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Dr.S.S.Arora
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Dr.S.S.Arora
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7 hours ago
☯️🕉️🌳🌻🌈🇮🇳🌈🌹🌳🕉️☯️ *_!! जब राजीव गांधी ने भारत में डिजिटल क्रांति की नींव रखी — "एक चिंतन " !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, 35वीं पुण्यतिथि पर विशेष।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, "1984 के आम चुनावों में कांग्रेस ने रिकॉर्ड 414 सीटें जीतीं।" यह राजीव गांधी की चरम लोकप्रियता और शक्ति का दौर था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और दिसंबर 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया — कुल 414 सीटें, जो भारतीय चुनावी इतिहास में किसी भी पार्टी का अब तक का सबसे बड़ा बहुमत है। यह दौर उनके "आधुनिक भारत" के विज़न की शुरुआत भी था, "जिसने उन्हें एक युवा, ईमानदार और प्रगतिशील नेता के रूप में स्थापित किया।" इंदिरा गांधी की हत्या के ठीक बाद हुए इन चुनावों में राजीव गांधी ने पूरे देश का दौरा किया, सैकड़ों रैलियाँ कीं और कांग्रेस को अभूतपूर्व जीत दिलाई।_* *_उनके प्रधानमंत्रित्व काल का सबसे प्रमुख योगदान था — "सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर और दूरसंचार क्रांति की नींव रखना।" वे भारत के कंप्यूटर एवं संचार क्रांति के जनक माने जाते हैं। उन्होंने समानांतर रूप से अनेक प्रौद्योगिकी मिशन शुरू किए और "सैम पित्रोदा" जैसे विशेषज्ञों को साथ लेकर देश को आधुनिक बनाने का अभियान चलाया। पहले टेलीफोन अमीरों की चीज़ था, "लेकिन राजीव गांधी के प्रयासों से यह आम लोगों — विशेषकर ग्रामीण भारत — तक पहुँचा।" इससे व्यवसाय, सरकारी कामकाज और सूचना के आदान-प्रदान में आसानी हुई, जो बाद में भारत की आईटी और बीपीओ उद्योग ( इन्फोसिस, विप्रो जैसी कंपनियों ) की मज़बूत नींव बनी। आज का "डिजिटल इंडिया" इसी दूरदर्शिता की देन है।_* *_मित्रों, जब 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, "उस समय भारत में मात्र 20-25 लाख टेलीफोन थे," जो मुख्यतः शहरों तक सीमित थे। टेलीफोन लगवाना बहुत मुश्किल और महँगा था, और ग्रामीण क्षेत्र लगभग इससे कटे हुए थे। इसी दौरान सैम पित्रोदा का आगमन हुआ, "जो अमेरिका में सफल दूरसंचार इंजीनियर थे।" 1981 में भारत आने पर उन्होंने देश की खराब टेलीकॉम व्यवस्था देखी और बदलाव की ठान ली। इंदिरा गांधी के समय संपर्क हुआ, किंतु राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर 1984 में पित्रोदा को सलाहकार नियुक्त किया गया।_* *_अगस्त 1984 में भारत में C-DOT ( Centre for Development of Telematics ) की स्थापना हुई — एक स्वायत्त संस्था, "जिसका उद्देश्य भारत में स्वदेशी डिजिटल टेलीफोन एक्सचेंज विकसित करना था।" पित्रोदा इसके संस्थापक एवं प्रथम प्रमुख बने। C-DOT ने विदेशी तकनीक पर निर्भरता घटाई और भारतीय परिस्थितियों ( गर्मी, धूल, बिजली की समस्याओं ) के अनुकूल सस्ती तकनीक विकसित की। देश में छोटे-बड़े डिजिटल एक्सचेंज ( Rural Automatic Exchanges – RAX ) विकसित किए गए, जिनसे गाँवों में भी टेलीफोन सुविधा पहुँची। C-DOT ने भारत को स्वावलंबी बनाया। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में टेलीफोन सेवाएँ सुधारने के लिए महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड ( MTNL ) की स्थापना की गई, जिससे सेवाएँ तीव्र और कुशल हुईं। