🎯 प्रेरणाप्रद कहानियाँ
शीर्षक:- अपने–अपने फ़र्ज़
कहानी:- अरे पापा, आप अभी तक तैयार क्यों नहीं हुए? आपका बैग कहाँ है—चलिए, मैं पैक कर देती हूँ।
नरेंद्र बाबू ने निशि की ओर उदास नज़र से देखा, “निशि बेटा, मैं कहीं नहीं जाऊँगा। यह घर तेरी माँ की यादों से भरा है।”
निशि की आँखें भर आईं। “पापा, माँ को गए छह महीने हो गए हैं। आपकी तबियत भी ठीक नहीं रहती। मैं आपको अकेले नहीं छोड़ सकती। आप मेरे साथ चलिए।”
“बेटा, मैं तेरे घर कैसे रहूँ? बेटी के घर का तो लोग पानी तक नहीं पीते। ऊपर से तेरे सास–ससुर… उन्हें मेरा रहना कैसे अच्छा लगेगा?”
“पापा, वो वैसे नहीं हैं। वे मेरे साथ बहुत अच्छे हैं।”
निशि ने उनका हाथ पकड़ लिया। “पिछली बार आपको शुगर का अटैक आया था। मैं आपकी इकलौती बेटी हूँ। आपकी जिम्मेदारी मेरी है।”
नरेंद्र बाबू सोच में पड़ गए—नवीन (दामाद) ने तो कभी साथ रहने को नहीं कहा, बस मिलने की बात कही थी।
निशि उन्हें अपने घर ले आई। सास–ससुर और नवीन समधी को देखकर चौंक तो गए, पर कुछ बोले नहीं।
नरेंद्र बाबू को लगता रहा कि शायद उनके आने से सब खुश नहीं हैं।
एक दिन लॉन में घूमते हुए उन्होंने नवीन की आवाज़ सुनी—
“निशि, पापा यहाँ कब तक रहेंगे?”
“ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?”
“तुम समझ नहीं रही हो, हमें अपने ही घर में अजीब लगने लगा है… वहाँ (उनके घर) उनकी अच्छी व्यवस्था हो सकती है।”
यह सुनकर उनका दिल काँप गया। अगले दिन जाने की तैयारी करने लगे।
निशि बोली, “पापा, ऐसे कैसे जा सकते हैं?”
“निशि, मेरी चिंता मत करो। अपने घर का ख्याल रखो। मैं ठीक हूँ।”
पर निशि समझ गई—कुछ तो हुआ है।
नाश्ते के बाद उसने सबके सामने कहा,
“आज पापा जा रहे हैं… और मैं एक फैसला कर रही हूँ। पापा की बड़ी कोठी में गरीब बच्चों के लिए एक छोटा स्कूल खोलूँगी। पापा और मैं मिलकर एक ट्रस्ट बनाएँगे। पापा की दो करोड़ की जमीन भी बेचकर उसी ट्रस्ट में डाल दी जाएगी। उसके ब्याज से गरीब बच्चों की पढ़ाई होगी। पापा की पेंशन और बाकी फंड उनके लिए काफी है।”
नरेंद्र बाबू अवाक होकर उसे देखते रह गए।
नवीन और उसके माता–पिता के चेहरों की चमक पल भर में उतर गई।
गिनती–हिसाब उनकी आँखों में तैरने लगा—पाँच करोड़ की कोठी, दो करोड़ की जमीन, और बाकी फंड!
पापा को छोड़कर लौटते ही नवीन गुस्से से बोला, “ये क्या बकवास थी?”
निशि मुस्कराई, “यह बकवास नहीं—सच है। ताकि किसी को भी मेरे पिता की मौत का इंतज़ार न रहे।”
नवीन चुप रह गया।
निशि ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“पापा ने मेरी शादी में हर जिम्मेदारी निभाई। क्या मेरा फ़र्ज़ नहीं कि मैं उनका साथ दूँ? मैंने तुम्हारे माता–पिता की सेवा में कभी कमी नहीं रखी। पर अपने पिता के प्रति अपना फ़र्ज़ निभाने से तुम मुझे नहीं रोक सकते।”
नरेंद्र बाबू दूर खड़े आँसुओं में भी गर्व से मुस्करा रहे थे।
शिक्षा:- सच्चा फ़र्ज़ वही है जो दिल से निभाया जाए – चाहे वह माता–पिता का हो या संतान का। रिश्तों की कीमत सुविधा से नहीं, संवेदना और कर्तव्य से तय होती है। परिवार तभी पूरा होता है जब हर व्यक्ति दूसरे के सम्मान, सुरक्षा और भावनाओं को बराबर महत्व दे।
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