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sn vyas
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3 घंटे पहले
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝अनमोल ज्ञान 🔥 “असुर कौन? राक्षस कौन? सच जानकर चौंक जाएंगे—हिन्दू ग्रंथों के इन रहस्यमयी पात्रों की असली पहचान!” 🔥 हिन्दू धार्मिक कथाओं को पढ़ते समय हम अक्सर असुर, दैत्य, दानव, राक्षस, पिशाच और बेताल जैसे शब्द सुनते हैं… और अनजाने में इन सभी को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक गहरी, रोचक और रहस्यमयी है। यह केवल नाम नहीं हैं—यह पूरी सृष्टि की विविध जातियों, संस्कृतियों और स्वभावों का एक अद्भुत ब्रह्मांड है। 🌿 असुर: एक जाति नहीं, एक व्यापक परिभाषा “जो सुर नहीं है, वही असुर है।” यह एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि एक गूढ़ दार्शनिक सत्य है। सुर यानी देवता—और देवता केवल 12 आदित्य नहीं, बल्कि समस्त देव, उपदेव, यक्ष, गंधर्व आदि का समूह हैं। इनके अतिरिक्त जो भी हैं—वे सभी “असुर” कहलाते हैं। 👉 यानी असुर कोई एक जाति नहीं, बल्कि एक छत्र शब्द (umbrella term) है। ⚔️ दैत्य: देवताओं के ही भाई महर्षि कश्यप और दिति के पुत्र—दैत्य। इनका आरंभ हुआ हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष से। हिरण्याक्ष का वध हुआ वराह अवतार द्वारा हिरण्यकश्यप का अंत हुआ नृसिंह अवतार से लेकिन इन्हीं के वंश में जन्मे प्रह्लाद बने भक्ति के आदर्श 👉 यही दर्शाता है—जाति नहीं, भाव महान बनाता है। 🔥 दानव: शक्ति और क्रूरता का प्रतीक दानव—दनु के पुत्र। आकार में विशाल स्वभाव से उग्र और बर्बर कम सुसंस्कृत इनमें प्रमुख थे: मय दानव — असुरों के महान वास्तुकार विप्रचित्ति 👉 रावण की पत्नी मंदोदरी भी दानव कुल से थीं—यह बताता है कि विभिन्न कुलों में गहरा संबंध था। 🏹 राक्षस: विद्वान, पराक्रमी और रहस्यमयी राक्षसों को अक्सर गलत समझा जाता है। असल में वे: अत्यंत विद्वान शास्त्रों के ज्ञाता राजनीति और युद्ध में कुशल इनका वंश जुड़ा है रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण से। 👉 रावण शिवभक्त था, विभीषण धर्मात्मा— यानी राक्षस होना बुराई की गारंटी नहीं। 🌑 पिशाच: अंधकार और भय का स्वरूप पिशाचों का वर्णन कम मिलता है, लेकिन वे अत्यंत रहस्यमयी हैं: मांसभक्षी और रक्तपायी पूर्ण रूप से निशाचर इच्छानुसार रूप बदलने वाले 👉 पश्चिमी “Vampire” की अवधारणा, दरअसल, हमारे पिशाचों से ही मिलती-जुलती है। 👻 बेताल: पिशाचों के भी स्वामी बेताल—पिशाचों में सबसे शक्तिशाली। काल भैरव के भक्त भगवान शिव के गण कई स्थानों पर वाहन भी माने जाते हैं 👉 प्रसिद्ध “विक्रम-बेताल” कथाएँ इन्हीं रहस्यमयी शक्तियों पर आधारित हैं। 🔗 आपसी संबंध: जहां असुर और मानव जुड़े सबसे रोचक तथ्य यह है कि— दैत्य, दानव, राक्षस—सभी में आपसी विवाह हुए कई ने मानवों से भी संबंध बनाए उदाहरण: शर्मिष्ठा का विवाह ययाति से हिडिम्बा का विवाह भीम से 👉 यानी यह संसार कभी भी “अच्छा vs बुरा” जितना सरल नहीं था। ✨ निष्कर्ष: असली रहस्य क्या है? इन सभी कथाओं का सार यही है— 👉 कोई जन्म से देव या असुर नहीं होता, बल्कि उसके कर्म और भाव उसे महान या अधम बनाते हैं। जहां एक ओर रावण जैसा राक्षस विद्वान हो सकता है, वहीं प्रह्लाद जैसा दैत्य भक्तों में श्रेष्ठ हो सकता है।
sn vyas
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3 घंटे पहले
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣0️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) #महाभारत पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः कर्ण का रंगभूमि में प्रवेश तथा राज्याभिषेक...(दिन 405) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ दुर्योधन उवाच स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद । अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम् ।। १४ ।। दुर्योधन बोला- महाबाहो ! तुम्हारा स्वागत है। मानद! तुम यहाँ पधारे, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। मैं तथा कौरवोंका यह राज्य सब तुम्हारे हैं। तुम इनका यथेष्ट उपभोग करो ।। १४ ।। कर्ण उवाच कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे । द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो ।। १५ ।। कर्णने कहा- प्रभो! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा कर दिया, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं आपके साथ मित्रता चाहता हूँ और अर्जुनके साथ मेरी द्वन्द्व-युद्ध करनेकी इच्छा है ।। १५ ।। दुर्योधन उवाच भुङ्क्ष्व भोगान् मया सार्थ बन्धूनां पियकृद् भव । दुर्हदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिंदम ।। १६ ।। दुर्योधन बोला-शत्रुदमन! तुम मेरे साथ उत्तम भोग भोगो। अपने भाई-बन्धुओंका प्रिय करो और समस्त शत्रुओंके मस्तकपर पैर रखो ।। १६ ।। वैशम्पायन उवाच ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत । कर्ण भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम् ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उस समय अर्जुनने अपने-आपको कर्णद्वारा तिरस्कृत-सा मानकर दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके बीचमें अविचल से खड़े हुए कर्णको सम्बोधित करके कहा ।। १७ ।। अर्जुन उवाच अनाहूतोपसृष्टानामनाहूतोपजल्पिनाम् । ये लोकास्तान् हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे ।। १८ ।। अर्जुन बोले-कर्ण ! बिना बुलाये आनेवालों और बिना बुलाये बोलनेवालोंको जो (निन्दनीय) लोक प्राप्त होते हैं, मेरे द्वारा मारे जानेपर तुम उन्हीं लोकोंमें जाओगे ।। १८ ।। कर्ण उवाच रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तव फाल्गुन । वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो बलं धर्मोऽनुवर्तते ।। १९ ।। कर्णने कहा-अर्जुन ! यह रंगमण्डप तो सबके लिये साधारण है, इसमें तुम्हारा क्या लगा है? जो बल और पराक्रममें श्रेष्ठ होते हैं, वे ही राजा कहलानेयोग्य हैं। धर्म भी बलका ही अनुसरण करता है ।। १९ ।। किं क्षेपैर्दुर्बलायासैः शरैः कथय भारत । गुरोः समक्ष यावत् ते हराम्यद्य शिरः शरैः ।। २० ।। भारत ! आक्षेप करना तो दुर्बलोंका प्रयास है। इससे क्या लाभ है? साहस हो तो बाणोंसे बातचीत करो। मैं आज तुम्हारे गुरुके सामने ही बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर धड़से अलग किये देता हूँ ।। २० ।। वैशम्पायन उवाच ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः । भ्रातृभिस्त्वरयाऽऽश्लिष्टो रणायोपजगाम तम् ।। २१ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर शत्रुओंके नगरको जीतनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुन आचार्य द्रोणकी आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयोंसे गले मिलकर युद्धके लिये कर्णकी ओर बढ़े ।। २१ ।। ततो दुर्योधनेनापि सभ्रात्रा समरोद्यतः । परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः ।। २२ ।। तब भाइयोंसहित दुर्योधनने भी धनुष-बाण ले युद्धके लिये तैयार खड़े हुए कर्णका आलिंगन किया ।। २२ ।। ततः सविद्युत्स्यनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः । आवृतं गगनं मेधैर्बलाकापङ्क्तिहासिभिः ।। २३ ।। उस समय बकपंक्तियोंके व्याजसे हास्यकी छटा बिखेरनेवाले बादलोंने बिजलीकी चमक, गड़गड़ाहट और इन्द्रधनुषके साथ समूचे आकाशको ढक लिया ।। २३ ।। ततः