#🪔सावन का पवित्र महीना 🙏
सावन का पवित्र महीना था। चारों तरफ भक्ति का वातावरण बना हुआ था। गांवों से लेकर शहरों तक हर गली में “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयकारे गूंज रहे थे। दूर-दूर तक केसरिया वस्त्र पहने कांवड़िए दिखाई देते थे। किसी के कंधे पर साधारण सी कांवड़ थी तो किसी ने उसे फूलों, घंटियों और रंग-बिरंगी पताकाओं से सजा रखा था। किसी के पैरों में छाले पड़ चुके थे, किसी का गला लगातार जयकारे लगाने से बैठ चुका था, फिर भी किसी के कदम रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। सबके मन में बस एक ही संकल्प था कि किसी भी तरह पवित्र जल भोलेनाथ तक पहुंचाना है। लेकिन उसी सावन में पूरी धाम में ऐसी अद्भुत लीला होने वाली थी, जिसे देखकर हजारों भक्तों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होने वाला था। क्योंकि कुछ ही दिनों बाद स्वयं भगवान जगन्नाथ अपने कंधे पर कांवड़ उठाकर एक भक्त की ओर चल पड़ने वाले थे। सवाल यह था कि आखिर क्यों? क्या भगवान शिव ने उन्हें बुलाया था? क्या कोई बड़ा संकट आने वाला था? या फिर किसी ऐसे भक्त की पुकार भगवान तक पहुंच चुकी थी, जिसकी आवाज दुनिया तक नहीं पहुंच पाई थी? इस रहस्य का उत्तर समय के साथ सामने आने वाला था।
कहानी शुरू होती है पूरी धाम से बहुत दूर बसे एक छोटे से गांव से। गांव छोटा था, लेकिन वहां के लोगों के दिल बहुत बड़े थे। चारों तरफ मिट्टी के घर, खेतों के बीच से गुजरती पतली पगडंडियां और सुबह-सुबह मंदिर की घंटियों की मधुर आवाज सुनाई देती थी। सावन आते ही पूरा गांव जैसे भक्ति के रंग में रंग जाता था। बच्चे हाथों में भगवा झंडियां लेकर गलियों में दौड़ते, मंदिरों में भजन और कीर्तन होते और गांव के नौजवान कांवड़ यात्रा की तैयारियों में जुट जाते। उन्हीं नौजवानों में एक था भोला। उसका नाम भी भोला था और स्वभाव भी बिल्कुल भोला। सीधा-सादा, मेहनती और कम बोलने वाला। लेकिन भगवान शिव के प्रति उसकी श्रद्धा ऐसी थी कि गांव का हर व्यक्ति उसे भोलेनाथ का सच्चा भक्त मानता था। हर वर्ष सावन में भोला कांवड़ लेकर यात्रा पर निकलता था। उसकी कांवड़ बहुत साधारण थी। एक पुराना बांस, दोनों ओर छोटे-छोटे कलश और ऊपर लाल कपड़े की एक पट्टी। लेकिन भोला के लिए वह केवल बांस और कलश नहीं थे। वह उसके पिता की आखिरी निशानी थी। उसके पिता जब जीवित थे तो हमेशा कहा करते थे, “बेटा, कांवड़ कितनी भी साधारण क्यों न हो, अगर उसे उठाने वाला दिल से भोलेनाथ को याद करता है तो वह सीधे भगवान तक पहुंचती है।” पिता अब इस संसार में नहीं थे, लेकिन उनकी आवाज आज भी भोला के मन में गूंजती थी। हर साल कांवड़ उठाने से पहले वह उसे माथे से लगाता और धीरे से कहता, “बाबा, इस बार भी आपके साथ चल रहा हूं।”
