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sn vyas
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sn vyas
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#🌟वट सावित्री की तैयारियां 🤗 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🎄हरे पेड़ #🌴पेड़ लगाएं🌍 #🏞️ प्रकृति की सुंदरता वृक्षों की पूजा-उपासना क्यों? 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ भारतीय संस्कृति में वृक्षों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि वे हमारे जीवन के प्राण हैं। पुराणों तथा धर्म-ग्रंथों में पेड़-पौधों को बड़ा पवित्र और देवता के रूप में माना जाता है, इसलिए उनके साथ पारिवारिक संबंध बनाए जाते हैं। जब से वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, लोक विश्वासों में दृढ़ता आई है, इसलिए पाप और पुण्य की अवधारणा भी उसके साथ जुड़ गई है और देव तुल्य वृक्षों का संरक्षण पुण्य व उनका विनाश करना पाप स्वरूप माना जाने लगा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार जो मनुष्य वृक्षों का आरोपण करते हैं, वे वृक्ष परलोक में उसके पुत्र होकर जन्म लेते हैं। जो वृक्षों का दान करता है, वृक्षों के पुष्पों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करता है और मेघ के बरसने पर छाता के द्वारा अभ्यागतों को तथा जल से पितरों को प्रसन्न करता है। पुष्पों का दान करने से समृद्धिशाली होता है। ऋग्वेद में वृक्षों को काटने या नष्ट करने की निंदा की गई है। मा काकम्बीरमुद्वृहो वनस्पतिमशस्तीर्वि हि नीनशः । मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा आदधते वेः॥ -ऋग्वेद 6/48/17 अर्थात् जिस प्रकार दुष्ट बाज पक्षी दूसरे पखेरुओं की गरदन मरोड़ कर उन्हें दुख देता है और मार डालता है, तुम वैसे न बनो और इन वृक्षों को दुख न दो। इनका उच्छेदन न करो, ये पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं को शरण देते हैं। मनुस्मृति में वृक्षों की योनि पूर्व जन्म के कारण मानी गई है और इन्हें जीवित एवं सुख-दुख का अनुभव करने वाला माना गया है। परम पिता परमात्मा ने वृक्ष का आविर्भाव संसार में परोपकार के लिए ही किया है, ताकि वह सदैव परोपकार में ही रत रहे। खुद भीषण धूप, गर्मी में रहकर दूसरों को छाया प्रदान करना और अपना सर्वस्व दूसरों के कल्याण के लिए अर्पित कर देना वृक्ष का सत्पुरुष के समान ही आचरण को दर्शाता है। वृक्षों की छाया में बैठकर ही हमारे न जाने कितने ही ऋषि-मुनियों ने तपस्याएं की हैं। विष्णु स्मृति के कूपतडागखननं तदुत्सर्ग विधान में लिखा है। वृक्षारोपयितुवर्बुक्षा परलोके पुत्रा भवन्ति वृक्षप्रदो वृक्षप्रसूनैर्देवाहे प्रीणयितफलैश्चतिधीन् छाययाचाम्भ्यागतान् देवे वर्षत्युदकेन पितृॄन । पुष्प प्रदानेन श्रीमान् भवति । अर्थात् जो व्यक्ति वृक्षों को लगाता है, वे वृक्ष परलोक में उसके पुत्र होकर जन्म लेते हैं। वृक्षों का दान करने वाला, वृक्षों के पुष्पों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करता है और मेघ के बरसने पर छाते के द्वारा अभ्यागतों को तथा जल से पितरों को प्रसन्न करता है, पुष्पों का दान करता है वह समृद्धशाली बनता है। 'वट सावित्री' के अवसर पर स्त्रियां अचल सौभाग्य देने वाले बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। गुरुवार के दिन केले के वृक्ष की पूजा की जाती है। इसके पत्ते पर भोजन करना शुभ माना जाता है। पारिजात वृक्ष को कल्पवृक्ष मानकर पूजा जाता है। अशोकाष्टमी के दिन अशोक वृक्ष की पूजा दुख को मिटाकर आशा को पूर्ण करने के लिए की जाती है। आंवले के वृक्ष में भगवान् विष्णु का निवास मानकर कार्तिक मास में इसकी पूजा, परिक्रमा करके स्त्रियां सुहाग का वरदान मांगती हैं। आम के पत्ते, मंजरी, छाल और लकड़ी यज्ञ व अनुष्ठानों में उपयोग की जाती हैं। पीपल के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। इस पर जल चढ़ाने, पूजा करने से संतान सुख मिलता है। इसके तने पर सूत लपेटना और परिक्रमा लगाने का भी विधान शास्त्रों में बताया गया है। तुलसी की नित्य पूजा करके जल चढ़ाना और इसके पास दीपक जलाकर रखना भारतीय नारियों का एक धार्मिक कृत्य है। विष्णु भगवान की प्रिया मानकर इसका पूजन किया जाता है। तुलसीदल का काफी महत्त्व माना जाता है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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#🌟वट सावित्री की तैयारियां 🤗 #🏞️ प्रकृति की सुंदरता वट सावित्रि व्रत 14 से 16 मई तक विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वट सावित्रि व्रत का महत्व 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जैसा कि इस व्रत के नाम और कथा से ही ज्ञात होता है कि यह पर्व हर परिस्थिति में अपने जीवनसाथी का साथ देने का संदेश देता है। इससे ज्ञात होता है कि पतिव्रता स्त्री में इतनी ताकत होती है कि वह यमराज से भी अपने पति के प्राण वापस ला सकती है। वहीं सास-ससुर की सेवा और पत्नी धर्म की सीख भी इस पर्व से मिलती है। मान्यता है कि इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और उन्नति और संतान प्राप्ति के लिये यह व्रत रखती हैं। भारतीय