स्नेहाद्धरिहयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम् । भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान् घनान् ।। २४ ।। तत्पश्चात् अर्जुनके प्रति स्नेह होनेके कारण इन्द्रको रंगभूमिका अवलोकन करते देख भगवान् सूर्यने भी अपने समीपके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर दिया ।। २४ ।। मेघच्छायोपगूढस्तु ततोऽदृश्यत फाल्गुनः । सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत ।। २५ ।। तब अर्जुन मेघकी छायामें छिपे हुए दिखायी देने लगे और कर्ण भी सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित दीखने लगा ।। २५ ।। धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन् देशो व्यवस्थिताः । भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन् ।। २६ ।। धृतराष्ट्रके पुत्र जिस ओर कर्ण था, उसी ओर खड़े हुए तथा द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और भीष्म जिधर अर्जुन थे, उस ओर खड़े थे ।। २६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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3 घंटे पहले
#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝आज का ज्ञान "108" का रहस्य 〰️〰️🌼〰️〰️ ॥ॐ॥ का जप करते समय 108 प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है।। ॥ 108 ॥ यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय काल से हमारे ऋषि -मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है। ★ संख्या 108 का रहस्य ★ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अ→1 ... आ→2 ... इ→3 ... ई→4 ... उ→5 ... ऊ→6. ... ए→7 ... ऐ→8 ओ→9 ... औ→10 ... ऋ→11 ... लृ→12 अं→13 ... अ:→14.. ऋॄ →15... लॄ →16 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ क→1 ... ख→2 ... ग→3 ... घ→4 ... ङ→5 ... च→6 ... छ→7 ... ज→8 ... झ→9 ... ञ→10 ... ट→11 ... ठ→12 ... ड→13 ... ढ→14 ... ण→15... त→16...थ→17 ... द→18 ... ध→19 ... न→20 ... प→21 ... फ→22 ... ब→23 ... भ→24 ... म→25 ... य→26 ... र→27 ... ल→28 ... व→29 ... श→30 ... ष→31 ... स→32 ... ह→33 ... क्ष→34 ... त्र→35 ... ज्ञ→36 ... ड़ ... ढ़ ... --~~~ओ अहं = ब्रह्म ~~~-- ब्रह्म = ब+र+ह+म =23+27+33+25=108 ~~~~~~~~~~~~~~~ (01) — यह मात्रिकाएँ (18 स्वर +36 व्यंजन=54) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे 108 की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार 108 मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की 108 सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम 108 मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए । (02) — मनुष्य शरीर की ऊँचाई = यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि = (4 अँगुलियों) का 27 गुणा होती है। = 4 × 27 = 108 (03) नक्षत्रों की कुल संख्या = 27 प्रत्येक नक्षत्र के चरण = 4 जप की विशिष्ट संख्या = 108 अर्थात ॐ मंत्र जप कम से कम 108 बार करना चाहिये । (04) — एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य ★ पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास= 108 ★ पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास= 108 अर्थात मन्त्र जप 108 से कम नहीं करना चाहिये। (05) हिंसात्मक पापों की संख्या 36 मानी गई है जो मन, वचन व कर्म ३ प्रकार से होते है। अर्थात 36×3=108 अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम 108 अवश्य ही करना चाहिये। (06) सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति 21600 बार सांस लेता है। दिन-रात के 24 घंटों में से 12 घंटे सोने व गृहस्थ कर्त्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है 10800 बार। इस समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए 10800 की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये 108 की संख्या निर्धारित करते हैं। (07) एक वर्ष में सूर्य 21600 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है। (08) ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम - मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 में राशियों की संख्या 12 से गुणा करें तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है। (09) 108 में तीन अंक हैं, 1+0+8. इनमें एक “1" ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर का एक सत्ता है अर्थात ईश्वर 1 है और मन भी एक है, शून्य “0" प्रकृति को दर्शाता है। आठ “8" जीवात्मा को दर्शाता है क्योकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के आठो मूल से विरक्त हो कर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “8" को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “0" का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “1" का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “0" में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “0" को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा , अर्थात शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “8" ईश्वर “1" से नहीं मिल पायेगा पूर्णता (1+8=9) को नहीं प्राप्त कर पायेगा । 9 पूर्णता का सूचक है। (10) 1- ईश्वर और मन 2- द्वैत, दुनिया, संसार 3- गुण प्रकृति (माया) 4- अवस्था भेद (वर्ण) 5- इन्द्रियाँ 6- विकार 7- सप्तऋषि, सप्तसोपान 8- आष्टांग योग 9- नवधा भक्ति (पूर्णता) (11) वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार अहंकार के गुण = 2 बुद्धि के गुण = 3 मन के गुण = 4 आकाश के गुण = 5 वायु के गुण = 6 अग्नि के गुण = 7 जल के गुण = 8 पॄथ्वी के गुण = 9 2+3+4+5+6+7+8+9 = अत: प्रकॄति के कुल गुण = 44 जीव के गुण = 10 इस प्रकार संख्या का योग = 54 अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = 54 एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = 54 दोंनों संख्याओं का योग = 108 (12) संख्या “1" एक ईश्वर का संकेत है। संख्या “0" जड़ प्रकृति का संकेत है। संख्या “8" बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है। [ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ] [ यही पवित्र त्रेतवाद है ] संख्या “2" से “9" तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “0" रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “0" न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती। “1" की चेतना से “8" का खेल । “8" यानी “2" से “9" । यह “8" क्या है ? मन के “8" वर्ग या भाव । ये आठ भाव ये हैं - 1. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । 2. क्रोध । 3. लोभ । 4. मोह । 5. मद ( घमण्ड ) । 6. मत्सर ( जलन ) । 7. ज्ञान । 8. वैराग । एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है ★ ॥ 108 ॥ ★ इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है । (13) सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। *इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें । इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ बसुओं से टक्कर होती हैं। *सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ बसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है। रहस्यमय संख्या 108 का हिन्दू- वैदिक संस्कृति के साथ हजारों सम्बन्ध हैं जिनमें से कुछ का संग्रह है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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3 घंटे पहले
