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sn vyas
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sn vyas
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3 घंटे पहले
हीनांगानतिरिक्तांगान् विद्याहीनान् विगर्हितान् । रूपद्रविणहीनांश्च सत्वहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥ [ महाभारत, अनुशासन पर्व - १०४/३५ ] अर्थात् 👉🏻 हीन अंग वाले , अधिक अंग वाले , विद्याहीन , निन्दित , रूपहीन , धनहीन तथा बलहीन मनुष्यों पर आक्षेप नही करना चाहिए । 🌄🌄 प्रभातवंदन 🌄🌄 #❤️जीवन की सीख
sn vyas
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7 घंटे पहले
#🌞जय सूर्यदेव भगवान🙏 शुभ रविवार🙏 ॐ सूर्याय नमः🌻🏕️ भगवान सूर्य का अनहद नाद है 'ॐ' ॐ ब्रह्माण्ड की नादीय अभिव्यंजना है ! 108 अंक ब्रह्माण्ड की गणितीय अभिव्यंजना है ! 💐#ॐकार_परब्रह्म_है।💐 वह निखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। उसे शब्द ब्रह्म और नाद ब्रह्म के नाम से भी जाना जाता है। प्रत्येक वेदमन्त्र के उच्चारण से पूर्व तथा पाठ समाप्ति के बाद इसे लगाया जाता है। सृष्टि के जितने पदार्थ हैं सबमें ॐकार ही व्याप्त है। 💐#ओ३म् (ॐ) #क्या_है:- ओ३म्(ॐ)का शाब्दिक और सरल अर्थ प्रणव अर्थात परमेश्वर से है, ओ३म् वास्तविकता में सम्पूर्ण सृष्टि कि उद्भावता की ओर संकेत करता है, कहने का तात्पर्य यह है कि ओ३म् से ही यह चराचर जगत चलायमान है और इस संसार के कण कण में ओ३म् रमा हुआ है। ओ३म् किसी भी एक देव का नाम या संकेत नहीं है,अपितु हर धर्म को मानने वालों ने इसे अपने तरीके से प्रचलित किया है। जैसे ब्रह्मा-वाद में विश्वास रखने वाले इसे ब्रह्मा,विष्णु के सम्प्रदाय वाले वैष्णवजन इसे विष्णु तथा शैव या रुद्रानुगामी इसे शिव का प्रतिक मानते है और इसी तरीके से इसको प्रचलित करते है। परन्तु वास्तव में ओ३म् तीनों देवो का मिश्रित तत्त्व है जो कि इस प्रकार है:- ओ३म्(ॐ)शब्द में "अ" ब्रह्मा का पर्याय है,और इसके उच्चारण द्वारा हृदय में उसके त्याग का भाव होता है। "उ" विष्णु का पर्याय है,इसके उच्चारण द्वारा त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का पर्याय है और इसके उच्चारण द्वारा त्याग तालुमध्य में होता है। इन तीनो देवों (त्रिदेवों) के संगम से यह ओ३म् (ॐ)बना है। ओ३म् (ॐ) की महत्ता:- हम जिस ब्रह्माण्ड में रहते है उसमे ओ३म् (ॐ) सर्वव्यापी है अर्थात सभी जगह व्याप्त है। ओ३म्(ॐ)के बिना इस संसार कि कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जब आप योग या ध्यान कि मुद्रा में बैठते होंगे तब आपको महसूस होता होगा कि बिना ओ३म् (ॐ) का जाप किये ही आपको अपने आप ही अनवरत रूप से ओ३म् (ॐ) कि ध्वनि आ रही है। यह तभी होता है जब आप ध्यान कि मुद्रा में पूर्ण रूप से खो जाते है अर्थात चरम तक पहुच जाये। ईश्वर का वाचक प्रणव 'ॐ' है, तथा इसी ओम् में सारी सृष्टि समायी हुई है। ओम् कि महत्ता तो यहाँ तक है कि माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ओ३म्(ॐ)की ध्वनि से पूर्ण ब्रह्माण्ड गुन्जायमान रहता है। तथा इस ओ३म् (ॐ) मंत्र को परम पवित्र और परम शक्तिशाली माना जाता है। यह ओ३म् (ॐ) ही हमारे प्राण अर्थात श्वास को नियंत्रित करता है तभी तो मनुष्य को श्वास लेते समय ओ३म् (ॐ) कि ध्वनि का अहसास होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि ओ३म् (ॐ) मंत्र बहुत शक्ति -शाली मंत्र है और इसका प्रभाव भी त्वरित होता है एवं ओ३म् (ॐ) को किसी मंत्र के साथ जोड़ दिया जाये तो वह मंत्र पूर्णतया शुद्ध,पवित्र और शक्तिशाली हो जाता है। तभी तो शास्त्रानुसार सभी मन्त्रों के पूर्व ओ३म् (ॐ) लगाने का विधान है, जैसे श्रीराम का मंत्र, -ॐ रामाय नमः, भगवान विष्णु का मंत्र, -ॐ विष्णवे नमः, भगवन शिव का मंत्र,- ॐ नमः शिवाय,आदि अत्यधिक प्रचलित है। कहा जाता है कि ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नही होता, चाहे उसका कितना भी जाप हो। मंत्र के रूप में मात्र ॐ भी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार ॐ का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है। ॐ का दूसरा नाम प्रणव (परमेश्वर) है। "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ॐ अक्षर है इसका क्षय तथा विनाश नहीं होता। ॐकार की 19 शक्तियाँ सारे शास्त्र-स्मृतियों का मूल है वेद। वेदों का मूल गायत्री है और गायत्री का मूल है ॐकार। ॐकार से गायत्री,गायत्री से वैदिक ज्ञान,और उससे शास्त्र और सामाजिक प्रवृत्तियों की खोज हुई। पतंजलि महाराज ने कहा हैः तस्य वाचकः प्रणवः। परमात्मा का वाचक ओंकार है। सब मंत्रों में ॐ राजा है। ॐकार अनहद नाद है। यह सहज में स्फुरित हो जाता है। अकार,उकार,मकार और अर्धतन्मात्रायुक्त ॐ एक ऐसा अदभुत भगवन्नाम मंत्र है कि इस पर कई व्याखयाएँ हुई। कई ग्रंथ लिखे गये। फिर भी इसकी महिमा हमने लिखी ऐसा दावा किसी ने नहीं किया। इस ओंकार के विषय में ज्ञानेश्वरी गीता में ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा हैः ॐ नमो जी आद्या वेदप्रतिपाद्या जय जय स्वसंवेद्या आत्मरूपा। परमात्मा का ओंकारस्वरूप से अभिवादन करके ज्ञानेश्वर महाराज ने ज्ञानेश्वरी गीता का प्रारम्भ किया था। धन्वंतरी महाराज लिखते हैं कि ॐ सबसे उत्कृष्ट मंत्र है। वेदव्यासजी महाराज कहते हैं कि, प्रणवः मंत्राणां सेतुः। यह प्रणव मंत्र सारे मंत्रों का सेतु है। कोई मनुष्य दिशाशून्य हो गया हो,लाचारी की हालत में फेंका गया हो,कुटुंबियों ने मुख मोड़ लिया हो,भाग्य रूठ गया हो,बन्धुओं ने सताना शुरू कर दिया हो,पड़ोसियों ने पुचकार के बदले दुत्कारना शुरू कर दिया हो... चारों तरफ से व्यक्ति दिशाशून्य, सहयोगशून्य,धनशून्य,सत्ताशून्य हो गया हो फिर भी हताश न हो वरन् सुबह-शाम 3 घंटे ओंकार सहित भगवन्नाम का जप करे तो वर्ष के अंदर वह व्यक्ति भगवत्शक्ति से सबके द्वारा सम्मानित,सब दिशाओं में सफल और सब गुणों से सम्पन्न होने लगेगा। इसलिए मनुष्य को कभी भी लाचार,दीन-हीन और असहाय मानकर अपने को कोसना नहीं चाहिए। भगवान तुम्हारे आत्मा बनकर बैठे हैं और भगवान का नाम तुम्हें सहज में प्राप्त हो सकता है फिर क्यों दुःखी होना ? रोज रात्रि में आप 10 मिनट ॐकार का जप करके सो जाइये। फिर देखिये इस मंत्र भगवान की क्या-क्या करामात होती है ? और दिनों की अपेक्षा वह रात कैसी जाती है और सुबह कैसी जाती है ? पहले ही दिन से अंतर दिखने लग जायेगा। मंत्र के ऋषि,देवता,छंद,बीज और कीलक होते हैं। इस विधि को जानकर गुरुमंत्र देने वाले सदगुरु मिल जायें और उसका पालन करने वाला सतशिष्य मिल जाये तो काम बन जाता है। ओंकार मंत्र का छंद गायत्री है, इसके देवता परमात्मा स्वयं है और मंत्र के ऋषि भी ईश्वर ही हैं। भगवान की रक्षण शक्ति,गति शक्ति,कांति शक्ति,प्रीति शक्ति, अवगम शक्ति,प्रवेश अवति शक्ति आदि 19 शक्तियाँ ओंकार में हैं। इसका आदर से श्रवण करने से मंत्रजापक को बहुत लाभ होता है ऐसा संस्कृत के जानकार पाणिनी मुनि ने बताया है। वे पहले महाबुद्धु थे,महामूर्खों में उनकी गिनती होती थी। 14 साल तक वे पहली कक्षा से दूसरी में नहीं जा पाये थे। फिर उन्होंने शिवजी की उपासना की,उनका ध्यान किया तथा शिवमंत्र जपा। शिवजी के दर्शन किये व उनकी कृपा से संस्कृत व्याकरण की रचना की और अभी पाणिनी मुनि का संस्कृत व्याकरण पढ़ाया जाता है। ---मंत्र में 19 शक्तियाँ हैं- 💐#रक्षण_शक्तिः - ॐ सहित मंत्र का जप करते हैं तो वह हमारे जप तथा पुण्य की रक्षा करता है। किसी नामदान के लिए हुए साधक पर यदि कोई आपदा आनेवाली है,कोई दुर्घटना घटने वाली है तो मंत्र भगवान उस आपदा को शूली में से काँटा कर देते हैं। साधक का बचाव कर देते हैं। ऐसा बचाव तो एक नहीं,मेरे हजारों साधकों के जीवन में चमत्कारिक ढंग से महसूस होता है। गाड़ी उलट गयी,तीन गुलाटी खा गयी किंतु बापू जी ! हमको खरोंच तक नहीं आयी.... ! हमारी नौकरी छूट गयी थी, ऐसा हो गया था,वैसा हो गया था किंतु बाद में उसी साहब ने हमको बुलाकर हमसे माफी माँगी और हमारी पुनर्नियुक्ति कर दी। पदोन्नति भी कर दी... इस प्रकार की न जाने कैसी-कैसी अनुभूतियाँ लोगों को होती हैं। ये अनुभूतियाँ समर्थ भगवान की सामर्थ्यता प्रकट करती हैं। 💐#गति_शक्तिः - जिस योग में,ज्ञान में,ध्यान में आप फिसल गये थे,उदासीन हो गये थे,किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे उसमें मंत्रदीक्षा लेने के बाद गति आने लगती है। मंत्रदीक्षा के बाद आपके अंदर गति शक्ति कार्य में आपको मदद करने लगती है। 