पञ्चाङ्ग अनुसार तीन दिवसीय वट सावित्री व्रत का आरम्भ 14 मई और समापन 16 मई को होगा। वट सावित्रि व्रत पूजा विधि 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सामग्री 〰️〰️ सावित्री-सत्यवान की मूर्ति, कच्चा सूत, बांस का पंखा, लाल कलावा, बरगद का फल, धूप मिट्टी का दीपक घी, फल (आम, लीची और अन्य फल) सत्यवान-सावित्री की मूर्ति,, कपड़े की बनी हुई बाँस का पंखा लाल धागा धूप मिट्टी का दीपक घी फूल फल( आम, लीची तथा अन्य फल) कपड़ा – 1.25 मीटर का दो सिंदूर इत्र सुपारी पान नारियल लाल कपड़ा दूर्वा घास चावल (अक्षत) सुहाग का सामान, नकद रुपए पूड़ि‍यां, भिगोया हुआ चना, स्टील या कांसे की थाली मिठाई घर में बना हुआ पकवान जल से भरा कलश आदि। पूजा विधि 〰️〰️〰️〰️ वट सावित्रि व्रत में वट यानि बरगद के वृक्ष के साथ-साथ सत्यवान-सावित्रि और यमराज की पूजा की जाती है। माना जाता है कि वटवृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव वास करते हैं। अतः वट वृक्ष के समक्ष बैठकर पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिन स्त्रियों को प्रातःकाल उठकर स्नान करना चाहिये इसके बाद रेत से भरी एक बांस की टोकरी लें और उसमें ब्रहमदेव की मूर्ति के साथ सावित्री की मूर्ति स्थापित करें। इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान और सावित्री की मूर्तियाँ स्थापित करें दोनों टोकरियों को वट के वृक्ष के नीचे रखे और ब्रहमदेव और सावित्री की मूर्तियों की पूजा करें। तत्पश्चात सत्यवान और सावित्री की मूर्तियों की पूजा करे और वट वृक्ष को जल दे वट-वृक्ष की पूजा हेतु जल, फूल, रोली-मौली, कच्चा सूत, भीगा चना, गुड़ इत्यादि चढ़ाएं और जलाभिषेक करे। फिर निम्न श्लोक से सावित्री को अर्घ्य दें अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥ इसके बाद निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना करें 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले। तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा॥ पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें। जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार अथवा यथा शक्ति 5,11,21,51, या 108 बार परिक्रमा करें। बड़ के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें। फिर बाँस के पंखे से सत्यवान-सावित्री को हवा करें। बरगद के पत्ते को अपने बालों में लगायें। भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर सासुजी के चरण-स्पर्श करें। यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं। वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात प्रतिदिन पान, सिन्दूर तथा कुंमकुंम से सौभाग्यवती स्त्री के पूजन का भी विधान है। यही सौभाग्य पिटारी के नाम से जानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों का भी पूजन होता है। कुछ महिलाएं केवल अमावस्या को एक दिन का ही व्रत रखती हैं अपनी सामर्थ्य के हिसाब से पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें। घर में आकर पूजा वाले पंखें से अपने पति को हवा करें तथा उनका आशीर्वाद लें। अंत में निम्न संकल्प लेकर उपवास रखें। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मम वैधव्यादिसकलदोषपरिहारार्थं ब्रह्मसावित्रीप्रीत्यर्थं सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्रीव्रतमहं करिष्ये। उसके बाद शाम के वक्त मीठा भोजन करे। वट सावित्रि व्रत की कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ वट सावित्रि व्रत की यह कथा सत्यवान-सावित्रि के नाम से उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित हैं। कथा के अनुसार एक समय की बात है कि मद्रदेश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा का राज था। उनकी कोई भी संतान नहीं थी। राजा ने संतान हेतु यज्ञ करवाया। कुछ समय बाद उन्हें एक कन्या की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा। विवाह योग्य होने पर सावित्री के लिए द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में वरण किया। सत्यवान वैसे तो राजा का पुत्र था लेकिन उनका राज-पाट छिन गया था और अब वह बहुत ही द्ररिद्रता का जीवन जी रहे थे। उसके माता-पिता की भी आंखो की रोशनी चली गई थी। सत्यवान जंगल से लकड़ियां काटकर लाता और उन्हें बेचकर जैसे-तैसे अपना गुजारा कर रहा था। जब सावित्रि और सत्यवान के विवाह की बात चली तो नारद मुनि ने सावित्रि के पिता राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। हालांकि राजा अश्वपति सत्यवान की गरीबी को देखकर पहले ही चिंतित थे और सावित्रि को समझाने की कोशिश में लगे थे। नारद की बात ने उन्हें और चिंता में डाल दिया लेकिन सावित्रि ने एक न सुनी और अपने निर्णय पर अडिग रही। अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा में लगी रही। नारद मुनि ने सत्यवान की मृत्यु का जो दिन बताया था, उसी दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ वन को चली गई। वन में सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ने लगा, उसके सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। कुछ देर बाद उनके समक्ष