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार हेतु विदेश संचार निगम लिमिटेड ( VSNL ) बनाया गया, जिससे विदेशी संपर्क सरल हुआ। इस काल में STD और PCO बूथों का अभूतपूर्व विस्तार किया गया। गाँव-गाँव PCO बूथ खुले, "जहाँ आम आदमी सस्ते में STD कॉल कर सकता था।" यह सबसे दृश्यमान परिवर्तन था, जो ग्रामीण भारत को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाली कड़ी बना।_* *_मित्रों, राजीव गांधी ने 1989 में टेलीकॉम कमीशन बनाया, "जिसे स्वायत्तता दी गई।" इससे नीतियाँ त्वरित लागू हो सकीं। कंप्यूटर आयात पर सीमा शुल्क घटाया गया, प्रौद्योगिकी मिशन शुरू किए गए, और सरकारी विभागों में कंप्यूटरीकरण की शुरुआत हुई। जिसके परिणामस्वरूप: टेलीफोन कनेक्शनों में तीव्र वृद्धि हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में संचार सुविधा बढ़ी, "जिससे व्यवसाय, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि को मदद मिली।" बाद में आईटी और बीपीओ उद्योग की मजबूत नींव पड़ी। "आज की डिजिटल इंडिया क्रांति इसी दूरदर्शिता की देन है।" यह क्रांति प्रारंभ में पूर्णतः सरकारी प्रयासों पर आधारित थी, किंतु 1990 के दशक में निजीकरण और 2000 के बाद मोबाइल फोन के आगमन ने इसे और आगे बढ़ाया। राजीव गांधी का योगदान दूरदर्शिता का था। उन्होंने “प्रौद्योगिकी को आम आदमी तक पहुँचाने” का सपना देखा और उसकी शुरुआत की। उस दौर में लिए गए उनके दूरदर्शी निर्णयों के कारण ही आज भारत आईटी क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है।_* 👌🏻 *_विशेष :-_* *_☝🏻आज, 21 मई... जब हम आपको याद करते हैं, "तो हृदय में एक गहरी पीड़ा और गर्व का मिश्रण उभरता है।" आपने मात्र 40 वर्ष की आयु में देश की बागडोर संभाली "और भारत को आधुनिक युग की ओर ले जाने का सपना देखा।" आपका विज़न था — "एक सशक्त, समृद्ध और प्रगतिशील भारत।" 21 मई 1991 को आपने देश के लिए अपना "सर्वोच्च बलिदान दिया।" लेकिन आपकी विचारधारा, आपकी ऊर्जा और आपका सपना आज भी जीवित है। आधुनिक भारत के शिल्पकार, महान देशभक्त, अत्यंत सरल और दूरदर्शी नेता राजीव गांधी जी को उनकी 35वीं पुण्यतिथि पर — सुरेंद्र अरोड़ा श्रद्धानवत श्रद्धांजलि अर्पित करता है।_*👏🏻 ☯️🕉️🌴🌾🌈🇮🇳🌈💐🌴🕉️☯️ #🌙 गुड नाईट
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22 hours ago
☯️🕉️🌳🌻🛕🌞🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! प्रातः कालीन वंदन !!_* *_आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं लोकनाथं विभुं व्यापकं शंकरम् ! सर्वभक्तेष्टं मुक्तिदं माधवं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे !!_* *_देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम् ! बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् !!_* *_देवमन्त्री विशालाक्षः सदा लोकहिते रतः ! अनेकशिष्यसंपूर्णः पीडां हरतु मे गुरुः !!_* *_युद्धे चक्रधरं देवं प्रवासे च त्रिविक्रमम् ! नारायणं तनुत्यागे श्रीधरं प्रियसंगमे !!_* *_दुःस्वप्ने स्मर गोविन्दं संकटे मधुसूदनम् !_* *_ॐ वरुणः पाप्मानं मे हन्तु सत्यधर्मा परिपातु विश्वतः ! यथाहमिहीनः स्यां यथा मा दुष्कृतं स्पृशत् ! ॐ स्वस्ति !!_* *_यः सेनानीर्वसूनां यः पृष्ठीनां नियोधकः। यो रथानां वाहांश्च स नो वायुर्मृडयातु नः॥_* *_!! ༺꧁ प्रभात पुष्प ꧂༻ !!