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sn vyas
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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदि के जन्म तथा भीष्मजी के धर्मपूर्ण शासन से कुरुदेश की सर्वांगीण उन्नति का दिग्दर्शन...(दिन 331) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच (धृतराष्ट्र च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि ।) तेषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् । कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर-इन तीनों कुमारोंके जन्मसे कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र- इन तीनोंकी बड़ी उन्नति हुई ।। १ ।। ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च । यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ।। २ ।। पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत बढ़ गयी, सभी अन्न सरस होने लगे, बादल ठीक समयपर वर्षा करते थे, वृक्षोंमें बहुत-से फल और फूल लगने लगे ।। २ ।। वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः । गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ।। ३ ।। घोड़े हाथी आदि वाहन हृष्ट-पुष्ट रहते थे, मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे दिन बिताते थे, फूलों और मालाओंमें अनुपम सुगन्ध होती थी और फलोंमें अनोखा रस होता था ।। ३ ।। वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः । शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ।। ४ ।। सभी नगर व्यापार-कुशल वैश्यों तथा शिल्पकलामें निपुण कारीगरोंसे भरे रहते थे। शूर-वीर, विद्वान् और संत सुखी हो गये ।। ४ ।। नाभवन् दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः । प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ।। ५ ।। कोई भी मनुष्य डाकू नहीं था। पापमें रुचि रखनेवाले लोगोंका सर्वथा अभाव था। राष्ट्र के विभिन्न प्रान्तों में सत्ययुग छा रहा था ।। ५ ।। धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः । अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ।। ६ ।। उस समय की प्रजा सत्य-व्रत के पालन में तत्पर हो स्वभावतः यज्ञ-कर्म में लगी रहती और धर्मानुकूल कर्मों में संलग्न रहकर एक-दूसरे को प्रसन्न रखती हुई सदा उन्नतिके पथ पर बढ़ती जाती थी ।। ६ ।। मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः। अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ।। ७ ।। सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे। लोगोंके आचार-व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानता थी ।। ७ ।। तन्महोदधिवत् पूर्ण नगरं वै व्यरोचत । द्वारतोरणनिर्यू हैर्युक्तमभ्रचयोपमैः ।। ८ ।। समुद्रकी भाँति सब प्रकारसे भरा-पूरा कौरवनगर मेघसमूहोंके समान बड़े-बड़े दरवाजों, फाटकों और गोपुरोंसे सुशोभित था ।। ८ ।। प्रासादशतसम्बाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् । नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु । काननेषु च रम्येषु विजहुर्मुदिता जनाः ।। ९ ।। सैकड़ों महलोंसे संयुक्त वह पुरी देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी। वहाँके लोग नदियों, वनखण्डों, बावलियों, छोटे-छोटे जलाशयों, पर्वतशिखरों तथा रमणीय काननोंमें प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ।। ९ ।। उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा। विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ।। १० ।। उस समय दक्षिणकुरु देशके निवासी उत्तरकुरुमें रहनेवाले लोगों, देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंके साथ होड़-सी लगाते हुए स्वच्छन्द विचरण करते थे ।। १० ।। नाभवत् कृपणः कश्चिन्नाभवन् विधवाः स्त्रियः । तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ।। ११ ।। कौरवोंद्वारा बढ़ाये हुए उस रमणीय जनपदमें न तो कोई कंजूस था और न विधवा स्त्रियाँ देखी जाती थीं ।। ११ ।। कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा । बभूवुः सर्वर्द्धियुतास्तस्मिन् राष्ट्र सदोत्सवाः ।। १२ ।। उस राष्ट्रके कुओं, बगीचों, सभाभवनों, बावलियों तथा ब्राह्मणोंके घरोंमें सब प्रकारकी समृद्धियाँ भरी रहती थीं और वहाँ नित्य-नूतन उत्सव हुआ करते थे ।। १२ ।। भीष्मेण धर्मतो राजन् सर्वतः परिरक्षिते । बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ।। १३ ।। जनमेजय ! भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे धर्मपूर्वक सुरक्षित भूमण्डलमें वह कुरुदेश सैकड़ों देवस्थानों और यज्ञस्तम्भोंसे चिह्नित होनेके कारण बड़ी शोभा पाता था ।। १३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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9 hours ago