अनेक दूतों के साथ स्वयं यमराज खड़े हुए थे। जब यमराज सत्यवान के जीवात्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, पतिव्रता सावित्री भी उनके पीछे चलने लगी। आगे जाकर यमराज ने सावित्री से कहा, ‘हे पतिव्रता नारी! जहां तक मनुष्य साथ दे सकता है, तुमने अपने पति का साथ दे दिया। अब तुम लौट जाओ’ इस पर सावित्री ने कहा, ‘जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे जाना चाहिए। यही सनातन सत्य है’ यमराज सावित्री की वाणी सुनकर प्रसन्न हुए और उसे वर मांगने को कहा। सावित्री ने कहा, ‘मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जाने को कहा और आगे बढ़ने लगे किंतु सावित्री यम के पीछे ही चलती रही यमराज ने प्रसन्न होकर पुन: वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर मांगा, ‘मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर पुनः उसे लौट जाने को कहा, परंतु सावित्री अपनी बात पर अटल रही और वापस नहीं गयी। सावित्री की पति भक्ति देखकर यमराज पिघल गए और उन्होंने सावित्री से एक और वर मांगने के लिए कहा तब सावित्री ने वर मांगा, ‘मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें’ सावित्री की पति-भक्ति से प्रसन्न हो इस अंतिम वरदान को देते हुए यमराज ने सत्यवान की जीवात्मा को पाश से मुक्त कर दिया और अदृश्य हो गए। सावित्री जब उसी वट वृक्ष के पास आई तो उसने पाया कि वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हो रहा है। कुछ देर में सत्यवान उठकर बैठ गया। उधर सत्यवान के माता-पिता की आंखें भी ठीक हो गईं और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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#जय श्री राम उर्मिला का त्याग 🙏 जब श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला, तब उनके साथ माता सीता और लक्ष्मण भी वन जाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन उस समय एक स्त्री ऐसी भी थी, जिसका त्याग सबसे बड़ा था — वह थीं उर्मिला, लक्ष्मण जी की पत्नी। जब लक्ष्मण वन जाने लगे, तब उर्मिला ने उनसे पूछा— “स्वामी, क्या मैं भी आपके साथ वन चलूँ?” लक्ष्मण कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले—🚩 “उर्मिला, वन में मेरा एक ही कर्तव्य होगा — प्रभु श्रीराम और माता सीता की सेवा। यदि तुम साथ चलोगी, तो मेरा मन तुम्हारी चिंता में भी बँटा रहेगा।” यह सुनकर उर्मिला की आँखें नम हो गईं, लेकिन उन्होंने अपने पति के धर्म और कर्तव्य को समझा। उन्होंने मुस्कुराकर कहा—🚩 “यदि आपका धर्म प्रभु की सेवा करना है, तो मेरा धर्म आपके धर्म का साथ देना है।” इतना कहकर उर्मिला ने अपने आँसू छिपा लिए और लक्ष्मण को वन जाने की अनुमति दे दी। कहते हैं कि 14 वर्षों तक लक्ष्मण ने एक पल भी नींद नहीं ली, ताकि वे रात-दिन श्रीराम और सीता की रक्षा कर सकें। लेकिन यह संभव कैसे हुआ?🚩 मान्यता है कि निद्रा देवी लक्ष्मण के पास आईं और बोलीं— “प्रकृति के नियम के अनुसार बिना सोए कोई जीवित नहीं रह सकता।” तब लक्ष्मण ने विनती की—🚩 “हे देवी, मेरी नींद किसी और को दे दीजिए।” तब उर्मिला ने अपने पति के तप और सेवा को सफल बनाने के लिए स्वयं 14 वर्षों तक निद्रा का भार स्वीकार कर लिया। उधर वन में लक्ष्मण जागते रहे… और इधर अयोध्या में उर्मिला मौन त्याग की प्रतिमा बनकर सब सहती रहीं।🚩 उन्होंने न शिकायत की, न दुःख प्रकट किया। जब 14 वर्ष बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे, तब सबने उनके वनवास की चर्चा की। लेकिन उर्मिला का त्याग अक्सर मौन ही रह गया। फिर भी इतिहास उन्हें उस स्त्री के रूप में याद करता है, जिसने बिना किसी प्रसिद्धि की इच्छा के सबसे बड़ा बलिदान दिया।🙏 कथा से शिक्षा ✨ सच्चा प्रेम त्याग और समझ से बना होता है। हर महान कार्य के पीछे किसी का मौन बलिदान छिपा होता है। कर्तव्य और धैर्य मनुष्य को महान बनाते हैं।
sn vyas
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.🙏श्रीकृष्ण प्राणवल्लभा–‘राधा’🙏 श्रीराधाजी भगवान् श्रीकृष्ण की परम प्रिया हैं तथा उनकी अभिन्न मूर्ति भी। राधाजी भगवान् श्रीकृष्ण के प्राणों की अघिष्ठात्री देवी हैं, अत: भगवान् इनके अधीन रहते हैं। श्रीराधाजी का एक नाम कृष्णवल्लभा भी है क्योंकि वे श्रीकृष्ण को आनन्द प्रदान करने वाली हैं। भगवान् श्रीकृष्ण दो रूपों में प्रकट हैं–द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज रूप में वे बैकुण्ठ में देवी लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और तुलसी के साथ वास करते हैं परन्तु द्विभुज रूप में वे गौलोक धाम में राधाजी के साथ वास करते हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम इतना गहरा था कि एक को कष्ट होता तो उसकी पीड़ा दूसरे को अनुभव होती। राधाजी श्रीकृष्ण का अभिन्न भाग हैं। इस तथ्य को इस कथा से समझा जा सकता है कि वृन्दावन में श्रीकृष्ण को जब दिव्य आनन्द की अनुभूति हुई तब वह दिव्यानन्द ही साकार होकर बालिका के रूप में प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण की यह प्राण शक्ति ही राधाजी हैं। राधाजी का नाम कृष्ण से भी पहले लिया जाता है। राधा नाम के जाप से श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर दया करते हैं। राधाजी का श्रीकृष्ण के लिए प्रेम नि:स्वार्थ था तथा उसके लिए वे किसी भी तरह का त्याग करने को तैयार थीं। राधाजी ने यह कहकर अपनी चरण धूलि दी कि भले ही मुझे 100 नरकों का पाप भोगना पडे तो भी मैं अपने प्रिय के स्वास्थ्य लाभ के लिए चरण धूलि अवश्य दूँगी। श्रीकृष्ण का राधा से इतना प्रेम था कि कमल के फूल में राधाजी की छवि की कल्पना मात्र से वो बेहोश हो गये तभी तो विद्ववत जनों ने कहा राधा तू बडभागिनी, कौन पुण्य तुम कीन। तीन लोक तारन तरन सो तोरे आधीन॥ जय जय श्री राधे॥ #जय श्री राधे