💐#कांति_शक्तिः- मंत्रजाप से जापक के कुकर्मों के संस्कार नष्ट होने लगते हैं और उसका चित्त उज्जवल होने लगता है। उसकी आभा उज्जवल होने लगती है,उसकी मति-गति उज्जवल होने लगती है और उसके व्यवहार में उज्जवलता आने लगती है। इसका मतलब ऐसा नहीं है कि आज मंत्र लिया और कल सब छूमंतर हो जायेगा...। धीरे-धीरे होगा। एक दिन में कोई स्नातक नहीं होता,एक दिन में कोई एम.ए. नहीं पढ़ लेता,ऐसे ही एक दिन में सब छूमंतर नहीं हो जाता। मंत्र लेकर ज्यों-ज्यों आप श्रद्धा से,एकाग्रता से और पवित्रता से जप करते जायेंगे त्यों-त्यों विशेष लाभ होता जायेगा। 💐#प्रीति_शक्तिः- ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों मंत्र के देवता के प्रति, मंत्र के ऋषि,मंत्र के सामर्थ्य के प्रति आपकी प्रीति बढ़ती जायेगी। 💐#तृप्ति_शक्तिः- ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों आपकी अंतरात्मा में तृप्ति बढ़ती जायेगी,संतोष बढ़ता जायेगा। जिन्होंने नियम लिया है और जिस दिन वे मंत्र नहीं जपते, उनका वह दिन कुछ ऐसा ही जाता है। जिस दिन वे मंत्र जपते हैं, उस दिन उन्हें अच्छी तृप्ति और संतोष होता है। जिनको गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है उनकी वाणी में सामर्थ्य आ जाता है। नेता भाषण करता है तो लोग इतने तृप्त नहीं होते, किंतु जिनका गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है ऐसे महापुरुष बोलते हैं तो लोग बड़े तृप्त हो जाते हैं और महापुरुष के शिष्य बन जाते हैं। 💐#अवगम_शक्तिः- मंत्रजाप से दूसरों के मनोभावों को जानने की शक्ति विकसित हो जाती है। दूसरे के मनोभावों को आप अंतर्यामी बनकर जान सकते हो। कोई व्यक्ति कौन सा भाव लेकर आया है ? दो साल पहले उसका क्या हुआ था या अभी उसका क्या हुआ है ? उसकी तबीयत कैसी है? लोगों को आश्चर्य होगा किंतु आप तुरंत बोल दोगे कि 'आप को छाती में जरा दर्द है... आपको रात्रि में ऐसा स्वप्न आता है.... कोई कहे कि 'महाराज ! आप तो अंतर्यामी हैं।' वास्तव में यह भगवत्शक्ति के विकास की बात है। 💐#प्रवेश_अवति_शक्तिः- अर्थात् सबके अंतरतम की चेतना के साथ एकाकार होने की शक्ति। अंतःकरण के सर्व भावों को तथा पूर्वजीवन के भावों को और भविष्य की यात्रा के भावों को जानने की शक्ति कई योगियों में होती है। वे कभी-कभार मौज में आ जायें तो बता सकते हैं कि आपकी यह गति थी,आप यहाँ थे,फलाने जन्म में ऐसे थे,अभी ऐसे हैं। जैसे दीर्घतपा के पुत्र पावन को माता-पिता की मृत्यु पर उनके लिए शोक करते देखकर उसके बड़े भाई पुण्यक ने उसे उसके पूर्वजन्मों के बारे में बताया था। यह कथा योगवाशिष्ठ महारामायण में आती है। 💐#श्रवण_शक्तिः- मंत्रजाप के प्रभाव से जापक सूक्ष्मतम,गुप्ततम शब्दों का श्रोता बन जाता है। जैसे, शुकदेवजी महाराज ने जब परीक्षित के लिए सत्संग शुरु किया तो देवता आये। शुकदेवजी ने उन देवताओं से बात की। माँ आनंदमयी का भी देवलोक के साथ सीधा सम्बन्ध था। और भी कई संतो का होता है। दूर देश से भक्त पुकारता है कि गुरुजी ! मेरी रक्षा करो... तो गुरुदेव तक उसकी पुकार पहुँच जाती है ! 💐#स्वाम्यर्थ_शक्तिः- अर्थात् नियामक और शासन का सामर्थ्य। नियामक और शासक शक्ति का सामर्थ्य विकसित करता है प्रणव का जाप। 💐#याचन_शक्तिः- अर्थात् याचना की लक्ष्यपूर्ति का सामर्थ्य देनेवाला मंत्र। 💐#क्रिया_शक्तिः- अर्थात् निरन्तर क्रियारत रहने की क्षमता,क्रियारत रहनेवाली चेतना का विकास। 💐#इच्छित_अवति_शक्तिः- अर्थात् वह ॐ स्वरूप परब्रह्म परमात्मा स्वयं तो निष्काम है किंतु उसका जप करने वाले में सामने वाले व्यक्ति का मनोरथ पूरा करने का सामर्थ्य आ जाता है। इसीलिए संतों के चरणों में लोग मत्था टेकते हैं,कतार लगाते हैं,प्रसाद धरते हैं, आशीर्वाद माँगते हैं आदि आदि। 💐#इच्छित_अवन्ति_शक्ति:- अर्थात् निष्काम परमात्मा स्वयं शुभेच्छा का प्रकाशक बन जाता है। 💐#दीप्ति_शक्तिः- अर्थात् ओंकार जपने वाले के हृदय में ज्ञान का प्रकाश बढ़ जायेगा। उसकी दीप्ति शक्ति विकसित हो जायेगी। 💐#वाप्ति_शक्तिः- अणु-अणु में जो चेतना व्याप रही है उस चैतन्यस्वरूप ब्रह्म के साथ आपकी एकाकारता हो जायेगी। 