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक२२२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अरण्यकाण्ड बाईसवाँ सर्ग चौदह हजार राक्षसोंकी सेनाके साथ खर-दूषणका जनस्थानसे पञ्चवटीकी ओर प्रस्थान शूर्पणखाद्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खरने राक्षसोंके बीच अत्यन्त कठोर वाणीमें कहा—॥१॥ 'बहिन! तुम्हारे अपमानके कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमाको प्रचण्ड वेगसे बढ़े हुए खारे पानीके समुद्रके जलको (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घावपर नमकीन पानीका छिड़कना)॥२॥ 'मैं पराक्रमकी दृष्टिसे रामको कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्यका जीवन अब क्षीण हो चला है। वह अपने दुष्कर्मोंसे ही मारा जाकर आज प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा॥३॥ 'तुम अपने आँसुओंको रोको और यह घबराहट छोड़ो। मैं भाईसहित रामको अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ॥४॥ 'राक्षसी! आज मेरे फरसेकी मारसे निष्प्राण होकर धरतीपर पड़े हुए रामका गरम-गरम रक्त तुम्हें पीनेको मिलेगा'॥५॥ खरके मुखसे निकली हुई इस बातको सुनकर शूर्पणखाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने मूर्खतावश राक्षसोंमें श्रेष्ठ भाई खरकी पुनः भूरि-भूरि प्रशंसा की॥६॥ उसने पहले जिसका कठोर वाणीद्वारा तिरस्कार किया और पुनः जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खरने उस समय अपने सेनापति दूषणसे कहा—॥७॥ 'सौम्य! मेरे मनके अनुकूल चलनेवाले, युद्धके मैदानसे पीछे न हटनेवाले, भयंकर वेगशाली, मेघोंकी काली घटाके समान काले रंगवाले, लोगोंकी हिंसासे ही क्रीड़ा-विहार करनेवाले तथा युद्धमें उत्साहपूर्वक आगे बढ़नेवाले चौदह सहस्र राक्षसोंको युद्धके लिये भेजनेकी पूरी तैयारी कराओ॥८-९॥ सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो। उसपर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्र-विचित्र खड्ग और नाना प्रकारकी तीखी शक्तियोंको भी रख दो॥१०॥ 'रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड रामका वध करनेके लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसोंके आगे-आगे जाना चाहता हूँ'॥११॥ उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्यके समान प्रकाशमान और चितकबरे रंगके अच्छे घोड़ोंसे जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया। दूषणने खरको इसकी सूचना दी॥१२॥ वह रथ मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोनेके बने हुए साज-बाजसे सजाया गया था, उसके पहियोंमें सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथके कूबर वैदूर्यमणिसे जड़े गये थे, उसकी सजावटके लिये सोनेके बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियोंके समुदाय तथा तारिकाओंसे वह रथ सुशोभित हो रहा था, उसपर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथके भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुँघुरुओंसे सजे और उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए उस रथपर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिनके अपमानका स्मरण करके उसके मनमें बड़ा अमर्ष हो रहा था॥१३-१५॥ रथ, ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजसे सम्पन्न उम विशाल सेनाकी ओर देखकर खर और दूषणने समस्त राक्षसोंसे कहा—'निकलो, आगे बढ़ो'॥१६॥ कूच करनेकी आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजासे युक्त वह विशाल राक्षस-सेना जोर-जोरसे गर्जना करती हुई जनस्थानसे बड़े वेगके साथ निकली॥१७॥ सैनिकोंके हाथमें मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फरसे, खड्ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसोंके हाथोंमें आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रोंसे उपलक्षित और खरके मनकी इच्छाके अनुसार चलनेवाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थानसे युद्धके लिये चले॥१८-२०॥ उन भयंकर दिखायी देनेवाले राक्षसोंको धावा करते देख खरका रथ भी कुछ देर सैनिकोंके निकलनेकी प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा॥२९॥ तदनन्तर खरका अभिप्राय जानकर उसके सारथिने तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे विभूषित उन चितकबरे घोड़ोंको हाँका॥२२॥ उसके हाँकनेपर शत्रुघाती खरका रथ शीघ्र ही अपने घर-घर शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगा॥२३॥ उस समय खरका क्रोध बढ़ा हुआ था। उसका स्वर भी कठोर हो गया था। वह शत्रुके वधके लिये उतावला होकर यमराजके समान भयानक जान पड़ता था। जैसे ओलोंकी वर्षा करनेवाला मेघ बड़े जोरसे गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खरने उच्चस्वरसे सिंहनाद करके पुनः सारथिको रथ हाँकनेके लिये प्रेरित किया॥२४॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२२॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
sn vyas
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12 घंटे पहले
#राधे-राधे ।। श्री राधे ।। आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की !! त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि, विमल विवेकविराग विकासिनि ! पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि, सुन्दरतम छवि सुन्दरता की !! !! आरती श्री वृषभानुसुता की..!! मुनि मन मोहन मोहन मोहनि, मधुर मनोहर मूरति सोहनि ! अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि, प्रिय अति सदा सखी ललिता की !! !! आरती श्री वृषभानुसुता की..!! संतत सेव्य सत मुनि जनकी, आकर अमित दिव्यगुन गनकी ! आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी, अति अमूल्य सम्पति समता की !! !! आरती श्री वृषभानुसुता की..!! ! आरती श्री वृषभानुसुता की ! कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि, चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि ! जगजननि जग दुखनिवारिणि, आदि अनादिशक्ति विभुता की !! !! आरती श्री वृषभानुसुता की..!! आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की !! ।। राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे ।। ...
sn vyas
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12 घंटे पहले
#श्री राधे बृजेश्वरी, रासेश्वरी श्रीराधा का विराटरूप दर्शन... उद्भव स्थित संहार:, कारिणीं क्लेश हारिणीम् । सर्व श्रेयश्करीं राधां , नतोऽहं कृष्ण वल्लभाम्।। नमस्त्रैलोक्यजननि प्रसीद करुणार्णवे। ब्रह्मविष्ण्वादिभिर्देवैर्वन्द्यमान पदाम्बुजे।। श्री राधा मेरी स्वामिनी, मैं राधे कौ दास | जनम-जनम मोय दीजियो, श्री चरनन कौ वास || सब द्वारन कूँ छाँडि कै, आयौ तेरे द्वार | हे वृषभानु की लाड़ली, नैक मेरी ओर निहार || श्री राधा राधा रटत ही, सब बाधा मिट जाय | कोटि जनम की आपदा, श्री राधा नाम ते जाय || जीवन प्राण अब बन रह्यौ, नवल प्रिया सुख धाम | ब्रज वृन्दावन स्वामिनी, ललितादिक अभिराम || "नाम महाधन है अपनौ, नहिं दूसरी सम्पति और कमानी | छोड़ अटारी अटा जग के, हमको कुटिया ब्रिज माहिं बनानी | टूक मिलें ब्रिजवासिन के अरु सेवें सदा जमुना महारानी | औरन की परवाह नहीं, अपनी ठकुरानी श्री राधिका रानी || राधे राधे. जय श्रीराधे. .