sn vyas
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#❤️जीवन की सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈 एक नदी में कुछ ऋषि पुत्रियाँ नग्न-अर्धनग्न अवस्था में स्नान कर रही थीं! कुछ पानी के अंदर थी और कुछ किनारे बैठी हँसी ठिठोली करती हुईं अपना अपना शरीर साफ कर रही थीं । तभी उन्हें पदचाप सुनाई दी । देखा तो व्यास ऋषि इधर ही आ रहे थे! उनके निकट आते ही बाहर बैठीं ऋषिकन्याएँ जल के अंदर चली गईं और उनके आगे बढ़ते ही फिर से बाहर आ गयी। थोड़ा आगे जाकर ऋषि ने नदी से जल ग्रहण किया और वापस चले गए। इस बार फिर से कन्याएं जल में उतर गयीं । थोड़ी ही देर में उधर से पदचाप सुनाई पड़ने पर कन्याओं ने देखा कि व्यास ऋषि के युवा पुत्र शुकदेवजी आ रहे हैं । कन्याएं वैसी ही बैठी स्नान करती रहीं और ब्यास जी आगे निकल गए । तभी कन्यायों ने देखा कि व्यास ऋषि अचानक इधर ही आ रहे हैं तो वे पानी मे उतर गयीं । इसबार व्यास ऋषि वहाँ ठहरे और बोले - पुत्रियों! मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि मुझ बूढ़े को देखकर तुम सभी को लज्जा और झिझक का आभास हो रहा है किंतु मेरे युवा पुत्र को देखकर कुछ भी नहीं । ऐसा क्यों ? एक कन्या ने गले तक जल में रहते हुए ही हाथ जोड़ते हुए कहा - क्षमा करें ऋषिवर! यह तो दृष्टि और विचारों के कारण ऐसा हो रहा है । ऋषि ,- मैं समझा नहीं । कृपया स्पष्ट कहें । कन्या - ऋषिवर, आपने हमें स्नान करते हुए न केवल देखा बल्कि हमारी क्रियाओं को भी संज्ञान में लिया जबकि वे आ रहे (एक तरफ संकेत करते हुए) शुकदेव जी ने न तो हमें स्नान करते हुए देखा और न हमारी क्रियाओं को संज्ञान में लिया । ऋषि - ऐसा कैसे सम्भव है कि शुकदेव ने तुम सभी को देखा ही न हो! फिर समीप आने पर उन्होंने शुकदेव जी को रोककर पूछा - शुकदेव, क्या आपने इन कन्याओं को तट पर स्नान करते हुए नहीं देखा ? शुकदेव जी - तात! कौन सा तट और कौन सी कन्याएं ! मैं तो प्रभुपद में निमग्न हूँ । और वे प्रणाम करते हुए आगे चले गये! ऋषि - क्षमा करना कन्याओं, आज मैं समझ गया कि शुकदेव क्यों श्रेष्ठ है! निष्कर्ष : ये दृष्टि ही तो है कि जब स्वयं की माँ, बहन या बेटी के गुह्य अंग दिखते हैं तब यह झुक जाती है और विचार भी उत्तेजक नहीं होते हैं बल्कि हम धीरे से या तो उस स्थान से हट जाते हैं या फिर अन्यत्र देखने लगते हैं। किन्तु यहीं पर यदि इनसे पृथक कोई अन्य स्त्री कुछ ऐसी ही दशा में होती है तो दृष्टि और विचारों में उलट प्रतिक्रिया होने लगती है । हम उनका पीछा भी करते हैं । दोष फिर भी स्त्री का .. भला क्यों ? राम नाम पावन परम सकल कलुष दे धोय, राम शरण जो आ गया शुद्ध वही जन होय, सभी यही कहते हैं कि हमारे घर की स्त्रियाँ ऐसी नहीं हैं किन्तु कभी दूसरों की दृष्टि और विचारों से भी उन्हें परख कर देख लेते तो शायद दोष किसका है समझ मे आ जाता । भइया जी, जो विचार और दृष्टि हम दूसरे की बहन बेटियों के लिए रखते हैं, दूसरों की वैसी ही दृष्टि और विचार हमारी बहन बेटियों के लिए भी रहते हैं चाहे हम उन्हें कितने ही परदे और बंदिशों में रख लें। दूसरों के कपड़े या भाव भंगिमा पर कटाक्ष करने से पहले हमें अपनी नज़र और विचारों को अनुशासित और संयमित रखना पड़ेगा ।
sn vyas
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“जब इंद्र ने भेजीं स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सराएँ… फिर भी नहीं डिगा उनका मन! 😳 जानिए नर-नारायण की अद्भुत तपस्या का रहस्य” 🌸 कथा को अंत तक जरूर पढ़ें… क्योंकि यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि मन को जीतने का रहस्य है। 🚩🙏 प्राचीन काल की बात है… जब पृथ्वी पर धर्म और सत्य का प्रकाश धीरे-धीरे कम हो रहा था, तब धर्मदेव और मूर्ति देवी के घर दो दिव्य तेजस्वी पुत्रों ने जन्म लिया। जैसे ही वे प्रकट हुए, चारों ओर अलौकिक प्रकाश फैल गया… मानो स्वयं देवताओं ने उनके आगमन का स्वागत किया हो। उनका नाम रखा गया — नर और नारायण। कहा जाता है… नारायण स्वयं भगवान विष्णु का अंश थे, और नर उनके साथ जन्मे तप के प्रतीक। 🏔️ हिमालय की ओर एक दिव्य यात्रा बचपन से ही दोनों भाइयों का मन संसार की चकाचौंध में नहीं लगा। जहाँ अन्य बालक खेलते थे… वहीं ये दोनों एकांत में बैठकर ध्यान करते, वेदों का चिंतन करते और प्रभु का स्मरण करते। समय बीता… और उनका वैराग्य इतना गहरा हो गया कि उन्होंने एक बड़ा संकल्प लिया— 👉 “हम ऐसा तप करेंगे, जो संसार को आत्मसंयम का मार्ग दिखाए।” और फिर… वे निकल पड़े हिमालय की ओर, जहाँ पहुँचे पवित्र बद्रीवन (बद्रीनाथ) में। 