_* *_☝🏻मित्रों, भरोसा हमेशा नस्ल देखकर ही करना चाहिए, "क्योंकि बकरियाँ हमेशा सूखी घास खाकर भी मीठा दूध देती हैं, और साँप हमेशा दूध पीकर भी जहर उगलता है।" यह सोच भ्रामक है—बकरी का दूध मीठा इसलिए है "क्योंकि वह बकरी है," साँप में जहर इसलिए है कि "वह साँप है।" तात्पर्य यह है कि नस्ल तो यह बताती है कि किससे क्या प्रकृति अपेक्षित है, "लेकिन इसका अर्थ यह हरगिज़ नहीं है कि हर साँप को मार दो या हर बकरी की पूजा-अर्चना करो।" असली भरोसा व्यवहार और चरित्र में दिखता है, "न कि जन्मजात नस्ल के लेबल पर।" सच्चा भरोसा तो वह है जो समय की कसौटी पर खरा उतरे, "न कि खून के धागे से बंधा हो।" इंसानियत नस्ल से नहीं, नीयत से पहचानी जाती है — "यही वह आस्था है जो कभी टूटती नहीं।"_*👌🏻 *_🙏🏻बृहस्पतिवार प्रातःकाल की पवित्र "मंगल बेला" पर विधाता आपको सदैव अक्षय आरोग्य, धन एवं ऊर्जा प्रदान करें। सुरेंद्र अरोड़ा की ओर से आपके लिए मंगलमय शुभकामनाएं। आपके स्वास्थ्य, सफलता एवं यश-कीर्ति की वृद्धि के लिए असीमित दुआओं के साथ... सुमंगल, स्नेहिल भोर-वंदन, मित्रों। भगवान श्री हरि विष्णु जी एवं देवगुरु बृहस्पति जी का स्नेहिल शुभ आशीर्वाद आप सभी मित्रजनों पर सदैव बना रहे। आपके जीवन की प्रत्येक सुबह आपके जीवन में नई आशा और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करे। मन में प्रसन्नता, बुद्धि में विवेक और आत्मा में शांति का वास सदा बना रहे। मस्त रहें, व्यस्त रहें, स्वस्थ रहें, समस्त पाप-कर्मों से दूर रहें तथा "प्रकृति के एहसानमंद और शुक्रगुज़ार रहें।"🙏🏻_* *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🌈☀️🌈💐🌴🕉️☯️ #🌞 Good Morning🌞
Dr.S.S.Arora
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22 hours ago
☯️🕉️🌳🌻🛕🌞🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! श्रद्धांजलि: भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा,35वीं पुण्यतिथि पर दो शब्द।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, आज ही के दिन, 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती बम विस्फोट में देश ने अपने सबसे युवा और दूरदर्शी प्रधानमंत्री को खो दिया। उनका बलिदान आतंकवाद के विरुद्ध एक ऐसा अध्याय है, जिसकी याद में प्रतिवर्ष 21 मई को "राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस" मनाया जाता है। मात्र 40 वर्ष की आयु में वे देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने और उन्हें ऐतिहासिक जनादेश मिला।_* *_उन्हें "भारत की सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार क्रांति का जनक" कहा जाता है। उन्होंने C-DOT ( Centre for Development of Telematics ) की स्थापना की और नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (NASSCOM) की नींव रखी, जिससे भारत IT हब बना। 1989 में 61वें संशोधन के माध्यम से मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी, जिससे देश के करोड़ों युवाओं को वोट देने का अधिकार मिला।_* *_उन्होंने ग्रामीण सशक्तिकरण के लिए पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया। पंजाब, असम और मिजोरम में ऐतिहासिक समझौतों के जरिए वर्षों से चले आ रहे संघर्ष और हिंसा को समाप्त किया। 21 मई 1991 की रात, चुनाव प्रचार के दौरान जब राजीव गांधी जी समर्थकों से मिल रहे थे, लिट्टे ( LTTE ) की आत्मघाती हमलावर धनु ने उनके चरण छूने का नाटक करते हुए बम विस्फोट कर दिया। "इस हमले में राजीव गांधी जी सहित 16 लोग शहीद हो गए।" उनका यह बलिदान यह दर्शाता है कि वे देश की आखिरी सांस तक उसकी रक्षा में जुटे रहे। आपकी विरासत प्रेरणा देती रहेगी। देश आपको सदा याद रखेगा।_*👏🏻 ☯️🕉️🌴🌾🌈☀️🌈💐🌴🕉️☯️ #🌞 Good Morning🌞
