप? धैर्य रखें । बड़े हुजूरके गुण याद करनेकी कृपा करें। मातृभूमिको किसके भरोसे छोड़ रहे हैं? कल मेवाड़को शत्रु खोदेंगे— रौदेंगे तो हजार कोस दूर बैठे होनेपर भी आपकी थालीका जीमण जहर हो जायगा । श्रीजी अभी बालक हैं। आप जिस कार्यके लिये पधारे हैं, उसकी चर्चा करावें ।' राजपुरोहितजीकी बातसे वे सावधान हुए। बाठेड़ा रावजीने कहा—'सरकार और मेवाड़के लिये हमारे सिर सदा प्रस्तुत हैं हुकम। किंतु हम मनमानी तो नहीं कर सकते। हुक्म पालनमें कभी भूल न होगी। हम केवल यह निवेदन करने आये हूँ कि हुजूरने मेड़तणीजीसाको विष दिलवाया तो क्यों ? हम लोगोंको क्या उत्तर दें? किस आधारपर उनकी बात काटें? राजाका धन प्रजा है हुकम! प्रजाका विश्वास उठनेपर राज्यका टिकना कठिन होता है।' 'मैं तो कहता हूँ कि विष दिया ही नहीं गया। विष दिया होता तो म्हाँरा देवलोक पधारतीं कि नहीं?' 'ठीक है । वैद्यजी कैसे मर गये ?" 'मरे होते तो चितापर न पौढ़ गये होते? वह तो किसी कारण मैंने क्रोधमें आकर डाँटा तो भयके मारे अचेत हो गये। घरके लोग उठाकर भाभी म्हाँराके पास ले गये। वे भजन गा रही थीं। भजन पूरा हुआ, तब तक उनकी चेतना लौट आयी। बाहर बात फैला दी कि मैंने वैद्यजीको मार डाला था और उन्होंने जीवित कर दिया। मैंने तो किसीको जहर नहीं दिया। यदि इतनेपर भी सभी कहते हैं तो कहने दो। जहर दिया तो दिया मेरी भौजाईको। इसमें दूसरोंका क्या गया ? यह मेरे घरकी बात है। औरोंको दखल देनेका क्या हक है ?" 'यह बात भूल जायें सरकार!' सलुम्बर रावतजी फिर बिफर उठे — ‘राजाके प्रत्येक कार्यका प्रभाव पूरे राज्य और प्रजापर पड़ता है। आप तो यहाँ महलोंमें बिराजते हैं। हमें सुनना भारी पड़ता है। हमारा स्वामी तो बल और गुणोंमें हमसे दुगुना होना चाहिये। अयोग्योंके लिये यह आसन नहीं है।" 'क्या कहा ?' – महाराणाने तलवार खींच ली। पुरोहितजी दोनोंके बीचमें खड़े हो गये और सरदारोंको धैर्य रखनेके लिये निवेदन किया, किंतु बाबाजी बोलते ही चले गये –'अपने मुँहसे कहना हमें अच्छा नहीं लगता, किन्तु यह स्मरण रखें सरकार ! कि एकलिंगके दीवान उन्हींके समान भरखिवे (धैर्य, क्षमा, बल और बुद्धिमान) होने चाहिये। ये हजारों-हजार पहलवान पाल रखे हैं। इन पाड़ोंको पालनेके बदले प्रजाको पाला होता तो राजके पाँव मजबूत होते। इन भाँडोंके स्वाँग और भगतण्यों (वेश्याओं) के नाचसे, अफीम और भाँगकी मनुहारोंसे राज्य नहीं चला करते। राजगद्दी या सिंहासन सुखकी सेज नहीं, काँटोंका मुकुट है। समझ गये हुजूर? बहुत दिन हो गये सहते हुए। छाती पक गयी है और कलेजे छालों से भर गए हैं। यदि मेड़तणीजीसा का रोम भी टेढ़ा हुआ तो फिर देखिएगा।' कहकर वे लौटने के लिए मुड़े। 'नहीं तो क्या करोगे तुम ?' – क्रोधसे भन्नाकर महाराणा उठ खड़े हुए। उनकी बात सुनते ही फिरकी-सी लेकर रावजी मुड़े– 'किसी भरोसेमें या अन्देशेमें न रहिये अन्नदाता !' वे क्रोधपूर्वक हँसकर बोले— 'राजा धरती फोड़कर नहीं प्रकट होते ।' रावतजीने प्रथम बार आँखें उठाकर महाराणाकी ओर देखा और दोनों हथेलियोंसे अपनी भुजाएँ ठोंकी — 'राजाको ये.... ये भुजाएँ बनाती हैं, यह याद रखियेगा ।' वे मुड़कर चले दिये। उनके साथ आये हुए अन्य सामंत भी चले गये । 'मेड़तणी! हाँ, यह मेड़तणी ही सारे अनर्थकी मूल है ।' – राणाजीने मन-ही-मन कहकर अपने दाँत पीस लिये जय श्री राधे.... राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸जय सिया राम #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #श्री हरि