उस साल भी सावन आते ही भोला ने अपनी पुरानी कांवड़ निकालकर साफ की। उसने दोनों कलशों को धोया, बांस पर नया लाल कपड़ा बांधा और सुबह मंदिर जाकर भगवान शिव की पूजा की। बाहर से सब कुछ पहले जैसा ही था, लेकिन भोला के घर में एक बड़ी चिंता थी। उसकी मां कई दिनों से बीमार चल रही थीं और उस सुबह उनकी तबीयत पहले से भी ज्यादा खराब थी। भोला ने मां के माथे पर हाथ रखा और पूछा, “मां, अभी भी बुखार है?” मां ने आंखें खोलकर मुस्कुराने की कोशिश की और बोलीं, “कुछ नहीं हुआ बेटा, तू चिंता मत कर।” भोला थोड़ा नाराज होते हुए बोला, “आप हर बार यही कहती हो। सच क्यों नहीं बतातीं?” मां कुछ पल चुप रहीं और फिर धीरे से बोलीं, “सच यह है कि तू कांवड़ लेकर जाने की तैयारी कर रहा है और मुझे खुशी है कि मेरा बेटा हर साल की तरह इस बार भी भोलेनाथ की यात्रा पर जाएगा।” भोला ने मां की ओर देखा लेकिन उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। मां ने फिर पूछा, “तू जाएगा ना बेटा?” भोला चुप रहा। मां ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “इस बार भी भोलेनाथ को जल चढ़ाएगा ना?” भोला ने नजरें झुका लीं। उसके मन में एक तरफ वर्षों पुराना संकल्प था और दूसरी तरफ उसकी बीमार मां। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
उसी शाम गांव के कुछ लड़के भोला के घर पहुंचे। उनमें से एक ने आवाज लगाई, “भोला, चल रहा है ना इस बार? पिछली बार तो तू सबसे आगे था।” दूसरा हंसते हुए बोला, “इस बार हमें पीछे मत छोड़ देना।” भोला ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “तुम लोग जाओ, मैं देखता हूं।” उसके दोस्तों ने हंसकर कहा, “अरे ये देखता हूं क्या होता है? कांवड़ यात्रा है, कोई शादी नहीं कि इतना सोच-विचार करेगा।” वे हंसते हुए वहां से चले गए, लेकिन उनके जाते ही भोला की मुस्कान गायब हो गई। वह घर के अंदर आया तो मां उसे देख रही थीं। मां ने कहा, “बेटा, तू जा।” भोला ने तुरंत सिर हिला दिया, “नहीं मां, मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगा।” मां ने समझाया, “पड़ोस वाली काकी हैं ना, वे मेरा ध्यान रख लेंगी।” भोला ने कहा, “नहीं मां, भगवान की यात्रा बार-बार आ जाएगी, लेकिन आपकी सेवा करने का मौका अगर आज चला गया तो शायद दोबारा न मिले।” मां कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने बस अपने बेटे के सिर पर हाथ रख दिया। उस स्पर्श में आशीर्वाद भी था और बेटे की भक्ति को समझ लेने का भाव भी।
अगली सुबह गांव में कांवड़ यात्रा शुरू हो गई। ढोल बजने लगे, शंख बजने लगे और चारों तरफ “बोल बम” के जयकारे गूंज उठे। एक-एक करके गांव के सभी कांवड़िए निकलने लगे। भोला अपने घर के दरवाजे पर खड़ा सबको जाते हुए देखता रहा। किसी ने पीछे मुड़कर आवाज लगाई, “भोला, जल्दी आ जाना।” भोला ने केवल हाथ हिला दिया। कुछ देर बाद सड़क खाली हो गई। जयकारों की आवाज धीरे-धीरे दूर होती चली गई और पूरा गांव शांत हो गया। भोला धीरे-धीरे घर के अंदर आया। उसकी नजर दीवार से टिकी अपनी कांवड़ पर पड़ी। वह कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर उसने कांवड़ उठाई, उसे अपने सीने से लगाया और उसकी आंखों से एक आंसू निकलकर कांवड़ पर गिर पड़ा। उसने आंखें बंद करके कहा, “भोलेनाथ, इस बार मैं आपके पास नहीं आ पाया। मां को छोड़ नहीं सकता। अगर मेरी भक्ति में सच्चाई है तो मेरी मजबूरी समझ लेना।” उसने कांवड़ वापस रख दी और भगवान शिव की तस्वीर के सामने बैठकर हाथ जोड़ लिए। उसने न कोई शिकायत की, न कोई सवाल किया। बस सिर झुका दिया। लेकिन भोला को क्या पता था कि उसकी यह छोटी सी प्रार्थना उस स्थान तक पहुंच चुकी थी, जहां से भगवान अपने भक्तों के दिल की आवाज सुनते हैं।