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1 days ago
☯️🕉️🌳🌻🌈☀️🌈🌹🌳🕉️☯️ *_!! चिता आंदोलन: "क्या विकास के नाम पर समुदायों का अस्तित्व मिटाना न्यायसंगत है ?” !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, “चिता आंदोलन” केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में छेड़ा गया एक चरम और प्रतीकात्मक आंदोलन है। इसका सार यह है कि प्रभावित समुदाय के लोग “इस परियोजना के कारण अपनी भूमि, वन और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत के विनाश को अपनी सामूहिक मृत्यु के समान मान रहे हैं।” वे प्रश्न करते हैं – क्या नदियों को जोड़ने के नाम पर समुदायों को मिटाना न्यायसंगत है? यह परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के एक विशाल हिस्से को जलमग्न कर देगी। “अनुमान है कि लगभग 20 लाख पेड़ काटे जाएंगे तथा 21 से अधिक गाँवों के लोग विस्थापित होंगे।” लोग आरोप लगाते हैं कि ग्राम सभाएँ केवल कागजों तक सीमित रह गईं – “न तो उन्हें वास्तविक सुनवाई मिली, न ही पारदर्शी चर्चा।” पुनर्वास नीति में “भूमि के बदले भूमि” का कोई प्रावधान नहीं है, जो आदिवासी एवं वनवासी समाज के लिए जीवन की अनिवार्य शर्त रही है।_* *_मित्रों, आंदोलनकारियों का मानना है कि "उनकी ज़मीन और जंगल छिनने का सीधा अर्थ उनके अस्तित्व का अंत है।" वे पूछते हैं – बिना ज़मीन के क्या कोई आदिवासी परिवार जी सकता है ? क्या विकास केवल शहरी सुविधाओं का नाम है ? प्रशासन ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए सख्त धाराएँ लागू कर दी हैं। “प्रदर्शन स्थलों तक खाद्य और जलापूर्ति बाधित करने का प्रयास किया गया है।” भूख और निर्जलीकरण को हथियार बनाकर लोगों को समर्पण के लिए मजबूर किया जा रहा है। क्या यह परियोजना दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति और जैव विविधता के “विनाश से विकास की परिभाषा” को चुनौती नहीं देती ?_* *_क्या ग्राम सभाओं की उपेक्षा करके “बनाई गई योजनाएँ लोकतांत्रिक हो सकती हैं,” जबकि संविधान की पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र) अधिनियम, 1996 ग्राम सभा को सर्वोच्च अधिकार देता है? जिस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान जंगल और नदी से जुड़ी है, “उसे मुआवज़े की कुछ राशि देकर विस्थापित करना किस नैतिकता का परिचायक है ?” क्या सरकार उन लोगों से सीधे वार्ता करने को तैयार होगी, जो अपनी चिता जलाकर एक ही प्रश्न पूछते हैं – “हमें मारकर किसका कल्याण होगा ?” 🤔😡_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, “चिता आंदोलन” केवल एक परियोजना का विरोध नहीं है; यह उस विकास मॉडल के खिलाफ एक कराह है, "जो प्रकृति और मनुष्य के बीच सदियों पुराने सामंजस्य को तोड़ता है।" यह हम सबके सामने एक असहज प्रश्न रखता है – “क्या हम उस सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ नदियाँ तो जुड़ेंगी, लेकिन जीवन अलग हो जाएँगे ?” क्या सरकार इस चुप्पी को और सुन सकती है, जो चीख बन चुकी है ? "उत्तर सिर्फ नीति-निर्माताओं को नहीं, बल्कि पूरे समाज को खोजना होगा।" ज्यादा न लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूँ। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा। 👏🏻_* *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🌈🌅🌈💐🌴🕉️☯️ #🌞 Good Morning🌞