Davinder Singh Rana
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19 hours ago
*श्रीहनुमान_चरित_३२* *|| मातृ-चरणोंमें ||* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 दशग्रीवके प्रायः सभी प्रमुख योद्धा समाप्त हो गये। विवशतः दशानन स्वयं युद्ध-भूमिमें आया। वह अद्भुत धीर, वीर एवं प्रबल पराक्रमी था, किंतु उसे भी कपिपुंगव आञ्जनेयकी वीरताकी प्रशंसा करनी पड़ी। रावणने भयानक युद्ध किया, किंतु श्रीरघुनाथजीके सम्मुख उसकी एक न चली। वह अमित सौन्दर्य-राशि त्रैलोक्य-त्राताका दर्शन करता हुआ उन्हींके पावनतम तीक्ष्ण शरकी भेंट चढ़ गया। दशाननका निर्जीव शरीर भू-लुण्ठित होते ही श्रीराम और रावणके युद्धकी पूर्णाहुति हो गयी ! 'जय श्रीराम !' आनन्दातिरेकसे वानर-भालू उछलने-कूदने और परस्पर आलिङ्गन करने लगे। आकाशमें देवगण प्रभुका स्तवन करते हुए उनपर स्वर्गीय सुमनोंकी वृष्टि करने लगे। आञ्जनेयके भी हर्षकी सीमा नहीं थी। उस समय उनके हर्षाश्रुसे भरे नेत्रोंके सम्मुख निखिल भुवनेश्वरी माता सीताके अरुण अमल चरण-कमल थे। उस समय भगवान् श्रीरामने विभीषण, हनुमान, अङ्गद, सुग्रीव और जाम्बवान् आदि वीरोंसे उनकी प्रशंसा करते हुए कहा— 'आपलोगोंके बाहु-बलसे आज मैंने रावणको मार दिया। आप सब लोगोंकी पवित्र कीर्ति जबतक सूर्य और चन्द्र रहेंगे, तबतक स्थिर रहेगी और जो लोग मेरेसहित आप सबकी कलि-कल्मष-नाशिनी त्रिलोकपावनी पवित्र कथाका कीर्तन करेंगे, वे परमपदको प्राप्त होंगे।'* *भवतां बाहुवीर्येण निहतो रावणी मया ॥ कीर्तिः स्थास्यति वः पुण्या यावच्चन्द्रदिवाकरौ । कीर्तयिष्यन्ति भवतां कां त्रैलोक्यपावनीम् ॥ मयोपेतां कलिहरां यास्यन्ति परमां गतिम् । —अ० रा० ६|१२|२-४ उसी समय मृत रावणको देखकर मन्दोदरी आदि रावणकी पत्नियाँ पछाड़ खाकर गिर पड़ीं और विलाप करने लगीं। स्वयं विभीषण अपने भाईका शव देखकर शोकसे व्याकुल हो गये। यह देखकर सुमित्रानन्दनने उन्हें संसारकी नश्वरताका वर्णन करते हुए प्रेमपूर्वक समझाया। उनके सदुपदेशसे विभीषणके शोक और मोहका निवारण हो गया। वे लक्ष्मणजीके साथ प्रभुके समीप पहुँचे। प्रभुने विभीषणको दुःखसे व्याकुल होकर विलाप करती हुई मन्दोदरी आदि रानियोंको समझाने और बन्धु-बान्धवोंसहित यथाशीघ्र दशाननका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेकी आज्ञा दी। विभीषणने पिता-तुल्य बड़े भाई रावणका विधिपूर्वक अन्तिम संस्कार कर उसे जलाञ्जलि दी और फिर पृथ्वीपर सिर रखकर प्रणाम किया। इसके अनन्तर उन्होंने मन्दोदरी आदि रानियोंको समझा-बुझाकर राज-सदनमें भेज दिया और स्वयं प्रभुके समीप जाकर विनीतभावसे हाथ जोड़े खड़े हो गये। भगवान् श्रीरामने विभीषणकी प्रथम भेंटमें ही उन्हें 