. #जय श्री कृष्ण “ वृंदावन आगमन “ मथुरा का राजा कंस बहुत क्रूर और अत्याचारी था। उसे यह भविष्यवाणी सुनने को मिली थी कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसका वध करेगा। इसी भय से कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब वसुदेव जी उन्हें रात के अंधेरे में गोकुल ले आए और उन्हें नंदबाबा और माता यशोदा को सौंप दिया। गोकुल में श्रीकृष्ण बड़े प्रेम से पले-बढ़े। लेकिन कंस को जब पता चला कि देवकी का पुत्र जीवित है और कहीं गोकुल में छिपा हुआ है, तो उसने कई राक्षसों को कृष्ण को मारने के लिए भेजा। कभी पूतना, कभी त्रिणावर्त, तो कभी अन्य दुष्ट राक्षस गोकुल पर हमला करने लगे। हालांकि भगवान कृष्ण हर बार अपनी दिव्य शक्ति से उन राक्षसों का अंत कर देते थे। गोकुल के लोगों को धीरे-धीरे यह डर सताने लगा कि कंस के अत्याचार से उनका गांव सुरक्षित नहीं है। तब एक दिन नंदबाबा ने सभी ग्वालों और परिवार के लोगों को बुलाकर विचार किया। उन्होंने कहा, “हमारे बच्चों की सुरक्षा सबसे जरूरी है। कंस बार-बार गोकुल पर संकट भेज रहा है, इसलिए हमें किसी सुरक्षित स्थान पर जाना चाहिए।” सभी ने मिलकर निर्णय लिया कि वे वृंदावन चलेंगे। वृंदावन एक सुंदर और शांत वन प्रदेश था, जहाँ चारों ओर हरियाली, पेड़-पौधे, और बहती हुई यमुना नदी थी। यह स्थान गोकुल से अधिक सुरक्षित और रमणीय था। फिर एक दिन गोकुल के सभी लोग अपनी बैलगाड़ियों में सामान लेकर, गायों और बछड़ों के साथ वृंदावन की ओर चल पड़े। उस यात्रा में छोटा सा कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम भी बहुत प्रसन्न थे। कृष्ण रास्ते भर बांसुरी बजाते और ग्वालबालों के साथ हँसी-मजाक करते जाते थे। जब सभी लोग वृंदावन पहुँचे, तो वहाँ की सुंदरता देखकर सबका मन प्रसन्न हो गया। ऊँचे-ऊँचे पेड़, हरी घास के मैदान, और पास में बहती यमुना नदी उस स्थान को स्वर्ग जैसा बना रहे थे। नंदबाबा और सभी ग्वालों ने वहीं अपने घर बना लिए और वृंदावन में बस गए। वृंदावन में ही श्रीकृष्ण ने अपनी कई अद्भुत लीलाएँ कीं। वे गायों को चराने जाते, ग्वालबालों के साथ खेलते, और बांसुरी की मधुर धुन से पूरे वन को आनंदित कर देते थे। यहीं पर उन्होंने कालिया नाग का दमन भी किया। यमुना नदी में रहने वाला विषैला कालिया नाग सबको परेशान करता था। तब श्रीकृष्ण ने नदी में कूदकर उस नाग को वश में किया और उसके फनों पर नृत्य करके उसे पराजित कर दिया। वृंदावन की यही भूमि श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से पवित्र हो गई। आज भी लोग मानते हैं कि वृंदावन में हर कण-कण में कृष्ण का प्रेम और उनकी दिव्य लीलाओं की सुगंध बसती है। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर समय साथ रहते हैं और प्रेम, भक्ति तथा साहस से हर संकट का सामना किया जा सकता है। राधे राधे…. जय श्रीकृष्ण…. .
sn vyas
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13 hours ago
#जय मां काली माँ काली की कथाएँ, विशेष रूप से रक्तबीज वध और भगवान शिव के ऊपर उनके नृत्य की कथा, धर्म और कर्म के अत्यंत गूढ़ रहस्यों को उजागर करती हैं। ये कहानियाँ हमें केवल असुर-विनाश की गाथा नहीं सुनातीं, बल्कि जीवन के सत्य से परिचित कराती हैं: 1. नकारात्मकता की जड़ को समाप्त करना (रक्तबीज वध) रक्तबीज एक ऐसा असुर था जिसकी एक बूंद खून गिरने से सैकड़ों नए असुर पैदा हो जाते थे। यह हमारी 'वासनाओं' और 'बुरे विचारों' का प्रतीक है। * रहस्य: यदि हम अपनी बुराइयों को ऊपर-ऊपर से दबाते हैं, तो वे फिर से पनप आती हैं। माँ काली द्वारा उसका रक्त पीना यह समझाता है कि धर्म के मार्ग पर चलते हुए नकारात्मकता को उसकी जड़ (मूल कारण) से समाप्त करना आवश्यक है। 2. समय की शक्ति (महाकाल और काली) 'काली' शब्द 'काल' (समय) से निकला है। माँ काली समय की अधिष्ठात्री देवी हैं। * रहस्य: यह हमें कर्म का यह रहस्य समझाती हैं कि समय किसी के लिए नहीं रुकता। हर कर्म का फल समय आने पर निश्चित मिलता है। वे हमें सिखाती हैं कि मृत्यु और परिवर्तन ही एकमात्र सत्य हैं, इसलिए मनुष्य को मोह का त्याग कर धर्म के मार्ग पर निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए। 