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1 days ago
☯️🕉️🌳🌻🛕🌞🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! प्रातः कालीन वंदन !!_* *_प्रातः स्मरणीयं गणनाथमनाथबन्धुं सिन्दूरफालपरिशोभितगण्डयुग्मम्। उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्डं मार्कण्डेयादिसुरनायकवृन्दवन्दितम्॥_* *_गणपतिर्विघ्नराजो लम्बोदरो गजाननः। द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः। विनायकश्चारुकर्णः पशुपतिर्भवात्मजः॥_* *_प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं भुवि। वायुभूतं समारुह्य भ्राम्यन्तं सर्वदा ग्रहैः॥_* *_सर्वदेवमयं देवं लोकानां हितकारकम्। नमामि बुधं सुरासुरैः स्तूयमानं सदा शुभम्॥_* *_ॐ गजध्वजाय विद्महे सुखहस्ताय धीमहि। तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्॥_* *_!! ༺꧁ प्रभात पुष्प ꧂༻ !!_* *_☝🏻मित्रों, जुनून आदमी से वह करवा लेता है "जो वह नहीं कर सकता", हौसला आदमी से वह करवाता है जो वह "कर सकता है", और अनुभव वही करवाता है "जो वास्तव में उसे करना चाहिए।" जुनून तुम्हें "असंभव" का स्वाद चखाता है, हौसला तुम्हें "संभव" का मार्ग दिखाता है, और अनुभव तुम्हें बताता है कि क्या वास्तव में "तुम्हारे लिए अर्थ रखता है।" इन तीनों के बिना व्यक्ति अधूरा है – "पहला जलाता है, दूसरा थामता है, तीसरा संवारता है।" जीवन की सफलता इस त्रिशूल के संतुलन में छिपी है: बिना जुनून के हौसला "बोझ" है, बिना हौसले के अनुभव "बेकार" है, और बिना अनुभव के जुनून "अंधा" है। स्मरण रहे, सीख लेना ही सच्चा "अनुभव" है, और सीखे हुए पर "अमल" करना ही सच्चा हौसला। 👌🏻_* *_🙏🏻बुधवार प्रातःकाल की पवित्र "मंगल बेला" में, विधाता आपको सदैव अक्षय आरोग्य, धन और ऊर्जा प्रदान करें। सुरेंद्र अरोड़ा की ओर से आपके लिए मंगलमय शुभकामनाएँ। आपके स्वास्थ्य, सफलता एवं यश-कीर्ति की असीमित दुआओं के साथ, सुमंगलम स्नेहिल भोर वंदन, मित्रों। भगवान श्री गणेश जी का स्नेहिल शुभ आशीर्वाद आप सभी मित्रजनों पर सदैव बना रहे। मस्त रहें, व्यस्त रहें, स्वस्थ रहें, समस्त पाप-कर्मों से दूर रहें, "तथा प्रकृति के प्रति एहसानमंद और कृतज्ञ बने रहें।" जीवन के हर पल में उत्सव का भाव रखें, और हर सुबह नई आशा के साथ जागें। आपका मंगलमय भविष्य ही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है।🙏🏻_* *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* 🕉️☯️🌴🌾🌈☀️🌈💐🌴☯️🕉️ #🌞 Good Morning🌞
Dr.S.S.Arora
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3 days ago
☯️🕉️🌳🌻🛕🌝🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! रात्रिकालीन वंदन !!_* *_आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। मृत्युलोके महाकालं त्रिलिङ्गं नमोऽस्तु ते॥_* *_ॐ क्षीरपुत्राय विद्महेऽमृततत्त्वाय धीमहि। तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात्॥_* *_यं त्वा सोम प्रभृथ्रा मन्दसानो मदिन्नम्। अभि यं तोशते मतिर्धियं जनेषु गीर्यम्॥_* *_कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥_* *_!! भारत का दोहरा चेहरा : "ऊपर चमक, नीचे चुप" !