💐#आलिंगन_शक्तिः- अर्थात् अपनापन विकसित करने की शक्ति। ओंकार के जप से पराये भी अपने होने लगेंगे तो अपनों की तो बात ही क्या ? जिनके पास जप-तप की कमाई नहीं है उनको तो घरवाले भी अपना नहीं मानते,किंतु जिनके पास ओंकार के जप की कमाई है उनको घरवाले,समाजवाले, गाँववाले,नगरवाले,राज्य वाले, राष्ट्रवाले तो क्या विश्ववाले भी अपना मानकर आनंद लेने से इनकार नहीं करते। 💐#हिंसा_शक्तिः- ओंकार का जप करने वाला हिंसक बन जायेगा ? हाँ,हिँसक बन जायेगा किंतु कैसा हिंसक बनेगा ? दुष्ट विचारों का दमन करने वाला बन जायेगा और दुष्टवृत्ति के लोगों के दबाव में नहीं आयेगा। अर्थात् उसके अन्दर अज्ञान को और दुष्ट सरकारों को मार भगाने का प्रभाव विकसित हो जायेगा। 💐#दान_शक्तिः- अर्थात् वह पुष्टि और वृद्धि का दाता बन जायेगा। फिर वह माँगनेवाला नहीं रहेगा,देने की शक्तिवाला बन जायेगा। वह देवी-देवता से,भगवान से माँगेगा नहीं,स्वयं देने लगेगा। 💐#भोग_शक्तिः- प्रलयकाल स्थूल जगत को अपने में लीन करता है,ऐसे ही तमाम दुःखों को,चिंताओं को,भयों को अपने में लीन करने का सामर्थ्य होता है प्रणव का जप करने वालों में। जैसे दरिया में सब लीन हो जाता है,ऐसे ही उसके चित्त में सब लीन हो जायेगा और वह अपनी ही लहरों में फहराता रहेगा,मस्त रहेगा... नहीं तो एक-दो दुकान,एक-दो कारखाने वाले को भी कभी- कभी चिंता में चूर होना पड़ता है। किंतु इस प्रकार की साधना जिसने की है उसकी एक दुकान या कारखाना तो क्या,एक आश्रम या समिति तो क्या, 1100,1200 या 1500 ही क्यों न हों,सब उत्तम प्रकार से चलती हैं ! उसके लिए तो नित्य नवीन रस, नित्य नवीन आनंद,नित्य नवीन मौज रहती है। शादी अर्थात् खुशी ! वह ऐसा मस्त फकीर बन जायेगा। 💐#वृद्धि_शक्तिः- अर्थात् प्रकृतिवर्धक,संरक्षक शक्ति। ओंकार का जप करने वाले में प्रकृतिवर्धक और सरंक्षक सामर्थ्य आ जाता है। #साभार_मानससिद्धमन्त्र★ सूर्य स्तुति:- नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।। जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः। नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।। नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः। नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।। 'पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।' आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है,आपको नमस्कार है।' 'उग्र(अभक्तों के लिये भयंकर), वीर (शक्तिसंपन्न) और सारंग (शीघ्रगामी) सूर्यदेव को नमस्कार है। कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है। ॐ विष्णवे नमः, ॐ नमः शिवाय, ॐ रामाय नमः,
sn vyas
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7 घंटे पहले
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 चौरासी लाख योनियों का रहस्य!!!!!! हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। कदाचित अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव,जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल),जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं,बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ,जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में ही की जाती है। आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७०००००(सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है। हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है,अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है,उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है। मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८००००००(अस्सी लाख)बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं,मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। किन्तु दुर्भाग्य ये है कि लोग इस बात का महत्त्व समझते नहीं हैं कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है। एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है-नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है। इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी,अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो,अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है- नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो। इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों,विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके। हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में,जहाँ पाप शून्य भाग था,मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है। हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है,जबकि ऐसा नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है। पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है: जलज नवलक्षाणी, स्थावर लक्षविंशति कृमयो: रुद्रसंख्यकः पक्षिणाम् दशलक्षणं त्रिंशलक्षाणी पशवः चतुरलक्षाणी मानव अर्थात, जलचर जीव-९०००००(नौ लाख) वृक्ष-२००००००(बीस लाख) कीट(क्षुद्रजीव)-११००००० (ग्यारह लाख) पक्षी-१००००००(दस लाख) जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख) मनुष्य-४००००० (चार लाख) इस प्रकार ९०००००+२०००००० +११०००००+१००००००+३०००००० +४०००००=कुल ८४००००० योनियाँ होती है। जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार: पृथ्वीकाय-७०००००(सात लाख) जलकाय-७०००००(सात लाख) अग्निकाय-७०००००(सात लाख) वायुकाय-७०००००(सात लाख) वनस्पतिकाय-१०००००० (दस लाख) साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर)-१४००००० (चौदह लाख) द्वि इन्द्रियाँ-२०००००(दो लाख) त्रि इन्द्रियाँ-२०००००(दो लाख) चतुरिन्द्रियाँ-२०००००(दो लाख) पञ्च इन्द्रियाँ(त्रियांच)-४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ(देव)-४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ(नारकीय जीव)- ४०००००(चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ(मनुष्य)-१४००००० (चौदह लाख) इस प्रकार ७०००००+७००००० +७०००००+७०००००+१०००००० +१४०००००+२०००००+२००००० +२०००००+४०००००+४००००० +४०००००+१४०००००= कुल ८४००००० अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए,तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही खोज लिया था। Sambhwami Yuge Yuge★● 🎉
sn vyas
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7 घंटे पहले
#🕉️सनातन धर्म🚩 महर्षि अगस्त्य पौराणिक उल्लेखों के अनुसार एक वैदिक ऋषि थे। वसिष्ठ मुनि के यह बड़े भ्राता थे। इनका जन्म काशी में हुआ माना जाता है। वर्तमान समय में यह स्थान अगस्त्य कुंड के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मतेज के मूर्तिमान स्वरूप महामुनि अगस्त्य जी का पावन चरित्र अत्यन्त उदात्त तथा दिव्य है। वेदों में इनका वर्णन आया है। प्रादुर्भाव ऋग्वेद का कथन है कि मित्र तथा वरुण नामक देवताओं का अमोघ तेज एक दिव्य यज्ञिय कलश में पुंजीभूत हुआ और उसी कलश के मध्य भाग से दिव्य तेज:सम्पन्न महर्षि अगस्त्य का प्रादुर्भाव हुआ- सत्रे ह जाताविषिता नमोभि: कुंभे रेत: सिषिचतु: समानम्। ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो ज्ञातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्॥ इस ऋचा के भाष्य में आचार्य सायण ने लिखा है- 'ततो वासतीवरात् कुंभात् मध्यात् अगस्त्यो शमीप्रमाण उदियाप प्रादुर्बभूव। तत एव कुंभाद्वसिष्ठमप्यृषिं जातमाहु:॥' इस प्रकार कुंभ से अगस्त्य तथा महर्षि वसिष्ठ का प्रादुर्भाव हुआ। अन्य पौराणिक प्रसंग एक यज्ञ सत्र में उर्वशी भी सम्मिलित हुई थी। मित्र, वरुण ने उसकी ओर देखा तो इतने आसक्त हुए कि अपने वीर्य को रोक नहीं पाये। उर्वशी ने उपहासात्मक मुस्कराहट बिखेर दी। मित्र वरुण बहुत लज्जित हुए। कुंभ का स्थान, जल तथा कुंभ, सब ही अत्यंत पवित्र थे। यज्ञ के अंतराल में ही कुंभ में स्खलित वीर्य के कारण कुंभ से अगस्त्य, स्थल में वसिष्ठ तथा जल में मत्स्य का जन्म हुआ। उर्वशी इन तीनों की मानस जननी मानी गयी।