जिस केदारनाथ में शंख नहीं बजता वहाँ आतिशबाजी हो रही है और इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला जा रहा है।
हमारे पूर्वज कहा करते थे कि कविलासों(हिमालय) में चीखना चिल्लाना या ज़ोर से आवाज़ नहीं करनी चाहिए दोष लगता है। शंख बजाना ही नहीं हिमालय के कुछ स्थानों पर ढोल दमाऊं लेकर जाना भी वर्जित था।
हिमालय बहुत संवेदनशील पर्वत हैं वहाँ के दुर्लभ जीव-जंतु वहाँ की परिस्थितिकी बेहद संवेदनशील है। वहाँ रहने वाले मनुष्य–ऋषि, महर्षि भी तपस्या में लीन हो सकते हैं। अतः किसी के जीवन में ख़लल उत्पन्न किए बिना, शांति भंग किए बिना कविलासों की यात्रा सम्पन्न करनी चाहिए। असल में यह खुद के जिंदा लौटने और यात्रा सम्पन्न करने के लिए ज़रूरी भी था।
पहले केवल शांति की कामना से ही लोग केदारनाथ(हिमालय) की यात्रा पर जाते थे मीलों पैदल चलते थे तब जाकर केदार भगवान के दर्शन होते थे उसमें कई लोग पहुंच नहीं पाते थे कई पहुंचकर लौट नहीं पाते थे। यात्रा पर जाने से पहले यात्री घरवालों से अच्छे से मिल लेते थे, खूब रो लेते थे संभवतः दुबारा मुलाकात हो न हो।
जब जीवन की अनिश्चितता होती है तो आदमी खुदबखुद अच्छा हो जाता है। मौत का भय और भूख प्यास की तड़फ नीच आदमी को भी सज्जन बना देती है इसलिए पापी लोग भी जो यात्रा पूर्ण करके घर लौट आते थे लोग उनकी चरण रज माथे पर लगाते थे वह चलते फिरते धाम बन जाते थे। सम्मान पाए हुए पापी व्यक्ति के लिए पुनः बुरा कार्य करना कुएं से ऊपर आकर फिर कुएं में गिरने जैसा होता है। अतः वह पाप करना छोड़ देता था। धर्म में यात्रा का प्रावधान इसी बदलाव के लिए होता था।
किंतु आज लोग यात्रा क्यों कर रहे हैं? क्या यात्रा से लौटे लोगों में आज भी ऐसा बदलाव देखने को मिलता है ? क्या आज भी ईश्वर के लिए ऐसे समर्पित यात्री देखने को मिलते हैं? समय के साथ धर्म का अनर्थ हो गया है केवल धन का ही अर्थ बचा है।
खुद को सोशल मीडिया पर अलग दिखाने और लाइक कमेंट्स बटोरने की चाहत में आज का युवा बोरा गया है।
पिछले एक डेढ़ दशक में सोशल मीडिया का चलन बढ़ने के साथ केदारनाथ आने वाले यात्रियों में युवाओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।
सोशल मीडिया पर केदारनाथ यात्रा की फ़ोटो रील्स आदि पोस्ट करने के ट्रेंड ने उन्मत्त और बदमस्त युवाओं को आकर्षित किया है। इन युवाओं को केदारनाथ यात्रा भोलेनाथ से अधिक अपने सोशल मीडिया पोस्ट्स/रील्स के लिए करनी होती है।
हर वर्ष हमें ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जिसमें युवाओं द्वारा धाम की पवित्रता भंग करने के कृत्य किए जाते हैं। यह लगातार हो रहा है और यह बढ़ता ही जा रहा है।
हैली सेवा, घोड़े-खच्चर आदि के माध्यम से यात्रा का सरल होना, भोग की वस्तुओं की आसान उपलब्धता और मोबाइल इन चीजों से केदारनाथ की पवित्रता संकट में है।
हमारी सरकारों ने तो धामों की पवित्रता को तार-तार करने में कोई कसर छोड़ी नहीं। हैली सेवा के बाद अब सरकार केदारनाथ के लिए रोपवे भी लगवाने वाली है जिससे आने वाले समय में भोगी विलासी यात्रियों की संख्या और बढ़ेगी।
समय रहते यदि इस समस्या पर गहन चिंतन न किया गया तो जनसंख्या बढ़ने के साथ नई नई समस्याएं जन्म लेंगी साथ ही धाम की पवित्रता भी जाती रहेगी।
~ नन्द किशोर भट्ट
Asha pandey
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