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, भारत में अब गरीबी नहीं छिपाई जाती — उसे “विकास” कहकर बेचा जाता है। देश की GDP बढ़ रही है। शेयर बाजार रिकॉर्ड बना रहा है। अरबपतियों की संपत्ति आसमान छू रही है। टीवी एंकर चिल्ला रहे हैं — “भारत सुपरपावर बन रहा है। "लेकिन इसी देश में 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन पर जी रहे हैं।" करोड़ों युवा डिग्री लेकर 12 हज़ार की नौकरी तलाश रहे हैं। गाँवों में मजदूरी ठहरी हुई है। शहरों में लोग EMI, किराए और अस्पताल के बिलों के बीच पिस रहे हैं। फिर भी हमें बताया जा रहा है — “असमानता कम हो रही है।” सवाल यह है — अगर असमानता सचमुच कम हो रही है, "तो अमीर और गरीब के बीच की दूरी हर साल और खतरनाक क्यों दिख रही है ?" क्यों भारत का एक छोटा वर्ग प्राइवेट जेट, डेटा सेंटर, बंदरगाह, हवाई अड्डे और मीडिया खरीद रहा है… जबकि करोड़ों लोग नौकरी, फीस और इलाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं ?_* *_मित्रों, भारत में अब विकास का मतलब यह नहीं रह गया कि जनता समृद्ध हो रही है। विकास का मतलब यह हो गया है कि कुछ कॉरपोरेट समूह अभूतपूर्व ताकत हासिल कर रहे हैं — "और बाकी जनता को राष्ट्रवाद, धर्म, मुफ्त राशन और डिजिटल तमाशे में उलझाए रखा जा रहा है।" नोटबंदी हुई — छोटे व्यापारी टूटे। GST आया — स्थानीय कारोबार दब गए। लेबर कोड आए — स्थायी नौकरियाँ और भी कमजोर हुईं। MGNREGA कमजोर किया गया — "गाँवों की अंतिम सुरक्षा-रेखा हिल गई।" लेकिन टीवी पर क्या दिखा ? “India Rising, विश्वगुरु और अमृतकाल" यानी ऊपर की चमक को नीचे के अंधेरे पर पर्दा डालने का काम किया गया।_* *_मित्रों, सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में गरीब आदमी अब सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं हार रहा — "वह मानसिक रूप से भी हार रहा है।" उसे यह यकीन दिला दिया गया है कि अरबपतियों की संपत्ति बढ़ना ही राष्ट्रभक्ति है।कि सवाल पूछना “नेगेटिविटी” है। कि बेरोजगारी पर बात करना “एंटी-डेवलपमेंट” है। और इसी बीच, देश की संपत्ति ऊपर सिमटती जा रही है। भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि यहाँ अमीर हैं। "त्रासदी यह है कि यहाँ अमीरी को राष्ट्रीय उपलब्धि और गरीबी को व्यक्तिगत असफलता बना दिया गया है।" यही “नया भारत” मॉडल है — ऊपर चमकता हुआ इंडिया, नीचे चुप कराया गया भारत। सरकार को आइना दिखाने का यह प्रयास चिंतन का आह्वान है, बिना किसी वैचारिक शोर के। असली विकास वही है जो सबसे नीचे खड़े व्यक्ति के जीवन में दिखे। बाकी सब चमक-दमक है।_* 🤔 *_🙏🏻सोमवार रात्रि की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को भगवान महाकाल जी का स्नेहसिक्त आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान भोले भंडारी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें। आप सदैव खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं सहित, सुमंगलम स्नेहिल रात्रि वंदन, मित्रो। यदि यह पोस्ट आपको अच्छी लगे, तो कृपया अपने सभी परिचितों के साथ अवश्य साझा करें। धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ. सुरेंद्र अरोड़ा 9780077479🙏🏻_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, यह पोस्ट हमें एक ऐसे आईने के सामने खड़ा करती है, "जहाँ ऊपर चमकते आँकड़े और नीचे कराहता हर दिन का संघर्ष एक साथ दिखते हैं।" असली चिंतन का विषय यह नहीं कि भारत बढ़ रहा है या नहीं, "बल्कि यह कि इस बढ़त का फल किनकी झोली में गिर रहा है।" जब अमीरी को राष्ट्रीय उपलब्धि और गरीबी को व्यक्तिगत असफलता बना दिया जाए, "तो समझ लीजिए कि विकास का असली मापदंड खो गया है।" आखिरकार, वही समाज सचमुच समृद्ध है, जहाँ सबसे नीचे खड़ा इंसान भी बिना डरे सपना देख सके। "बाकी सब सिर्फ चमकता हुआ भ्रम है।" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटी रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🌈😴🌈💐🌴🕉️☯️ #🌙 गुड नाईट