🔥 ऐसी तपस्या… कि हिल उठा देवलोक! वहाँ उन्होंने जो तपस्या शुरू की… वह साधारण नहीं थी। दिन बीते… महीने बीते… वर्ष बीत गए… कभी वे एक पैर पर खड़े होकर ध्यान करते कभी बर्फीली हवाओं में अचल बैठ जाते कभी अन्न-जल त्यागकर केवल वायु पर जीवित रहते उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि… ⚡ पृथ्वी कांपने लगी ⚡ नदियाँ शांत हो गईं ⚡ और उसकी ऊर्जा सीधा देवलोक तक पहुँच गई 😨 इंद्र का भय… और एक चाल! स्वर्ग के राजा इंद्र चिंतित हो उठे। उन्हें डर था— 👉 “अगर ये ऋषि कोई वरदान माँग लें, तो मेरा इंद्रासन खतरे में पड़ सकता है!” बस… यहीं से शुरू हुई एक चाल। इंद्र ने बुलाया कामदेव को… और साथ भेजीं स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सराएँ— ✨ रंभा ✨ मेनका ✨ और कई दिव्य नर्तकियाँ 🌸 वसंत का जादू… लेकिन मन अडिग! जैसे ही वे बद्रीवन पहुँचीं… पूरा वातावरण बदल गया— 🌼 फूल खिल उठे 🌬️ सुगंधित पवन बहने लगी 🎶 मधुर संगीत गूंजने लगा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं… कामदेव ने अपने पुष्पबाण चला दिए… लेकिन… 👉 नर-नारायण की आँखें ध्यान में बंद थीं 👉 उनके मन में कोई विकार नहीं उठा ⚡ फिर जो हुआ… उसने इंद्र का अहंकार तोड़ दिया! कुछ समय बाद… नारायण ने अपनी आँखें खोलीं। उन्होंने सब समझ लिया… और मुस्कुरा दिए। ना क्रोध… ना अहंकार… बस उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से अपनी जंघा (ऊरु) से एक अद्भुत रूपवती स्त्री प्रकट कर दी। उसकी सुंदरता ऐसी थी कि— 👉 अप्सराएँ भी उसके सामने फीकी पड़ गईं! वही दिव्य नारी आगे चलकर उर्वशी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। 🙏 इंद्र का झुका हुआ सिर जब अप्सराओं ने यह देखा… तो वे स्वयं लज्जित हो गईं। और जब यह समाचार इंद्र तक पहुँचा— तो उनका अहंकार चूर-चूर हो गया। वे स्वयं बद्रीवन आए… और नर-नारायण के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी। 👉 और देखिए उनकी महानता… दोनों ऋषियों ने मुस्कुराकर उन्हें क्षमा कर दिया। 🔱 इस कथा का गहरा रहस्य नर-नारायण ने हजारों वर्षों तक तप किया… और संसार को एक अमर संदेश दिया— ✨ सच्चा बल शरीर में नहीं… मन पर नियंत्रण में है। ✨ जिसने अपने मन को जीत लिया… उसे कोई भी प्रलोभन नहीं डिगा सकता। 🕉️ महाभारत से जुड़ा रहस्य मान्यता है कि— 👉 नर ने अर्जुन के रूप में जन्म लिया 👉 नारायण स्वयं कृष्ण बने इसलिए कृष्ण और अर्जुन की मित्रता सिर्फ मित्रता नहीं… बल्कि एक सनातन दिव्य संबंध है। 🚩 अंतिम संदेश यह कथा हमें सिखाती है— 👉 तपस्या सिर्फ जंगल में बैठना नहीं है 👉 असली तप है अपनी इच्छाओं, मन और अहंकार पर विजय पाना जिसने यह कर लिया… उसके लिए जीवन की कोई भी बाधा बड़ी नहीं रहती। 👉 अगर आप भी मानते हैं कि मन पर विजय ही सबसे बड़ी शक्ति है, तो “जय नारायण 🙏” कमेंट में जरूर लिखें! #🕉️सनातन धर्म🚩 #❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान
sn vyas
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#🌷🌷ॐ नमः शिवाय🌹🌹🙏🙏 #🙏शिव पार्वती प्राचीन समय की बात है। माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष के विरोध के बावजूद भगवान शिव से विवाह किया था। लेकिन राजा दक्ष इस विवाह से कभी प्रसन्न नहीं हुए।🚩 एक दिन राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में सभी देवताओं और ऋषियों को आमंत्रित किया गया, लेकिन जानबूझकर भगवान शिव और माता सती को नहीं बुलाया गया।🚩 जब माता सती को यह पता चला, तो उन्होंने शिवजी से कहा कि वे अपने पिता के घर जाना चाहती हैं। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि जहाँ अपमान हो, वहाँ जाना उचित नहीं। लेकिन पिता के प्रेम में माता सती यज्ञ में पहुँच गईं।🚩 यज्ञ स्थल पर पहुँचते ही उन्होंने देखा कि किसी ने भी उनका सम्मान नहीं किया। राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान करना शुरू कर दिया। यह सुनकर माता सती का हृदय टूट गया। उन्होंने क्रोधित और दुखी होकर कहा— “जिस शरीर ने ऐसे पिता से जन्म लिया है जो मेरे स्वामी का अपमान करे, वह शरीर अब मेरे लिए व्यर्थ है।”🚩 इतना कहकर माता सती ने यज्ञ अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। जब यह समाचार भगवान शिव तक पहुँचा, तो उनका क्रोध और शोक पूरे ब्रह्मांड में फैल गया। उन्होंने अपने जटाओं से वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने यज्ञ का विनाश कर दिया। फिर भगवान शिव माता सती के जले हुए शरीर को उठाकर पूरे ब्रह्मांड में विलाप करते हुए घूमने लगे। उनके दुख से सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। देवता भयभीत हो गए।🚩 तब भगवान विष्णु ने संसार की रक्षा के लिए अपना सुदर्शन चक्र चलाया। सुदर्शन चक्र ने माता सती के शरीर के 51 खंड कर दिए। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।🚩 कहा जाता है कि ये 51 शक्तिपीठ आज भी देवी शक्ति के सबसे पवित्र स्थान माने जाते हैं। हर शक्तिपीठ में माता के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है।🚩 यह कथा केवल दुख की नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति और सृष्टि के संतुलन की भी प्रतीक है। माता सती ने अगले जन्म में माता पार्वती के रूप में जन्म लिया और पुनः भगवान शिव से विवाह किया।🚩
