एक लड़का रोज़ अपनी गर्लफ्रेंड को रात में 11 बजे "सो गई क्या?" का मैसेज करता था।
और लड़की हर दिन जवाब देती "नहीं... तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।"
धीरे-धीरे दोनों की आदत बन गई -
दिन भर चाहे कितनी भी लड़ाई हो जाए, रात 11 बजे दोनों की बात ज़रूर होती थी।
एक दिन छोटी-सी बात पर दोनों में बहुत बड़ी लड़ाई हो गई।
गुस्से में लड़की ने कहा -
"आज के बाद मुझे मैसेज मत करना।"
उस दिन पहली बार लड़के ने 11 बजे मैसेज नहीं किया... और पहली बार लड़की ने भी इंतज़ार करते-करते खुद को रोक लिया।
रात के 12 बजे...
1 बजे...
2 बजे...
लड़की बार-बार फोन खोलती, लेकिन खुद से कहती "नहीं... इस बार मैं ही क्यों झुकूं?"
उसी रात के 3 बजे जब लड़की को अचानक दर्द हुआ और उसका फोन हाथ से छूटने लगा, तभी उसके फोन की स्क्रीन जल उठी। लड़के का मैसेज फ्लैश हुआ— "तुमसे कितनी भी लड़ाई हो जाए, पर मैं तुम्हें खुद से दूर नहीं देख सकता। सो गई क्या? प्लीज बात करो, मन बहुत बेचैन है।"
लड़के की आवाज़ और उस मैसेज के नोटिफिकेशन की 'टिंग' ने जैसे लड़की में जान फूंक दी। उसने हिम्मत जुटाई और फोन उठाया। लड़के ने बिना इंतज़ार किए कॉल कर दिया।
लड़की की भारी आवाज़ सुनते ही लड़का सब समझ गया। वह तुरंत अपनी बाइक उठाकर उसके घर की तरफ भागा। सही वक्त पर उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया और उसकी जान बच गई।
अस्पताल के बेड पर जब लड़की की आँखें खुली, तो सामने लड़के को अपनी उंगलियां थामे पाया। लड़के ने उसकी आँखों में देखते हुए धीरे से कहा— "सॉरी, अब कभी 11 बजे का इंतज़ार नहीं करवाऊंगा।"
लड़की ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ और ज़ोर से पकड़ लिया। दोनों ने यह सीखा कि:
"रिश्तों में 'अहंकार' (Ego) से बड़ा 'एहसास' होना चाहिए। झुकना कमज़ोरी नहीं, बल्कि उस रिश्ते को बचाने की ताकत है जिसे आप खोना नहीं चाहते।"
आज भी रात के 11 बजते हैं, पर अब मैसेज "सो गई क्या?" का नहीं, बल्कि एक-दूसरे का हाल पूछने और साथ निभाने के वादे का होता है।
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