3. अहंकार का अंत (शिव पर काली का पैर) कथा के अनुसार, जब माँ काली क्रोध में असुरों का संहार कर रही थीं, तो उन्हें शांत करने के लिए भगवान शिव उनके चरणों में लेट गए। जैसे ही माँ का पैर शिव पर पड़ा, उनकी जीभ बाहर निकल आई। * रहस्य: शिव 'परम चेतना' के प्रतीक हैं और काली 'शक्ति' की। यह दृश्य समझाता है कि बिना ज्ञान और चेतना के, शक्ति अनियंत्रित और विनाशकारी हो सकती है। यह हमें अपने अहंकार (Ego) को नियंत्रित करने का रहस्य सिखाता है। जब शक्ति (कर्म) का मिलन चेतना (धर्म) से होता है, तभी कल्याण संभव है। 4. बाह्य आवरण और आंतरिक सत्य माँ काली का स्वरूप (मुंडमाल, बिखरे बाल, गहरा रंग) डरावना लग सकता है, लेकिन वे 'करुणामयी माँ' हैं। * रहस्य: यह धर्म का यह रहस्य है कि सत्य हमेशा सुंदर या कोमल नहीं होता। कभी-कभी सत्य कठोर और भयानक भी होता है। हमें व्यक्ति या स्थिति के बाहरी स्वरूप को देखकर न्याय नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके पीछे छिपे धर्म और उद्देश्य को पहचानना चाहिए। 5. त्याग और वैराग्य माँ काली श्मशान में निवास करती हैं। * रहस्य: श्मशान वैराग्य का प्रतीक है। यह कर्म का रहस्य समझाता है कि अंत में सब कुछ राख हो जाना है। इसलिए कर्म ऐसे होने चाहिए जो आत्मा को शुद्ध करें, न कि उसे सांसारिक बंधनों में और ज्यादा उलझा दें। माँ काली की कथाएँ हमें सिखाती हैं कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध निर्भय होकर खड़े होना और अपने भीतर की बुराइयों का निर्ममता से अंत करना है।
sn vyas
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13 hours ago
🌺 शांति की अंतिम पुकार: हस्तिनापुर का वैभव बनाम प्रेम! 🌺 #महाभारत महाभारत के भीषण युद्ध की छाया कुरुक्षेत्र पर मंडरा रही थी। विनाश को टालने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर की सभा में पधारे। दुर्योधन, जो अपनी शक्ति के मद में चूर था, उसने सोचा कि वह अपनी भव्यता से माधव को मोहित कर लेगा। दुर्योधन ने कृष्ण के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी। महल को हीरों और रत्नों से सजाया गया, सोने की थालियों में 'छप्पन भोग' सजाए गए। लेकिन जैसे ही दुर्योधन ने बड़े गर्व से उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया, कृष्ण ने अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ उसे रोक दिया। "दुर्योधन! व्यक्ति भोजन दो ही स्थितियों में करता है—या तो खिलाने वाले के हृदय में अगाध प्रेम हो, या खाने वाले को तीव्र क्षुधा (भूख) लगी हो। न तो तुम्हें मुझसे प्रेम है और न ही इस समय मुझे भूख है। तुम्हारा यह ऐश्वर्य, अहंकार की सुगंध दे रहा है, और मुझे प्रेम की महक पसंद है।" राजसी ठाठ-बाट को ठुकरा कर, सांवरा सीधे महात्मा विदुर की साधारण सी कुटिया की ओर चल पड़ा। विदुर घर पर नहीं थे, पर उनकी पत्नी सुलभा (विदुरानी) वहां थीं। जैसे ही उन्होंने द्वार खोला और सामने जगत के स्वामी को खड़ा पाया, उनके प्राण मानो उनकी आंखों में आकर ठहर गए। वे इतनी भावविभोर हो गईं कि उन्हें याद ही नहीं रहा कि अतिथि का सत्कार कैसे किया जाता है। न बैठने को मखमली आसन था, न खिलाने को कोई पकवान। पर कृष्ण तो प्रेम के भूखे थे। उन्होंने बड़े लाड़ से कहा, "काकी, बड़ी भूख लगी है! कुछ खाने को दो।" काकी हड़बड़ाहट में रसोई से कुछ केले उठा लाईं। कृष्ण को अपने सामने पाकर वे इतनी तल्लीन (मग्न) हो गईं कि उनकी दृष्टि कृष्ण के मनमोहक मुखमंडल पर टिक गई। * वे केला छीलतीं, फल फेंक देतीं और केले का छिलका कृष्ण के हाथों में थमा देतीं। * मधुसूदन भी बड़े चाव से, आँखें मूँदकर उन कड़वे छिलकों को ऐसे खा रहे थे जैसे वे अमृत का रस पी रहे हों। तभी महात्मा विदुर वहाँ पहुँचे और यह दृश्य देखकर हतप्रभ रह गए। उन्होंने चीख कर कहा, "अरी पगली! यह क्या अनर्थ कर रही है? साक्षात नारायण को छिलके खिला रही है?" विदुरानी होश में आईं और अपनी भूल पर फूट-फूट कर रोने लगीं। विदुर जी ने तुरंत एक केला छीलकर उसका गूदा कृष्ण की ओर बढ़ाया। कृष्ण ने एक ग्रास खाया, फिर धीरे से मुस्कुराकर बोले: "विदुर जी, इस फल में वो मिठास कहाँ, जो काकी के उन छिलकों में थी! उन छिलकों में 'मैं' और 'मेरा' मिट चुका था, वहाँ केवल शुद्ध भाव था। मुझे तृप्ति छिलकों से नहीं, काकी की ममता से मिली है।" इस