उसी समय बहुत दूर पूरी धाम में भगवान जगन्नाथ के मंदिर के भीतर अचानक एक गहरी शांति छा गई। दीपक की लौ हल्के से कांपी। एक सेवक ने दूसरे की ओर देखा और पूछा, “तुमने कुछ महसूस किया?” दूसरे सेवक ने कहा, “पता नहीं, लेकिन आज कुछ अलग लग रहा है।” तभी भगवान जगन्नाथ के श्रीमुख पर एक हल्की मुस्कान दिखाई दी। वह मुस्कान ऐसी थी जैसे उन्हें किसी के दर्द का पता चल गया हो। कुछ ही क्षण बाद मंदिर की घंटियां तेज हो उठीं। महाप्रभु की दृष्टि जैसे किसी अनजानी दिशा में टिक गई। वहां कौन था, क्या हुआ था और भगवान किसकी ओर देख रहे थे, यह किसी को पता नहीं था। लेकिन एक बात निश्चित थी कि महाप्रभु ने अपने मन में कोई निर्णय ले लिया था।
इधर भोला की जिंदगी पहले जैसी चलती रही। गांव के बाकी लोग कांवड़ यात्रा पर जा चुके थे। भोला सुबह उठता, सबसे पहले मां के लिए दवा तैयार करता, फिर खेतों में मजदूरी करने चला जाता। शाम को लौटकर खाना बनाता, मां को खिलाता और रात में भगवान शिव के सामने दीपक जलाकर कुछ देर शांत बैठता। लेकिन उसके मन में एक सवाल बार-बार उठता, “क्या मैंने अपना संकल्प तोड़ दिया?” एक दिन गांव का ही एक व्यक्ति उसे रास्ते में मिल गया। उसने पूछा, “अरे भोला, इस बार कांवड़ नहीं उठाई?” भोला ने धीरे से कहा, “मां की तबीयत ठीक नहीं है।” वह व्यक्ति हंसते हुए बोला, “भक्ति में इतनी भी मजबूरी कैसी? भगवान के लिए थोड़ा त्याग तो करना ही पड़ता है।” भोला ने कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप आगे बढ़ गया। घर पहुंचकर वह सीधा अपनी कांवड़ के पास गया और उसे देखते हुए बोला, “भोलेनाथ, लोग कुछ भी कहें, आप तो जानते हैं ना कि मैं क्यों नहीं आया।” उसे नहीं पता था कि उसका यह सवाल भी सुना जा चुका है।
उधर पूरी धाम में भी कुछ बदल रहा था। मंदिर के सेवक पूजा की तैयारियों में लगे थे। एक सेवक ने दूसरे से कहा, “आज महाप्रभु का ध्यान कहीं और लगा हुआ लगता है।” दूसरे ने कहा, “कहीं कोई भक्त उन्हें याद तो नहीं कर रहा?” उसी समय भगवान जगन्नाथ के सामने रखा एक फूल नीचे गिर पड़ा। सेवक ने फूल उठाया और भगवान के श्रीमुख की ओर देखा। वही रहस्यमयी मुस्कान उनके चेहरे पर थी। जैसे कोई फैसला हो चुका हो। उधर कैलाश पर भगवान शिव शांत भाव से बैठे थे। माता पार्वती ने पूछा, “स्वामी, आज आपके मन में कुछ चल रहा है?” महादेव मुस्कुराए और बोले, “एक भक्त अपने धर्म को लेकर परेशान है।” माता पार्वती ने पूछा, “कौन सा भक्त?” भगवान शिव ने अपनी आंखें बंद कर लीं और बोले, “वही जिसे लगता है कि उसने मुझे छोड़ दिया है, जबकि असल में उसने मुझे ही चुना है।” पार्वती जी कुछ समझ नहीं पाईं। उन्होंने पूछा, “मैं समझी नहीं।” महादेव मुस्कुराकर बोले, “समय आने दो देवी।”