'लंकाधीश' बना दिया था, किंतु अब प्रभुके आदेशानुसार लक्ष्मणजीने सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान और जाम्बवान् आदिके सहित लंकामें प्रवेश किया और वहाँ उन्होंने ब्राह्मणोंके द्वारा मन्त्रपाठपूर्वक समुद्रके जलसे भरे हुए सुवर्ण-कलशोंसे विभीषणका मङ्गलमय अभिषेक किया। विभीषण लंकाके अधीश्वर हुए, यह देखकर पवनपुत्रके हर्षकी सीमा न रही। सच तो यह है कि विभीषणको इस सुख-सौभाग्यकी प्राप्तिका मुख्य हेतु श्रीहनुमान-मिलन ही था। यह अहैतुक दयामय पवन-पुत्रकी दयामयी दृष्टिका ही सुफल था। विभीषण लंकाके सम्भ्रान्त नागरिकोंके साथ विविध प्रकारके बहुमूल्य उपहार लेकर लक्ष्मणसहित प्रभुके चरणोंमें पहुँचे। उपहार प्रभुके सम्मुख रखकर उसने उन्हें सादर दण्डवत्-प्रणाम किया। उसको राज्य-पदपर अभिषिक्त देखकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त प्रसन्न थे। प्रभुने देखा, उनके सम्मुख पर्वताकार हनुमानजी हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हैं। श्रीराघवेन्द्रने उनसे कहा— 'पवनकुमार ! तुम मिथिलेशकुमारीके स्नेह-भाजन हो। तुम महाराज विभीषणकी आज्ञा प्राप्त करके लंकामें प्रवेश करो और वहाँ सीताको रावण वधका समाचार सुना दो। साथ ही वानरराज सुग्रीव, युवराज अङ्गद, मैन्द, द्विविद, नल, नील, जाम्बवान्, विभीषण तथा अन्यान्य वीर वानर-भालुओंके साथ मेरा और लक्ष्मणका कुशल-समाचार बतला दो।' 'जय श्रीराम !' हनुमानजीने गर्जना की। हर्ष उनके हृदयमें समा नहीं रहा था। जगज्जननी जानकीजीको उन्होंने वचन दिया था और वह वचन रावण-वधके साथ पूरा हो गया, किंतु यह कुशल-समाचार ! यह विजय-संदेश !! प्रभुके विरह-वह्निमें जलनेवाली अनुपम सती पत्नी सीताको प्रभुका विजय-संदेश !!! इससे अधिक सुखकी वस्तु और क्या होगी ? विभीषणके आदेशानुसार महावीर हनुमानजीके साथ प्रख्यात वीर असुर चल रहे थे। हनुमानजीका सर्वत्र उल्लासपूर्ण स्वागत एवं सादर अभिनन्दन हो रहा था, किंतु उन प्रभु-भक्तको तो मातृ-चरणोंके दर्शनकी, उन चरणोंमें दण्डकी भाँति लेट जानेकी उत्कट लालसा थी। हनुमानजी अशोकवाटिकामें पहुँचे। माता सीता उसी अशोक तरुके नीचे राक्षसियोंसे घिरी बैठी थीं, जहाँ पहले पवनतनयने उनका दर्शन किया था। उग्रवेग हनुमानजी दौड़े और 'माता !' कहते हुए उनके चरणोंमें लेट गये। हनुमानको देखते ही माता सीताका मुख हर्षसे खिल उठा। कुछ देर बाद हनुमानजी उठे और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। उन्होंने गद्गद कण्ठसे कहा— 'माता ! असुरराज रावण मारा गया। विभीषणने लंकाका राज्य-पद प्राप्त कर लिया और श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सुग्रीव तथा वानरसेनासहित सकुशल हैं।' जीवन-सर्वस्व प्रभुका संदेश कितना सुखद था, इसे वियोगिनी माता जानकी ही जानती हैं। उनके आनन्दकी सीमा नहीं थी। हर्षातिरेकके कारण कुछ क्षण तो वे बोल भी नहीं सकीं। फिर उन्होंने कहा— 'वत्स हनुमान ! इस संदेशके सदृश त्रैलोक्यकी अन्य कोई वस्तु मुझे सुख नहीं दे सकती ! इस अवसरपर मैं तुम्हें क्या दूँ, मुझे नहीं सूझ रहा है। तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है, मैं तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकती।' विनीतात्मा हनुमानजी माताके चरणोंमें गिर पड़े। उन्होंने कहा— 'माता ! मैं शत्रुके नष्ट होनेपर स्वस्थ-चित्तसे विराजमान विजयशाली श्रीरामका दर्शन करता हूँ— यह मेरे लिये नाना प्रकारकी रत्नराशि और देवराज्यसे भी बढ़कर है।