Dr.S.S.Arora
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3 days ago
☯️🕉️🌳🌻🌈☀️🌈🌹🌳🕉️☯️ *_!! चिता आंदोलन: "क्या विकास के नाम पर समुदायों का अस्तित्व मिटाना न्यायसंगत है ?” !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, “चिता आंदोलन” केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में छेड़ा गया एक चरम और प्रतीकात्मक आंदोलन है। इसका सार यह है कि प्रभावित समुदाय के लोग “इस परियोजना के कारण अपनी भूमि, वन और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत के विनाश को अपनी सामूहिक मृत्यु के समान मान रहे हैं।” वे प्रश्न करते हैं – क्या नदियों को जोड़ने के नाम पर समुदायों को मिटाना न्यायसंगत है? यह परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के एक विशाल हिस्से को जलमग्न कर देगी। “अनुमान है कि लगभग 20 लाख पेड़ काटे जाएंगे तथा 21 से अधिक गाँवों के लोग विस्थापित होंगे।” लोग आरोप लगाते हैं कि ग्राम सभाएँ केवल कागजों तक सीमित रह गईं – “न तो उन्हें वास्तविक सुनवाई मिली, न ही पारदर्शी चर्चा।” पुनर्वास नीति में “भूमि के बदले भूमि” का कोई प्रावधान नहीं है, जो आदिवासी एवं वनवासी समाज के लिए जीवन की अनिवार्य शर्त रही है।_* *_मित्रों, आंदोलनकारियों का मानना है कि "उनकी ज़मीन और जंगल छिनने का सीधा अर्थ उनके अस्तित्व का अंत है।" वे पूछते हैं – बिना ज़मीन के क्या कोई आदिवासी परिवार जी सकता है ? क्या विकास केवल शहरी सुविधाओं का नाम है ? प्रशासन ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए सख्त धाराएँ लागू कर दी हैं। “प्रदर्शन स्थलों तक खाद्य और जलापूर्ति बाधित करने का प्रयास किया गया है।” भूख और निर्जलीकरण को हथियार बनाकर लोगों को समर्पण के लिए मजबूर किया जा रहा है। क्या यह परियोजना दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति और जैव विविधता के “विनाश से विकास की परिभाषा” को चुनौती नहीं देती ?_* *_क्या ग्राम सभाओं की उपेक्षा करके “बनाई गई योजनाएँ लोकतांत्रिक हो सकती हैं,” जबकि संविधान की पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र) अधिनियम, 1996 ग्राम सभा को सर्वोच्च अधिकार देता है? जिस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान जंगल और नदी से जुड़ी है, “उसे मुआवज़े की कुछ राशि देकर विस्थापित करना किस नैतिकता का परिचायक है ?” क्या सरकार उन लोगों से सीधे वार्ता करने को तैयार होगी, जो अपनी चिता जलाकर एक ही प्रश्न पूछते हैं – “हमें मारकर किसका कल्याण होगा ?” 🤔😡_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, “चिता आंदोलन” केवल एक परियोजना का विरोध नहीं है; यह उस विकास मॉडल के खिलाफ एक कराह है, "जो प्रकृति और मनुष्य के बीच सदियों पुराने सामंजस्य को तोड़ता है।" यह हम सबके सामने एक असहज प्रश्न रखता है – “क्या हम उस सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ नदियाँ तो जुड़ेंगी, लेकिन जीवन अलग हो जाएँगे ?” क्या सरकार इस चुप्पी को और सुन सकती है, जो चीख बन चुकी है ? "उत्तर सिर्फ नीति-निर्माताओं को नहीं, बल्कि पूरे समाज को खोजना होगा।" ज्यादा न लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूँ। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा। 👏🏻_* *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🌈🌅🌈💐🌴🕉️☯️ #🙏शुभ दोपहर