कुछ दिन और बीत गए। एक रात भोला की मां की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई। भोला घबरा गया। उसने मां को पुकारा, “मां, आंखें खोलो।” मां ने मुश्किल से आंखें खोलीं और बोलीं, “डर मत बेटा, मैं ठीक हूं।” भोला की आंखों से आंसू निकल पड़े। उसने कहा, “मां, आप बस ठीक हो जाओ। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।” उस रात वह भगवान शिव के सामने बैठा। दीपक की लौ उसके चेहरे पर कांप रही थी। उसने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, मैंने कभी आपसे कुछ नहीं मांगा। आज बस मां को ठीक कर दीजिए। मैं कांवड़ नहीं ला पाया, इसका दुख है, लेकिन मां को छोड़कर आता तो शायद खुद को कभी माफ नहीं कर पाता।” उसकी आवाज भर्रा गई। तभी घर के बाहर किसी ने आवाज लगाई, “भोला!” भोला तुरंत उठकर बाहर आया, लेकिन वहां कोई नहीं था। सिर्फ ठंडी हवा चल रही थी। आसमान में बादलों के बीच एक अजीब सी चमक दिखाई दे रही थी। भोला कुछ देर तक उस चमक को देखता रहा और फिर वापस घर के अंदर चला गया।
उधर उसी समय पूरी धाम में मंदिर की घंटियां अचानक तेज हो उठीं। लोग घबराकर मंदिर की ओर दौड़ने लगे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हो रहा है। लेकिन महाप्रभु अपना निर्णय ले चुके थे। अगले दिन सुबह पूरी धाम में भक्तों की भीड़ हमेशा की तरह दर्शन के लिए कतार में खड़ी थी। मंदिर में पूजा चल रही थी। तभी भगवान जगन्नाथ के सामने जल रहा दीपक तेजी से कांपने लगा। एक सेवक ने दूसरे की ओर देखा। अचानक मंदिर के भीतर एक दिव्य सुगंध फैल गई। भगवान जगन्नाथ के श्रीमुख पर वही करुणामयी मुस्कान दिखाई दी। कुछ ही क्षण बाद मंदिर के विशाल द्वार धीरे-धीरे खुलने लगे। बाहर खड़ी भीड़ की नजरें एक साथ द्वार की ओर उठ गईं। तभी किसी ने जोर से पुकारा, “महाप्रभु बाहर आ रहे हैं!” भीड़ में हलचल मच गई। लेकिन अगले ही पल जो दृश्य सामने आया, उसे देखकर हजारों भक्तों की सांसें थम गईं। स्वयं भगवान जगन्नाथ के कंधे पर एक कांवड़ थी। एक बुजुर्ग भक्त की आंखों में आंसू आ गए। वह कांपती आवाज में बोला, “महाप्रभु कांवड़ लेकर कहां जा रहे हैं?” किसी के पास इसका उत्तर नहीं था। जगन्नाथ जी शांत भाव से आगे बढ़ते रहे और धीरे-धीरे भक्तों की भीड़ भी उनके पीछे चल पड़ी।
किसी ने कहा, “शायद भगवान शिव ने उन्हें बुलाया है।” दूसरा बोला, “नहीं, जरूर किसी भक्त की पुकार है।” हजारों श्रद्धालु महाप्रभु के पीछे चलने लगे। उधर कैलाश पर भगवान शिव ने आंखें खोलीं। माता पार्वती ने पूछा, “स्वामी, क्या होने वाला है?” महादेव के चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने कहा, “आज एक भक्त को पता चलेगा कि उसकी भक्ति अधूरी नहीं थी।” पार्वती जी ने पूछा, “कौन सा भक्त?” शिवजी ने दूर आकाश की ओर देखते हुए कहा, “वही जिसने मेरे पास आने के बजाय अपनी मां के पास रहना चुना।” उधर भोला अपनी मां के पास बैठा था। अचानक गांव के बाहर शोर सुनाई दिया। लोग चिल्ला रहे थे, “भगवान जगन्नाथ आ गए!” भोला चौंककर बाहर निकला। पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। दूर सड़क पर हजारों लोगों की भीड़ थी और उस भीड़ के बीच स्वयं भगवान जगन्नाथ उसकी ओर बढ़ रहे थे। भोला की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने हाथ जोड़ दिए और जमीन पर बैठ गया।