[2] पुराणों में यह कथा आयी है कि महर्षि अगस्त्य की पत्नी महान पतिव्रता तथा श्री विद्या की आचार्य थीं, जो 'लोपामुद्रा' के नाम से विख्यात हैं। आगम-ग्रन्थों में इन दम्पत्ति की देवी साधना का विस्तार से वर्णन आया है। महर्षि अगस्त्य का समुंद्र पान तेजस्वी ऋषि महर्षि अगस्त्य महातेजा तथा महातपा ऋषि थे। समुद्रस्थ राक्षसों के अत्याचार से घबराकर देवता लोग इनकी शरण में गये और अपना दु:ख कह सुनाया। फल यह हुआ कि ये सारा समुद्र पी गये, जिससे सभी राक्षसों का विनाश हो गया। इसी प्रकार इल्वल तथा वातापी नामक दुष्ट दैत्यों द्वारा हो रहे ऋषि-संहार को इन्होंने बंद किया और लोक का महान कल्याण हुआ। एक बार विन्ध्याचल सूर्य का मार्ग रोककर खड़ा हो गया, जिससे सूर्य का आवागमन ही बंद हो गया। सूर्य इनकी शरण में आये, तब इन्होंने विन्ध्य पर्वत को स्थिर कर दिया और कहा- "जब तक मैं दक्षिण देश से न लौटूँ, तब तक तुम ऐसे ही निम्न बनकर रुके रहो।" ऐसा ही हुआ। विन्ध्याचल नीचे हो गया, फिर अगस्त्य जी लौटे नहीं, अत: विन्ध्य पर्वत उसी प्रकार निम्न रूप में स्थिर रह गया और भगवान सूर्य का सदा के लिये मार्ग प्रशस्त हो गया। इस प्रकार के अनेक असम्भव कार्य महर्षि अगस्त्य ने अपनी मन्त्र शक्ति से सहज ही कर दिखाया और लोगों का कल्याण किया। भगवान श्रीराम वनगमन के समय इनके आश्रम पर पधारे थे। भगवान ने उनका ऋषि-जीवन कृतार्थ किया। भक्ति की प्रेम मूर्ति महामुनि सुतीक्ष्ण इन्हीं अगस्त्य जी के शिष्य थे। अगस्त्य संहिता आदि अनेक ग्रन्थों का इन्होंने प्रणयन किया, जो तान्त्रिक साधकों के लिये महान उपादेय है। मन्त्र द्रष्टा ऋषि सबसे महत्त्व की बात यह है कि महर्षि अगस्त्य ने अपनी तपस्या से अनेक ऋचाओं के स्वरूपों का दर्शन किया था, इसलिये ये 'मन्त्र द्रष्टा ऋषि' कहलाते हैं। ऋग्वेद के अनेक मन्त्र इनके द्वारा दृष्ट हैं। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 165 सूक्त से 191 तक के सूक्तों के द्रष्टा ऋषि महर्षि अगस्त्य हैं। साथ ही इनके पुत्र दृढच्युत तथा दृढच्युत के पुत्र इध्मवाह भी नवम मण्डल के 25वें तथा 26वें सूक्त के द्रष्टा ऋषि हैं। महर्षि अगस्त्य और लोपामुद्रा आज भी पूज्य और वन्द्य हैं, नक्षत्र-मण्डल में ये विद्यमान हैं। 'दूर्वाष्टमी' आदि व्रतोपवासों में इन दम्पति की आराधना-उपासना की जाती है।
sn vyas
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17 घंटे पहले
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 ✨ क्या आपका ‘भाग्य’ सोया हुआ है? 🔱 देवगुरु बृहस्पति को जाग्रत करने के अचूक शास्त्रीय उपाय ज्योतिष शास्त्र में देवगुरु बृहस्पति को जीव, धर्म, ज्ञान, संतान, धन और भाग्य का अधिष्ठाता माना गया है। जब कुंडली में गुरु निर्बल, नीच या पीड़ित हो जाते हैं, तब व्यक्ति का भाग्य साथ नहीं देता — 👉 बनते काम रुक जाते हैं 👉 सम्मान घटने लगता है 👉 धन आते-आते रुक जाता है 👉 सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता लेकिन शास्त्र कहते हैं — “गुरु प्रसन्न हो जाएँ, तो सोया भाग्य भी जाग उठता है।” आज आपके लिए प्रस्तुत हैं लाल किताब, वनस्पति तंत्र और वास्तु से जुड़े वे गुप्त लेकिन अत्यंत प्रभावी उपाय जो गुरु कृपा को शीघ्र सक्रिय करते हैं। ✨ 📕 लाल किताब के विशेष ‘अरिष्ट नाशक’ उपाय 🔸 मंदिर सेवा लगातार 8 गुरुवार किसी पुराने मंदिर की सीढ़ियों या प्रांगण की सफाई करें। ➡ यह गुरु के अहंकार दोष और कर्म अवरोध को शांत करता है। 🔸 केसर का तिलक प्रतिदिन माथे, नाभि और जीभ पर शुद्ध केसर का तिलक करें। ➡ यह उपाय गुरु को सीधे Activate करता है। 🔸 सोने का सही प्रयोग यदि गुरु नीच या अशुभ हों — ✔ दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली में सोने की अंगूठी या ✔ कलाई पर पीला धागा ❌ सोने का दान इस स्थिति में न करें। 🌿 वनस्पति तंत्र | प्रकृति से गुरु कृपा 🌳 पीपल की सेवा गुरुवार को पीपल की जड़ में शक्कर मिश्रित जल अर्पित करें और धूप दिखाएँ। 📌 शनिवार को स्पर्श करें, गुरुवार को केवल जल दें। 🟡 हल्दी की गांठ धन और स्थिरता के लिए — ✔ हल्दी की साबुत गांठ पीले धागे में बाँधकर दाईं भुजा पर धारण करें। ➡ यह पुखराज के समान फल देती है। 🏠 वास्तु सम्मत गुरु सुधार 🔹 ईशान कोण (North-East) इस कोने को खाली, स्वच्छ और शांत रखें। ✔ यहाँ गंगाजल रखें ❌ भारी सामान या कचरा न रखें 🔹 पीले रंग का प्रयोग विशेषकर Study Room में ✔ हल्के पीले पर्दे या बेडशीट ➡ गुरु तत्व को मजबूत करता है 💎 शीघ्र लाभ हेतु बोनस उपाय 🐄 गुरुवार को अपने हाथों से गाय को चने की दाल और गुड़ खिलाएँ। 🙏 गुरु और बुजुर्गों का चरण स्पर्श ➡ यह बृहस्पति का सबसे शक्तिशाली राजयोग कारक उपाय है। ⚠ सावधानी गुरुवार को ❌ बाल न कटवाएँ ❌ नाखून न काटें ❌ घर में पोछा न लगाएँ।
