चाणक्य नीति 2.17
वेश्या निर्धन मनुष्य को। प्रजा पराजित राजा को। पक्षी फलरहित वृक्ष को व अतिथि उस घर को। जिसमे वे आमंत्रित किए जाते है। को भोजन करने के पश्चात छोड़ देते है।
#😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 2.16
ब्राह्मणों का बल विद्या है। राजाओं का बल उनकी सेना है। वेश्यो का बल उनका धन है। और शूद्रों का बल छोटा बनकर रहना। अर्थात सेवा-कर्म करना है।
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चाणक्य नीति 2.15
नदी के किनारे खड़े वृक्ष, दूसरे के घर में गयी स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाते है। इसमें संशय नहीं करना चाहिए।
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चाणक्य नीति 2.14
स्त्री का वियोग, अपने लोगो से अनाचार, कर्ज का बंधन, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और अपने प्रतिकूल सभा, ये सभी अग्नि न होते हुए भी शरीर को दग्ध कर देते है।
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चाणक्य नीति 2.12
अत्यधिक लाड़-प्यार से पुत्र और शिष्य गुणहीन हो जाते है। और ताड़ना से गुनी हो जाते है। भाव यही है कि शिष्य और पुत्र को यदि ताड़ना का भय रहेगा। तो वे गलत मार्ग पर नहीं जायेंगे।
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चाणक्य नीति 2.11
जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, वे उनके शत्रु है। ऐसे अपढ़ बालक सभा के मध्य में उसी प्रकार शोभा नहीं पाते, जैसे हंसो के मध्य में बगुला शोभा नहीं पाता।
#😇 चाणक्य नीति
चाणक्य नीति 2.11
जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, वे उनके शत्रु है। ऐसे अपढ़ बालक सभा के मध्य में उसी प्रकार शोभा नहीं पाते, जैसे हंसो के मध्य में बगुला शोभा नहीं पाता।
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चाणक्य नीति 2.11
जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, वे उनके शत्रु है। ऐसे अपढ़ बालक सभा के मध्य में उसी प्रकार शोभा नहीं पाते, जैसे हंसो के मध्य में बगुला शोभा नहीं पाता।
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