sn vyas
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12 घंटे पहले
🔥"ऋषि अगस्त्य ने क्यों किया" अपनी ही रची कन्या से विवाह ? जानिए शास्त्रसम्मत सत्य 🙏🚩 ​ क्या आप जानते हैं कि क्यों एक महान ऋषि ने अपनी ही तपस्या से रची एक कन्या को अपनी पत्नी के रूप में चुना? जो आज के समय में कल्पना से परे लगता है। आज हम उस आदि-सृजन की पूरी सच्चाई को आपके सामने रख रहे हैं। जो आज भी संतों के लिए विस्मय का विषय है।✍ 👉📖​(शास्त्रसम्मत प्रमाण) यह कथा पूर्ण रूप से महाभारत के वनपर्व (तीर्थयात्रा पर्व) में वर्णित है। ​ग्रंथ: महाभारत, वनपर्व ​अध्याय: अध्याय 97 ​संदर्भ: लोपामुद्रा की उत्पत्ति और अगस्त्य ऋषि के साथ उनके विवाह का संवाद👇 🌿​(संपूर्ण कथा - सृजन से विवाह तक) विदर्भ के राजा संतानहीन थे और उन्होंने महर्षि अगस्त्य की सेवा की। राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर अगस्त्य ऋषि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। लेकिन ऋषि को यह ज्ञात था कि भविष्य में उन्हें पितृ-ऋण से मुक्त होने और धर्म के कार्य के लिए एक ऐसी साथी की आवश्यकता है जो उनके समान ही तपस्वी हो। 💧​कन्या के सृजन की वजह: अगस्त्य ऋषि ने साधारण कन्या का जन्म नहीं चाहा। उन्होंने विदर्भ नरेश के राज्य में एक दिव्य अनुष्ठान किया और अपनी योग-शक्ति से सृष्टि के सबसे सुंदर अंगों का चयन किया—राजहंस की चाल, मृग के नयन, कोमल पुष्पों की सुगंध और चंद्रमा की शीतलता। इन सूक्ष्म तत्वों को एकत्र कर उन्होंने एक ऐसी कन्या को आकार दिया जो साक्षात् विद्या और सौंदर्य का प्रतीक थी। इसी कारण उसका नाम 'लोपामुद्रा' पड़ा (लोप=अंग, मुद्रा=आकृति)। 💥​विवाह की वजह: जब लोपामुद्रा विवाह योग्य हुई तो ऋषि अगस्त्य ने उनसे विवाह का प्रस्ताव इसलिए रखा क्योंकि वे जानते थे कि लोपामुद्रा के बिना उनका 'गृहस्थ धर्म' और 'पितृ-ऋण' अधूरा है। जब लोपामुद्रा को ऋषि अगस्त्य का विवाह प्रस्ताव मिला तो उन्होंने राजमहल की विलासिता को ठुकरा दिया। और ऋषि अगस्त्य से विवाह कर।लोपामुद्रा ऋषि के साथ घने जंगलों में जाकर वर्षों तक कठोर तपस्या की। वे केवल उनकी पत्नी नहीं, बल्कि 'श्री विद्या' की वे महान आचार्य बनीं, जिन्होंने ऋषि के ज्ञान को संसार में फैलाया। उनका विवाह सृजन, त्याग और धर्म की रक्षा का एक अनूठा संगम था। 🙏​(निष्कर्ष) लोपामुद्रा का जन्म साधारण नहीं था, वह एक उद्देश्य के लिए रची गई दिव्य शक्ति थीं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वैभव का त्याग अनिवार्य है। वे उस ऋषि की अर्धांगिनी बनीं जिन्होंने अपनी रचना को स्वयं तराशा था। #👉 लोगों के लिए सीख👈 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #☝आज का ज्ञान #🕉️सनातन धर्म🚩 #☝अनमोल ज्ञान
sn vyas
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12 घंटे पहले
#रामायण #रामायण ज्ञान रावण का पुत्र मेघनाद हिन्दू धर्म के सबसे दुर्धुष एवं प्रसिद्ध योद्धाओं में से एक है। इतिहास में कदाचित वही एक योद्धा है जिसे अतिमहारथी होने का गौरव प्राप्त है। आम तौर पर लोगों को ऐसा लगता है कि मेघनाद ही एकमात्र ऐसा योद्धा है जो कभी पराजित नहीं हुआ। हालाँकि ये बात सच है कि मेघनाद निःसंदेह एक अभूतपूर्व योद्धा था किन्तु फिर भी वो अपराजेय नहीं था। मेघनाद का वर्णन हमें रामायण के बहुत बाद के खण्डों से मिलता है लेकिन रामायण में दो स्थानों पर ऐसा वर्णन है कि मेघनाद को भी पराजय का स्वाद चखना पड़ा था। एक तो लक्ष्मण के हाथों, जो हम सब जानते हैं और दूसरी अंगद के हाथों। रामायण के युद्ध कांड के सर्ग ४३ और ४४ में हमें मेघनाद के पराजय की बात पता चलती है। युद्ध कांड के सर्ग ४३ के श्लोक ६ में लिखा है कि जब राक्षसों की सेना ने वानरों की सेना पर आक्रमण किया तो मेघनाद अंगद के साथ उसी प्रकार भिड़ गया जैसे महादेव के साथ अंधकासुर भिड़ गया था। इसके आगे श्लोक १८ में लिखा है कि मेघनाद ने अंगद पर गदा से प्रहार किया किन्तु अंगद ने उसकी गदा हाथ से पकड़ ली और उसी गदा से मेघनाद के रथ, घोड़ो और सारथि को चूर-चूर कर दिया। तो यहाँ पर साफ़ लिखा गया है कि अंगद ने अपने पराक्रम से मेघनाद को विरथ होने पर विवश कर दिया था। आगे एक और विस्तृत वर्णन हमें सर्ग ४४ के श्लोक २८ से श्लोक ३३ में मिलता है। इसमें उनके उसी युद्ध के बारे में बताया गया है। इसमें लिखा गया है कि जब अंगद ने मेघनाद के रथ को तोड़ दिया और घोड़ों और सारथि को मार डाला तब अपने आप को कष्ट में पड़ा देख कर मेघनाद वहां से अंतर्धान हो गया। अंगद के ऐसा प्रकाराम दिखाने पर सभी ऋषि और देवता उनकी प्रशंसा करने लगे। श्रीराम और लक्ष्मण ने भी अंगद के पराक्रम की बहुत प्रशंसा की। सभी मेघनाद का पराक्रम जानते थे इसीलिए उस युद्ध में उसे अंगद द्वारा पराजित हुआ देख कर सभी को बड़ी प्रसन्नता हुई। सभी लोग अंगद को साधुवाद देने लगे। इसके बाद जैसा कि हम सभी जानते हैं कि वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के सर्ग ९० में हमें लक्ष्मण और मेघनाद के बीच का तुमुल युद्ध देखने को मिलता है। इस युद्ध में लक्ष्मण मेघनाद की एक नहीं चलने देते और अंततः उनके हाथों मेघनाद का वध हो जाता है। यदि हम रामचरितमानस की बात करें तो वहां भी लक्ष्मण के अतिरिक्त एक बार हमें मेघनाद के पराजय का वर्णन मिलता है। हालाँकि वहां अंगद का कोई वर्णन नहीं है बल्कि मानस के सुन्दर कांड के अनुसार हनुमान जी ने युद्ध में मेघनाद को अंतर्धान होने पर विवश कर दिया था। उसके बाद जब मेघनाद को लगा कि इस वानर को बल से नहीं जीता जा सकता, तब उसने उनपर ब्रह्मास्त्र से प्रहार किया था। तो इस प्रकार वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों में हमें एक-एक बार लक्ष्मण के अतिरिक्त मेघनाद की पराजय के बारे में पढ़ने को मिलता है। लेकिन हाँ, ये भी सत्य है कि इसके अतिरिक्त हमें रामायण या मानस में कही भी मेघनाद की पराजय के बारे में पढ़ने को नहीं मिलता। ये सिद्ध करता है कि वो कितना उत्कृष्ट योद्धा था।