कथा का सार: प्रेम-लक्षणा भक्ति यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर को वश में करने का कोई मंत्र नहीं है, सिवाय प्रेम के। * भाव ही सार है: भगवान को आपके छप्पन भोग की आवश्यकता नहीं, वे आपके आंसुओं और मुस्कान के पीछे छिपे भाव को देखते हैं। * समर्पण: विदुरानी के पास ऐश्वर्य नहीं था, पर उनके पास 'स्वयं' का पूर्ण समर्पण था। * अहंकार का पतन: जहाँ 'मैं' (Ego) होता है, वहाँ ईश्वर नहीं होते। दुर्योधन के पास 'मैं' था, विदुरानी के पास 'तुम'। इसीलिए सदियों से भक्त गाते आए हैं: "सबसे ऊँची प्रेम सगाई। दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाई॥"
sn vyas
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15 hours ago
#जय श्री #जय श्री राम 📕वेदकृत-श्रीरामस्तुति📕 [श्रीरामचरितमानस] जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुजबल बने॥ अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे। जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥१॥ ✍️हे सगुण और निर्गुणरूप ! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त ! हे राजाओंके शिरोमणि ! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। आपने मनुष्य-अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यन्त कठोर दुःखों को भस्म कर दिया। हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीताजी)-सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ ॥१॥ तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे॥ जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे॥२॥ ✍️हे हरे ! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल, कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए) दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं। हे नाथ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टि से) देख लिया, वे [मायाजनित] तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गये। हे जन्म-मरण के श्रम को काटने में कुशल श्रीरामजी! हमारी रक्षा कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं ॥२॥ जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥ बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥३॥ ✍️जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेषरूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु [के भय] को हरनेवाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देवदुर्लभ (देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होनेवाले, ब्रह्मा आदि के) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं। [परन्तु] जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जप कर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं। हे नाथ! ऐसे आपका स्मरण करते हैं ॥३॥ जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी॥ ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे॥४॥ ✍️जो चरण शिव जी और ब्रह्मा जी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर [शिला बनी हुई] गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली देवनदी गङ्गाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल, इन चिन्हों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ जानेसे ढट्ठे पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं ॥४॥ अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने। षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥ फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे। पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥५॥ ✍️वेद-शास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है; जो [प्रवाह रूप से] अनादि है; जिसके चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत-से फूल हैं; जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं; जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है; जिसमें नित्य नये पत्ते और फूल निकलते रहते हैं; ऐसे संसार वृक्ष स्वरूप (विश्वरूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं ॥५॥ जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन पर ध्यावहीं। ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं॥ करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं। मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं॥