भगवान जगन्नाथ उसके सामने आकर रुक गए। फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपने कंधे से कांवड़ उतारी। भोला फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने कहा, “प्रभु, मैं आपके पास नहीं आ सका। मां को छोड़ नहीं पाया। इसलिए मेरा संकल्प अधूरा रह गया।” भगवान जगन्नाथ के श्रीमुख पर करुणा भरी मुस्कान थी। उन्होंने कहा, “तुम्हारा संकल्प अधूरा नहीं था भोला। तुमने अपनी मां की सेवा को चुना था।” भोला ने आंसुओं से भरी आंखों से प्रभु को देखा। महाप्रभु ने कांवड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, “तुम मेरे लिए नहीं आ सके, इसलिए मैं तुम्हारे लिए चला आया।” भोला की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। गांव के लोग भी भावुक हो गए। लेकिन भोला के मन में अभी भी एक सवाल था। उसने कांपती आवाज में पूछा, “प्रभु, यह कांवड़ लेकर आप आखिर जा कहां रहे थे?” भगवान जगन्नाथ मुस्कुराए और बोले, “जहां तुम जाना चाहते थे। तुम्हारा संकल्प था कि भोलेनाथ तक जल पहुंचाना है। तुम नहीं जा सके, इसलिए आज तुम्हारी जगह मैं जाऊंगा।”
भोला की मां ने कमजोर आवाज में कहा, “प्रभु, मेरे बेटे ने तो आपकी यात्रा छोड़ दी थी। क्या आपने इसे क्षमा कर दिया?” महाप्रभु ने कहा, “मां, जिसने अपने सुख से पहले आपकी सेवा को चुना हो, उसे क्षमा की जरूरत नहीं। उसकी सेवा ही उसकी पूजा है।” भोला ने मां की ओर देखा। मां मुस्कुराईं और बोलीं, “जा बेटा, आज तेरी कांवड़ खुद भगवान उठा रहे हैं।” भोला ने मां के चरण छुए और भगवान जगन्नाथ के पीछे चल पड़ा। हजारों भक्त भी उनके साथ हो लिए। चलते-चलते मौसम बदलने लगा। आसमान में काले बादल छा गए और हल्की बारिश शुरू हो गई। कुछ दूर जाने के बाद भोला ने सामने देखा तो दूर बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां दिखाई देने लगीं। भोला ठिठक गया। उसने पूछा, “प्रभु, क्या हम...” भगवान जगन्नाथ मुस्कुराए, “हां भोला, अब हम कैलाश जा रहे हैं।”
उधर कैलाश पर भगवान शिव जैसे पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे। माता पार्वती ने दूर आकाश की ओर देखा और पूछा, “स्वामी, वो आ गए?” महादेव मुस्कुराए और बोले, “हां देवी। लेकिन इस बार कांवड़ कोई भक्त नहीं, मेरा प्रिय जगन्नाथ लेकर आ रहा है।” कैलाश की चोटियों पर अचानक दिव्य प्रकाश फैल गया। भोला को अब भी पता नहीं था कि अगले कुछ क्षणों में वह ऐसी लीला देखने वाला है जिसे वह जीवन भर नहीं भूल पाएगा। सामने बर्फ से ढका कैलाश था। ठंडी हवा चल रही थी और उस दिव्य वातावरण में स्वयं भगवान शिव खड़े थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें पहले से पता था कि महाप्रभु आने वाले हैं। भगवान जगन्नाथ आगे बढ़े। उनके कंधे पर वही कांवड़ थी। महादेव ने मुस्कुराकर कहा, “आइए महाप्रभु।” भगवान जगन्नाथ भी मुस्कुराए। उन्होंने कांवड़ नीचे रखी और दोनों कलशों का जल लेकर भगवान शिव को अर्पित किया।