sn vyas
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12 घंटे पहले
#🚴‍♂️विश्व साइकिल दिवस 🚲 विश्व साईकिल दिवस 2026 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यदि आप कार-बंगले वाले हैं तो अपने स्टेटस को साइकिल से जोड़कर कम समझने की भूल न करें। कार से उतरें तथा प्रतिदिन कम से कम 5-6 किलोमीटर तक साइकिलिंग करें, देखें फिर आप अपनी फिटनेस। नियमित साइकिल चलाने से पूरे शरीर का व्यायाम हो जाता है। यह न केवल सर्वोत्तम व्यायाम है, अपितु खर्च भी बचाता है। बहुत से लोग चाहकर भी साइकिल नहीं चला पाते। लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे आदि बातों की कल्पना करते हैं। वे साइकिल चलाने का इरादा छोड़ देते हैं। साइकिल चलाने को एक व्यायाम के रूप में अपनाइए तो इसके ढेर सारे लाभ होते हैं। यदि समतल सड़क या मैदान पर साइकिल चलाई जाए तो इसमें थकान कम और व्यायाम अधिक होता है। शहरों में एक-दूसरे के पास गाड़ियों की संख्या जानने के लिए तो लोगों का उत्सुक रहना आम बात है लेकिन अब लोग एक-दूसरे के घरों में साइकिल की बाबत भी पूछ रहे हैं। नहीं, यह पेट्रोल बचाने की कोई मुहिम नहीं है बल्कि इसके पीछे शहरवासियों का अपनी सेहत के प्रति सजग होना है। सुबह सवेरे साइकिलिंग करना लोगों की आदत में शुमार होता जा रहा है। लोग अब जिम जाने की बजाय साइकिल चलाना ज्यादा पसंद करते हैं। यही वजह है कि लोग सुबह सैर और जॉगिंग करने के साथ-साथ साइकिलिंग करना भी पसंद करते हैं। इनमें बच्चे, बुजुर्ग, युवा सब शामिल हैं। जिम, योग, जॉगिंग के बाद अब शहरवासियों को साइकिलिंग भा रही है। सेहत के नजरिए से लोग साइकिल चलाना पसंद कर रहे हैं और इसे अपनी आदत में शुमार कर लिया है। इतना ही नहीं, पहले जहाँ साइकिल को गरीब वर्ग से जोड़ कर देखा जाता था, वहीं अब महँगी गाड़ियों में घूमने वाले लोगों के घरों में भी साइकिल नजर आ रही है। साईकिल चलाने के फायदे 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जिनके घुटने के जोड़ दुःखते हैं या शरीर में जकड़न महसूस होती है, वे अनिवार्य रूप से एक घंटे साइकिल चलाएँ। जरूरी नहीं है कि सड़कों या मैदानों में जाकर ही यह कार्य करें। चाहें तो घर के किसी कमरे में साइकिल को स्टैंड पर खड़ी करके सीट पर बैठ जाएँ तथा पैडल मारें, इससे घुटनों का अच्छा व्यायाम हो जाता है तथा जोड़ खुलने लगते हैं। पैरों की पिंडलियों की मांसपेशियाँ भी मजबूत बनती हैं। साइकिल चलाना सबसे सरल व्यायाम है, इसे स्त्री-पुरुष और बच्चे सभी अपना सकते हैं। हाँ, अपनी ऊँचाई के हिसाब से साइकिल लेनी चाहिए अन्यथा फायदे कम, नुकसान ही ज्यादा होंगे। साइकिल चलाने का सर्वोत्तम समय सुबह होता है। इस समय ज्यादा ट्रॉफिक नहीं रहता अतः प्रदूषण बहुत कम होता है और वायु भी शुद्ध मिलती है। याद रहे, शुरुआत में साइकिल कम दूरी तक ही चलाएँ तथा उसकी गति मध्यम हो, जगह चढ़ाई वाली न हो। जो लोग अपने मोटापे से दुःखी हैं, उन्हें नियमित रूप से साइकिल चलाना चाहिए, इससे मोटापा घटता है। साइकिल चलाने से जाँघें भी मजबूत होती हैं तथा शरीर में रक्त संचालन भी सही ढंग से होता है, जिससे फेफड़े भी मजबूत बनते हैं। एक अध्ययन में दावा किया गया है कि कार्यालय जाने के लिए अपने वाहन का इस्तेमाल करने के बजाय सार्वजनिक वाहन या साइकल का उपयोग करने या पैदल चलने से लोगों को वजन घटाने में मदद मिल सकती है। ब्रिटेन में ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय (यूईए) और सेंट फॉर डाइट एंड एक्टिविटी रिसर्च के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि कार्यालय पैदल चलकर जाने या साइकल से जाने से मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि अपने वाहन के बजाए कार्यालय जाने के लिए सार्वजनिक वाहन या साइकल का प्रयोग करने या पैदल कार्यालय जाने से 2 वर्ष में वजन कम हो सकता है। अनुसंधानकर्ताओं ने 4,000 लोगों से बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। यूईए के नोर्विच मेडिकल स्कूल के मुख्य अनुसंधानकर्ता एडम मार्टिन ने कहा कि हमने पाया कि कार के बजाय पैदल चलने, साइकल चलाने या सार्वजनिक वाहन का इस्तेमाल करने से औसतन 0.32 बीएमआई कम हुआ, जो एक सामान्य व्यक्ति का एक किलोग्राम वजन कम होने के बराबर है। उन्होंने कहा कि अनुसंधान में पाया गया कि यात्रा जितनी लंबी होगी, उतना ही अधिक वजन कम करने में मदद मिलेगी। मार्टिन ने कहा कि 30 मिनट से अधिक समय यात्रा करने वालों का औसतन 2.25 बीएमआई या करीब 7 किलोग्राम वजन कम हुआ। साइकल चलाते समय न करें ये गलतिया 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 👉 फिट और एक्टिव रहने के लिए साइकिल चलाना बेस्ट माना जाता है। यदि नियमित रूप से साइकिल चलाई जाएं तो इससे बॉडी की पूरी एक्सरसाइज होती है। और टोन्ड और परफेक्ट फिगर पा सकते है। लेकिन साइकिल चलाते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। वरना सेहत से जुड़ी अन्य समस्या हो सकती हैं। आइए जानें- 1👉 कुछ लोगों की आदत होती है, कि वे बार-बार पानी पीते है, ये बिलकुल अच्छी बात है लेकिन साइकिल चलाते समय अधिक मात्रा में पानी नहीं पीना चाहिए। क्योंकि साइकिल चलाते वक्त अधिक मात्रा में पानी पीया जाएं तो इससे मतली की समस्या होने लगती है। वहीं ज्यादा पानी पीने से बार-बार पेशाब आएगी। जिससे पेट में दर्द हो सकता है। इसलिए साइकिल चलाते वक्त पानी न पीएं। 2👉 साइकिल चलाना फिट रहने के लिए एक बेस्ट विकल्प है। इसलिए साइकिल चलाते वक्त फास्ट फूड या फिर जंक फूड से दूरी रखना ही बेहतर होता है, क्योंकि अनहेल्दी खाने से शरीर में फेट बढ़ता है। इससे आप सुस्त महसूस करेंगे। 3👉 साइकिल चलाने से पहले स्ट्रेचिंग न करें। वैसे आमतौर पर वर्कआउट से पहले स्टेचिंग की सलाह दी जाती है। लेकिन साइकिल चलाने से पहले स्ट्रेचिंग न करें। इससे मांसपेशियां कमजोर हो सकती है और उनमें खिंचाव आ सकता है। यदि आप स्टेचिंग करना चाहते है तो कम से कम आधे घंटे पहले करें। 4👉 कई बार ऐसा होता है कि हम साइकिल राइड को मजेदार बनाने के लिए स्टंट करना शुरू कर देते हैं। इससे एक्सीडेंट होने की संभावना अधिक रहती है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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13 घंटे पहले