६॥ ✍️ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है-जो [इस प्रकार कहकर उस] ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किन्तु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। हे करुणा के धाम प्रभो! हे सद्गुणों की खान! हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्याग कर आपके चरणों में ही प्रेम करें ॥६॥ सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्ह उदार। अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार॥ ✍️वेदों ने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की। फिर वे अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मलोक को चले गये। 🙏राजा रामचन्द्र की जय 🌹🚩
sn vyas
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16 hours ago
*#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१७१* *श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण* *अयोध्याकाण्ड* *इक्यानबेवाँ सर्ग* *भरद्वाज मुनिके द्वारा सेनासहित भरतका दिव्य सत्कार* जब भरतने उस आश्रममें ही निवासका दृढ़ निश्चय कर लिया, तब मुनिने कैकेयीकुमार भरतको अपना आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये न्यौता दिया॥१॥ यह सुनकर भरतने उनसे कहा—'मुने! वनमें जैसा आतिथ्य-सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल-मूल आदि देकर कर ही चुके'॥२॥ उनके ऐसा कहनेपर भरद्वाजजी भरतसे हँसते हुए से बोले—'भरत! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है। अतः मैं तुम्हें जो कुछ दूँगा, उसीसे तुम संतुष्ट हो जाओगे॥३॥ 'किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेनाको भोजन कराना चाहता हूँ। नरश्रेष्ठ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये॥४॥ 'पुरुषप्रवर! तुम अपनी सेनाको किसलिये इतनी दूर छोड़कर यहाँ आये हो, सेनासहित यहाँ क्यों नहीं आये?'॥५॥ तब भरतने हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिको उत्तर दिया—'भगवन्! मैं आपके ही भयसे सेनाके साथ यहाँ नहीं आया॥६॥ 'प्रभो! राजा और राजपुत्रको चाहिये कि वे सभी देशोंमें प्रयत्नपूर्वक तपस्वीजनोंको दूर छोड़कर रहे (क्योंकि उनके द्वारा उन्हें कष्ट पहुँचनेकी सम्भावना रहती है)॥७॥ 'भगवन्! मेरे साथ बहुत-से अच्छे-अच्छे घोङे, मनुष्य और मतवाले गजराज हैं, जो बहुत बड़े भूभागको ढककर मेरे पीछे-पीछे चलते हैं॥८॥ 'वे आश्रमके वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओंको हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ'॥९॥ तदनन्तर उन महर्षिने आज्ञा दी कि 'सेनाको यहीं ले आओ।' तब भरतने सेनाको वहीं बुलवा लिया॥१०॥ इसके बाद मुनिवर भरद्वाजने अग्निशालामें प्रवेश करके जलका आचमन किया और ओठ पोंछकर भरतके आतिथ्य-सत्कारके लिये विश्वकर्मा आदिका आवाहन किया॥११॥ वे बोले—'मैं विश्वकर्मा त्वष्टा देवताका आवाहन करता हूँ। मेरे मनमें सेनासहित भरतका आतिथ्य-सत्कार करनेकी इच्छा हुई है। इसमें मेरे लिये वे आवश्यक प्रबन्ध करें॥१२॥ 'जिनके अगुआ इन्द्र हैं, उन तीन लोकपालोंका (अर्थात् इन्द्रसहित यम, वरुण और कुबेर नामक देवताओंका) मैं आवाहन करता हूँ। इस समय भरतका आतिथ्य सत्कार करना चाहता हूँ, इसमें मेरे लिये वे लोग आवश्यक प्रबन्ध करें॥१३॥ 'पृथिवी और आकाशमें जो पूर्व एवं पश्चिमकी ओर प्रवाहित होनेवाली नदियाँ हैं, उनका भी मैं आवाहन करता हूँ; वे सब आज यहाँ पधारें॥१४॥ 'कुछ नदियाँ मैरेय प्रस्तुत करें। दूसरी अच्छी तरह तैयार की हुई सुरा ले आवें तथा अन्य नदियाँ ईंखके पोरुओंमें होनेवाले रसकी भाँति मधुर एवं शीतल जल तैयार करके रखें॥१५॥ 'मैं विश्वावसु, हाहा और हुहू आदि देव-गन्धर्वोका तथा उनके साथ समस्त अप्सराओंका भी आवाहन करता हूँ॥१६॥ 'घृताची विश्वाची, मिश्रकेशी, अलम्बुषा नागदत्ता, हेमा, सोमा तथा अद्रिकृतस्थली (अथवा पर्वतपर निवास करनेवाली सोमा) का भी मैं आवाहन करता हूँ॥१७॥ 'जो अप्सराएँ इन्द्रकी सभामें उपस्थित होती हैं तथा जो देवाङ्गनाएँ ब्रह्माजीकी सेवामें जाया करती हैं, उन सबका मैं तुम्बुरुके साथ आवाहन करता हूँ। वे अलङ्कारों तथा नृत्यगीतके लिये अपेक्षित अन्यान्य उपकरणोंके साथ यहाँ पधारें॥१८॥ 'उत्तर कुरुवर्षमें जो दिव्य चैत्ररथ नामक वन है, जिसमें दिव्य वस्त्र और आभूषण ही वृक्षोंके पत्ते हैं और दिव्य नारियाँ ही फल हैं, कुबेरका वह सनातन दिव्य वन यहीं आ जाय॥१९॥ 