sn vyas
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17 घंटे पहले
#जय श्री राम श्री राम की कृपा और सान्निध्य पूरे दिन अनुभव करने के लिए सुबह की शुरुआत शास्त्रोक्त विधि और भक्तिभाव से करना अत्यंत फलदायी होता है। आप अपने दिन का आरंभ इस प्रकार कर सकते हैं: ​1. जागते ही कर-दर्शन और राम नाम ​सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले अपनी हथेलियों को देखें और प्रभु का स्मरण करें। बिस्तर छोड़ने से पहले "राम" नाम का तीन बार उच्चारण करें। यह आपके चेतन मन को सात्विक ऊर्जा से भर देता है। ​2. रामरक्षा स्तोत्र का पाठ ​दिन भर की सुरक्षा और नकारात्मकता से बचाव के लिए 'रामरक्षा स्तोत्र' का पाठ अचूक माना गया है। यदि समय कम हो, तो इसकी इस एक पंक्ति का जप करें: ​"रामेति रामभद्र इति रामचन्द्र इति वा स्मरन्। नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥" ​3. हनुमान जी का ध्यान ​प्रभु राम की कृपा पाने का सबसे सरल मार्ग हनुमान जी की भक्ति है। सुबह हनुमान चालीसा का पाठ करें या केवल यह मंत्र पढ़ें: ​"अंजनीगर्भ सम्भूत कपीन्द्र सचिवोत्तम। रामप्रिय नमस्तुभ्यं हनुमान रक्ष सर्वदा॥" माना जाता है कि जहाँ हनुमान जी की वंदना होती है, वहाँ श्री राम स्वतः ही रक्षा करते हैं। ​4. मानस पूजा और अर्पण ​नहाने के बाद भगवान राम की छवि के सामने घी का दीपक जलाएं और अपने दिन के सभी कार्यों को उन्हें समर्पित करने का संकल्प लें। मन ही मन कहें— "हे राघव, आज मैं जो भी कर्म करूँ, वह आपकी प्रसन्नता के लिए हो।" ​5. मर्यादा पुरुषोत्तम के गुणों का धारण ​श्री राम केवल पूजनीय नहीं, अनुकरणीय भी हैं। दिन की शुरुआत में संकल्प लें कि आज आप: ​अपनी वाणी में मधुरता रखेंगे। ​माता-पिता और बड़ों का सम्मान करेंगे। ​सत्य और धैर्य का मार्ग अपनाएंगे। ​6. विजय मंत्र का जप ​घर से निकलते समय या काम शुरू करते समय इस महामंत्र का 11 बार जप करें, जो आत्मविश्वास और सफलता प्रदान करता है: ​"श्री राम जय राम जय जय राम" ​विशेष सूत्र: गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार, जो व्यक्ति सुबह उठकर "राम चरित मानस" की किसी एक चौपाई का भी पाठ करता है, श्री रघुनाथ जी उसके योग-क्षेम (कल्याण) का वहन स्वयं करते हैं।
sn vyas
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18 घंटे पहले
#☝अनमोल ज्ञान प्रभु से मानसिक वार्तालाप भी जरूरी है 🙏🙏 1. हे नाथ! आप मुझे मुझसे अधिक जानते है । इसलिए मेरी इच्छा कभी पूर्ण न हो । आपकी इच्छा पूर्ण हो। 2. हे नाथ! मेरे मन, वचन, कर्म से कभी भी किसी को भी किंचिन्मात्र दुःख न पहुँचे यह कृपा बनाये रखे। 3. हे नाथ! मैं कभी न पाप देखूँ, न सुनू और न किसी के पाप का बखान करूँ। 4. हे नाथ! शरीर के सभी इन्द्रियों से आठो पहर केवल आपके प्रेम भरी लीला का ही आस्वादन करता रहूँ। 5. हे नाथ! प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी आपके मंगलमय विधान देख सदैव प्रसन्न रहूँ। 6. हे नाथ! अपने ऊपर महान से महान विपत्ति आने पर भी दूसरों को खुशी दिया करू। 7. हे नाथ! अगर कभी किसी कारणवश मेरे वजह से किसी को दुःख पहुँचे तो उसी समय उसके चरणों में पड़कर क्षमा माँग लू। 8. हे नाथ! आठो पहर रोम रोम से आपके नाम का जप होता रहे। 9. हे नाथ! मेरे आचरण श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के अनुकूल हो। 10. हे नाथ! हरेक परिस्थिति में आपकी कृपा के दर्शन हो। 🙏🏻 जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻
sn vyas
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20 घंटे पहले