भोला यह दृश्य देखकर भावुक हो गया। जिस जल को वह स्वयं लेकर आने वाला था, आज वही जल भगवान जगन्नाथ अपने हाथों से महादेव को चढ़ा रहे थे। भोला रोते हुए बोला, “प्रभु, मेरी इतनी सी भक्ति के लिए आपने इतना कष्ट क्यों किया?” भगवान शिव उसके पास आए और बोले, “कष्ट? भक्त के लिए चलना भगवान के लिए कष्ट नहीं, सौभाग्य है।” भोला की आंखों से आंसू बहते रहे। महादेव ने कहा, “तुम्हें लगता था कि इस बार तुम अपनी कांवड़ यात्रा पूरी नहीं कर पाए। लेकिन तुमने जो किया, वह उससे भी बड़ी यात्रा थी। तुमने अपनी इच्छा से पहले अपनी मां को चुना। याद रखना, जहां निस्वार्थ प्रेम होता है, वहीं भगवान की पूजा पूरी हो जाती है।” भगवान जगन्नाथ ने मुस्कुराकर कहा, “भक्त भगवान तक पहुंचने के लिए हजारों कदम चलता है, लेकिन जब किसी मजबूरी में उसके कदम रुक जाते हैं, तब भगवान खुद उसके लिए पूरी यात्रा चल पड़ते हैं।”
भोला फूट-फूटकर रो पड़ा। माता पार्वती ने उसकी मां को आशीर्वाद दिया और धीरे-धीरे उसकी मां की तबीयत भी ठीक होने लगी। भोला के लिए उस दिन सबसे बड़ा चमत्कार यही था कि उसे समझ आ गया था कि भगवान को पाने के लिए केवल लंबी यात्राएं करना ही भक्ति नहीं है। किसी भूखे को भोजन कराना, किसी बीमार की सेवा करना, मां-बाप का हाथ पकड़ना, किसी जरूरतमंद की मदद करना और अपनी खुशी से पहले किसी दूसरे की जरूरत को समझना भी पूजा ही है। उस दिन कैलाश की पवित्र चोटियों पर दो जयकारे एक साथ गूंज उठे, “हर हर महादेव” और “जय जगन्नाथ।” भोला ने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, अब समझ आया। मैं आपको ढूंढने निकला था, लेकिन आप तो पहले से मेरे साथ थे।” महादेव मुस्कुराए और भगवान जगन्नाथ ने कहा, “याद रखना भोला, सच्ची भक्ति में भगवान और भक्त के बीच दूरी नहीं होती। भक्त एक कदम पीछे हटे तो भगवान खुद आगे बढ़कर उसके पास आ जाते हैं।”
उस दिन भगवान जगन्नाथ कांवड़ इसलिए नहीं उठा रहे थे कि दुनिया को अपना चमत्कार दिखा सकें। वह कांवड़ इसलिए उठा रहे थे क्योंकि उनका भक्त अपने भगवान तक पहुंचने में असमर्थ था। और भगवान अपने सच्चे भक्त को अकेला कैसे छोड़ सकते थे? भोला ने उस दिन जाना कि भक्ति केवल मंदिर तक पहुंचने का नाम नहीं, बल्कि उस प्रेम का नाम है जिसमें इंसान अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे के लिए खड़ा होता है। भगवान के लिए चढ़ाया गया जल पवित्र होता है, लेकिन किसी की सेवा में बहा प्रेम भी उतना ही पवित्र होता है। और जब भक्ति के पीछे सच्चा भाव हो, तो भगवान को बुलाने के लिए ऊंची आवाज में पुकारने की भी जरूरत नहीं पड़ती। एक सच्चे भक्त की आंख से निकला एक आंसू भी भगवान तक पहुंच जाता है। भोला की कांवड़ उसके घर में रह गई थी, लेकिन उसकी भक्ति भगवान तक पहुंच गई थी। इसलिए जब भक्त भगवान तक नहीं पहुंच पाया, तो भगवान खुद भक्त तक चले आए। यही सच्ची भक्ति की शक्ति है। हर हर महादेव। जय जगन्नाथ।