#संकट चतुर्थी #🙏🏻 संकट चतुर्थी स्पेशल 🙏🏻 विभुवन संकष्टी चतुर्थी 03 जून विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार अधिक मास के कृष्ण पक्ष की संकष्टी को विभुवन संकष्टी के रूप में मनाया जाता है। अधिक मास में आने के कारण विभुवन संकष्टी को अत्यन्त दुर्लभ माना जाता है क्योंकि यह प्रत्येक ढाई वर्ष के उपरान्त आती है। विभुवन संकष्टी किसी भी चन्द्र माह में पड़ सकती है अतः इसके लिये कोई निश्चित माह निर्धारित नहीं है। किन्तु माह के परिवर्तित होने से इसके नाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, अतः किसी भी माह में अधिक मास पड़ने पर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विभुवन संकष्टी के रूप में ही मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणपति के विभुवन गणेश रूप की आराधना की जाती है। विभुवन का अर्थ 'तीनों लोकों में विद्यमान' अथवा 'तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले' होता है। अतः विभुवन गणेश कर अभिप्राय है, तीनों लोकों में विद्यमान रहने वाले भगवान गणेश। विभुवन संकष्टी के दिन व्रत एवं पूजन का विधान अन्य संकष्टी व्रतों के समान ही है, किन्तु इस दिन विशेष रूप से भगवान गणेश को नारियल के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। अधिक मास होने के कारण इस दिन किये गये जप, तप, पूजन तथा व्रत आदि का सामान्य संकष्टी के व्रत की तुलना में अनेक गुणा फल प्राप्त होता है। यह उत्तम व्रत सभी मनोरथ पूर्ण करने तथा समस्त कष्टों का निवारण करने वाला है। षोडशोपचार पूजा विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ इस व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पूर्व या सूर्योदय काल से ही करनी चाहिए। सूर्यास्त से पहले ही गणेश विनायक चतुर्थी व्रत कथा-पूजा होती है। गणेश जी को दूर्वा तथा लड्डू अत्यंत प्रिय है अत: गणेश जी पूजा में दूर्वा और लड्डू जरूर चढ़ाना चाहिए साथ मे गुड़, गन्ने और मूली का उपयोग भी करना चाहिए। इस दिन मूली भूलकर भी नहीं खानी चाहिए कहा जाता है कि मूली खाने धन -धान्य की हानि होती है। इस व्रत में चंद्रोदय के समय चन्द्रमा को गुड़ आदि का अर्घ्य देना चाहिए। साथ ही संकटहारी गणेश एवं चतुर्थी माता को गुड़, मूली आदि से अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देने के उपरांत ही व्रत समाप्त करना चाहिए। इस दिन निर्जला व्रत का भी विधान है माताएं निर्जला व्रत अपने पुत्र के दीर्घायु के लिए अवश्य ही करती है। इस दिन तिल का प्रसाद खाना चाहिए। पूजन सामग्री👉 (वृहद् पूजन के लिए ) -शुद्ध जल,दूध,दही,शहद,घी,चीनी,पंचामृत,वस्त्र,जनेऊ,मधुपर्क,सुगंध,लाल चन्दन,रोली,सिन्दूर,अक्षत(चावल),फूल,माला,बेलपत्र,दूब,शमीपत्र,गुलाल,आभूषण,सुगन्धित तेल,धूपबत्ती,दीपक,प्रसाद,फल,गंगाजल,पान,सुपारी,रूई,कपूर। विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें -और आवाहन करें - गजाननं भूतगणादिसेवितम कपित्थजम्बू फल चारू भक्षणं | उमासुतम शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम || आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव | यावत्पूजा करिष्यामि तावत्वं सन्निधौ भव || और अब प्रतिष्ठा (प्राण प्रतिष्ठा) करें - अस्यैप्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा क्षरन्तु च | अस्यै देवत्वमर्चार्यम मामेहती च कश्चन || आसन-रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्यंकर शुभम | आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः || पाद्य (पैर धुलना) उष्णोदकं निर्मलं च सर्व सौगंध्य संयुत्तम | पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगह्यताम || अर्घ्य(हाथ धुलना )- अर्घ्य गृहाण देवेश गंध पुष्पाक्षतै :| करुणाम कुरु में देव गृहणार्ध्य नमोस्तुते || आचमन सर्वतीर्थ समायुक्तं सुगन्धि निर्मलं जलं | आचम्यताम मया दत्तं गृहीत्वा परमेश्वरः || स्नान गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदाजलै:| स्नापितोSसी मया देव तथा शांति कुरुश्वमे || दूध् से स्नान कामधेनुसमुत्पन्नं सर्वेषां जीवन परम | पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थं समर्पितं || दही से स्नान पयस्तु समुदभूतं मधुराम्लं शक्तिप्रभं | दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यतां || घी से स्नान नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकं | घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || शहद से स्नान तरु पुष्प समुदभूतं सुस्वादु मधुरं मधुः | तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || शर्करा (चीनी) से स्नान इक्षुसार समुदभूता शंकरा पुष्टिकार्कम | मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || पंचामृत से स्नान पयोदधिघृतं चैव मधु च शर्करायुतं | पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || शुध्दोदक (शुद्ध जल ) से स्नान मंदाकिन्यास्त यध्दारि सर्वपापहरं शुभम | तदिधं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम || वस्त्र सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे | मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यतां || उपवस्त्र (कपडे का टुकड़ा ) सुजातो ज्योतिषा सह्शर्म वरुथमासदत्सव : | वासोअस्तेविश्वरूपवं संव्ययस्वविभावसो || यज्ञोपवीत नवभिस्तन्तुभिर्युक्त त्रिगुण देवतामयम | उपवीतं मया दत्तं गृहाणं परमेश्वर : || मधुपर्क कस्य कन्स्येनपिहितो दधिमध्वा ज्यसन्युतः | मधुपर्को मयानीतः पूजार्थ् प्रतिगृह्यतां || गन्ध श्रीखण्डचन्दनं दिव्यँ गन्धाढयं सुमनोहरम | विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यतां || रक्त(लाल )चन्दन रक्त चन्दन समिश्रं पारिजातसमुदभवम | मया दत्तं गृहाणाश चन्दनं गन्धसंयुम || रोली कुमकुम कामनादिव्यं कामनाकामसंभवाम | कुम्कुमेनार्चितो देव गृहाण परमेश्वर्: || सिन्दूर सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् || शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यतां || अक्षत अक्षताश्च सुरश्रेष्ठं कुम्कुमाक्तः सुशोभितः | माया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरः || पुष्प पुष्पैर्नांनाविधेर्दिव्यै: कुमुदैरथ चम्पकै: | पूजार्थ नीयते तुभ्यं पुष्पाणि प्रतिगृह्यतां || पुष्प माला माल्यादीनि सुगन्धिनी मालत्यादीनि वै प्रभो | मयानीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर: || बेल का पत्र त्रिशाखैर्विल्वपत्रैश्च अच्छिद्रै: कोमलै :शुभै : | तव पूजां करिष्यामि गृहाण परमेश्वर : || दूर्वा त्वं दूर्वेSमृतजन्मानि वन्दितासि सुरैरपि | सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरो भव || दूर्वाकर दूर्वाकुरान सुहरिता नमृतान मंगलप्रदाम | आनीतांस्तव पूजार्थ गृहाण गणनायक:|| शमीपत्र शमी शमय ये पापं शमी लाहित कष्टका | धारिण्यर्जुनवाणानां रामस्य प्रियवादिनी || अबीर गुलाल अबीरं च गुलालं च चोवा चन्दन्मेव च | अबीरेणर्चितो देव क्षत: शान्ति प्रयच्छमे || आभूषण अलंकारान्महा दव्यान्नानारत्न विनिर्मितान | गृहाण देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर: || सुगंध तेल चम्पकाशोक वकु ल मालती मीगरादिभि: | वासितं स्निग्धता हेतु तेलं चारु प्रगृह्यतां || धूप वनस्पतिरसोदभूतो गन्धढयो गंध उत्तम : | आघ्रेय सर्वदेवानां धूपोSयं प्रतिगृह्यतां || दीप आज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहिन्ना योजितं मया | दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम || नैवेद्य शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादुचोत्तमम | उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यतां || मध्येपानीय अतितृप्तिकरं तोयं सुगन्धि च पिबेच्छ्या | त्वयि तृप्ते जगतृप्तं नित्यतृप्ते महात्मनि || ऋतुफल नारिकेलफलं जम्बूफलं नारंगमुत्तमम | कुष्माण्डं पुरतो भक्त्या कल्पितं प्रतिगृह्यतां || आचमन गंगाजलं समानीतां सुवर्णकलशे स्थितन | आचमम्यतां सुरश्रेष्ठ शुद्धमाचनीयकम || अखंड ऋतुफल इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव | तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि || ताम्बूल पूंगीफलं पूंगीफलम महद्दिश्यं नागवल्लीदलैर्युतम | एलादि चूर्णादि संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यतां || दक्षिणा(दान) हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो: | अनन्तपुण्यफलदमत : शान्ति प्रयच्छ मे || आरती चंद्रादित्यो च धरणी विद्युद्ग्निंस्तर्थव च | त्वमेव सर्वज्योतीष आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम || पुष्पांजलि नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोदभवानि च | पुष्पांजलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर: || प्रार्थना रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षक: भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात || अनया पूजया गणपति: प्रीयतां न मम कहकर प्रणाम कर आरती के लिए खड़े हो जाये। श्री गणेश जी की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जय गणेश,जय गणेश,जय गणेश देवा | माता जाकी पारवती,पिता महादेवा || एक दन्त दयावंत,चार भुजा धारी | मस्तक पर सिन्दूर सोहे,मूसे की सवारी || जय ... अंधन को आँख देत,कोढ़िन को काया | बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया || जय ... हार चढ़े,फूल चढ़े और चढ़े मेवा | लड्डुअन का भोग लगे,संत करें सेवा || जय ... दीनन की लाज राखो,शम्भु सुतवारी | कामना को पूरा करो जग बलिहारी || जय ... विभुवन संकष्टी चतुर्थी की कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एक बार भगवान् शिव तथा पार्वतीजी चौपड़ खेल रहे थे। पार्वती ने खेल ही खेल में भगवान् शिव की सारी वस्तुएँ जीत ली। शिवजी ने जीती हुई वस्तुओं में से केवल गजचर्म वापस माँगा, पर पार्वती ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। क्रुद्ध होकर महादेवजी ने कहा “अब मैं उनतीस दिन तक तुमसे बोलूँगा नहीं।” यह कहकर महादेव अन्यत्र चले गये। पार्वतीजी भी उन्हें ढूँढ़ती-ढूँढ़ती एक घनघोर वन में जा पहुँची। उन्होंने वहाँ कुछ स्त्रियों को व्रत का पूजन करते देखा। वे स्त्रियाँ विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर रही थी। पार्वतीजी ने भी उन्हीं स्त्रियों के अनुसार वह व्रत करना आरम्भ किया। उन्होंने अभी एक ही दिन व्रत किया था कि शिवजी उसी स्थान पर प्रकट हो गये। शिवजी ने पार्वतीजी से पूछा : ‘तुमने ऐसा क्या विलक्षण उपाय किया है जिससे मुझसे तुम्हारे प्रति उदासीन का निश्चय भंग हो गया।’ तब पार्वती ने विभुवन संकष्टी चतुर्थी का विधान शिवजी को बता दिया। पुनः शिवजी ने विष्णु, विष्णु ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने इंद्र को तथा इन्द्र ने राजा विक्रमादित्य को यह व्रत बताया। राजा विक्रमादित्य ने इसका वर्णन अपनी रानी से किया। रानी ने राजा की बात पर विश्वास तो किया नहीं, उलटे निंदा की। इस कारण उसे कोढ़ हो गया। राजा ने तत्काल रानी को कहीं अन्यत्र चले जाने का आदेश दिया ताकि उनका राज्य इस भयंकर रोग से बच जाए। रानी ने महल छोड़ दिया। वह ऋषियों के आश्रम में जाकर उनकी सेवा करने लगी। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर मुनियों ने बताया कि तुमने गणेश जी का अपमान किया है, इसलिए जबतक तुम गणेशजी का पूजन-व्रत नहीं करोगी, स्वस्थ नहीं हो पाओगी। उसने गणेश पूजन व्रत आरम्भ किया। एक मास पूरा होते ही रानी स्वस्थ हो गयी। रानी वहीं आश्रम में रहने लगी। एक बार पार्वती नंदी पर सवार होकर शिवजी के साथ उस वन से गुजरी। मार्ग में एक दुःखी ब्राह्मण को देखकर पार्वतीजी ने पूछा : ‘हे ब्राह्मण! तुम किसलिए इतना विलाप कर रहे हो।’ ब्राह्मण ने उत्तर दिया- ‘यह सब दरिद्रता की ही कृपा का फल है।’ दयालु पार्वती ने ब्राह्मण को भी विक्रमादित्य के राज्य में चले जाने का आदेश दिया। ‘वहाँ एक वैश्य से पूजन की सामग्री लेकर व्रत पूजन करो। तुम्हारी दरिद्रता नष्ट हो जाएगी और तुम राज्यमंत्री बन जाओगे।” ब्राह्मण ने वैसा ही किया। ब्राह्मण राजमंत्री बन गया। एक दिन राजा विक्रमादित्य उस ऋषि आश्रम में आ पहुँचे, जहाँ उसकी रानी रहती थी। रानी को स्वस्थ तथा निरोग देखकर उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वे रानी को लेकर महलों में चले गये। राजा और रानी जीवनभर सभी सुखों का भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को प्राप्त किया। अन्य प्रचलित कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्राचीन काल में राजा चंद्रसेन एक प्रतापी राजा थे और उनकी पत्नी का नाम रत्नावली था। राजा सब प्रकार से सुखी थे, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। इस दुख के निवारण के लिए वे अपनी पत्नी के साथ वन में तपस्या करने निकल गए।अनजाने में वे महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंच गए। उन्होंने महर्षि को प्रणाम करके अपनी व्यथा बताई। तब महर्षि मार्कण्डेय ने उन्हें बताया कि राजा अपने पूर्व जन्म में भी एक राजा थे। एक बार शिकार के दौरान, उन्होंने वन में नागकन्याओं को लाल वस्त्र पहनकर 'विभुवन संकष्टी चतुर्थी' (अधिक मास वाली चतुर्थी) का व्रत और पूजा करते देखा था。नागकन्याओं ने उन्हें बताया था कि इस व्रत के प्रभाव से समस्त कष्ट और बाधाएं दूर हो जाती हैं। राजा ने उस समय व्रत करने का संकल्प तो लिया, लेकिन विधि-विधान से इसे पूरा नहीं किया। उसी अधूरे कर्म और व्रत के प्रभाव के कारण राजा को इस जन्म में भी संतान सुख से वंचित होना पड़ा。तब महर्षि मार्कण्डेय की सलाह से राजा चंद्रसेन और रानी रत्नावली ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ अधिक मास में आने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हुई। गणेश जी से जुड़े पौराणिक तथ्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1👉 किसी भी देव की आराधना के आरम्भ में किसी भी सत्कर्म व अनुष्ठान में, उत्तम-से-उत्तम और साधारण-से-साधारण कार्य में भी भगवान गणपति का स्मरण, उनका विधिवत पूजन किया जाता है। इनकी पूजा के बिना कोई भी मांगलिक कार्य को शुरु नहीं किया जाता है। यहाँ तक की किसी भी कार्यारम्भ के लिए ‘श्री गणेश’ एक मुहावरा बन गया है। शास्त्रों में इनकी पूजा सबसे पहले करने का स्पष्ट आदेश है। 2👉 गणेश जी की पूजा वैदिक और अति प्राचीन काल से की जाती रही है। गणेश जी वैदिक देवता हैं क्योंकि ऋग्वेद-यजुर्वेद आदि में गणपति जी के मन्त्रों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। 3👉 शिवजी, विष्णुजी, दुर्गाजी, सूर्यदेव के साथ-साथ गणेश जी का नाम हिन्दू धर्म के पाँच प्रमुख देवों (पंच-देव) में शामिल है। जिससे गणपति जी की महत्ता साफ़ पता चलती है। 4👉 ‘गण’ का अर्थ है - वर्ग, समूह, समुदाय और ‘ईश’ का अर्थ है - स्वामी। शिवगणों और देवगणों के स्वामी होने के कारण इन्हें ‘गणेश’ कहते हैं। 5👉 शिवजी को गणेश जी का पिता, पार्वती जी को माता, कार्तिकेय (षडानन) को भ्राता, ऋद्धि-सिद्धि (प्रजापति विश्वकर्मा की कन्याएँ) को पत्नियाँ, क्षेम व लाभ को गणेश जी का पुत्र माना गया है। 6👉 श्री गणेश जी के बारह प्रसिद्ध नाम शास्त्रों में बताए गए हैं; जो इस प्रकार हैं: 1. सुमुख, 2. एकदंत, 3. कपिल, 4. गजकर्ण, 5. लम्बोदर, 6. विकट, 7. विघ्नविनाशन, 8. विनायक, 9. धूम्रकेतु, 10. गणाध्यक्ष, 11. भालचंद्र, 12. गजानन। 7👉 गणेश जी ने महाभारत का लेखन-कार्य भी किया था। भगवान वेदव्यास जब महाभारत की रचना का विचार कर चुके तो उन्हें उसे लिखवाने की चिंता हुई। ब्रह्माजी ने उनसे कहा था कि यह कार्य गणेश जी से करवाया जाए। 8👉 पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ‘ॐ’ को साक्षात गणेश जी का स्वरुप माना गया है। जिस प्रकार प्रत्येक मंगल कार्य से पहले गणेश-पूजन होता है, उसी प्रकार प्रत्येक मन्त्र से पहले ‘ॐ’ लगाने से उस मन्त्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। वरदा चतुर्थी पूजा की विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ वरदा चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र पहनें. इसके बाद पूजा स्थान को शुद्ध करके चौकी पर भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें. पूजा के दौरान गणपति बप्पा को सिंदूर का तिलक अर्पित करें, क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय माना जाता है. गणेश जी की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है. पूजा करते समय “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए 21 दूर्वा दल अर्पित करें. इसके बाद भगवान गणेश को मोदक या उनके प्रिय मिठाई का भोग लगाएं. विधि-विधान से विघ्नहर्ता गणेश की आराधना करें और अंत में आरती उतारें. मान्यता है कि वरदा चतुर्थी का व्रत करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है. इस दिन गणेश पूजन के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना और अपनी क्षमता अनुसार दान देना शुभ माना जाता है. धार्मिक विश्वास के अनुसार “ॐ गणेशाय नमः” मंत्र का जाप करने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और स्वास्थ्य संबंधी कष्टों में भी राहत मिलती है. अधिकमास विभुवन चतुर्थी मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ चतुर्थी तिथि प्रारम्भ 👉 03 जून 2026 को रात्रि 21:21 बजे से चतुर्थी तिथि समाप्त 👉 जून 04 को रात्रि 23:30 बजे तक संकष्टी के दिन चन्द्रोदय 👉 रात्रि 22:04 से 22:43 तक। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️