* और पुत्र तो मातासे कभी उऋण हो ही नहीं पाता। मैं आपके साथ परमप्रभुके चरणोंकी छाँहमें पड़ा रहूँ, मुझे आपकी सेवाका सुअवसर प्राप्त होता रहे, बस, मेरी यही लालसा है। मेरी इतनी ही कामना है।' * रत्नौघाद् विविधाद् वापि देवराज्याद् विशिष्यते । हतशत्रु विजयिनं रामं पश्यामि सुस्थिरम् ॥ —अ० रा०६|१२|६२ मारुतात्मजकी श्रद्धा-भक्तिपूर्ण विनीत वाणी सुनकर जनकनन्दिनीने प्रसन्न होकर कहा— 'वीरवर ! तुम्हारी वाणी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, माधुर्य-गुणसे भूषित तथा बुद्धिके आठ† अङ्गों ( गुणों ) से अलंकृत है। ऐसी वाणी केवल तुम्हीं बोल सकते हो। तुम वायुदेवताके प्रशंसनीय पुत्र तथा परम धर्मात्मा हो। शारीरिक बल, शूरता, शास्त्रज्ञान, मानसिक बल, पराक्रम, उत्तम दक्षता, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय तथा अन्य बहुत-से सुन्दर गुण केवल तुम्हींमें एक साथ विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है।‡ † शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा । ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ॥ ❝सुननेकी इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, स्मरण रखना, ऊहा ( तर्क-वितर्क ), अपोह ( सिद्धान्तका निश्चय ), अर्थका ज्ञान होना तथा तत्त्वको समझना — ये आठ बुद्धिके गुण हैं।❞ ‡ अतिलक्षणसम्पन्नं माधुर्यगुणभूषणम् । बुद्ध्या ह्यष्टाङ्गया युक्तं त्वमेवार्हसि भाषितुम् ॥ श्लाघनीयोऽनिलस्य त्वं सुतः परमधार्मिकः । बलं शौर्यं श्रुतं सत्त्वं विक्रमो दाक्ष्यमुत्तमम् ॥ तेजः क्षमा धृतिः स्थैर्यं विनीतत्वं न संशयः । एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभनाः ॥ —वा० रा० ६|११३|२६-२८ अनिलात्मजकी प्रशंसा करती हुई माता जानकीने उन्हें दुर्लभतम आशिष दे दी— 'हे पुत्र ! सुनो, समस्त सगुण तुम्हारे हृदयमें बसें और हे हनुमान ! लक्ष्मणजीके साथ कोसलपति प्रभु सदा तुमपर प्रसन्न रहें।'§ § सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदय बसहु हनुमंत । सानुकूल कोसलपति रहहु समेत अनंत ॥ —मानस ६|१०७ निखिल भुवनेश्वरी जगदम्बासे शुभाशीर्वाद प्राप्तकर हनुमानजी पुनः मातृ-चरणोंमें गिर पड़े। कुछ क्षणोंके उपरान्त उन्होंने क्रूर दृष्टिवाली विकरालमुखी राक्षसियोंको देखकर निवेदन किया— 'माता ! इन विकराल, विकट आकारवाली, क्रूर और अत्यन्त दारुण राक्षसियोंने आपको बड़ी पीड़ा पहुँचायी है। इन्हें देखकर मेरा खून खौल रहा है। आप कृपापूर्वक आज्ञा प्रदान करें तो मैं इनके दाँत तोड़ दूँ, इनके नाक-कान काट लूँ और इनके बाल नोचकर मुक्कों और लातोंसे मार-मारकर इनका कचूमर निकाल दूँ।' हनुमानजीकी कठोर वाणी सुनकर सीताजीको