'यहाँ भगवान् सोम मेरे अतिथियोंके लिये उत्तम अन्न, नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्यकी प्रचुर मात्रामें व्यवस्था करें॥२०॥ 'वृक्षोंसे तुरंत चुने गये नाना प्रकारके पुष्प, मधु आदि पेय पदार्थ तथा नाना प्रकारके फलोंके गूदे भी भगवान् सोम यहाँ प्रस्तुत करें'॥२१॥ इस प्रकार उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भरद्वाज मुनिने एकाग्रचित्त और अनुपम तेजसे सम्पन्न हो शिक्षा (शिक्षाशास्त्रमें बतायी गयी उच्चारणविधि) और (व्याकरणशास्त्रोक्त प्रकृति-प्रत्यय सम्बन्धी) स्वरसे युक्त वाणीमें उन सबका आवाहन किया॥२२॥ इस तरह आवाहन करके मुनि पूर्वाभिमुख हो हाथ जोड़े मन-ही-मन ध्यान करने लगे। उनके स्मरण करते ही वे सभी देवता एक-एक करके वहाँ आ पहुँचे॥२३॥ फिर तो वहाँ मलय और दर्दुर नामक पर्वतोंका स्पर्श करके बहनेवाली अत्यन्त प्रिय और सुखदायिनी हवा धीरे-धीरे चलने लगी, जो स्पर्शमात्रसे शरीरके पसीनेको सुखा देनेवाली थी॥२४॥ तत्पश्चात् मेघगण दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण दिशाओंमें देवताओंकी दुन्दुभियोंका मधुर शब्द सुनायी देने लगा॥२५॥ उत्तम वायु चलने लगी। अप्सराओंके समुदायोंका नृत्य होने लगा। देवगन्धर्व गाने लगे और सब ओर वीणाओंकी स्वरलहरियाँ फैल गयीं॥२६॥ सङ्गीतका वह शब्द पृथ्वी, आकाश तथा प्राणियोंके कर्णकुहरोंमें प्रविष्ट होकर गूँजने लगा। आरोह-अवरोहसे युक्त वह शब्द कोमल एवं मधुर था, समतालसे विशिष्ट और लयगुणसे सम्पन्न था॥२७॥ इस प्रकार मनुष्योंके कानोंको सुख देनेवाला वह दिव्य शब्द हो ही रहा था कि भरतकी सेनाको विश्वकर्माका निर्माणकौशल दिखायी पड़ा॥२८॥ चारों ओर पाँच योजनतककी भूमि समतल हो गयी। उसपर नीलम और वैदूर्य मणिके समान नाना प्रकारकी घनी घास छा रही थी॥२९॥ स्थान-स्थानपर बेल, कैथ, कटहल, आँवला, बिजौरा तथा आमके वृक्ष लगे थे, जो फलोंसे सुशोभित हो रहे थे॥३०॥ उत्तर कुरुवर्षसे दिव्य भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न चैत्ररथ नामक वन वहाँ आ गया। साथ ही वहाँकी रमणीय नदियाँ भी आ पहुँचीं, जो बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षोंसे घिरी हुई थीं॥३१॥ उज्ज्वल, चार-चार कमरोंसे युक्त गृह (अथवा गृहयुक्त चबूतरे) तैयार हो गये। हाथी और घोड़ोंके रहनेके लिये शालाएँ बन गयीं। अट्टालिकाओं तथा सतमंजिले महलोंसे युक्त सुन्दर नगरद्वार भी निर्मित हो गये॥३२॥ राजपरिवारके लिये बना हुआ सुन्दर द्वारसे युक्त दिव्य भवन श्वेत बादलोंके समान शोभा पा रहा था। उसे सफेद फूलोंकी मालाओंसे सजाया और दिव्य सुगन्धित जलसे सींचा गया था॥३३॥ वह महल चौकोना तथा बहुत बड़ा था—उसमें संकीर्णताका अनुभव नहीं होता था। उसमें सोने, बैठने और सवारियोंके रहनेके लिये अलग-अलग स्थान थे। वहाँ सब प्रकारके दिव्य रस, दिव्य भोजन और दिव्य वस्त्र प्रस्तुत थे॥३४॥ सब तरहके अन्न और धुले हुए स्वच्छ पात्र रखे गये थे। उस सुन्दर भवनमें कहीं बैठनेके लिये सब प्रकारके आसन उपस्थित थे और कहीं सोनेके लिये सुन्दर शय्याएँ बिछी थीं॥३५॥ महर्षि भरद्वाजकी आज्ञासे कैकेयीपुत्र महाबाहु भरतने नाना प्रकारके रत्नोंसे भरे हुए उस महलमें प्रवेश किया। उनके साथ-साथ पुरोहित और मन्त्री भी उसमें गये। उस भवनका निर्माणकौशल देखकर उन सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई॥३६-३७॥ उस भवनमें भरतने दिव्य राजसिंहासन, चँवर और छत्र भी देखे तथा वहाँ राजा श्रीरामकी भावना करके मन्त्रियोंके साथ उन समस्त राजभोग्य वस्तुओंकी प्रदक्षिणा की॥३८॥ सिंहासनपर श्रीरामचन्द्रजी महाराज विराजमान हैं, ऐसी धारणा बनाकर उन्होंने श्रीरामको प्रणाम किया और उस सिंहासनकी भी पूजा की। फिर अपने हाथमें चँवर ले, वे मन्त्रीके आसनपर जा बैठे॥३९॥ तत्पश्चात् पुरोहित और मन्त्री भी क्रमशः अपने योग्य आसनोंपर बैठे; फिर सेनापति और प्रशास्ता (छावनीकी रक्षा करनेवाले) भी बैठ गये॥४०॥ तदनन्तर वहाँ दो ही घड़ीमें भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे भरतकी सेवामें नदियाँ उपस्थित हुईं, जिनमें कीचके स्थानमें खीर भरी थी॥४१॥ उन नदियोंके दोनों तटोंपर ब्रह्मर्षि भरद्वाजकी कृपासे दिव्य एवं रमणीय भवन प्रकट हो गये थे, जो चूनेसे पुते हुए थे॥४२॥ उसी मुहूर्तमें ब्रह्माजीकी भेजी हुई दिव्य आभूषणोंसे विभूषित बीस हजार दिव्याङ्गनाएँ वहाँ आयीं॥४३॥ इसी तरह सुवर्ण, मणि, मुक्ता और मूँगोंके आभूषणोंसे सुशोभित, कुबेरकी भेजी हुई बीस हजार दिव्य महिलाएँ भी वहाँ उपस्थित हुईं, जिनका स्पर्श पाकर पुरुष उन्मादग्रस्त-सा दिखायी देता है॥