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१४९ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड अड़सठवाँ सर्ग वसिष्ठजीकी आज्ञासे पाँच दूतोंका अयोध्यासे केकयदेशके राजगृह नगरमें जाना मार्कण्डेय आदिके ऐसे वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणोंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥१॥ 'राजा दशरथने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्नके साथ मामाके यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं॥२॥ 'उन दोनों वीर बन्धुओंको बुलानेके लिये शीघ्र ही तेज चलनेवाले दूत घोड़ोंपर सवार होकर यहाँसे जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं?'॥३॥ इसपर सबने वसिष्ठजीसे कहा—'हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ।' उनका वह कथन सुनकर वसिष्ठजीने दूतोंको सम्बोधित करके कहा—॥४॥ 'सिद्धार्थ! विजय! जयन्त! अशोक! और नन्दन! तुम सब यहाँ आओ और तुम्हें जो काम करना है, उसे सुनो। मैं तुम सब लोगोंसे ही कहता हूँ॥५॥ 'तुमलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर तुरंत ही राजगृह नगरको जाओ और शोकका भाव न प्रकट करते हुए मेरी आज्ञाके अनुसार भरतसे इस प्रकार कहो॥६॥ 'कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँसे शीघ्र ही चलिये। अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है॥७॥ 'भरतको श्रीरामचन्द्रके वनवास और पिताकी मृत्युका हाल मत बतलाना और इन परिस्थितियोंके कारण रघुवंशियोंके यहाँ जो कुहराम मचा हुआ है, इसकी चर्चा भी न करना॥८॥ 'केकयराज तथा भरतको भेंट देनेके लिये रेशमी वस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुमलोग यहाँसे शीघ्र चल दो'॥९॥ केकय देशको जानेवाले वे दूत रास्तेका खर्च ले अच्छे घोड़ोंपर सवार हो अपने-अपने घरको गये॥१०॥ तदनन्तर यात्रासम्बन्धी शेष तैयारी पूरी करके वसिष्ठजीकी आज्ञा ले सभी दूत तुरंत वहाँसे प्रस्थित हो गये॥११॥ अपरताल नामक पर्वतके अन्तिम छोर अर्थात् दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरिके उत्तरभागमें दोनों पर्वतोंके बीचसे बहनेवाली मालिनी नदीके तटपर होते हुए वे दूत आगे बढ़े॥१२॥ हस्तिनापुरमें गङ्गाको पार करके वे पश्चिमकी ओर गये और पाञ्चालदेशमें पहुँचकर कुरुजाङ्गल प्रदेशके बीचसे होते हुए आगे बढ़ गये॥१३॥ मार्गमें सुन्दर फूलोंसे सुशोभित सरोवरों तथा निर्मल जलवाली नदियोंका दर्शन करते हुए वे दूत कार्यवश तीव्रगतिसे आगे बढ़ते गये॥१४॥ तदनन्तर वे स्वच्छ जलसे सुशोभित, पानीसे भरी हुई और भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे सेवित दिव्य नदी शरदण्डाके तटपर पहुँचकर उसे वेगपूर्वक लाँघ गये॥१५॥ शरदण्डाके पश्चिमतटपर एक दिव्य वृक्ष था, जिसपर किसी देवताका आवास था; इसीलिये वहाँ जो याचना की जाती थी, वह सत्य (सफल) होती थी, अतः उसका नाम सत्योपयाचन हो गया था। उस वन्दनीय वृक्षके निकट पहुँचकर दूतोंने उसकी परिक्रमा की और वहाँसे आगे जाकर उन्होंने कुलिङ्गा नामक पुरीमें प्रवेश किया॥१६॥ वहाँसे तेजोऽभिभवन नामक गाँवको पार करते हुए वे अभिकाल नामक गाँवमें पहुँचे और वहाँसे आगे बढ़नेपर उन्होंने राजा दशरथके पिता-पितामहोंद्वारा सेवित पुण्यसलिला इक्षुमती नदीको पार किया॥१७॥ वहाँ केवल अञ्जलिभर जल पीकर तपस्या करनेवाले वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंका दर्शन करके वे दूत बाह्लीक देशके मध्यभागमें स्थित सुदामा नामक पर्वतके पास जा पहुँचे॥१८॥ उस पर्वतके शिखरपर स्थित भगवान् विष्णुके चरणचिह्नका दर्शन करके वे विपाशा (व्यास) नदी और उसके तटवर्ती शाल्मली वृक्षके निकट गये। वहाँसे आगे बढ़नेपर बहुत-सी नदियों, बावड़ियों, पोखरों, छोटे तालाबों, सरोवरों तथा भाँति-भाँतिके वनजन्तुओं—सिंह, व्याघ्र, मृग और हाथियोंका दर्शन करते हुए वे दूत अत्यन्त विशाल मार्गके द्वारा आगे बढ़ने लगे। वे अपने स्वामीकी आज्ञाका शीघ्र पालन करनेकी इच्छा रखते थे॥१९-२०॥ उन दूतोंके वाहन (घोड़े) चलते-चलते थक गये थे। वह मार्ग बड़ी दूरका होनेपर उपद्रवसे रहित था। उसे तै करके सारे दूत शीघ्र ही बिना किसी कष्टके श्रेष्ठ नगर गिरिव्रजमें जा पहुँचे॥२१॥ अपने स्वामी (आज्ञा देनेवाले वसिष्ठजी) का प्रिय और प्रजावर्गकी रक्षा करने तथा महाराज दशरथके वंशपरम्परागत राज्यको भरतजीसे स्वीकार करानेके लिये सादर तत्पर हुए वे दूत बड़ी उतावलीके साथ चलकर रातमें ही उस नगरमें जा पहुँचे॥२२॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥६८॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
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