निरन्तर डराने-धमकानेवाली रावणकी दुष्ट दासियाँ अत्यन्त भयभीत होकर वैदेहीके मुखारविन्दकी ओर देखने लगीं। जनकदुलारीने कहा— 'ना, बेटा ! ये तो स्वयं रावणके अधीन थीं और उसके आदेशका पालन कर रही थीं। रावणकी मृत्युके बाद तो ये अत्यन्त विनयपूर्वक मुझे प्रत्येक रीतिसे संतुष्ट करनेका प्रयत्न कर रही हैं। मुझे तो अपने पूर्व-कर्मोंके कारण यह सारा दुःख निश्चितरूपसे भोगना ही था, इसलिये यदि इन राक्षसियोंका कुछ अपराध भी हो तो उसे मैं क्षमा करती हूँ। ये तो दयाकी पात्र हैं।' 'दयामयी जननी !' हनुमानजीने गद्गद कण्ठसे कहा— 'ऐसे वचन मेरे परमप्रभु श्रीरामकी सहधर्मिणी ही बोल सकती हैं!' फिर हनुमानजीने निवेदन किया— 'माँ ! अपनी ओरसे आप मुझे कोई संदेश दें। अब मैं अपने स्वामीके पास जाऊँगा।' || जय_श्री_राम || || राणा जी खेड़ांवाली|| #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏रामायण🕉 #🌸जय सिया राम #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩
Davinder Singh Rana
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19 hours ago
*काशी तो काशी है, काशी अविनाशी है!!!!!!* ☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️ पंचकोशी काशी का अविमुक्त क्षेत्र ज्योतिर्लिंग स्वरूप स्वयं भगवान विश्वनाथ हैं । ब्रह्माजी ने भगवान की आज्ञा से ब्रह्माण्ड की रचना की । तब दयालु शिव जी ने विचार किया कि कर्म-बंधन में बंधे हुए प्राणी मुझे किस प्रकार प्राप्त करेंगे ? इसलिए शिव जी ने काशी को ब्रह्माण्ड से पृथक् रखा और भगवान विश्वनाथ ने समस्त लोकों के कल्याण के लिए काशीपुरी में निवास किया । काशी को स्वयं भगवान शिव ने 'अविनाशी' और 'अविमुक्त क्षेत्र' कहा है । ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ स्वरूप होने के कारण प्रलयकाल में भी काशी नष्ट नहीं होती है; क्योंकि प्रलय के समय जैसे-जैसे एकार्णव का जल बढ़ता है, वैसे-वैसे इस क्षेत्र को भगवान शंकर अपने त्रिशूल पर उठाते जाते हैं । स्कंद पुराण के अनुसार काशी नगरी का स्वरूप सतयुग में त्रिशूल के आकार का, त्रेता में चक्र के आकार का, द्वापर में रथ के आकार का तथा कलियुग में शंख के आकार का होता है । संसार की सबसे प्राचीन नगरी है काशी!!!!!! काशी को संसार की सबसे प्राचीन नगरी कहा जाता है; क्योंकि वेदों में भी इसका कई जगह उल्लेख है । पौराणिक मान्यता के अनुसार पहले यह भगवान माधव की पुरी थी, जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरने से वह स्थान 'बिंदु सरोवर' बन गया और भगवान यहा 'बिंदुमाधव' के नाम से प्रतिष्ठित हुए । एक बार भगवान शंकर ने ब्रह्माजी का पांचवा सिर अपने नाखूनों से काट दिया । तब वह कटा सिर शंकर जी के हाथ से चिपक गया । वे १२ वर्षों तक बदरिकाश्रम, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में घूमते रहे, परंतु वह सिर उनके हाथ से अलग नहीं हुआ । ब्रह्मदेव का सिर काटने से ब्रह्महत्या स्त्री रूप धारण करके उनका पीछा करने लगी । अंत में जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और