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*_!! प्रशासन का दुस्साहस: "देव आदेश की धज्जियाँ उड़ाकर किन्नर कैलाश यात्रा शुरू करना आग से खेलना है" !!_*
*_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_*
*_☝🏻मित्रों, हिमाचल के किन्नौर जिले की पवित्र किन्नर कैलाश यात्रा को लेकर "प्रशासन ने एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और विनाशकारी कदम उठाया है।" जहाँ एक ओर स्थानीय कुलदेवता "परका शंकर जी" ने अपने "गुर" के माध्यम से स्पष्ट देव आदेश दिया था कि इस यात्रा को पूर्णतः बंद किया जाए, "वहीं प्रशासन ने इस दैवीय चेतावनी को नकारते हुए यात्रा को पुनः शुरू करवा दिया है।" यह प्रकृति और आस्था के साथ सरासर खिलवाड़ है, एक ऐसी मूर्खता जिसके "घातक" परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।_*
*_दरअसल, पोवारी गाँव के कुलदेवता ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में आदेश दिया था कि बढ़ते पर्यटन से क्षेत्र की "पवित्रता और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।" पोवारी के देव कारदारों ने भी जिला प्रशासन को लिखित ज्ञापन सौंपकर देव आदेश का सम्मान करने की विनती की थी। लेकिन प्रशासन ने इन सबको दरकिनार कर एक ऐसा फरमान जारी किया है जो 'देव भूमि' की आत्मा पर कुठाराघात करने के समान है। यह केवल एक यात्रा का मसला नहीं है; यह धार्मिक भावनाओं की घोर अवहेलना है।_*
*_प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2025 में भारी बारिश, "बादल फटने और भूस्खलन के कारण इस यात्रा ने कितना भयावह रूप ले लिया था, जिसमें पाँच श्रद्धालुओं की जानें गईं थीं।" तब आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत यात्रा स्थगित करना तो तर्कसंगत था, लेकिन आज देवता के सीधे संकेत के बावजूद "यात्रा बहाल करना प्रशासनिक अहंकार की पराकाष्ठा है।" जिला उपायुक्त का यह कहना कि "वे स्थानीय भावनाओं का सम्मान करेंगे," अब एक खोखला और झूठा आश्वासन बनकर रह गया है। कैबिनेट मंत्री से परामर्श की बात करना तब बेमानी है जब सर्वोच्च देव आदेश को ही ठुकरा दिया गया।_*
*_यह संघर्ष पवित्रता बनाम व्यावसायीकरण का जीता-जागता उदाहरण है। बढ़ता कचरा, शोर-शराबा और अव्यवस्था 'देव भूमि' की आत्मीयता को कुचल रहे हैं। ‘गुर’ के ज़रिए देवता का संदेश एक दिव्य चेतावनी है कि अगर यात्रा जारी रही तो इसके विनाशकारी परिणाम होंगे। इसे अनदेखा करना सिर्फ आस्था का अपमान नहीं, "बल्कि जनजीवन को खतरे में डालने जैसा है।" क्या पाँच लोगों की त्रासदीपूर्ण मृत्यु हमारे लिए पर्याप्त शिक्षा नहीं थी ? क्या प्रशासन और अधिक लाशें चाहता है ?_*
*_यह साफ है कि प्रशासन ने धार्मिक विश्वास और प्रकृति की चेतावनी को ताक पर रखते हुए "पर्यटन-आधारित अर्थव्यवस्था को अंधी दौड़ में प्राथमिकता दी है।" यह तथाकथित "प्रगति" हमें धीरे-धीरे हमारी धरोहरों के अस्तित्व को मिटाने की ओर ले जा रही है। सुरेंद्र अरोडा सरकार और उच्च अधिकारियों से सीधा अनुरोध करता हैं कि इस आग से खेलने वाले निर्णय पर तुरंत रोक लगाएँ। इस नए आदेश की कठोरतम शब्दों में निंदा की जाती है और "तत्काल प्रभाव से देव आदेश का पालन करते हुए किन्नर कैलाश यात्रा को बंद किया जाए।" प्रकृति से खिलवाड़ और जनभावनाओं से बेरुखी "हमेशा घातक सिद्ध होती है।" इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, सरकार को जागना होगा।_* 😡🤔
*_विशेष :-_*
*_☝🏻मित्रों, किन्नर कैलाश यात्रा पर प्रशासन का यह दुस्साहस केवल एक यात्रा का प्रश्न नहीं है, "बल्कि यह हमारे समक्ष आस्था, सुरक्षा, पारिस्थितिकी और पर्यटन-आधारित अर्थव्यवस्था के बीच गहरे द्वंद्व को उजागर करता है।" क्या हम विकास की अंधी दौड़ में उन पवित्र स्थलों को पूरी तरह खो देना चाहते हैं जहाँ प्रकृति स्वयं देवता का रूप धारण करती है ? "या फिर परंपरा को तोड़कर व्यावसायीकरण को प्राथमिकता देना ही हमारी एकमात्र प्रगति है ?" यह घटना हमें पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर देती है कि "देव भूमि" की पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रशासन को अपनी जिद छोड़कर "प्रकृति-सम्मत आस्था' की उस परिभाषा को स्वीकार करना ही होगा जो सदियों से चली आ रही है।" सरकार से मेरी अंतिम अपील है कि "अंधे न बनें, प्रकृति और आस्था के विरुद्ध यह युद्ध तुरंत बंद करें।" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻
*_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_*
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