sn vyas
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ब्रह्मा जी की पुत्री अहिल्या को यह वरदान प्राप्त था कि वह सदा ही 16 वर्ष की आयु के सदृश ही रहेंगी। जय जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 ब्रह्मा जी ने एक स्पर्धा करवाई, जिसे गौतम ऋषि ने जीता और अहिल्या को पत्नी रूप में प्राप्त किया। अहिल्या के रूप की चर्चा तीनों लोकों में थी। अपने रूप, गुण, सौन्दर्य और पतिव्रत धर्म के पालन के कारण ही वह भक्तों के मन में बसी हुई हैं। देवराज इन्द्र ने जब अहिल्या के बारे में सुना तो उन्होंने सूर्य से उसकी सुन्दरता के बारे में पूछा। सूर्यदेव ने इन्द्र देव की भावना भांप कर अपनी असमर्थता जताई। तब इंद्र ने चंद्रमा से पूछा तो उसने कहा कि अहल्या से अधिक रूपवती, गुणवान और पतिव्रता स्त्री सारी सृष्टि में कोई और नहीं है। ऐसा सुनकर इन्द्र ने छल रूप से अहिल्या को पाने का प्रयास करते हुए चंद्रमा की सहायता ली। योजना बनाई कि जब ऋषि गौतम प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में गंगा स्नान को जाते हैं वही समय अहिल्या को पाने के लिए सही है। इंद्र ने चन्द्रमा को अपने काम में साथ देने के लिए उन्हें ऋषि के आश्रम के ऊपर ही टिके रहने के लिए कहा ताकि जब वह किसी को आश्रम की ओर आता देखे तो वह आश्रम के ऊपर से हट जाए क्योंकि चंद्रमा के हटने पर किसी को शक भी नहीं होगा तथा इन्द्र को ऋषि के आने की सूचना भी चंद्रमा के इस संकेत से मिल जाएगी। अहिल्या को पाने की लालसा से आधी रात को ही इंद्र ने मुर्गा बन कर बांग लगाई और ऋषि गौतम प्रात: हो गई सोचकर गंगा स्नान के लिए आश्रम से निकल गए। तब इंद्र ने झट से ऋषि गौतम का वेश बनाया और आश्रम में जाने लगे तो अहिल्या ने अपने तपोबल के प्रभाव से इंद्र को पहचान लिया और कहा कि ‘यदि मेरे पति हो तो आश्रम में आ जाओ’। इंद्र के छल की लालसा को देखकर अहिल्या ने उसे श्राप दिया कि तुम्हें कोढ़ हो जाए। दूसरी तरफ जब ऋषि गौतम ने गंगा स्नान करने के लिए कमंडल में जल भरा तो गंगा मां ने कहा कि अभी तो आधी रात हुई है, तो ऋषि आश्रम की ओर वापस चल पड़े। आश्रम के बाहर उन्होंने अपने वेश में ही इन्द्र को अपने साथ टकरा कर जाते हुए देखा और छत पर चन्द्रमा को पहरेदारी करते देखकर सारी स्थिति को भांप लिया। ऋषि पत्नी अहिल्या उनके जल्दी आश्रम में लौट आने की चिंता में जैसे ही बाहर आई तो ऋषि गौतम ने अहिल्या को शिला होने और चन्द्रमा को इन्द्र का साथ देने के लिए उसमें दाग होने और ग्रहण लगने का तत्काल श्राप दे दिया। जिसके प्रभाव से अहिल्या आश्रम के बाहर एक पत्थर की शिला बन गई। देवर्षि नारद ने तब ऋषि गौतम को अहिल्या के बेकसूर होने के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि श्राप तो नहीं मिटाया जा सकता परन्तु उन्होंने अहिल्या को एक वरदान भी दिया कि सूर्यवंशी भगवान श्री राम जब उस शिला के साथ अपने चरणों का स्पर्श करेंगे तो वह पूर्ववत हो जाएगी। धर्मग्रंथों में चंद्रमा के कलंक लगने और ग्रहण लगने के बारे में भी अनेक कथाएं मिलती हैं, परंतु ऋषि गौतम का श्राप भी उनमें से एक है। मिथिला में राजा जनक के धनुष यज्ञ को दिखाने के लिए गुरु विश्वामित्र उन्हें साथ लेकर जा रहे थे तो ‘आश्रम एक दीख मग माहीं, खग, मृग, जीव जन्तु तंह नाहीं, पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी, सकल कथा मुनि कहा बिसेषी’। गुरु विश्वामित्र ने बताया ‘गौतम नारी श्राप बस उपल देह धरि धीर, चरण कमल रज चाहति, कृपा करो रघुबीर’। श्री राम जी के पवित्र एवं शोक का नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई और भक्तों को सुख देने वाले प्रभु को सामने देखकर वह प्रभु चरणों से लिपट गई। *परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥ अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥ भावार्थ:-श्री रामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री रघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनंद के आँसुओं) की धारा बहने लगी॥ *धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥ मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥ भावार्थ:-फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्री रघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की- हे ज्ञान से जानने योग्य श्री रघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगत को पवित्र करने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥ *मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥ बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥ भावार्थ:-मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥ *जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥ भावार्थ:-जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पतिलोक को चली गई॥ *अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥ भावार्थ:-प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥ !!राम राम सब कोई कहे,ठग ठाकुर और चोर!! !! जिस राम से मीरा तले,वह राम कोई और!!