स्नान करते ही उनके हाथ से चिपका हुआ कपाल भी अलग हो गया । जिस स्थान पर वह कपाल छूटा, वह 'कपालमोचन तीर्थ' कहलाया । तब शंकर जी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना करके उस पुरी को अपने नित्य निवास के लिए मांग लिया । इस सम्बन्ध में एक पौराणिक प्रसंग है- राजा मनु के वंश में उत्पन्न सम्राट दिवोदास ने गंगा तट पर वाराणसी नगर बसाया । एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को यह अच्छा नहीं लगता कि वे सदा पति के साथ पिता के घर (हिमालय) में रहें । अत: पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने हिमालय छोड़ कर किसी सिद्ध क्षेत्र में बसने का निर्णय किया । उन्हें वाराणसी नगरी अच्छी लगी । शंकर जी ने अपने निकुम्भ नामक गण को वाराणसी नगरी को निर्जन करने का आदेश दिया । निकुम्भ ने वैसा ही किया । नगर निर्जन हो जाने पर भगवान शंकर अपने गणों के साथ वहां आकर निवास करने लगे । भगवान शंकर के साथ रहने की इच्छा से देवता तथा नाग भी वहां आकर रहने लगे । सम्राट दिवोदास अपनी वाराणसी नगरी छिन जाने से बहुत दु:खी हुए । उन्होंने तपस्या करके ब्रह्माजी से यह वर मांगा कि 'देवता अपने दिव्य लोक में रहें और नाग पाताल लोक में रहें । पृथ्वी मनुष्यों के लिए रहे ।' ब्रह्माजी ने 'तथाऽस्तु' कह दिया । इसका परिणाम यह हुआ कि शंकर जी सहित सभी देवताओं को वाराणसी छोड़ देना पड़ी । किंतु भगवान शंकर ने यहां 'विश्वेश्वर' रूप से निवास किया और दूसरे देवता भी श्रीविग्रह रूप में स्थित हुए । भगवान शंकर काशी छोड़ कर मंदराचल चले तो गए; किंतु उन्हें अपनी यह पुरी बहुत प्रिय थी । वे यहीं रहना चाहते थे । उन्होंने राजा दिवोदास के शासन में दोष ढूंढ़ कर उनको वाराणसी से निकालने के लिए चौंसठ योगिनियाँ भेजी । वे योगिनियां बारह मास तक काशी में रह कर राजा और उनके शासन में दोष निकालने का प्रयत्न करती रहीं, परंतु सफल नहीं हुईं । राजा ने उन्हें एक घाट पर स्थापित कर दिया । शंकर जी ने सोचा सूर्य 'लोकचक्षु' कहलाते हैं अर्थात् वे समस्त संसार की आंखें है, उनसे कुछ भी छिपा नहीं है । अत: राजा दिवोदास के राज्य में दोष ढ़ूंढ़ने के कार्य के लिए उन्होंने सूर्यदेव को भेजा; किंतु वाराणसी पुरी का वैभव देख कर सूर्यदेव चंचल (लोल) बन गए और अपने बारह रूपों में यहीं बस गए । ये बारह सूर्यों के नाम इस प्रकार हैं-१. लोलार्क, २. उत्तरार्क, ३. साम्बादित्य, ४. द्रौपदादित्य, ५. मयूखादित्य, ६. खखोल्कादित्य, ७. अरुणादित्य, ८. वृद्धादित्य, ९. केशवादित्य, १०. विमलादित्य, ११. गंगादित्य और १२. यमादित्य । शंकर जी विचार करने लगे-'अभी तक काशी से लौट कर न तो योगनियां ही आईं हैं और न ही सूर्यदेव । अब काशी का समाचार जानने के लिए मैं वहां किसे भेजूं । वहां की बातों को ठीक-ठीक जानने में ब्रह्माजी ही समर्थ हैं, अत: ब्रह्माजी को ही वहां भेजता हूँ ।' शंकर जी के कहने पर ब्रह्माजी वाराणसी आए। उन्होंने राजा दिवोदास की सहायता से यहां दस अश्वमेध यज्ञ किए और यहीं बस गए। यह स्थान 'दशाश्वमेध घाट' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद भगवान शंकर की आज्ञा से ढुण्ढिराज गणेश जी ज्योतिषी का रूप धारण कर काशी आए । उन्होंने राजा दिवोदास को उपदेश करते हुए कहा-'आज के अठारहवें दिन कोई ब्राह्मण आकर तुम्हें उपदेश करेगा । तुमको बिना बिचारे उसके वचनों का पालन करना चाहिए । ऐसा करने से तुम्हारा सभी मनोरथ पूर्ण होगा ।' जब गणेश जी भी काशी जाकर देर तक नहीं लौटे तब भगवान शंकर ने विष्णु जी की ओर देखा । शंकर जी की इच्छा पूर्ण करने के लिए भगवान विष्णु यहां ब्राह्मण वेश में पधारे और उन्होंने राजा दिवोदास को ज्ञानोपदेश किया । इससे वे विरक्त हो गए । राजा दिवोदास ने एक शिवलिंग की स्थापना की और जैसे ही स्तुति करना आरम्भ किया, आकाश से शिव-पार्षदों से घिरा हुआ एक दिव्य विमान उतरा । राजा दिवोदास विमान में बैठ कर शिव लोक चले गए । तब भगवान शंकर मंदराचल से आकर काशी में स्थित हो गए । काशी के देवता!!!!!!!! द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक 'भगवान विश्वनाथ' काशी के सम्राट हैं । इन्हें मिला कर काशी में कुल ५९ मुख्य शिवलिंग हैं । १२ आदित्य हैं । ५६ विनायक हैं, ८ भैरव हैं, ९ दुर्गा हैं, १३ नृसिंह हैं, १६ केशव हैं । ५१ शक्तिपीठों में से एक 'विशालाक्षी शक्तिपीठ' भी काशी में है, जहां सती के दाहिने कान का कुण्डल गिरा था । काशी बारह नामों से जानी जाती है- १. काशी, २. वाराणसी (मां गंगा के तट पर वरुणा और असी नामक नदियों के बीच में स्थित होने के कारण इसे वाराणसी कहते हैं) ३. अविमुक्त क्षेत्र (भगवान शिव और पार्वती ने कभी इस क्षेत्र का त्याग नहीं किया), ४. आनंदकानन (भगवान शिव के आनंद का कारण), ५. महाश्मशान (यहां मणिकर्णिका घाट पर हर समय चिता जलती रहती है) ६. रुद्रावास (भगवान विश्वनाथ ने समस्त लोकों के कल्याण के लिए काशीपुरी में निवास किया है ।) ७. काशिका, ८. तप:स्थली, ९. मुक्ति भूमि, १०. मुक्ति-क्षेत्र, ११. मुक्ति-पुरी, १२. श्रीशिवपुरी । परमेश्वर शिव का धाम काशी जीवों को मोक्ष प्रदान करने वाली, संसार के भंवर में फंसे हुए लोगों के लिए नौका के समान, चौरासी के चक्कर में पड़े लोगों के लिए विश्रामस्थल और जीव के जन्म-जन्मांतर के कर्मबंधनों को काटने के लिए छुरे के समान है । काशी ही वह पुरी है जो मनुष्य को साक्षात् मोक्ष देती है । माना जाता है कि यहां देह-त्याग के समय भगवान शंकर मरणोन्मुख प्राणी के कान में तारक-मंत्र सुनाते हैं, उससे जीव को तत्त्वज्ञान हो जाता है और उसके सामने शिवस्वरूप ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है । ब्रह्म में लीन होना ही अमृत पद प्राप्त कर लेना या मोक्ष है । जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत संत, श्रुति, सकल पुरान । सो गति मरन-काल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ।। इसलिए यहां कैसा भी प्राणी मरे, वह मुक्त हो जाता है । इसी आस्था के कारण देश के कोने-कोने से सहस्त्रों वर्षों से लोग देहोत्सर्ग के लिए आते रहे हैं । हर हर महादेव राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #हर हर महादेव