४४½॥ इनके सिवा नन्दनवनसे बीस हजार अप्सराएँ भी आयीं। नारद, तुम्बुरु और गोप अपनी कान्तिसे सूर्यके समान प्रकाशित होते थे। ये तीनों गन्धर्वराज भरतके सामने गीत गाने लगे॥४५-४६॥ अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका और वामना—ये चार अप्सराएँ भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे भरतके समीप नृत्य करने लगीं॥४७॥ जो फूल देवताओंके उद्यानोंमें और जो चैत्ररथ वनमें हुआ करते हैं, वे महर्षि भरद्वाजके प्रतापसे प्रयागमें दिखायी देने लगे॥४८॥ भरद्वाज मुनिके तेजसे बेलके वृक्ष मृदङ्ग बजाते, बहेड़ेके पेड़ शम्या नामक ताल देते और पीपलके वृक्ष वहाँ नृत्य करते थे॥४९॥ तदनन्तर देवदारु, ताल, तिलक और तमाल नामक वृक्ष कुबड़े और बौने बनकर बड़े हर्षके साथ भरतकी सेवामें उपस्थित हुए॥५०॥ शिंशपा, आमलकी और जम्बू आदि स्त्रीलिङ्ग वृक्ष तथा मालती, मल्लिका और जाति आदि वनकी लताएँ नारीका रूप धारण करके भरद्वाज मुनिके आश्रममें आ बसीं॥५१॥ (वे भरतके सैनिकोंको पुकार-पुकारकर कहती थीं—) 'मधुका पान करनेवाले लोगो! लो, यह मधु पान कर लो। तुममेंसे जिन्हें भूख लगी हो, वे सब लोग यह खीर खाओ और परम पवित्र फलोंके गूदे भी प्रस्तुत हैं, इनका आस्वादन करो। जिसकी जो इच्छा हो, वही भोजन करो'॥५२॥ सात-आठ तरुणी स्त्रियाँ मिलकर एक-एक पुरुषको नदीके मनोहर तटोंपर उबटन लगा-लगाकर नहलाती थीं॥ बड़े-बड़े नेत्रोंवाली सुन्दरी रमणियाँ अतिथियोंका पैर दबानेके लिये आयी थीं। वे उनके भीगे हुए अङ्गोंको वस्त्रोंसे पोंछकर शुद्ध वस्त्र धारण कराकर उन्हें स्वादिष्ट पेय (दूध आदि) पिलाती थीं॥५४॥ तत्पश्चात् भिन्न-भिन्न वाहनोंकी रक्षामें नियुक्त मनुष्योंने हाथी, घोड़े, गधे, ऊँट और बैलोंको भलीभाँति दाना-घास आदिका भोजन कराया॥५५॥ इक्ष्वाकुकुलके श्रेष्ठ योद्धाओंकी सवारीमें आनेवाले वाहनोंको वे महाबली वाहन-रक्षक (जिन्हें महर्षिने सेवाके लिये नियुक्त किया था) प्रेरणा दे-देकर गन्नेके टुकड़े और मधुमिश्रित लावे खिलाते थे॥५६॥ घोड़े बाँधनेवाले सईसको अपने घोड़ेका और हाथीवानको अपने हाथीका कुछ पता नहीं था। सारी सेना वहाँ मत्त-प्रमत्त और आनन्दमग्न प्रतीत होती थी॥५७॥ सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंसे तृप्त होकर लाल चन्दनसे चर्चित हुए सैनिक अप्सराओंका संयोग पाकर निम्नाङ्कित बातें कहने लगे—॥५८॥ 'अब हम अयोध्या नहीं जायँगे, दण्डकारण्यमें भी नहीं जायँगे। भरत सकुशल रहें (जिनके कारण हमें इस भूतलपर स्वर्गका सुख मिला) तथा श्रीरामचन्द्रजी भी सुखी रहें (जिनके दर्शनके लिये आनेपर हमें इस दिव्य सुखकी प्राप्ति हुई)'॥५९॥ इस प्रकार पैदल सैनिक तथा हाथीसवार, घुड़सवार, सईस और महावत आदि उस सत्कारको पाकर स्वच्छन्द हो उपर्युक्त बातें कहने लगे॥६०॥ भरतके साथ आये हुए हजारों मनुष्य वहाँका वैभव देखकर हर्षके मारे फूले नहीं समाते थे और जोर-जोरसे कहते थे—यह स्थान स्वर्ग है॥६१॥ सहस्रों सैनिक फूलोंके हार पहनकर नाचते, हँसते और गाते हुए सब ओर दौड़ते फिरते थे॥६२॥ उस अमृतके समान स्वादिष्ट अन्नका भोजन कर चुकनेपर भी उन दिव्य भक्ष्य पदार्थोंको देखकर उन्हें पुनः भोजन करनेकी इच्छा हो जाती थी॥६३॥ दास-दासियाँ, सैनिकोंकी स्त्रियाँ और सैनिक सब-के-सब नूतन वस्त्र धारण करके सब प्रकारसे अत्यन्त प्रसन्न हो गये थे॥६४॥ हाथी, घोड़े, गदहे, ऊँट, बैल, मृग तथा पक्षी भी वहाँ पूर्ण तृप्त हो गये थे; अतः कोई दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करता था॥६५॥ उस समय वहाँ कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखायी देता था, जिसके कपड़े सफेद न हों, जो भूखा या मलिन रह गया हो, अथवा जिसके केश धूलसे धूसरित हो गये हों॥६६॥ अजवाइन मिलाकर बनाये गये, वराही कन्दसे तैयार किये गये तथा आम आदि फलोंके गरम किये हुए रसमें पकाये गये उत्तमोत्तम व्यञ्जनोंके संग्रहों, सुगन्धयुक्त रसवाली दालों तथा श्वेत रंगके भातोंसे भरे हुए सहस्रों सुवर्ण आदिके पात्र वहाँ सब ओर रखे हुए थे, जिन्हें फूलोंकी ध्वजाओंसे सजाया गया था। भरतके साथ आये हुए सब लोगोंने उन पात्रोंको आश्चर्यचकित होकर देखा॥६७-६८॥ वनके आस-पास जितने कुएँ थे, उन सबमें गाढ़ी स्वादिष्ट खीर भरी हुई थी। वहाँकी गौएँ कामधेनु (सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली) हो गयी थीं और उस दिव्य वनके वृक्ष मधुकी वर्षा करते थे॥६९॥ भरतकी सेनामें आये हुए निषाद आदि निम्नवर्गके लोगोंकी तृप्तिके लिये वहाँ मधुसे भरी हुई बावड़ियाँ प्रकट हो गयी थीं तथा उनके तटोंपर तपे हुए पिठर (कुण्ड) में पकाये गये मृग, मोर और मुर्गोंके स्वच्छ मांस भी ढेर-के-ढेर रख दिये गये थे॥७०॥ वहाँ सहस्रों सोनेके अन्नपात्र, लाखों व्यञ्जनपात्र और लगभग एक अरब थालियाँ संगृहीत थीं॥७१॥ पिठर, छोटे-छोटे घड़े तथा मटके दहीसे भरे हुए थे और उनमें दहीको सुस्वादु बनानेवाले सोंठ आदि मसाले पड़े हुए थे। एक पहर पहलेके तैयार किये हुए केसरमिश्रित पीतवर्णवाले सुगन्धित तक्रके कई तालाब भरे हुए थे। जीरा आदि मिलाये हुए तक्र (रसाल), सफेद दही तथा दूधके भी कई कुण्ड पृथक्-पृथक् भरे हुए थे। शक्करोंके कई ढेर लगे थे॥७२-७३॥ स्नान करनेवाले मनुष्योंको नदीके घाटोंपर भिन्न-भिन्न पात्रोंमें पीसे हुए आँवले, सुगन्धित चूर्ण तथा और भी नाना प्रकारके स्नानोपयोगी पदार्थ दिखायी देते थे॥७४॥ साथ ही ढेर-के-ढेर दाँतन, जो सफेद कूँचेवाले थे, वहाँ रखे हुए थे। सम्पुटोंमें घिसे हुए सफेद चन्दन विद्यमान थे। इन सब वस्तुओंको लोगोंने देखा॥७५॥ इतना ही नहीं, वहाँ बहुत-से स्वच्छ दर्पण, ढेर-के ढेर वस्त्र और हजारों जोड़े खड़ाऊँ और जूते भी दिखायी देते थे॥७६॥ काजलोंसहित कजरौटे, कंघे, कूर्च (थकरी या ब्रश), छत्र, धनुष, मर्मस्थानोंकी रक्षा करनेवाले कवच आदि तथा विचित्र शय्या और आसन भी वहाँ दृष्टिगोचर होते थे॥७७॥ गधे, ऊँट, हाथी और घोड़ोंके पानी पीनेके लिये कई जलाशय भरे थे, जिनके घाट बड़े सुन्दर और सुखपूर्वक उतरनेयोग्य थे। उन जलाशयोंमें कमल और उत्पल शोभा पा रहे थे। उनका जल आकाशके समान स्वच्छ था तथा उनमें सुखपूर्वक तैरा जा सकता था॥७८॥ पशुओंके खानेके लिये वहाँ सब ओर नील वैदूर्यमणिके समान रंगवाली हरी एवं कोमल घासकी ढेरियाँ लगी थीं। उन सब लोगोंने वे सारी वस्तुएँ देखीं॥७९॥ महर्षि भरद्वाजके द्वारा सेनासहित भरतका किया हुआ वह अनिर्वचनीय आतिथ्य सत्कार अद्भुत और स्वप्नके समान था। उसे देखकर वे सब मनुष्य आश्चर्यचकित हो उठे॥८०॥ जैसे देवता नन्दनवनमें विहार करते हैं, उसी प्रकार भरद्वाज मुनिके रमणीय आश्रममें यथेष्ट क्रीडा-विहार करते हुए उन लोगोंकी वह रात्रि बड़े सुखसे बीती॥८१॥ तत्पश्चात् वे नदियाँ, गन्धर्व और समस्त सुन्दरी अप्सराएँ भरद्वाजजीकी आज्ञा ले जैसे आयी थीं, उसी प्रकार लौट गयीं॥८२॥ सबेरा हो जानेपर भी लोग उसी प्रकार मधुपानसे मत्त एवं उन्मत्त दिखायी देते थे। उनके अङ्गों पर दिव्य अगुरुयुक्त चन्दनका लेप ज्यों-का-त्यों दृष्टिगोचर हो रहा था। मनुष्योंके उपभोगमें लाये गये नाना प्रकारके दिव्य उत्तम पुष्पहार भी उसी अवस्थामें पृथक्-पृथक् बिखरे पड़े थे॥८३॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९१॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
sn vyas
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19 hours ago
#😇मन शांत करने के उपाय 🌟 || बुराई न करें, न सुनें || 🌟 हम प्रतिदिन जैसा सुनते हैं, देखते हैं, वही होने भी लग जाते हैं। किसी की बुराई करना और किसी की बुराई सुनना, दोनों ही वैचारिक दुर्बलता के लक्षण हैं। जो लोग आपके सामने दूसरों की बुराई करते हैं, सच समझना निश्चित ही वो लोग दूसरों से आपकी बुराई भी अवश्य करते होंगे। बुरा करना ही गलत नहीं है अपितु बुरा सुनना भी गलत है। स्वच्छ विचार ही जीवन की प्रसन्नता का मूल है। उन लोगों से अवश्य ही सावधान रहने की आवशयकता है, जिन्हें दूसरों की बुराई करने में रस की प्राप्ति होती हो। विचारों का प्रदूषण फैलने का कारण हमारी वो आदतें हैं, जिन्हें किसी की बुराई सुनने में रस आने लगता है। बुराई को सुनना, बुराई को चुनना जैसा ही है क्योंकि जब हम बुराई सुनना पसंद करते हैं तो बुराई का प्रवेश हमारे विचारों के माध्यम से हमारे आचरण में स्वतः होने लगता है। विचारों का प्रदूषण विज्ञान से नहीं अपितु स्वयं के अन्तः ज्ञान से ही मिटाया जा सकता है। 🙏जय श्री राधे कृष्ण🙏
sn vyas
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19 hours ago
#🙏 प्रेरणादायक विचार नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥ [ गर्गसंहिता/खण्ड- ७ ( विश्वजित्खण्डः ) अध्याय- २५ , श्लोक संख्या-४१ ] अर्थात् 👉🏻 आपने स्वयं को ही वासुदेव , संकर्षण , प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध-इस चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट किया है । मैं आपको बारंबार नमस्कार करता हूँ । 🌄🌄प्रभात वंदन🌄🌄
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