sn vyas
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1 hours ago
#जय श्री राधे कृष्ण 🌸🔥 “रुक्मिणीजी भी रह गईं स्तब्ध! 😱 जब पहली बार हुआ राधा रानी का दर्शन… कृष्ण प्रेम का सबसे बड़ा रहस्य उजागर!” 🔥🌸 द्वारिका के महल में एक दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने स्वयं महारानी रुक्मिणी के हृदय को भी झकझोर दिया… भगवान श्रीकृष्ण एकांत में बैठे थे। उनकी आंखें बंद थीं… और अधरों पर बार-बार एक ही नाम था— “राधा… राधा…” 💫 उनकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी… मानो वे किसी ऐसी स्मृति में खो गए हों, जो शब्दों से परे थी। 👑 यह दृश्य देखकर रुक्मिणीजी चकित रह गईं। उन्होंने कभी कृष्ण को इस तरह भावविभोर नहीं देखा था। उनके मन में एक प्रश्न उठा— 👉 “आखिर वो कौन हैं… जिनका नाम लेते ही स्वयं प्रभु इतने अधीर हो जाते हैं?” धीरे से उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की— “स्वामी… मैं उस राधा के दर्शन करना चाहती हूँ।” 🙏 🌸 समय बीता… और वह दिव्य क्षण आ ही गया। जब प्रभास क्षेत्र में ब्रजवासी और द्वारिका का सारा परिकर एकत्र हुआ, तब श्रीकृष्ण ने रुक्मिणीजी को अकेले ही राधारानी के दर्शन के लिए भेजा। 💫 लेकिन जो हुआ… वह किसी चमत्कार से कम नहीं था! जैसे ही रुक्मिणीजी राधाजी के महल के द्वार पर पहुँचीं… वहाँ खड़ी एक सखी को देखकर ही वे ठिठक गईं। उस सखी का सौंदर्य… इतना अद्भुत, इतना दिव्य था… कि रुक्मिणीजी को लगा 👉 “यही राधा होंगी!” 😳 लेकिन यह तो बस शुरुआत थी… 🌈 महल की सात सीढ़ियाँ… और हर सीढ़ी पर एक नया रहस्य! जैसे-जैसे रुक्मिणीजी आगे बढ़ती गईं, हर सीढ़ी पर उन्हें एक नई सखी मिली— ✨ जिसका रूप करोड़ों लक्ष्मियों से भी अधिक तेजस्वी था… ✨ जिसकी आभा पूरे वातावरण को आलोकित कर रही थी… हर कदम पर उनका अहंकार पिघलता जा रहा था… हर दृश्य उनके भीतर कुछ तोड़ रहा था… 💥 और फिर… आया वह क्षण! जब वे अंततः श्री राधारानी के समक्ष पहुँचीं… 😱 वे स्तब्ध रह गईं! राधाजी का रूप… वर्णन से परे था… उनकी सुंदरता स्थिर नहीं थी— वह हर क्षण बदलती, निखरती, और और भी दिव्य होती जा रही थी। 👉 यही है “नित्य नवायमान” स्वरूप— जो हर पल नया, हर पल अद्वितीय होता है। 🌸 रुक्मिणीजी की आँखें झुक गईं… वाणी मौन हो गई… और हृदय पूर्णतः समर्पित हो गया। 💖 🌧️ जब वे लौटकर आईं… तो उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा— 👉 “प्रभु… आज तक मुझे अपनी शक्तियों और स्थान पर गर्व था… लेकिन राधाजी के प्रेम और रूप के आगे… सब कुछ तुच्छ है।” और फिर उन्होंने वह प्रश्न पूछा— 👉 “आप उनके बिना कैसे रहते हैं?” 💫 कृष्ण मुस्कुराए… और एक गहरा सत्य प्रकट किया: “मैं उनसे कभी दूर नहीं हूँ… राधा मेरे हृदय में हैं… और मैं उनके।” ❤️ 🌸 इस कथा का गहरा संदेश: 👉 राधा सिर्फ एक नाम नहीं… वह शुद्ध प्रेम का सर्वोच्च स्वरूप हैं। 👉 कृष्ण शक्ति हैं… तो राधा उस शक्ति की आत्मा हैं। 👉 जहाँ राधा हैं, वहीं कृष्ण हैं… और जहाँ सच्चा प्रेम है, वहीं भगवान का वास है। ✨ यह कथा हमें सिखाती है— कि भक्ति में स्थान, पद या शक्ति नहीं… केवल प्रेम का महत्व है।
sn vyas
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5 hours ago
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞? ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *इस संसार में जन्म लेने के बाद एक मनुष्य को पूर्ण मनुष्य बनने के लिए उसके हृदय में दया , करुणा , आर्जव , मार्दव ,सरलता , शील , प्रतिभा , न्याय , ज्ञान , परोपकार , सहिष्णुता , प्रीति , रचनाधर्मिता , सहकार , प्रकृतिप्रेम , राष्ट्रप्रेम एवं अपने महापुरुषों आदि के प्रति अगाध श्रद्धा का होना परम आवश्यक है | यह सारे सद्गुण जिस मनुष्य में होते हैं वही पूर्ण मानव कहा जा सकता है | यही सारे सद्गुण मिलकर एक सुंदर समाज की रचना करते हैं | इनका आरोपण मनुष्य में किस प्रकार हो ? इस पर गहन चिंतन हमारे ऋषि महर्षियों ने सृष्टि के आदिकाल में ही कर लिया था | इन सारे उत्तम गुणों का आवाहन एक-एक व्यक्ति में करने के लिए ही सनातन धर्म में संस्कार की व्यवस्था बनाई गई थी क्योंकि हमारे सद्ग्रंथों में लिखा है :- "संस्कारोहि गुणान्तरा धानमुच्चते" अर्थात संस्कार का प्रभाव अलग होता है | मनुष्य के दुर्गुणों को निकालकर उसमें सद्गुण आरोपित करने की प्रक्रिया को ही संस्कार कहा जाता है | यदि देखा जाय तो मानव जीवन को परिष्कृत करने वाली आध्यात्मिक विद्या का नाम ही संस्कार है | संस्कारों से संपन्न होने वाला मानव सुसंस्कृत , चरित्रवान , सदाचारी और भक्तिपरायण हो सकता है अन्यथा कुसंस्कार से प्रेरित एवं पीड़ित होकर मनुष्य पतित हो जाता है | अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य में संस्कार का होना परम आवश्यक है | हमारी भारतीय संस्कृति में संस्कारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है इसी क्रम में गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यंत अनेकों सांस्कारिक प्रयोग बताए जाते रहे हैं | संस्कार विहीन मनुष्य पशु की भांति ही जीवन यापन करता रहता है और वह अपने लक्ष्य को निर्धारित नहीं कर पाता , जबकि संस्कारी व्यक्ति की क्रिया सत्य सनातन को खोजने की यात्रा बन जाती है इस सत्य को खोजने का प्रयास करने वाला ही समाज एवं मानवता के लिए सर्वस्व निछावर कर सकता है | समस्त विश्व में भारत देश एक आदर्श संस्कृति एवं संस्कार के लिए जाना जाता रहा है हमारे संस्कारों ने ही हम को विश्व गुरु का दर्जा दिया था | विश्व के समस्त देशों ने हमारे संस्कारों को ग्रहण करने का प्रयास किया है | संस्कारों से संस्कृत होकर सामान्य मनुष्य भी ऋषियों के समान पूज्य हो जाता है | जो सम्मान समाज एवं देश में एक संस्कारी व्यक्ति पा जाता है वह सम्मान किसी अन्य को प्राप्त होना दुर्लभ है | संस्कारों का ही महत्व था कि परिवार व्यवस्था हमारे भारत देश में आज तक चल रही है अन्यथा अन्य देशों में तो एकल परिवार प्रारंभ से ही देखे जा सकते हैं | संस्कार विहीन होकर मनुष्य ना तो अपना कल्याण कर सकता है ना ही समाज एवं देश का |* *आज संस्कारी कहा जाने वाला हमारा देश भारत भी आधुनिकता की चपेट में दिख रहा है | संस्कारों की कमी आज हमारे देश में भी स्पष्ट दिखाई पड़ने लगी है | संस्कार की प्रथम पाठशाला परिवार को कहा गया है | सनातन धर्म में बताए जाने वाले सोलह संस्कार आज कहने भर को रह गए है | इन दिव्य संस्कारों की बात छोड़ दिया जाय आज तो सामान्य संस्कार भी देखने को नहीं मिल रहे है | परिवार में माता पिता एवं समाज में सद्गुरु , महापुरुषों का सम्मान आज की युवा पीढ़ी नहीं करना चाहती है | इसका एक ही कारण है कि उनमें संस्कारों का आरोपण नहीं किया गया है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि किसी भी परिवार एवं समाज को चिरस्थाई प्रगतशील एवं उन्नतशील बनाने के लिए बनाने के लिए संस्कारों का महत्वपूर्ण योगदान होता है परंतु आज हम अपने ही बच्चों को संस्कारित नहीं कर पा रहे हैं | इसका कारण यह है कि स्वयं हमने भी संस्कारों से मुंह मोड़ लिया है | जब संस्कार स्वयं हम मे नहीं बचे हैं तो हम अपने बच्चों को संस्कारी कैसे बना सकते हैं | एकल परिवारों को बढ़ावा देने में इन संस्कारों का ना होना भी एक महत्वपूर्ण कारण कहा जा सकता है क्योंकि कोई भी परिवार एवं समाज तभी श्रेष्ठ आचरण का पालन कर सकता है जब उनमें संस्कार आरोपित किए गए हो | संस्कार एवं आचार ही सर्वश्रेष्ठ धर्म कहे गये हैं | संस्कार अर्थात आचार से विहीन मनुष्य पवित्रात्मा भी हो तो उसका इहलोक एवं परलोक दोनों ही नष्ट हो जाता है इसलिए मनुष्य में संस्कार का होना परम आवश्यक बताया गया है |* *एक मनुष्य में मानवीय संस्कार एवं सनातन संस्कारों का होना उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार जीवित रहने के लिए प्राणवायु | बिना प्राणवायु के मनुष्य एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता है उसी प्रकार बिना संस्कारों के मनुष्य का जीवन सुव्यवस्थित नहीं हो सकता |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